Skip to main content

Full text of "Tulsidas Ramcharitmanas Vol.1"

See other formats


3 08% 089 
३१७०७ञप#त्त एक्राएहशआाए 87889 
गाएएछ 


ए9&॥8 ॥.(5षटा, 0 2 


व्यय 2!52 । 5५ _।).09 7 "| 
46 ० #(८#र 


#व्य्मटिं206:54 6 हगक 


प॥४ ए००८ ४४070 ७०७ ए"एएय66 (० 06 एव) 
दिया 0 इक 086 हम आम पलक 9ल0च 
पतह्ठ॒ क्र बड़ फटा ॥ल्य।ज धरा) 

छ९ लो470०१. 





प्रीविष्वेरवर' घरपम्‌ 


श्रीरामचरितसानस 


अयोध्याकाण्ड 


( प्रभम क्षण्ड ) 
( भावार्थ ) श्र्तपूर्णापमहित रामचम्हस्मृति" ( शास््रीय स्यास्या ) 


प्यास्पाता 
प० श्रीविद्यपनाय शास्त्री दासार 
( पास्त्ररत्ताकर विद्याभूषण स्यायप्रमाकर श्यायकेसरी नीविषास्त्प्रबीण ) 


छेछर 
थी पोताराम मिष 
हिन्दी बिधारद 


| किक +म कस 54 ३ कक 2 || ॥६७छुए।!प | भा भफासथपमलल भ भआाभा पुष्च 
| किक काना 


|] ्+ 


प्रकाएक 


विश्वनाथ शास्त्री दाप्तार-पुरतक समित्ति 
के० २०८१ ब्रह्माघाट, वाराणसो 


[ | + 


प्रकाशक है 
विश्वनाथ शास्त्री दातार पुस्तक समिति 


के० २२/८१ ब्रह्माघांट, वाराणसी 


सर्वाधिकार सुरक्षित 
मूल्य * पचीस रुपये 


प्राप्ति स्थान हु 

गीर्वाणवार्वधिनी सभा, सागवेद विद्यालय, रामघाट, काशी ह 
श्रीविश्वनाथ शास्त्री दातार परिवार ( उक्त-समिति-सदस्य ) 
के० २२/८१ ब्रह्माघाठ, काशी 

श्री सीताराम सिश्र रामघाट के० २४[२८ वाराणसी ( उक्त समितिसदस्य ) 
श्री रामकिशोर मुदडा चौखम्भा सी० ४/२३ वाराणसी ( उक्त समितिसदस्य 
श्रो केसरीनन्दन रस्तोगी राजादरवाजा काशी ( उक्त समितिसदस्य ) 


| 
| 


मुद्रक 
शीला प्रिण्टर्स, 
लहरतारा, वाराणसी 


प्रथम सस्करण 
प्रतियाँ ११०० 
भाद्र शुक्ल पक्ष ४, 
सवत्‌ २०८४ 
रे £ हा! 

63 


जा 
६. ३2 


झओ पुदस्षरणम्‌ 
व्याय्पाता फा प्राषकर्यन 


प्रस्तुत व्यास्पा में छास्त्रप्रामाण्य की प्रपानतया चर्चा करसे हुए बरास्यगाछ को घटना माद धातो 
है। ध्राप २०वें वप आयुष्य के पूर्व ही मुप्ते राजनाति विषय में छिखने की प्रयुत्ति हो रही थी | उसी सावग 
में मेने स्व० सदाशिय शास्प्रो बापद महो”य से सेखनकार्म आारम्म करने के छिए मुद्दत्ते पूर्छा या। उनके 
द्वारा निदिष्ट महू्त में गागज कलम सलेकर खेखन बा 'उपक्रम' थी गणेर से किया। पर वृद्धि प्रतिभादि 
के अमाव में कलम आगे न घढ़ सकी । बडाचित्‌ स्व* गुरुजी ( श्री पण्डिपराज 'राजेष्यर पास्त्री द्रविष्ठ ) 
मे मेरा पुश्रयोग देखने के लिए भृगुसंह्िता निकाछो तो उसमें भी प्रस्थकर्ता का मोग देखा गया। गुरजो 
के मिह्ट राजनीति का अध्ययन चछ ही रहा था, पेषविछास स' गु८जी के साथ देशअमण का अवसर 
मिष्टा। उसमें राजनीति बा व्यास्याम सुनने-्सुनाने बा सुयाग प्राप्त हुआ। गुरुजी के आदेश से उन 
व्याण्यानों वा संकछतन धान्ति का सप्रदूत' नाम के तोन भार्गों में क्षेपियद्ध फरमे से ग्रम्यक्तृत्त का 
अनुभव हुआ, पर यह अनुवादमात्र था । 

भाएगति से पिछृबियोग पुप्नवियोग बा दु'य आ पढा । भाग्तीय राजनीति के पिम्ठन में पूम्य गुंस्जो 
रामबरितमानस का अभ्यास करते पे शिसस मेरी भो श्रद्धा उस प्रग्थ पर घढ़ गयी | पुराण कपा के श्ोता 
मेरे प्रिय भिष्य थी रामबिधोर मुँदड़ा रामघरित्र बे विपय में दांबाएँ उठाते मुप्ते उनका उत्तर न्याय प्रणार्ठी 
के आधार पर सोघबर देना पडता दब उनफो समाधान होता। उसो समय यह घिचार आया कि गुरुबी 
बी भारमतुष्टि के शिए राजनीति वे पुनश्द्धार हेतु स रामचरिसमानस की सीतिपरक ब्यास्या को बर्षोंल 
शिखा जाय ? 

गृररुषी गो समस्या, मनिष्ठ पुप्रचियोग ध्रातृब्ियोग गुएवियोग का वातावरण मनोधियोग में विक्षेप 
कर रहा था उसी समय विघार आया कि मामस की धास्त्रीम टोका के महाने से हो श्रीराम की णरण 
में जाजर बर्यो न धात तिछाम किया जाय ?+ ऐसा सोचकर गुरकृपा से प्राप्त क्षास्प्रधाघ का उपयोग मान 
का घोपाइपों>ोहीं के अर्थविचार में बरने का निशम्यय किया, शदनुसार ( धास्त्रोय स्याक्या ) छेखन आरम्म 
हुआ | स्फुट विचारों गो पुस्तक गत रूप दन के लिए क्रमानुस्तार एखनवद्ध करने की समस्या थी। सभी 
देव मे लवदाप्टप्राप्त श्री प्तोताराम जी मिथ महोदय को सगति का |सुयोग प्राप्त करा विया। उनका 
संक्षिप्त परिचय संजरत है। घार वर्ष से श्रधिव उनके -ससत परिश्रम से अयोध्याकाण्ड को छास्त्रीय 
व्यास्या दो खाण्डों में प्रयाधित हो सकी है। 

पुस्तपप्रकाद्षन में दूसरों मुख्य समस्या अर्थव्यय को थी। प्री रामकिक्ोरब्ी ठीकाप्रकाशम के 
एिए मे कैयल उत्साहित ही कर रहे थे, वल्कि प्रकाप्तन के प्राराम्मकब्यय का भार भी बहूस करने को 
तसर हा गये। छुभस्प थ्ीघ्र॑ प्रकाणम बम आरम्म होते ही श्री गौरीनाय धास्त्री ( तत्कालीन 
उपकुछपति सं० सं० वि० बि० ) बे द्वारा ध्ास्प्रचृद़्ामणि योजना के -अन्त्र्गंठ जो वृत्ति को ध्यवस्था हुई 
उसका घछ छेकर प्रकाशन दाग्य कर्षचित्‌ सफड़ हो सकात +- + 

घार वर्ष पूव इस स्पास्या के मामकरण का ँउस्सक स्व० सौ०भनोरमा गुणे के द्वारा प्रसिद्ध वणिक्‌ 
श्री भागवतवास जी की रामघाट स्थिप्त कोठी में सम्पस्न किया ।गया'या | [ स्थ० पौ० ममोरमा गुणे 

-के जीवन का संक्षिप्त परियय संरग्न है )। 


मन ४ + 


पाठकों की सुविधा के लिए यह भी कहना अपेक्षित है कि गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित रामचरिते 
मानस के मल पाठ के आधार पर व्यास्था में चोपाई, दोहा, छद को सम्या का उल्लेख किया गया है। 
इस प्रकाशन में जो भी भज्ञता प्रयुक्त पाठकों को कठिनाई का अनुभव होगा व श्रुटियाँ दृष्टिगोच र होगी 
उनका समाधान कृतज्ञता प्रकाशन नमन भादि द्वितीय सण्ड मे द्रष्टव्य है । 
लेखक का परिचय 
प० सीताराम मिश्र काशी के प्रतिष्ठित गौड ब्राह्मण वश में उत्पन्न हुए है। पिता का नाम स्वृ० प० 
बटकप्रसाद मिश्र, माता का नाम स्व० बच्चो देवी था। उनके पूव॑ंज काणी के प्रसिद्ध राय खानदान के 
कुल पुरोहित थे इस परम्परा का निर्वाह मात्र आज भी है। मातृवश में उनके नाना प० गोरीदत्त मिश्र 
काशिराज के दानाध्यक्ष थे । 
श्री मिश्र जी ने इटर तक अग्रेजी शिक्षा प्राप्त करके कुछ समय तक बाबूराव विष्णु पराइक्र 
( तत्कालीन आज सम्पादक ) के सरक्षण में सम्पादकीय विभागों में काम किया। फिर काणी हिन्दू विश्व 
विद्यालय, कालेज आफ टेकनालॉजी के विसिपछ आफिस में दो वर्ष काम किया अन्त में रेलवे के 
लेखा विभाग में कार्यरत हो गये | सन्‌ १९७८ मे काणी के मडुआभाडोह स्थित डीजल लोको कारखाना से 
रिटायर होकर रामघाट में निवास करने लगे । 
देवपृजन एवं कथा में आपकी स्वाभाविक रुचि थो। भाग्यवशात्‌ साधु सतो का सम भी होता 
रहा। उपरोक्त डोजल लोको कालोनी मे रहते रामचरितमानस के अखण्ड पाठ का नवाहायोजन 
नियमित रूप से होता रहा जिसका फल हुआ कि भोसला मन्दिरस्थ ( व्याख्याता ) की भागवत्तकथाश्रवण 
मे रामायण की चर्चा सुतकर उसके तात्तिक विवेचन मे श्री मिश्र जी की रुचि जागृत हो गयी और 
स्वेच्छानुसार शास्त्रीय टोक़ा लेखनकार्य में दत्तचित्त हो अवकाश का सदुपयोग करते हुए प्रस्तुत 
पुस्तक के प्रकाशन में सहायक हुए। इटर तक दी शिक्षा में सस्कृत विपय के सामान्य ज्ञान से इन्होने 
शास्त्रीय तक मोमासा सिद्धान्त को मेरे साथ बेठकर समझने का जो प्रयास किया है उसको सामान्य 
भाषा में व्यक्त करके पाठक के समक्ष उपस्थापित किया है। 
. अभु से यही प्राथंना है कि वे श्री रामचरितमानस की शोष शास्त्रीय व्याख्या के लेखन में आपको 
समर्थ रखें । 
स्व० सो० सनोरमा गुणे का परिचय 
आपका जन्म महाराष्ट्र प्रान्त के रत्नागिरि स्थान में हुआ था | पति का नाम वैद्य मनोहर पत गणे 
था जो सगमनेरनिवासी थे। अपनी माता उमा वाई तंाँबे के सुशिक्षण से आपकी रुचि वाल्यकाल से 
ही वर्णाश्रमधमंप्रधान रही। आपके पातिक्रत्य से दोनो कुछ की मर्यादा को उज्वलित किया। पुराण 
इतिहास, धर्मग्रन्थ के श्रवण-पठन में जीवन बिताते हुए तत्सम्बन्धी विषयों की कविता मराठो भाषा में 
लिखने में आप अभ्यस्त रही जिसका परिचय द्वितीय खड में उद्भूत मराठी पद से प्रकाशित है। आपने 
बाबा साहिब पुरन्दरे द्वारा रचित शिवाजी-ररित्र को अपनी कविता में लिखा है। 
वानप्रस्थ के सकल्प में घर-परिजन आदि से असग होकर आप काशीवास के लिए मगलागौरी 
स्थित अपने भाई अग्निहोत्री ताँबे जी के पास आकर रही, मनस्‌ सनन्‍्यास की ओर रहा। श्रो दातारजो 
को भागवत कथा की नित्य श्रोत्री रही ! अन्त त्तक आपका जीवन धमंपरतन्त्र रहा। अन्त में गगाजरू 
'मात्र पीकर प्रायोपवेशन करते हुए आपने शरीर त्याग किया । [ बाप साहेब ताँबे ] 


“विश्वनाथ शास्त्री दातार 


ग्ामुस 


भरी गुरुचरन सरोच्रन मिल मनु सुकुट सुधारि। 
घरनउ रघुवर विमसू जसु नो दायकु फल चारि ॥ 


पूज्य पाद गोस्वामी छुछसोदासजो ने बाऊकाण्ड के मेगछाचरण में “नाना पुरण्ण निगमागम' उपदिष्ट 
मर्तों का समन्यय-संग्रह बवचिदयतोर्श्रव/ फ॑ द्वारा अपनी गुरुपरम्पराप्राप्त मति के अनुसार विवेषूर्ण 
भृक्तियों से रामचरित फो प्रथा यराभ्य ( रामघरितमानस ) के रस में प्रकाक्षित किया है। रचि महेस निज 
मानस रास्ता । पाह सुसमठ सिवासन भाषा संमुप्रसाद सुमति हिंयें हुछुसी । रामभरित मांस बवि छुछसी' 
के अनुसार गोस्वामीजी मे 'संवतद सोरहू सो इकलोसा। त्ोमो भोमवार मधुमासा अवधपुरी यहू खरित 
प्रकासा' के अनुसार प्रन्यारम का क्रम दिखाया है। 


रामचरित्र के यर्णन में प्रम्थबार को दृष्टि श्रीराम के प्रमुस्व एवं मानवता से विशिए (कारणमानुप')-- 
इन दा हत्वोँ के प्रश्राशम पर कर्द्रित है। ध्लोराम को प्रमुता का स्थापन व स्॑प्रधम धिवचरित्र के स्पष्ट 
शिंगक दर्णन से उपक्रमभूमिका में कहे “मात्तु पिता गुर प्रभुग्े घानी। विनहि विचार करित सुम जानी' 
द्वारा स्थापिस सिद्धाल्त का उपस्थापन करके धच्चनप्रमाणप्रमित हितकारिस्व मे भक्ति विवेक घ्म नीति 
का भोग दिखाया है| उसमें शासम्य यह है कि शास्त्रयच्नन के हिसकारिस्व में विध्यास रक्षकर धास्त्रविधि बा 
पाझन घममं है. विद्यार्मों के वछायछ का विचार वियेक है, उसमें प्रस्यक्षानुमान का पुट दैना नीति है। सबके 
रक्षेकसप में भक्ति प्रमुख है। 


राम' प्रमु मो पहुचान में क्षिवज़ों ने अपने भमिनयात्मक दच्चन से जो युद्ि सती के समक्ष प्रकट 
की उससे सती के मनस्‌ का संशय महों मिटा जेंसा घाऊकाण्ड के शिय चरित्र म बढ़ा गया है-- 
सतो सो इसा संभुके देसों॥ उर उपसा संरेह विसेयों ॥ 
संफद कगतर्वश जगदीसा | सुरमर मुमि सब लावत सीसा 0 
हिन्हू नृपसुतहि कोन्द्रु परतामा। कहि सच्चिदानन्द परधामा॥ 
भए मणन छपि सासु परिशोको | अमहें भोति उर रहति न रोको 0 
क्रह्म थो व्यापक बिरल अज्त अकछ अनोह अभेद ॥ 
सो कि देह घरि होइ मर लाहिन जानत सेद श| 
श्रौराम के प्रभुत्य को पहचान में उसी युक्ति को छोकवेद्य बनाने के छिए कवि ( शिवज्ञी ) सतापस- 
प्रसंग में दो० ११० के अर्गंत 'जे ठिन्‍्हू करि जुगुपि यमु पहिचाने' से मर्ज आश्रम फे समीप मसुता 
तीर वांदियों फे मध्य म स्फुट बरेंगे जिसमें पा॑प्तीजी के प्रश्न (  रामु सो अवधनूपति सुत सोई की भ्रम 


अगुन अछस्त गति कोई” )5था भरद्वाज मुनि के ( भ्रक्म रामु बवन प्रभु पूछतें तोही। कहिज ब॒ुझ्ताइ कृपा 
निधि मोहि/ ) का समाधान होगा। 


3 १: से 


वनवास ( चित्रकूट वास ) तक का चरित्र रामचरित्र का पूर्वार्द्ध कहा जायगा जिसमे श्रीयम का 
प्रभुत्वप्रतिपादक चरित्रविशेष है। रामचरित्र का उत्तराध लकाविजय तक है जिसमे "में छू करंत्रि 
ललित मर छीछा' के अनुसार सत्यसघ पित्ताश्री के बचनप्रमाण के अनुगमन में भक्ति-विवेज-बम से युक्त 
मानवताविशेष है जिसकी पूर्णता 'जौ जनतेउ वन बधुविछोह। पित्तावचन मनतेऊ नहिं ओोह' ( चौ० ६ 
दो० ६१ ल० का० ) से स्फुट है। शिवजी के उपरोक्त सिद्धान्त को लोक में नीतिमम्मत बनाने के लिए 
सत्यसच हितकारी पिताश्री के वचनप्रामाण्य को दो० १०३ में कहे गगाजी के "बगौरपेय बचना से पुण्ट 
कराकर श्रीराम के नरचरित्र की विशेषता वो दर्शाया गया है। मानसक्ार का उद्देष्य यही है कि अध्वस्त्त 
का बोध कराते हुए चातुव॑ण्यसमाज को रामभक्ति में स्थिर करना तथा रामचरित्र से मानव जीवन के 
प्रति व्यापक दृष्टि देता । 

नोति को राजनीति कहने का अर्थ इतना ही है कि शासक होने के नाते राजा द्वारा भक्तिसम्बल्त 
सम्पूर्ण धर्मों एव विद्याओं का रक्षण नीति के अन्तर्गत है। इसी कारण राजा की प्रतिष्ठा सर्व॑मान्य है 
नीतिच्युत होनेपर राजाओं की आदरपात्रता सन्त, महात्माओ, विद्वानों की दृष्टि मे समाप्त हो जाती है । 
ऐसे राजाओ के पत्तन का इतिहास पुराणप्रसिद्ध है। 


गोस्वामीजी की कलापूर्ण कृति मे कुछ स्थल ऐसे है जिनका गृढ्यर्थ समझने मे वृद्धि चकरा जाती है 
अत ग्रन्थ का ही सहारा लेकर व्याख्या मे उनका आभाणय यथामति प्रयाशित करने का स्वल्प प्रयास किया 
गया है। उदाहरणार्थ विमल वस यह भनुचित एक प्रेमु सप्रेम पछितानि भादि। 


प्रस्तुत व्याख्या में निम्त विशिष्ट स्थलों की ओर पाठको का ध्यान भाक्ृष्ट करना है :-- 


१. निकालज्ञ होते हुए मुनि वसिष्ठ ने रामराज्योत्सव के समर्थन मे “राजन राउर नामु जसु सब 
अभिमत दातार। फल अनुगामी महिपमनि-मन-अभिलापु तुम्हार! (दो० ३) कहकर राजाश्री को 
क्यो उत्साहित किया ? जब कि रामराज्याभिपेक में विध्न होनेवाला था इस जका के समाधान 
में सुदित सुमगलु तबहि जब रामु होहि जुबराजु' तथ्रा 'जौ विधि कुसल निवाहै काजू' की 
व्याख्या द्रष्टव्य है । 

२ भन्थरा द्वारा कहे 'भयउ पाखु दित सजत समाजू' मे 'पाखु दिन! की सगति शास्त्र के आवार 
पर दिखाने का प्रयास किया गया है । 


३ 'देखहु काम प्रताप बडाई' से कामप्रत्ताप की प्रसक्ति मे राजा दशरथ की सामयिक चेष्टा को 
दिखाते हुए धमंशील राजा मे कामुकतादोष का परिहार भी किया गया है। 


४ दो० २६ के अन्तगंत राजाश्री की गर्वोक्ति का आभास होता है, पर उसका वास्तविक उद्देश्य 
राज्य मे निरपराध-स्थिति को सूचित करता है--इसका स्पष्टीकरण व्यास्था मे देखें | 


५ कैकेयी की वस्याचना मे 'पुरचहु नाथ मनोरथ मोरी' मे मनोरथ का ओऔचित्य न्यायप्रणाली से 
किसप्रकार सम्मत है ? इसका विचार किया गया है। 


६ श्रीराम की-चोौ० १-२ दो० ४६ मे 'पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू! आदि उक्तियो की व्याख्या 


3 के तरुणताप्राप्त पुत्र के प्रमाद का मनौवेज्ञानिक विवेचन युवको के शिक्षार्थ महत्त्व का 
यहै। 


>> छ ० 


७ दो० ४७ के अन्तर्गत कहे स्त्री जाति के दुर्गुणों से स्त्रोविरोधी मावनाओों को छेकर जो भाक्षेप 
किया जात्ता है उसका समुचित समाधान ब्यास्पा में किया गया है। 


< सोघाराम-सम्बाद में पातिव्रत्प ( प्रथम कर्प ) एवं उप्तके अनुकल्प का निरूपण करते हुए 
पतिद्रत्ता का स्वमाय यताया गंगा है। सोसाञी के पातिग्रत्य-आच्रण की प्रतिष्ठा गंगाजी के 
वचन से सिद्ध की गयी है। राजा के सन्देष म सीतामो के लिए कहे फिरदइ छ हो६ प्रान मबछूवा! 
फा सात्यय दिखाते हुए वतवास में सोहाजो को 'महिं मग अमु भमु दुख मन मोरे! वी स्थिति 
को स्पष्ट किया गया है। 


९. सीताजी ओर लंक्ष्मणद्धी को दिये श्रीराम के उपदेष्य का साथंब्य 'देतुपन्यास' न्याय से सिद्ध 
किया गया है। 
१० सुमस्त्र द्वारा सुनाये राजा के द्वितीय आदेश की प्रसक्ति का अमाव न्याय की फसौटो पर कहाँ 
तह मान्य है इसका विस्तृत विचार व्याख्या म॒ किया गया है। 


११ सुहाई रहहु भगस मनके कूटिसाई (घो० ९-८ दो० १ )। ऊँ निवास सीच करतूती | चछी 
विचारि बियुध मति पोचधी फे निराकरण में सरस्वती के 'आगिलु काजु विचारि बहोरी | करिहृहि 
भाहु कुसछ कवि मोरो घरो०५से ९ दो० १२प्ते व्यक्त तात्यय॑ पुनि कछू छजन बढु घानी। 
प्रमु यरमे घड़ मनुचित्त जानी ( घो० ४ दो० ९६ ) लादि आदि को उपपत्ति चिन्तित है| 


१२ छदश्मणजी से उमिछा की मेट तर होने को उपपत्ति में पति का सेख्यत्वासमासकाछ्तीन सेवकस्वा 
भ्रत चिन्तमीम विपय है। 


१३ केवट की प्रार्थना 'फिरतो वार मोहि जो देवा । सो/भादु मैं सिर घरि छेवा का प्रभु के बाकाश 
मार्ग से छोटने पर पूर्ण करने की श्पेक्षा मीमांसा न्‍्पाय से निरत है जो ब्पाश्यायें में स्पष्ट है। 


१४ शास्त्र को मगबान्‌ का रण कहा गया है | शास्त्र ही भगवान्‌ का आदेश है। लेसा दो० ३२५ में 
भरतजी के सम्वम्ध में 'नित्त पूजत प्रभु पाँवरी प्रीधिन हृदय समाति। माँगि-माँगि भायसु 
करस राजकाज यहू भाँसि' से स्पष्ट है। मानव अवतार ,छेकर प्रमु मी प्लास्त्र के -अधीन हो जाते 
हैं जेसे शेकेयीडी की घमंसंवद्ध प्रस्याचना को धाास्प्रसम्मत मानकर पितु आमसु वहुरि सम्मत 
जननी तोर' से प्रमु ने वनवास को सह स्वीकार किया तथा सस्यसंघ पिताश्री कै बंधन 
प्रामाष्य को पंगाजी को अपोस्पेय वाणी से सिद्ध करा दिया। ( दो० १०३ ) | छुम-अक्षुम कम 
का निर्णायक शास्त्र है, पर फछमोग ईप्वर के अधीन है। दास्त्रविधि एवं फछुभोग में उक्त वैषम्प 
बी विजिश्रता को रामवनवास म देखकर राजा दषश्यरष ने श्रीराम के प्रमुत्व का अनुमान किया 
बहू दो० ३९ की श्यास्पा में द्रष्टष्य है। 


सर्माश्म को छेकर दास्त्रोय ध्यास्या में भक्ति भ्मनीसि का वियेजन किया गया है। मानव लोवन 
का अस्तिम ध्येय भगवत्मदप्राप्ति है| वरसंमान समाज में फेक्ली सोच जाति या घुद्र विरोधी भावना के प्रत्युत्तर 
में कहना है कि वर्णाश्नम धमम के अनुगमन में मक्ति बी सुखमता सब दण व तदनुगामियों को एकसमान है 
उसमें ऊंष-नीच की मर्यादा अवरोधक सहीं किन्तु साधक है। गुह केवट गीघ छबरी मभादि से छ्ेकर मुतति 
महपि तक को कृतार्भता में प्रभु का पक्षपासरहित अनुग्रह भक्ति सुपतल्त्र सकल गुम खालौ' से संगत सुरसरि 


पे 722 कलर 


तीर आपु चलि आए! की व्याख्या मे प्रभु के स्वतन्त्र कतुंत्व मे दर्शाया गया हे। उसमे ध्यातठ्य भक्ति का 
मल साधन 'प्रथमहि विप्रचरन अति प्रीती । निज निज कम निरत श्रुति रीती' है जिसकी रेबट मी उक्ति 
तुम्हार मरमु मे जाना” । व्याख्या में स्पष्ट किया है। भक्ति की उक्त स्वतन्तता या नाममाहात्म्य के चाम- 
पर निरकुश हो वर्णात्रम धर्म की उपेक्षा करना प्रभु फो इष्ट नहीं हे स्विहना नीति ह्ठि ले समाण 
की सुव्यवस्था भें वर्णाश्रम की उपयोगिता विचारणीय है। भारतीय राजनीति वी सफलता गा का आधार 
वर्णाश्रम की प्रतिष्ठा पर ही निर्भर है जसा उत्तरकराण्ठ में रामराज्य के वर्णन में कहा गया है -- 


सब नर करंहिं परसपर प्रीती। चलहि स्वधमंनिरत श्रुतिन्‍्नीति॥ 
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। परि रहा मपनेहूँ बघ नाहों 
रामभगतिरत नर अर नारी। सकछ परमगति के अधिकारोश॥ 


१५ चित्रक्कट पहुँचने तक वीच मे श्रीराम के निवास की प्रयोजऊता तत्तत्‌ स्थलो मे व्यास्थान है । 
अन्त में स्व० परम पूज्य गुरुजी (श्री राजेब्चर गास्त्री द्रविड़ ) का स्मरण करते हुए उनके द्वारा 
कहे मानस की चौपाइयो में 'एहा-एह' के बहुल प्रयोग क्रा सार्वक्य आस्चीक्षिय्युक्त तर्जानुभाव को रफुड करने 
में समझता है जहाँ ग्रन्थकार को सिद्धान्त रप में यथार्थ तत्ववोच कराना अपेकलित है वहॉनच्र्शा एह्रा-ाह् 
से नीति आदि विद्याओ से पोषित भक्तिसिद्वान्त का स्थापन तकंयुक्‍त अनुमान के आधार पर समझाना 


है। इसको ध्यान मे रखते हुए मानम-पाठजिज्ञासुओ व शोधकर्ताओं के लिए यह थशास्नोय व्यास्या 
मननीय है । 


प्रस्तुत शास्त्रीय व्याख्या में शास्त्रों के पारिभाषिक णव्दों का प्रयोग इसलिए हुआ है फि बिना दुर्ग 
मे रहे तकपूर्व॑क प्रमाणसिद्ध अर्थ का समन्वय करना सम्भव नही था तावन्मात्रेण पाठफ़ी को असन्तोष हो 
तो उनसे व्याख्यात्ता व लेखक अपनी त्रुटि के लिए क्षमाप्रार्थी हैं। 


प्रस्तुत व्याख्या मे साहित्यिक विपय पर चर्चा न करके जास्त्रीय गूढार्थ पर ही विशेप बल दिया गया 
है जिसका उद्देश्य यही है कि धमंतीति एवं भक्ति के साधन में शास्त्राघारित तत्वों को समझकर पाठक 
कल्याण मार्ग ( धर्मत्तीति सबलित भवित ) को अपनावें «अन्यथा निगमानुणासनविहीनता ( मारग सोड़ 
जा कहूँ जो भावा ) का परिणाम 'मिथ्यारभ दभ रत' सिद्ध होगा जिसका फलू उत्तर काण्ड में कथित 
( “तामस धर्म करहि नर जप तप ब्रत मख दान” ) अशुभ की प्राप्ति है। 


-सीताराम मिश्र 


आीबिश्वेश्वर' प्तरणम्‌ 
श्रीगुरुः झरणम्‌ 


अथ्‌ अयोध्याकाण्डम्‌ 
अम्नपू्णो ( माबाये ) सहदितम्‌ 


रामचन्द्रस्थृति ( शास्त्रीयव्याख्या ) समेत 
भूमिका 


प्रमाणका चछाबर सभा प्रमेय ध्िचारकी सामान्य रुपरेखा “लक्षणप्रमाणाम्या हि प्रमेयसिद्धि'"० 
ईस न्यायसिद्धान्तफे अमुसार प्रन्थकारने थाल्कापडफे शिय और रामजीके संयबादम परमहितकारी 
प्रमुके घनको प्रमाण मानकर शिघज्जीके द्वारा प्रमेयसिद्धि स्थापित की है। जेसा कि निम्नलिखित 
जौपाइयों से स्पष्ट है-- 


“प्ातु पिता मुर प्रश्न कै पानो । विनदि दिचार करिअ सुभ नानी ॥ 
तुम्द सब भाँति परम द्वितफारी | अन्ना सिरपर नाथ मुम्हारी॥ 
प्रश्न तोपेठ छुनि संफर पचना। भक्ति - विबेक - धर्मशुत रचना”! ॥ 
प्रमाणभूस यचनपर दृद् निष्ठा हो तो प्रमेयसिद्धिमें फोई संशय फरना या यचनके पाछनमें 
हिघकिधाहट ना मक्तिपंथके यिरुस ऐप । 
छ्िषजीफे उपयुक्त यर्यनोमें यही ठफ भक्ति-षिचेक-घर्मसे संघघित मक्तिप॑मका संस्थापक है' कौर 
इसीमें प्रमु पृण॑ संतुष्ट हैं। मक्तोफे लिए ऐसा ही भक्तिपय घछुमदायक बताया गया है'। चालफ़ाण्ड फे 
हुसी धर्म वियेक-मक्तिफे सम्वघवों प्रफट फरते हुए प्रन्यफ्रार अयोध्याफाण्डफा स्थापन कर रहे हें। 
मन्यरा-फैफेयीपे: पक्षने प्रमाणपरतन्त्र स्यक्तियों लेसे रमा दशरथ, शभीरास आदि फे प्रति 
जो इक्राओंफका चीजारोपण फिया ८सफा प्रमाय या आक्रमण संपूणे राज्यमें और चोर ढाकुओपर मी 
पड़ा | इस भेद-नीछिफे छारा म॑पर्ण राज्य बिनाझ्फे फगार पर पहुँच गया। गेसी पिकट परिस्थितिसे 
क्षपनेफो वचानेफे लिए राजा दृश्य, भीराम और मरतने उन शंकाओंका उन्‍्मूछन फैसे किया ९ 
इसका तर्फयुक्त पियेचन करना प्रस्तुत फाण्दफा पिपय है। 
औरामफे चित्रफूटमें घिराजनेतफफा बणेन अयोध्याकाण्डका पूषोधे और मरत-भरिश्रफा ब्णेन 
ध्तराधे दै'। इसमें म्रसाणके चछावछफे पिचारके साथ समस्त विद्याओं सहित भारतीय राजनीतिका 
रक्षण और इन्द्ीफे माष्यमसे मक्तिका पोपण होगा, जिसफो दृशरथ-फैकेयी-सेपाद, कौसल्या-सीता 
राम-संयाद, रास-झत््मण-संयाद और अन्तर्मे मरतचरित्रफे निरूपणसे भ्रन्यकार प्रस्तुत करेंगे। 
कहीं दुशरथका यबन सयेया और कहीं सापेक्ष रूपमें प्रमाण भाना गया है--उदाहरणार्थ, श्रीराम 
बन-गसनमें राजा दशरथका षचन पूर्णेत्या प्रमाण सानते है पर सुमन्त्र द्वारा राजाके सन्देशको सुनकर 
सी यनसे छौटाने संबघी राजवन पर ध्यान नहीं देते। सीताका भी ऐसा दी चरित्र है । इसी प्रकार 


3 छश्वण और प्रमाणकि हारा हदवी प्रमेप-सिदधि होती है ! 
३ इुकिये क्षपोप्पाकांड शो ९०५ ञऔी ६ आंर एंका कांड दो ९१ नो ६ 


२ भावाथे, शास्रीयव्याग्या समेतम 


औराम वनगमनमें कैफ्रेयीके वचनऊो प्रमाण मानते हैँ । उसीके वचनफो राज्यस्त्ीकार करनम 
भण्त अप्रमाग मानते हैँ। पर चित्रकूट पहुँचने पए राज्य-मचालन करनेमे उन्हीं बचनां का आदर 
कप्ते हैं। कौन बचन सापेक्षहूपमें क्रिस रीतिसे अनुष्ठय होता हे, यह चित्रकृद तकके श्रीरासबन- 
गशन-चरित्रमे दर्शाया गया है.। 

विद्याओंके वढावलसे बचनप्रामाण्यका सुक्म विचार भरतचरित्रस युक्तियाँ द्वारा किया गया 
है'। उन उन वचनोको विद्याके बढ्मवलविचारसे जिस अकार अलनुप्टानत प्रमाण बनाया गया है' 
उसी प्रकार साधु-सन्तोंके बचनोंके धर्म-भक्ति-विवेक-पूर्वेक तात्पयेफो समझकर काये करनेसे ही दित है, 
उसमे शंका करना ठीक नहीं हैं, यह भी दिखाया गया है'। 


प्रमाणोंकों अपनानेमें प्राएबलि 


वालकाण्डमें वचनप्रमाणको स्थिर रखनेके हेतु अप्रमाण मानने वाल्मकी बलि होना पड़ा जैस मां 
सतीद्वारा शिवजीके वचनोपर अश्नद्धा, नारदद्वारा शिवजीफे वचनोकी अवहेलना आदि। अयोन्याकाण्डम 
चचनग्रमाणको स्थिर रखनेवाढोंको भी वलिवेदी पर चढना पडा छै'। जैसे-- 

“जीवन सोर रास विन्नु नाहीं। जीवन रास दरम आधीना” | इत्यादि । 


अपने इस घचनको रखनेके लिए दशरथको प्राणत्याग करना पडा | अन्यथा उनके बचनप्रामाण्य 
के अभावमे प्रमेयसिद्धि ( राक्षसोके विनाशके वाद रूकाबिजय और सकुशछ अश्योध्या लोटना और 
त्रिकोकव्यापिनी कीति ) न होती, किंवहुना श्रमेय सिद्धिके लिए प्रभु रामकों अपने श्रभन॒त्वके चलूपर 
कारये करना पड़ता। शास्त्रवचनका आमसाण्य अकट करनेमे म्यादापुरुपोत्तमकी शास्रानुयाय्रता और 
झाखसत्रकी प्रतिछ्ठाका रूप सामने नहीं आता। 

प्रमेयसिद्धि 

त्रयी ( वेद, बेदांग सीमांसा, न्याय धर्मशाख्र और पुराण, ) के अधीनस्थ श्रीरामका गृहस्थाश्रममे 
अवेश होनेपर बातों विद्या प्रसन्न हो घर-घरमे अ्थंग्रदान कर रही है'। जेसा अयोध्याकाण्डके प्रार्भमे 
“जब ते राम व्याहि घर आये?”***** **” से कविने वर्णन किया है'। त्रयीके प्रामाध्यको उपेक्षित कर 
आन्वीक्षिकीका उपयोग करनेवाले नानाविध तके-कुतक करते द्व तो आन्चीक्षिकी विफल होती है'। 
यह मन्थरा-केकेयीसंवादमे स्पष्ट है'। केकेयी स्वयके द्वारा राजा दशरथके साथ किये तर्कभे अपनी 
सफलता समझती है किन्तु त्रयीके विरोधमे उसका तर्क सफल नहीं हो सका । दूसरी ओर राजा च्यी- 
आ्रामाण्यके अधीन रहकर आन्वीक्षिकीके साध्यमसे तकंपू्वेंक विचार करके अपना अन्तिम निर्णय 
सुनाते हैं। यदहदी निणेय सफल होकर रहा।' अभझ्ुुने भी वन्वासकी सफलताम पिताके वचनको ही 


प्रसाण साना उसके प्रमेयसिद्धेकी अभिव्यक्ति ग्रन्थकारने ल्काकाण्डमे रूक्मणशक्तिके अचसरपर 
दिखायी है' ( लकाकाण्ड दो० 5१ चौं० ६ )। 


: कैकेयी, कौसल्या और गुरु चसिष्ठ तथा सभासदोंके सामने कहे वचनोंसे भरतने अवधघवासियों 
की शंकाका उन्मूलन करके आन्वीक्षिकीकी स्थापना की है, अपना विनय प्रदर्शित करके दण्डनीतिकी 


१--- “१ खुबस वसिहि फिरि अवध सुहाई। सब ग्रुन घास रास प्रभुताई ॥ 
करिदर्हि भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहु घुर राम बढ़ाई ॥ 
तोर करलूंकु मोर पछिताऊ। सुणपहु न मिटिहिन जाइहि. काऊ ॥ 

( बा० चौ० ३ दोह्या ३६ )। 





अयोध्याक्ाण्दम्‌ ड्‌ 


सफछता दिखायी" | जिससे श्षयोष्याघासी और पनप्रान्तयासी प्रजाजरनोंका स्नेह अपने प्रति भरतने 
बना रखा तथा समी अजासे मक्तिपयको फैलाकर इसके स्नेहकी स्थिरता अपनेमें आप्त की । संवका परिणास 
यह हुआ फि उन्होंने सव भाइयों फे छिए पिवाकी अनुकंपा द्वारा प्रमेयसिद्धिका सार्गे प्रश्तस्त किया । 
मन्त्नशक्तिदेतु शिवपन्दना 
सर्वेशक्षिसम्प्त नीतिमाम्‌ व्यक्ति द्वी नैतिक कार्यफों पूर्ण फरनेर्मे सक्षम दोसा दे! शासरोर्मे 
नीतिमानोंफे छिए खक्तियोंका श्रेयिष्य दतछाया गया है | सन्श्रणक्ति, प्रमुणक्ति एवं सस्साहशक्ति। ये दी 
शक्तियां नीतिका सर्वोगीण विकास करनेमें हेसु मानी गयी हैं । 
रामायणफे नायय प्रमु भीरामर्मे उक्त सीर्नों शक्तियाँ प्रकट हैं। उसीका चित्रण करना सन्त 
शिरोमणि श्री गोस्थासी प्र माह छक्ष्य है। तीनों ाक्तियर्मि सयशास्रने मन्त्रष्नक्ति ( पिचा 
रणा ) फो सर्शश्रेघे्त माना है'। यह फकुण्ठितन हो एठदथे नीतिमानोंके छिए निर्विकारिता अपेक्षिस है, 
जो राजशास्तरमें सस्यके नामसे पुकारी गयी है, उसके अमिय्क्न-यये तपस्या, पूछा, वनन्‍्दुना जादिकी 
ख्पेक्षा ऐ। मन्त्रशक्तिका स्लोत यिद्यापति श्रीक्षिपजीकी पन्दुनासे उपलत्ध होता है। ऐसा सोचकर 
अयोधष्याफाण्डके आरं॑मर्मे गोमाइजी शिवजीकी पन्दना कर रहे है । 
संगलाघरणमें छियमीको समन करनेफा कारण यद्‌ मी है' कि गोसाईजी मक्तिसे संप्रक्त भारतीय 
शास्रसम्मसत नीसितरपका प्रफाशन फरनेफे छिए हृसर्सफल्प हैँ। इसमें शास्रपिरोध, पैराग्यफे नाम 
पर रागएी स्थिति, नीतिसे ध्युत होकर पिरक्तिके नामपर नीतिमानोंको प्रमुफे 'बरित्रमें बिपरीत 
चोध पे दम्भमें साधुत्यकी परिणति झआआादि दोर्पोफ़ी सैभावनासे बचलेफे लिए गोसाइंजी पेयक्तिक 
#ूपमे छियजीकी प्रार्थना फर रहे हैं. -- 
इछोफ-मस्पाझ्के व पिमाति भ्रघरसुता देवापगा मस्सके। 
भाले बालपिपुर्गल' व गरल॑ यस्पोरति ष्याछराट। 
सोडय॑ भूतित्रियूषण' सुरबरः सर्वाधिप सर्वदा। 
शर्वे सर्वगत झ्लिव शशिनिम भीझद्ूर'पात् मास || १ ॥ 
साखार्थ --डिनकी गोद्में दिसाऊय पर्ुतकी पुत्ती पु्॑ंती विरास रही हैं, सिमके सिरपर देशशदी शहा, रछार 
पर द्वितीयाके रत्दमाका तिछक, गंछेगें विप, हृदभपर सर्पराश पासुकिका थहोपबीत ओर झरीर 
पर आमूपण रुपमें मस्मको लपताये-जो दबोंमें श्रेट महापेश सपके श्रप्रीष्वर, संद्दार कश्मेदाफ्े, साझी 
झुपमें सबके भल्तःकरण्से निथास करमेबाछे, सबंध्यापी मंगझके स्व॒रूप भौर अश्तमा के समान 
उस्उध्रछ बर्णबाले हैं, थे करती सवु। सेरी रक्षा करें । 


घानतच्य और कामतप्तका समन्वय 


शास्ीय स्यास्या--शिवतस्प बोधास्सक है, जैसा यालकाण्डमें भीशझरजीफी पन्दनासे स्पष्ट है- 
“बद चोधमय॑ नित्य॑ गुरुम-”” आदि। उनफे घामाहु्में स्थिद 'भूघर-सुत्ता” आदि विशेषणोंसे (शाषजीकी 
निर्षिकारितार्में की प्रतीस होती हे। किन्तु इस स॑र्दधर्म शास्त्र सिद्धान्व यह है' कि शासकी पृणदा होने 


१--शयोष्पाकाण्डमें ब्लिंठ चरिध्रोमें माणसकार जाश्दीक्षिकी ज्यी तथा वार्ता विधाकी प्रठिष्टाझ बिचाहर 
में ल॑क्षास्त्रोक्त निएत वचनोंका समस्वप इर्सा रहे हैं +-- 

“इण्इमूका। ठिख्ो विद्या: विपिसमसूसो दुचइ! । क्लाल्दीक्षिकीजपीबातौनों घोगशेमसाथनों दृष्डः। तस्व 
छीति्ि इण्डलीपिए” 


छ भावाथे, शास्तीयव्याख्या समेतम 


के अनन्तर कामतत्त्वके समाल्गिनकी सुसानुभूतिसि ऊध्वेरेतस्क्र जानी यदि अपना समय कतिपय 
दिनोंके लिये व्यतीत करते हैं. तो भी उत्तका निमल लानतत्त्व उच्छिन्न नहीं शोता ननी छामतत्यरी 
अधीनतामे ज्ञानी व्यक्ति अनुचित कार्य ही करता है.। अत जानी शिव जस सत्रगके लिए भुवग्सुना 
का अकमे रहना भूपण है' न कि दपण। ला 

गड़्ाजीको भस्तकपर रखनेसे शिवको कामतत्त्वका दास नरी समझना चाहिये। बल्कि कामनत्त्त 
उनके ( ज्ञानी के ) अधीनस्थ होकर म्व्रय दास बना रहता है। उस गोस डिजीन छाठाटस्व चन्द्रमा के 
वर्णनसे स्फुट किया है' कि कामजनित उष्णताके सपर्कम चन्द्रमा सलिन भावद्रा नहीं प्राप्त हा रहा ४-८ 
बल्कि साक्षविकरता एवं निर्विकारिताका इतना अत्यधिक उत्कट प्रभाव ८ जिसके सपण्यलस फपठस 
निवास कर रहा बिप भी अपनी तीक्ष्णताफ़ों छोड बेठा है। उसी आीतछताकी साज़म बरमता दुआ 
सपराज प्रशुके कण्ठमे पहुँचकर जब सुखानुभूतिस आया तबसे संदाफ़े दल प्रशुझे बन्नस्वलत 
फो उसने अपना निवासस्थान चना लिया, इतना हो नहीं बह स्व्य योपवीतरी ओाभारों बढ़ा रहा हे। 

मन्त्रशक्तिका अतिम पृतेरुप विरक्ति ही देसी जाती है। उसीको शारकारेने “भ्रति”/ अब्वस 
व्यवह्गत किया है'। वही उनका अलछकार है'। स्थावर, जगस आदि जितने प्रार्णी है उन सभीकी मगल- 
कामना करना तथा न्यायोचित रीतिसे उनका योागक्षिम करते रहना प्रभुका स्यभाव है। अत वे सब्रो- 
घिप हैं। उन्हींके लेहृत्वमे पशुस्थानापन्न श्राणी अपने स्त्र ( सम्पत्ति ) का भागम छाता है| तभी 
उसका सगल होना नियत है'। अत' वे 'पशुपति! है। वबोधात्मक चंतनस्वरूपम रहकर प्राणिमान्रफे 
“(हुदयमे (साक्षी रूपमे ) प्रभु निवास करते रहते है इससे वे 'सर्वंगतः दै। भगवान्‌ झकर ही 
शिव अथोत्‌ मगलुरूपमें प्रतिष्ठित हैं । 

वोधसहचरित योगज तेज जिस प्रभुुके शरीरमसे पूर्णे दीप्रिमान्‌ होता हुआ चाहर शणिरूप मे 
प्रकट है' वह प्रभु हमारी रक्षा करे | 


उत्साहसंघटित विरक्ति 
बविह्वत्संगतिमें स्थित व्यक्ति ही अकायेसे निवृत्त तथा वराग्यसम्पन्न होकर न्‍्यायोचित कार्चम 
प्रवृत्त होते हैं, ऐसा अर्थशाखने विधान किया है'। डसीका अनुसरण सर्थादापुरुषोत्तर रास और भरत 
दोनों कर रहे हैं। राजा दशरथके वाद अयग्रोध्यावासियोंके रक्षणमे यही दो तट साने गये हे । इन 
पर विद्यापति श्रीशिवजी की पूर्ण अनुकम्पा है'। उन्हीके सोतसे श्रीराम एवं भरतकी भन्त्र्शाक्ति 
भविष्यत्कालीन सपूर्ण उत्थानका पूछ आधार हो रही है। उसका मूर्तस्वरूप, नीतियुक्त उत्साहर्शाक्ति 
सघटित ( सभन्वित ) विराक्ति ही है'। वह चरित्रनायक दोनों भाइयो के मुखश्रीपर सदा अकट है'। अत 


कक वन्दनाके बाद गोसाईजी श्रीराम एवं भरतकी विरक्तिपरिपृ्णे मुखश्रीसे सगछ कासना कर 
रहे हैं। 


इलोक-असन्नतां या न गताउप्रिपेकृरतस्तथा न सस्‍्छे बचनवासटु;खतः । 
५ सुखाम्बुजश्री रघुनन्द्नस्य मे सदा 5स्तु सा मज्जुलमकडुलग्रदा ॥२॥ 
भावार्थ--जिनके मुखकमलकी शोभा राज्याभिपेक होनेसें न तो प्रफुल्छित है और न वनवासके ढ उसे विक्ृत 
है, ऐसे ह्षविषादसे रहित श्रीरघुनन्दनकी ( श्री राम और भरत, श्री राम ) सुखभ्री शोभायमान 
होती हुईं सदा मेरे लिए कल्‍्याणकारिणी रहे । 


राजनोति में अम्युदयके मूलतत्त 
शा० व्या०--फैकेयी माताके प्रयत्न तथा अनुकंपासे राज्यश्री भरतको वरण करनेके लिए उद्यत 


चत हे' । 
वनश्री भी जयसाला रघुनन्दन श्रीरामको समर्पण करनेके लिए प्रस्तुत है'। परन्तु 


गुरु वसिष्ठ के 


अयोध्याकाण्डम्‌ ५ 


द्ारा उपलय-आन्धीक्षिणी “श्रयीट, थातों! एसं दण्डनीति/की क्षिक्षाफा प्रमाथ है फि दोनों साइयोके 
चेहरोंपर हुए या घिपादका प्रभाय स्पल्पमाधामें सी प्रकट नहीं हो रहा है, चल्कि पैराग्य ही दोनों 
साइयेफे रूपमें मूर्तिमाम होषर जनताफी समुद्ठसित कर रहा है'। ऐसा होना ही राजनीतिके मतसे 
पन्नतिफा थीज है'। यरिफारिता, एर्प एर्प शोक्में हेसु चनफर झपने अधीनस्थकों अवनधिकी ओर 
अप्रसर फ्रती रहती है। इसको प्रभुने अनुपादेय समझाते हुए अभ्युवयकी साधकताफी सिखाया है। 
इसछिए गोमाईजी ने दोनों रघुनन्दन ( भरी रास और भरत ) छी मुश्ताम्युजभीका ध्यान फिया है" । यह 
मुखाम्युजशी ही अयोध्या काण्डका प्राणददे तया उसाह एव पक शक्तिफी भेरिका है, कार्य -सफछसा की 
कुंजी ऐ, शत्रुप्षपरों मोहमें फसानेका महान अस्त्र हे, मि आर्जिका है, सम्पार्भाफो प्रीसिमें 
आवयद्ध परनेर्गी मघन प्रथि है, यथायप्रसिमा में आवरणधिदारिफा है, स्थायि कीर्चियी मल मित्ति 
है, मारतीय राजनीतिबी प्रथम सोपानपर॑परा है, अल्गुगासी पर्गोंके लिए शीवतटताकी लहरी है, 
पृ्योफे लिए प्रेमास्पद है, पामिनियोफा सपस्थ है, ऋषियोंफे लिए आराध्या है। 


इसफे अनन्तर गोसाईंपी प्रमुशक्तिसंयल्त उत्साहशाक्तिका परिचय पेते हुए अपने इृप्ट देव 
नीसिफुशल रामयी यन्दना फर रहे है। 
इलोफक--नोलाम्युजश्यामलफोमला्स॑ सीतासमारोपितयामसाशम्‌ । 
पाणी मद्यासायकचारुचार्प नमामि राम रघुवण्ननाथम्‌ ॥१॥ 


सांयार्य--खिनका %श सीए कमछपे समास दयाम भार कोमफ है प्रो क्षपमे शाम साशमसे सीतासीको बैटाये 
हैं भार जिनफे दोनों इासोंमे समोप्र बाण भार शोसादापक घतुष्य दे। ऐसे रघुप॑सके नाप सीरामकों 


प्रणाम करता हू। 
नीपिप्रणिष्ठादेसु एक्ेसंयलित वैराग्य 


ज्ञा० व्या०--रघुवशफे स्थामी राम, अपने अनुश्ासनमें प्रत्येकको बणोप्रमघसंमें प्रयृश्त फरासे हुए 
निप्रद्ठामुप्रहमं समथ॑ हैं. और उनकी प्रमुणाक्ति ही पारस्परिक प्रीतिमें जनमानसफो आषक रखती हुई 
फर्तण्यके प्रति प्रेरिद फर अफसण्यसे निगल कराती हे। इस शाक़िमें फर्सव्याफतेज्यदी मगौदा 
ध्यास्प्र! है। प्रमुने उसीफो अपनाया है । अत थे रघुनाथ हैं.। राय रुन्दीको प्रणाम करते है। प्रभुशाक्ति- 
सम्पम्नकोी सदाफे लिए नीठिफे प्रति, प्रीसि ये निप्ठा चनाये रखना उत्साहर्श्ाक्तफा काम है। 
इन दोनों शक्तियोंकों गोसाइंडीने 'पाणौ।ं सहासायकदारुबापम्‌! पहफर ध्यक्त फिया है। “सीता 
ममारोपितयासभागम्‌? इस पिछ्षेपणसे प्रभुफो मीतास्पर्मप्रयुक्त न घो उद्ेग ऐै, न तो योगियों जैसी 
चैराग्म फी धारणा ही। अपितु तकोत्मक योग के साथ फ्लामस॑र्यघित पैराग्यको घ्वनित फिया है। 
यही नीवि-अठिप्तामे हंसु हैः । 

नीस्थम्थुज श्यामलकोमसणागम! विशेषणसे आयुर्वदर्सिद्धान्स ज्ञात दोते हैं। हमकफे अनुसार 
झारीरफी इयासछतासे सेयकॉफे प्रत्ति समगघानफा अनुराग एबं चनवी परानशील्सा प्रकट होती है'। 
संयुजरूपकसे यह भी स्पष्ट फिया कि पूर्षोक्त येराग्ययुक्त मम्द्रश्ाक्ति भमुमें पूण जाएूत है'। 

इस प्रकार राज्यकी 80 4280 सम्त्रोत्माहप्रभायधाक्तिरूपर्मे शिय एम राम दोनोंको 
प्रणाम फरनेफे छानन्वर पूर्षोच्रकाप्कर ख्पेक्षित समनन्‍्ययात्मक संगतिका निरूपण कररेंगे। 
इमफे पूर्ष गोसाई जीने गुरुकी पन्दना करना उचिस समझा है । 


$ झथीष्पाकाणइके पूर्वार्धमें रामचरितश्र सौर उत्तराध॑सें सरतचरित्र शांपा है | मठ! जिस विधेपणोंसे गोसाईंसी 


शहुपस्दलका स्‍्मर॒म पहोँ कर रह ह उनसे रपुमस्दुत राम और सरत दोलोंक्रो स्तुति उसको इए दे पसा कशता 
असंगत्त हुईं होगा। 
। 


+ 


न भावाथे, शास्त्रीयव्याख्या समेतम 


दोहा--श्री गुरुवरण सरोज रज निजमनु मृकुरु सघारि | 
बरनडें रघुबर विमर जसु जो दाग फल चारि ॥ १ 


भावाथें--गुरुक चरणकमलकी धूछको अपने मनोरूपी दर्पणमे धारण करके कआबोग अस्त-कर्णकों निर्मल करो 
श्रीरघुवर रामफे उज्ज्वल यशका चर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारो फ्योका टेनेवाठा है | 


जिसके चरित्रसें पूर्ण घास्ानुयायित्ता है उसका यण उज्बलद श | 
विवेक त्यचस्छिनगुरुकी बन्द्ना 


शा० व्या०--इस काण्डमे दशरथ, कफ्रेयी, कोसल्या, सीता, प्रशु, भरत, तापस आदि पात्रोफी -गढतम 
सन्त्रणाओंका निरूपण कतेव्य हे। इसके छिए बिवेकब्रन्ति एवं जालक्री मर्यादा अपेक्षित है। गुस्तत्त्त 
विवेकबृत्त्यवच्छिन्नचेतन्यात्मक हूँ । गुरुके चरणाकी वन्दनाके बिना गुप्त मन्त्रणाए कबिके छदयम प्रफद 
नहीं हो सकतीं ऐसा वालकाण्डमे निर्दिष्ट हैं-- 


श्री गुरुपद नख मनिगन जोती । समिरत दिव्य दृष्टि हिय होती । 
सह्नहि रामचरित मनिमानिक, शुपुत प्रकट जेंह जेहि सानिक ॥ 


१ >»<> 
॥ वाल्काड 7 ८०, ८ ॥ 
आदि चोपाइयोंसे । उसीको ध्यानमे रखकर गोसाईजी गुरुजीकी वन्दना कर रहे है । 


रामचरिद्रकी उपादेयता 


गुरुचरण सरोजके रजसे मनोरुप दर्पणका सुधार करनेमे ही इष्टनसिद्धि होती है। इसका 
नैतिक अर्थ यह हैं कि विवेकबृत्त्यच्छिन्न गुरुके चरणरजमे मन प्रीविमान हू तथा प्रमाणत्रयसमन्बित 
गुरूपदेशोंकी सुनकर वह असदिग्ध हो गया है तो यही मनका सुधार हैं। एस मनकी सहायतास 
ही रघुवरके विभिन्न चरित्रात्मक शास्त्रीय नीतिसिद्धान्तको अ्रकाशित करना इष्ट है। यह प्रकाशन बन 
जनमात्रके हम उपेक्षणीय नहों हैं। इसलिये कि बेढ प्रथमत शाल्घोके द्वारा डबिष्ट तत्त्व 
पलव्धिके साधनोंको समझाते हू, परन्तु असभावना व विपरीतभावनाकी कर्पना आने 253 
निरसनहेतु साधुओंके छिए प्रकाशक प्रभु श्रीरामका चरित्र हे । 3953 


चारों प्रुरुपार्था'की-मिद्धि 


गोसाईंजी कह रहे हैं. कि रामायणमें मके वर्त 
णम प्रभु रामके सात र्त्रि चतु विधि >. 


१ रामायणमे निर्दिष्ट कर्तव्य रामचरिज्रसे मु 
है 5 थ् त्र्स अजुप्र सक्त्वगु 
यही “धर्म? है। उम्राणित होनेके कारण सच्त्वगुणात्मक हे' 


२ अभुने उन्ही चरित्रोंके माध्यमसे मिन्राजे 
) ; जन, शत्रुविजय आदि हृष्टफलोपलब्धि हे 
अतः ये सभी अनुमान एवं अत्यक्षसे प्रभित अथरूप पुरुषार्थके साधक एवं सुखसाध्य है। तक जी 


इस कप राज शाखर का करना आह | सकामतामे रोगोंका शिकार होना पढ़ता हे 
जर्नातिशाखत्र का कद्दना यह हे कि शरीरको उसकी इच्छापर छोड़ दि पड़ता हैं। 
शरीरका लालन नहीं, ट्वेप होगा। निष्कामतामे मनोरथसिद्धिका हेतु ढ़ दिया जाय तो 


तु त्याग है। रे 
22 गया है। श्रीराम, भरत, लक्ष्मण एव सता इन चारने स्पोगगय +4528406 
ड5 काससिद्धि पूर्णे की हैं। अतः मानसोक्त रामचरिज्रमे कामकी साधकता निर्विवाद हे । अपनाते 


अ्रयोष्याक्राण्डम छ 


४ भगपानके सेयफ दोफर स्पतन्धताफो अपने फस्योर्मे से दूर फरके मानसर्वाणत चरिश्रफो अपनाने 
पर मोक्षको प्राप्ति सहज साध्य है । 
_ दम प्रकाए अपोष्याकारइके नायफ़फा चरित्र भरुर्विध पुरुंपाथसाथक हानेसे स्पृहणीय है। काम 
दलुदयां मगयानफे घरित्र निर्णीद होनेपर भी उनके द्वारा प्रतिध्तापित चरित्र निप्कामताफी ही कोर 
हे जाने म अप्रमर हैं । 
रामचरित्रकी विभरता 


प्रभु भीरामफे घरिप्रफी बिमलता (पास्राहयायिता) इतनी जद॒भुत है फि मद्दान्‌ से मदयम्‌ दैवशक्ति- 
सम्पन्न योदा भी उनफे समझ प्रतियोदाफे रूपमें प्र द्नेफा मफ्छ साधम नहीं फर सफ्सा | 


प्रभुफपा इृए्ट 

प्रश्न--भमु अपतीण दोफर शास्चायाभिमत घरिश्रपे प्रद्शनमे फौससा अपना इट समझ रहे हैं ९ 

साता पिता आदि गुरुजनोंफी सेयार्में सीर्षाको (मनुष्यों ) अपृत्त फराना प्रभुफा इष्ट माना 
जाय हो इसके समाधानपर एांफा यद दो सफ्सी है फि जब प्रमु दी जगतफो सफटफे समान नचाते हैं 
और जीपम॑ अपनी स्पतन्य ( प्रूषप ), स्यतन्यता दे हा नहां। हय सांता पिता आदिफी शुझ्पामें जीयफो 
प्रपू्त फराना प्रजुफा इष्ट फेस माना जाय १ यदि ्सा माना जाय फि जिन जीपोंफो उपयुक्त शुभूपा में 
प्रयृत्त फराना दृष्ट है! रनपे' छिए ही प्रमुफे घरिप्र हैं सो प्रमु फा परिश्रम स्यर्थ ही प्रतीत होता है । यठ 
पैसे जीप मो प्रभुपी इग्छासे प्रपृत्त होंग ही । 


जीयया प्रपर्तसत्य एवं स्वातन्य 


उत्तर-झाम्रफारोंफ़े खमिमतसे मानपोम॑ सग्रथा स्पतन्थताफा अभाय नहीं है'। यह मत्य है' फि शरीर 
जड़ दोनेसे उसफा प्रपतफ संयमाक्षी चेतन दी है तथापि जीप चेठन अपनी मल्नितामें दो शरीरफो फुपय 
फी ओर भी प्रवृत्त फर समा है। उस दशा म जीपफा स्थातन्द्रयरूप फर्द्ध्य श्ला्फारोफो अभिमत 
है। पैसे तो जीप फमम स्पतन्ध दोफए जमातरीय यासनाओंकी यपटमें स्यसनांसक्त ह्ोफर 
माता-पिता गुसजनों आदिपी प्लुभूपासे पिमुण दोम रदत हैं। परिणाम यद होता है फि उनफा स्पतन्त्र 
होना तो दूर रद, तफ शाक्तिफे अमायमें जद़ताफा इतना थोध्त हो जाता है कि ये घिरफारफे लिए 
परतनन्यवार्मे फँस सात ६। अत उद़ताफों दूर फरने ण्य॑ स्पत्तम््ताफ्रे दतु उपयोगी सत्फर्मफो बतलछाने 
के डिये फ्लीयोफ्ो साग प्रदर्शक 'रामर्चारण! है.। यही प्रभु फो इृष्ट दे । 

याल्पाण्ड व अयोध्याफाण्ड की सगति 


चाएठफाण्द में उपयणित पिपाधचरिश्रकें साथ उत्तरपरिश्रफा सम्बाघ अथ फर्षि जोड़ रहे हैं। 
सदनुसार गृहस्थोथिष पमेफा निमषण परना आयदयफ हे! गृहस्थाभसप्रयेशफे बाद अनुप्ठीयमाल 
फसन्योंफे मंफेद्से अयोध्याफाण्डफा शुमारंम मगलाघरणफे याद फपि फर रहे हैं। 
घी०-जथ ते राम ब्यादि घर आए | नित नव मंगल मोद घघाएं ॥१॥ 
आपार्थ--श्रीराम सीदाको प्याइ कर जपसे झ्योप्यामें भाये हें तफ्से मित्प बये संग झालम्द बछाइ शोसे करो--- 
( शिसका स्दरूए अप्रिम औषपाइयों में दश्ब्य दोगा | ) 
संगवि--धालफाण्दफे अन्तर्मे दोद्दा ३ ९ में जो 'मगछ मोद छछाह” फी किफ्ता दिखायी गई हैं 
कस सीताफी उपस्यितिसे हुआ है, इसको यतानेवे लिए पभकार यहाँ उसकी पुनरुक्ति 
कर रहे हैं.। 


८ भावाथे, शास्त्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


जश्ञा० व्या०-ाईसुव्य धर्ममें रहकर शास्यमयादा में पद्ममहाभूत चलछि। भूतरक्षण आदे लित्योचित 
कर्मकी यही सकठता है कि जिसके आश्रयमें जड़ चेतन आदि सभी वर्गोको सन्तोष हो वह हो रहा हे । 
अत उन सभीको प्रीति अ्भुमे वृद्धिगत होने छगी। 
मिथिलाराजा के मोदका स्थायित्व 
जबसे श्रोराभ श्रीसीताके साथ व्याहकर अयोध्यामे आये तवसे मंगल-मोद छा गया। इसस यह 
नहों समझना चाहिये कि सिथिछामे सीताके न रहनेसे मंगल मोदका नित्यत्व नहीं रहा | या देवी स४- 
भूतेपु बुद्धिरुपेण संस्थिदा! के अनुसार शास्त्र-सर्यादाका नीतिपूर्वक पालन करनेवाके राजा जनकको 
चुद्धिशक्ति रूपमे 'सीता! सदा आनन्द देनेवाली है'। सीताकी विदाईके समय राजा जनककी जो 
अधीरता दिखायी पड़ी वह अतिशय श्रेभकी द्योतिका है, जो अवसरके अनुकूछ प्रशंसनीय ह'। सीता 
की चिदाईके वाद राजा जनकके मोदकी स्थिति में कोई कसी नहीं है' जैसा कि राजा दशरथ और श्रीराम 
को सिथिछासे विदा करते हुए राजा जनकके वचनोसे स्पष्ट हैं। ( दो. ३४० से ३४२ वा. का. ) 


ची,-सुवन चारि दस भूधर भारी । सुकूत भेघ बरषहि सुख बारी ॥२॥ 
रिद्धि सिद्धि संपर्ति नदी सुहाई । उमगि अवध अंचुधि कहुँ घाई ॥३॥ 
भावाथे--चोदहो झ्रुवनरूप वडे बड़े पर्वतोपर पुण्यरूप मेघों की वर्षाौसे सुखकी धाराए वह रही हैं जो सिद्धि 
ऋतष्धिः सपत्ति रुप नदियोका सुहावना रूप लेकर उसडती हुई' अजवधरूपी समुक्षकी ओर आकर उससे 
मिल रही हे) जथीव्‌ राजा दृशरथके घुण्यसे अयोध्यासें सीतारामके सिलनसे सपत्ति छा गयी है । 
गृहस्थ धमंका फल मंगल 
श्ा० व्या०--यह स्सरणीय है कि प्रभु रासने सह वसिए्के सकेतपर विद्याकी उपलरूद्धि की है'। उसीके 
प्रभावसे आत्मगुण-सम्पन्न होनेसे वे राजत्व से ( राजोचित गुण) विभूषित कहलाने छगे। डसीका 
यह अत्यक्ष परिणास है कि प्रत्येक वगेको प्रति दिन स्वकीय इशप्टका दर्शन होने छूगा। जैसे कोषक्षय का 
परिहार, कोपबृद्धि आदि। अत्येक व्यक्तिके शरीरपर नये-नयें आभूषण भी इदृष्टिगोचर होने छगे। 
ये सभी आरोग्य ( सम्पन्नता ) के विधायक होनेसे मंगरूमय हैं। इस प्रकारसे समगलमय वातावरणमे 
सुकृत ( मेधरूप से ) सर्वेन्र देशमे उत्तम शुभ-दायक वो कर रहा है'। 
सुकृत चढनेसे भंगल मोदका भार इतना अधिक हुआ कि इसके परिणाममे चौंदहों सुबन तथा 
भूधरापर सेघाने समगछसय वपोका आरभ कर दिया। यहाँ तक कि घृतकुल्या, भधघुकुल्या, अन्न, ऋद्धि- 
सिद्धि आदि सबके लिए सुछम हो गई । 
निष्कर्ष यह कि संगलमय कत्तेव्य, पूज्योंका आदर आदि सत्कर्म देशमें होता रहता है तो वृष्टि 
( विभिन्‍न सम्पढाएँ ) भी अत्युत्तम रीतिसे प्राप्त होती रहती हैं.। जैसे-जैसे सर्वेत्र आय दृष्टिगोचर होने 


के घेसे विनियोग बटर 
लगा उसी अकार वेंसे बेसे आयधनका विनियोग ( सत्पात्रप्रतिपात्त ) चढ़ने छगा। इसीको प्रभुने 
गाहंस्थ्यथर्म मे अवेश करके प्रकट किया है'। 


चो,-मनिगन पुर नर नारि सुजाती | सुचि अमोल झुंदर सब भांती ॥७॥ 

,.. फेहि न जाइ कछ नगर विभूति । जलु एतनिअ विरंखचि करतूती ॥५॥ 
भावाथे--जसे समुत््से जाति-जातिके सणिरत्न होते हैं, वेसे ही अयोध्यापुरीसें चारो बर्णोके नर-नारी रज्नोंके 
समान सुशोमित है । जैसे स्वच्छ रत्न अमूल्य होते हैं. वेसे ही थे शुचि नरनारी सब प्रकास्से सुन्दर 
है। अपने-जपने चर्णाश्मके अनुसार स्वधर्मसें स्थित होना ही सब भॉतिका तात्पये है । सुन्दर 


अयोध्या नगरका ऐड्वर्य कहा नहीं जा सकता। मानो धह्माकी छार्यकुशलताकी इतनी 
अयोध्याफे बाहर इससे बढ़कर अर्माकी स््टिकुश्छता दिखायी नहीं देती । इतनी ही सीमा हो अर्थात्‌ 


२ अयोष्याकाण्डमू' ९ 


घतुदश भुपनमें मंगलफो आधा | 


ज्ञा० ध्या०--राषणफे भयसे चतुददेश मुषन कआार्तकित हैं। उससे सुक्ति सिछे यही सवफी कासना है'। 
पह अमीतफ पूर्ण नहीं हो रही थी। परन्तु भीरामफे गृहस्थाभ्रम प्रयेशसे उपयुक्त' ज्यथासे छुटफारा पाने 
फी श्ाज्षाफी फिरणे मैसे-जेसे फेलने छगी पैसे पेसे चतुर्देशभुषनमें कानन्दातिरेक चदने छगा। 
क्योंफि अयोष्यापुरीमें नीतिसान्‌ राम अयतार ऐेफर अयोधष्यायासियों फो मंगल्मय एव सुझी वना रहे हैँ । 
सनको देखकर चुदेष्ा मुयन इस निमश्नय पर पहुँच रद्या हे कि भविष्यत्‌ में सर्येत्र मगछसय शास्रसम्मत 
दृद्य उपस्थित होगा। समय भी मुखदायी आापेगा | इस निम्नयसे समी जनमानस प्रसन्न है क्योघ्यादी 
संपूर्ण जनता उत्तम मणिसमृष्ठफे समान मयत्र देदीप्यमान प्रदीत दो रही ऐ, अथोत्त्‌ समी निरातंक, 
प्रमुदित एपं हर्पोष्ठसित ६ंैं। फिसीफे चेहरेपर दुम्मफी झलक देखनेमें नहीं आती। जात्मसम्पन्न 
लीति-माम्‌ रामफे द्वारा न्याय स्थमण्झछफा पालन, एयं समस्त वाघाओंका निरसन क्षति 
सुलम दो गया। 
राषण-यघमें हृतु मानवता 


प्रझन--रघुपेफ्तमें पृथयर्ती राजा नोतिमाम, घर्मेश जौर याग्सी सानप थे। फिर ये रायणव् में 
समय यों नहीं हुम्‌ ? 

उप्तर--अप्लाजीफे परसे छप्त राषणमफा आतंफ इतना अधिक था फि उसफे विरोधमें दप करना 
किसीफे लिए संभप भहीं था। न सो परश्म से छड़ने फा विधान है ।* 

अथपा इतिहास घ पुरा्णोंमे यद्द्‌ प्रसिद्ध ही था फि रघुयंशमें सामुपरुपमें अपदीणणे हक हारा ही 
रायणफा यघ संभष है.। अठ' भरीरामफे पूषयर्तों रघुर्वशी राजा राषण्से युसफे छिए प्रशृत्त नहीं हुए। 

अयोध्यादिनगरीसें प्रशुस्व 

प्रइन--राक्षसफि आार्मफसे सप्र हाद्माफार मचा हुआ था फिर भी अयोध्या नगरीमें राजाओं के 
प्रभुत्यफी स्थिरता फैसे दनी रही ९ 

उत्तर--सिस स्थानमें अशुचिता रद्दी उसका छाभ रायणने पूर्णरूपण उठाया। फल्व' उन उन स्थानों 
पर झपने अधिफारियोंडी नियुक्ति मी उसने की थी। हठात श्योध्याफ़े राजा मी अश्लुच्चि भूमागसे 
झनधिए्त होफर राजघानी ( हुगे ) में दी टिफे रहे। राक्रसोफे आातंकफे मयसे घ॑ भी प्रमाद्‌ न करते 
हुए धुचिताको माणपण से अपनाकर घमेकी प्रतिष्ठामें सप्नग रहे। परिणाम यह हुआ कि सुस्त सम्पदा 
दुगैमें स्थिर हो गयी। दूघ भी आफर यहाँ चसे ।१ जहाँ जहाँ त्रुचिता एप अप्रमाद रहता हे. पहाँ यहाँ दुख 
( राक्ष॒मां ) फी दृष्टि पड़ती नहीं झयया आ्ाक्मणमतति दोसी ही नहीं । 


१ अकाल्दैवण्फ्तेन न फुर्यादेव पिग्रहम | ( का० नी० (०२३ ) 
शप् डरा प अर्जन करमेसें राबण विध्य करता था) विमा दंवताशोंकी आराधताके राषणका सेहार दोहा 
संभव नहीं या। दुदता रादकके प्रतापसे मिस्तलस्क हो शयपे थे। दृष्यछ-निरपेक्ष द्ोकर केबक्क लीहिमाज््के 
अजुप्ानसे ( जैसे सत्पर्संप माता पिता गुरुजन झादिकी शुभपा तथा अद्ासीशमाबमें बसपास करणा क्रादि ) 
रूपिष्टित सानब ही रावण्के संदारमें समर्थ हो सकठा है पेसी सावना सी छुछ हो गपी थी। श्रघौत्‌ सानबताको 
दे भूछ गये थे | कस राजा दरपने विश्रामिद्रसे कह्टा दे । 
, कई निश्चिचर अतिधोर फ़ठोरा ! फट सुंदर झुत परम फ़िसोरा!! ॥) 
(जौ० ६ दो० २०८ या का० ) 
३, “दुंबातां प्रयोप्पा । 


१० भावाथे, शाम्रीयव्यास्या समेतम 


९ 
कलियुगयें भी धर्म-नीतिका प्रभाव 
उपयुक्त व्याप्तिके प्रभावसे ही अयोध्यामे उत्तमोत्तम मणि आदि रस्नॉकी स्वय रत्नाकर पर्चा रटे 
ह। कवि भी अयोध्याकी सुस् सम्पदाके वर्णन जब्दोफी कभीफा अनुभव कररट द्र। अडा & 280 
विरिंचि (त्रह्मा ) की सपंण कृति दृष्टिगोचर हो रही है। यह धर्म एव दीति की प्रतिष्ठाफा अभाव | 
अत. त्रयीधर्सका अनुछठान राक्षताँके आतफकम (कलियुग मे ) भी व्यथ् था अग्रामाणिक नही ठटरता | 
2 डः अभिवर्द्धिफी ४ के रेल स्त्रपन अल 
धर्मनीतिसं निपुण राजाके अनुशासनमे प्रजा धमकी अभिव्वाद्रफ़ी ओर उन्मुग रात्ती ओर शाम्त्रपत 
विवेकको समाप्त नहीं करती । 
लोकतन्त्रमें राजच्वाधिकारयोग्यता 
आत्मगुणसम्पत्तिसे युक्त श्रीरामको देखकर महाराजा दशरथ उनका युवराजपदस अविएत करना 
चाहते हैं। अब राजा योगके इच्छुक है। पर छोकतन्त्रात्मक व्यवस्था के अनुसार सवासिमतनों न समच- 
कर अश्ुु रामका राज्यासिपेक करना ( केवल अपन मन से ) नीतिविस्द्र मानते 8। यत अशभ् जाम्त्रम 
एकराज्यवादमे भी छोकतन्त्रको पुणे मान्यता दी गयी है' । उसके अभिमतकी जानकारी लिए 
ही उत्तराधिकारी श्रीरामकी सेवासे राजाने दास दासियो, पुरजनवासियों, सरीसटेलियोबी नियुक्ति 
फरके रखी है' ! 
चो,-सभ विधि सब पुरलोग सुखारी | रामचंद मुस चंद निहारी ॥६, 
सुदित मातु सब सखी सहेली। फलित विलोऊझि मनोरथ वेली ॥७॥ 
,, रॉम रूप मुन्तु सील सुभाउ | प्रझुदित होइ देखि सुनि राझ ॥८॥ 
भावाथथे--चौ० ३ में अवधको “अवध अंचुधि' कहा है । जिस प्रकार समुद्र पूर्ण चन्द्रकों ठेस्य उमगित होता ए 
उसी प्रकार अयोध्यावासी श्रीरामचन्द्रके मुसचन्द्रका दर्शन करते हुणु सब प्रकारस सुस्यका 
अनुभव कर रहे हैं । 
अपने मनोरथरूपी वेलको फछते देख सब माताएँ ओर उनकी सखी सहदेलिया आनन्दित है। राजा 
हल बे ्ऊ 
दशरथ श्रीरामके गुणशीलुस्वभावको देख-देख और सुन सुन कर आनन्दित होते रहते है । 
'मनारथवेलि? 
बे । खं प्रजा । ० 
शा० व्या०-- ' प्रजा-छुखे सुख राज्नः ना च ग्रय हतम। 
नात्मप्रियं हित राज्ञ। अजाना च॒ प्रियं हितसम ॥ 
( को० आ० १-१५ ) 
ज्क्तिके अ बे पोरथ >> 5 डी, सब | 
इस उक्तिके अनुसार सव माताओका सनोरथ अजासुख है जो” 'सब विधि सब लोग स॒सारी! 
से स्पष्ट किया है'। ऋद्धि सिद्धि संपत्तिसे युक्त सब प्रजाकों देखना ही 'फलित मनोरथ वेढी” कहा है'। 
संबासिमतकी उपादेयता 
सभी सहवासी दास दासियों वुद्धिशक्ति-सत्वगुण-सम्पन्न श्रीरामके सुखावलोकनेच्छ हुए। श्रीरास 
भी आत्मत्वेन सवके हृदयमे निवास करने छगे। उनकी स्नेहवल्ली छोकमे उत्तरोत्तर अभिवृद्ध होने 
छगी ( यही श्रीराम के ईश्वरत्व का परिचायक चिह्न दृष्टिगोचर होता है')। माता एवं सखियों 
परिचारिकाके रूपमे रहती हुई ज्येष्ठपुत्रके व्यवहारसे असन्न दिखाई पडती हैं। नीतिमान्‌ “व्यक्ति का 
शील ही, संवासियोंके प्रमोदकी सम्रद्धिके लिए, नीतिशास्रमें कारणतावच्छेदक माना गया है' न कि 


क्षयोप्याफाण्डम्‌ ११ 


व्यक्तिक्रा उपक्तिव्य। सौतेडी माताएँ सो भे तामके स्रह्मती दये एवं गुम प्रमावसे अयन्त प्रमुदित हैं। 
थे अपने मीतेडेमायका परिस्याग फर चुरो हैं । 


छोकमत्प्राप्तिकी ऊुँची 


क्ीछके अन्सर्गत दाहुत्य मी सहाम्‌ गुण साना गया है। दातृत्य गुणसे युक्त राजा कर्थार्थियों फे 
सिए कस्पयृक्षके समान साना खाता है! रत अपेक्षा इस वातकी है कि अनुजीयीपृत्त प्रकरणफे खनु- 
सार सेवकोंकी हृष्टिमे स्थामीका फस्पयूक्षसम दादृत्य प्रकट होना चाहिये। सभी छोकमतकी अ्जुकूलता 
प्राप्त फी जा सकती है'। शीछके अन्वगेत दावृत्वफे अतिरक्त, गुण, सस्य तथा रूप मी छोकप्रमोदुफी कारणदा 
का सपच्छेदफ माने जाते हैँ । यया -- 
(१) रूप-डन्द्रियों का मोह द!। उसमें सामुद्रिक शास्रोक्त रेखा छक्षण आदि अन्सर्निष्ठित हैं। 
(२) गुण--परोपकारिता ही गुण दै। 
(३ ) शीछ--भआत्मसंमांवनीयता हेतु गुण है । 
(४ ) सस्य--व्यसन (पिपत्ति) एवं अम्युद्यमें निर्विकारिता आर्याप्त दोनो में एफ समान स्थिवि है। 
(५) स्पसाष--पृथ्थे जन्म प्राप्त छदूघुद्ध संस्कारयुक्त जितेन्द्रियता हे'। 
52 श्रीराममें उपरोक्त समी गुण मत्यक्ष, अनुमान एर्य झन्द ( संघासिसत ) प्रमारणोंसे परिछक्षित 
गये द। 
दोहा--सप के उर अमिलापु अम फहृदिं मनाह मह्देसु । 
आप अछत युवराब-पद्‌ रामदि देठ नरेसु॥ १॥ 
साधाधे--शयोष्पामें सपके मसमें ऐसी इप्फा हे कि जिसको पूणे करनेके छिपे क्ंकरमीको सनाते हुये के कह 
रहे हैं कि राजा इशरब अपने रहते भीरामको युषराज्-पत्‌ दें दं। “मसाइ मद्देसु” से स्केस हे कि 
अयोध्या के राधा लोर प्रदाके इप्ट देश पकरजी हूं । 
प्रबाका मनोरय 
झ्ान्‍्थ्या०--अयेषास्त्रके निर्देशालुसार घममेषिजयी, मजापाठक-आत्मगुणसम्पन-न्‍्यायप्रिय सथा रिपृख्णय 
राजाफ्रो ही प्रजा राजपदपर अधिएछ्ित वेखना चाही हे । 
भद्दाराज़ा दृशरथ पृद्ध हक हूं। सनकी चिन्ता शव॒प्रजामें कम होती जा रही है'। सीतिमास्‌ 
रामफो पाकर प्रद्ा (जनता) सौभाग्य पर प्रमुदित है'। सर्वेत्र एफ ही अमिठापा उस्लसित हो रही 
कि सद्ाराज दृष्टरव युयराजपदपर भीरासको अधिप्ठित कर दें । 
संगति--लोकतन्त्रास्सक शासन के अनुयागीं राजा भी शासन ( नीति ) सिद्धान्त का अनुसरण करते हुये 
खछोकमवद समझनेके दसु वेशके समी ससहके हितयादी प्रदिनिधियोंको आमंत्रित करना भाहते हैं. । 
चौ०-एक्समय सब सहित समाजा । राजसमा रघुरान विराजा ॥ १॥ 
चौ०-सकछ सुकृत मूरति नरनाह्ट | राम सुजसु सुनि अतिषि उछाहू ॥ २॥ 
भावार्े--पूक समय रघुकुछके राजा इसरप समाज्सदित दाजसभार्से बिराजमाल ये। सांतो राला संपण पुष्षों 


के सूर्ति कप हों। भीरासका सुन्दर यप्त सुत कर उप्तको अष्यस्‍्ठ इत्साइ हुमा। धार्सिकोर्ष्य स्यायता 
प्रजापाछक्त:, यह प्रसिद्धि सुप्तकी व्याक्या है ! 


१२ भावाशे, आाखीयव्यारया समेतम 
बृद्धांमिसम्मति 

शा० ठया०--एज्ञमभामें समी पत्नक्ि समह हिलवादी वृद्धनन उपस्थित ट । सभी /लसान सम्मानसे 
् शैय राजशासनमे प्रत्यक्ष मतदानकी व्यवस्था शजसभाओी विश्वायतरा लथा उन्च 
विभपित है। भारतीय राजशासनमे सत्यक्ष मत | े 
परम प्रशघन उठता ही नहीं। गहाराज़ के अभिमतक्री 

४। नेतिक कार्योम विपमताका प्रठन उठता ही नहां। भठाराज़ के अभिमतक 


चर आदर्शकी ह 
्‌ परिचायिका ह' धर ्ट न ड * बनानेके लिये 
सुनकर सभी प्रतिनिधि बृद्धजन, अभिषिक्त नेताफ़े रुपमें नितिसान श्लीरामकों राज़ा बनसानके लि 


अपनी सम्मति दे रहे हे ! े 
संगति--राजा दशरथका ऐसा छोकोत्तर श्रभाव था कि लोकपाल भी अन्यान्य राजाओं फ्री तरह 
श्रीदशरथके अनुगमन से अपना कल्याण समझते हैं. 

चौ०--नुप सब रहहि कृपा अमिलाखें | लोकप करहि प्रोति रूस रास ॥ ३ ॥ 


भावाश-राजा दशरथका प्रताप है कि सब राजा डनकी कृपाकी आकाक्षा रखते ९ै। और लोकपाए राजासे प्रीति 
करनेमे उनका रुप टेसते रहते हं । कृपा? जार प्रीति! का भाव है कि सर्यवणी य राजा दशरथ आगस्सीय- 

[३ गा सर । ः तत समझने "ली..८ 
स्वेन उनको स्वीकार करें । सूर्यवंश द्वारा सुरक्षित धर्मप्रतिप्ंस लोकपाझ अपनेकोा सुरक्षित समझने हूँ । 


घर्ममर्यादामें पूर्ण सवतन्त्र ता, शोष्यशोपण नहीं 


शा० व्या०--ज्ञातज्य है' कि रावणके भयसे सच्नस्त शोकर सूर्यवशीय राजा पिया व्णेकपाल न्य स्व धर्म 
सयोदाके पालनमें अपना मत परिवर्तित नहीं करते । किन्तु सूथ वशके शासन कालम जो भी फल दृप्टिगत 
हो रद्दा था, वह शास्त्रसम्सत मर्यादामे स्थित प्रेमका अनुभाव था। यद्यपि कतिपथ विचारकाफा मत है कि 
धर्मकी मयोदामे अधिष्ठित शञासकवर्ग पर्ण परतन्त्र एव कामसुखसे वचित रखे जाते दे पर यह विचार 
भारतीय राजनीतिसे समन्वित नहीं होता । क्यू भारतीय नीत मयोदाम स्थित सब नरश इतने स्वतन्त्र 
हैं कि उनके सनोरथ कभी अपरिपण होते ही नही थे न तो प्रजाका उत्पीड़न ही होता था । किचहुना छोऊपाल 
स्वयं उनके अनुगासी थे । शासकोंके स्नेहशीलम आवद्ध जनता राजाको स्वयं अलक्ृनत करतीं है' उनके प्रति 
प्रीति तथा आद्रमे औचित्यपृवंक कर देनेकी व्यवस्थाके अनुसार कर आइि देनमे बह पीछे नहीं रहती । 
प्रेमकी स्थतिमे आवेगसम्पन्न प्रजाके ये सव अनुभाव है। ऐसे व्यवद्दारम भोप्य एवं शोपणऊा प्रश्न ही नहीं 
रहता । यह भारतीय राजनीतिकी पूर्ण सफलता फा परिचायक है! ! 


चौ०--त्रिशुवन तीनि कारू जग माद्दी । भूरिभाग दसरथ सम नाहीं॥ ४ ॥ 
भावार्थ--तीनो भ्रुवनो और तीनो कालूसें राजा दशरथ के समान वड़भागी संसारमे कोई नहीं हर 


प्रभुके अवतारमें हेतु बंशकी पवित्रता 


शा० व्या०--पुत्र पुन्नामक नरकसे पिताका उद्धारक माना गया है'। ऐसी परम्परा सूर्यवंशम सनुसे लेकर 
अद्यावधि अविछिन्नजल्धारावत्‌ प्रवाहित चढली आ रही है'। उसीके परिपाकसे स्वय अभु रघुबशका उद्धार 


ही नहीं किन्तु उसके साथ नीतिकी शिक्षा देकर जगत्‌के कल्याणके लिए पुत्र (रास) रुपमे अवतीण है । 
यही राजा दशरथका 'भुरिभाग/ है'। जो तीनों छोक एवं तीनों काम और किसीको प्राप्त नहीं है'। 


चौ०--मंगलमूल रायसुत जात । जो कछु कहिअ थोर सब तास ॥ ५॥ 


थ--ऊपर [0 मंगछोंके ५ 
भावा कहे 'मूरि भाग? को यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं। सम्पूर्ण समंगछोंके मूठ राम जिनको पुत्र रुपसें भाप्त हैं 
३ को पु 
उनके वारेमे जो कहा जाय वह्द थोड़ा ही है। श्रीरामकी मगलमूलता गुरु, केवट, सुनि भरहाज, बादसी की 
आदिके बचनोसे गायी जायेगी । 


छायोध्यादाण्डम्‌ 4 


राज्याधिकारों के चुननेर्मे विदेहरणे मदन 


शा? उ्या+--आत्मगुगपत्यम्न भावी मुरपवऊ सम्पतिर्मे जो भी युक्तिययों गायी जाये यह मोड़ी ही हैं.। 
महाराज दृशरय अम्यागत प्रतिनिधियोंके अभिमतफो जानकर शत्यन्त प्रसन्न है। झातज्य है कि भार्रों 
साईयोंके रहते राजपदाधिष्ठानफे लिए श्री रासफे प्रति प्रजारी सम्मसि उपख्य्य हो रही है इसका कारण 
भीरामफा अपना झस्यधिक यिनय है' जो थाल्काण्डमें श्रीपरश्ुराम मंपादसे स्पष्ट है। “होइद्दि कोर एक घास 
तुम्हारा ” (चौपाई ९ दोहा २७१ वाटफाण्ड)। प्रमु राम ल्येप्ठ पुत्र है । निर्दोप एर्च पूरे आत्म गुणसम्पन्न ब्येष्ठ 
पुत्रके रहते अन्य भाइयोंका राजपदमें अधिपष्ठित होना शास्प्रसम्मत नहीं है। इस #षप्टिसे प्रज्ावर्गेका 
संर्योप्रज रामके राज्यामिपेकफे छिए उपयुक्त सतदान फरना ज्ञास्प्रानुकूल सथा सारदीय नीतिमम्मत 
इनेसे घुद्धिमत्ता पूंे है| 
पूर-मंत्रि परिपव्‌ 
संगति--अधेषशाखये निर्देशानुसार समाममें उपस्थित प्रतिनिधियों फा सतद्ान होना ह्वी राज़ाके लिए 


क्षन्तिम निर्णयके रूपमें प्राष् नहीं माना गया है' अपितु प्रजाजनाँका निर्णय जाननेके बाद सी राजाफो 
अपना निर्णय फरनेमें स्पतन्त्रता है । 


फ़्संध्य में अपिर व फा उपदेश 


अत" झन्तिम निर्णेयके छिए एत्तरमश्री, राजपुरोहिस जैसे महामनीपियोंके अभिमतण्ती क्रपेक्षा राजा 
फो रखनी भाहिये | उसी यियार*/ंखढाफे अन्तर्गत प्रथमस' गोसाईं जी गरतेम्यफो समझा रहे हैं. 


घौ०-राय सुमार्य सुकुछु कर लीन्द्रा । यदनु पिलोकि पुकुट सम फीन्दा ॥६॥ 

॥ “भवन समोप भए मित फेसा । मनहूँ जरठपनु अम उपदेंशा ॥७॥ 

/ शेप जुपराजु राम फट देहे। जीपन घनम हलाहु किन छेद ॥८॥ 
मायाथ--राजा दृप्तरपने सइद्ध ऐी छीशा शायमें छेकर मुख देखा तो किरीट रेढ़ा था उसको सीपभा किया | इसे 
शर्तिमित्त समस्कर कामक़ि पासदे याझ्ांको सफंद दुकर उनको पेसा सान हुआ कि सालो दृद्धाबस्पाका 


उपद॒श हो रहा है कि "दे रायम्‌ श्रीरासकों युवराज पद्‌ दे दो। ऊप्मका पद्टी छाम दे इसको जीते शी 
दया पहटी ऐसे? । 


अन्तसमय फी सना एय फर्सस्य पर बयान 


झा« ब्या०--शीछ्षेमं अपने मुकुठको हृढप्रथमतया टेदा देखना महाराज दशर्थफों अपने अन्तिम 
मसमयका परिज्ञान फरा रहा है। फानोंफे घालोंफो सफेद देखना सी अपने समयफी पूर्णेताका होतक 
है। कर्णफेशफि सफेदीसे घृद्धावस्थाकी पूर्णता पबे मुकुल्के ठेढेपनफों बैखनेसे आासप्रमृत्युकी कल्पना 
थे शाम्नोदित भिह् दोनेसे फ्री ज्यर्थ नही समझे जाते। इन्हीं देतुओंको देखकर राजाकों अपने अषष्ति्ट 
अन्तिम कस॑न्यफी प्रेरणा सत्पन्न हुई और उसको प्‌णे करनेके लिए ससयका अविसम्व सी भ्यानमें आाया। 
मंकेस ( अझयो० दो २० चौ3 ६ एवं चौ ७०० दो में स्पष्ट है!) चौ० १ धोह्या २० में कैफेयीकी उक्ति-- 
“दिन प्रति देखें राति कुमपने” से भी स्पष्ट है कि बहुत विनॉसे फैकेयीफो दुस्थप्न और अपश्कुन हो रहे थे 
जो राजा को भी सादम दोगें। अतः स्थाप्निक निमिष्ठ एयं जागृत निमित्त दोनोंसे राजाकों अपनी थ्रासन्न 


$ शतेअंपे मस्त्रे मस्वऊेंः स्वयं मूयों दिचारपेत्‌। 
शथा बर्तेत मल्तशो पया स्थायथ ल पीड़पेद॥ 
( भीछिसार स १३ एफ्कोक ४० ) 





१४ भावाय, शास्रीयव्यास्या समेतम 


सुयुक्रा सफ़र सिठ। है।। पुवाय' का माय है. के रत व्वडिव छल गुट वे ये ही। । लिकिन सु 
आज ही टेहा दिल्लायी दिया और करावर्मि ठतेी केश अत 2 उतका व्यनिंाता | सा दाना रा 
द्वारा राजाको अपनी आमजन्न मुत्युका सक्रेत देना है जिससे बरह सावधान हाकर अन्तिम समयके 
कर्वव्योंको पणण करनेमे पुरुपार्थ द्वारा परितोप फरले | “उपदेसा” फ्रा यह भाव झ कि राजा दशरथन 
अभीतक पुत्रोंको राज्य देनेके सम्बन्ध सोचा ही नहीं था। अत, यह कहना छोसा कि सन्थराझी उक्ति 
“पठए मरतु भूप ननिअउरे” निराधार सिद्ध होती हैं । 


अन्तिम कच्तेंब्य की ग्रेरणा 


राजाने अपने जीवनमें सभी मंगलकत्य पूर्ण किये &ैं। मगलोकि सम्बन्ध क्रतमा जसी स्थिति हे 

९८ करनेके €(्‌-- 5३ ८ढध ३ ४ # गउटदका किट 
अब एक ही कतव्य शेप है' जिसको सम्पादित करनेके लिए कणेफेशॉकी सितिसा एव झंडठका ट्टापन 
प्रेरणा दे रहा है'। राजा भी उस कार्यकों सम्पन्न करनेमे बिलम्बर करना टष्ट नहीँ समझ रह ढे। वह ४ 


ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको युवराज पद देना, इसमे प्रजा एकसत है'। 

उत्तर-मंत्रि-परिपद्‌ 
संगति--अन्तिम निर्णय हेतु उत्तर-संत्रिपरिपदके पूर्वन्य बिद्वान्‌ पुरोहित वसिप्ठजीके चरणोमे राजा 
उपस्थित हो रहे हैं । 

दोहा-यह विचारु उर आनि नृप सुद्िन्ु सुअवसरु पाह । 
प्रेम पुठकि तन प्ृुदित मन गुरहि सुनायउ जाह ॥२॥ 
भांवार्थ--उक्‍्त उद्देश्यसे राजाने मनसे जो विचार स्थिर किया उसको कार्यान्त्रित करनेसे वही शुभ-दिन भर 
सुभवसर है ऐसा जानकर प्रेमपुछकित तन ओर मुद्दित मनसे जाकर गुरु चसिष्टको सुना दिया । 


“मुकुट सम कीन्हा। जरट॒पन उपदेसा”? के परिणाम स्वस्प राजाने “योगेनान्ते तहु व्यजाम” की 
उफ्तिका विचार जाते ही उसी समयको तत्काल कार्यारम्भके लिए 'सुद्दिन सुभवसर! समझा है । 


राज्योत्सव के लिये मुहूर्त का निर्णय 


शा० व्या०--चौ० 5 दोहा २ की व्याख्यामे मुकुटके ठेढा होनेसे मृत्यु की सूचनाकी चात कही गयी है, 
उससे पुत्रवियोग, शोक और मरण ( अंध शाप से सम्बन्धित ) आदिका संकेत राजाको हो गया है'। अत 
पुत्नरवियोग से अप॑नेको वचानेके लिए राजाने शीघ्रता की जो गुरुके पास जाने और तत्काल राज्या- 
भिषेकका कार्यक्रम शुरु करनेसे स्पष्ट है'। कम से कम जितना समय हो सकता था उसको देखते हुए उत्तर 
दिनमे ही रामराज्योत्सवका आयोजन करना राजाने निरिचत किया। हु 


भरवका पहुँचना स्वल्प समयमें संभव नहीं 


इतनी स्वट्प अवधिमे भरतका आना हो नहीं सकता था। राजाकी ऐसी तीत्र शीघ्रता देखकर देव भी 
धवड़ा कर विवश्ञतामें उसी रात्रिमें देवताओंमें सरस्वती मातासे विध्नकार्य करने को कहेंगे । 


रामवियोग की संभावना में विलंव की अस्त्रीकृति 
ज्ञातव्य है' कि अंधशापसे पुत्रवियोग होना निश्चित है' तो ऐसी सी 
आनेकी प्रीतक्षामें अधिक समय छगनेसे उसी वीच श्रीराम भी कहीं सकी 8 8३000 3 


हीं चले जॉय औ व्यवस्था 
किये विना ही मृत्यु हो जाय ९ इस दोपसे वचनेके लिए राजाने उत्तरदिन को आग हे पक 


आअयोध्याकाण्डम्‌ श्ष 


कामना-पूर्दिका योग 
यहुत दिनांसे चछ रही मनः फासनाफे पूण द्ोनेषा योग 'अमी आया है। इसीफो कपिने 'सुअयसरः 
इब्दसे घोधिन फिया है'। पंचागफे अनुसार स्योतिष मी गुरुके समीप पहुँचनेफे छिए प्रहोंकी मनुकूल्ता 
फो थता रद्या है।। इस प्रसंगमें समझना यह छऐ फि जिस समय राजाने अपनी आमिछापाको छेकर गुरुफे 
यहाँ जानेफा पियार फिया उस दिन पंचागम्म सुदिन था। इसमें देतुयाक्य दोहा २ है! । 
मुप्तमंत्रणा्थ गुरु के यहा राजगमन का औषित्य 


विधारोंपी अस्युन्चता और पायेसम्पत्तिफी भेप्वाको ध्यानमें रखकर रासाने स्थयं गुरु फे आश्रम में 
जाना टी उचित समझा | अग्रया अन्नणाषे लिए योग्यदम स्थान गुरुषा निधासस्थान टीफ होगा ऐेसा 
राजा समझ रहे हैं । 

जयंदफ मम्पूण सामग्री एफत्रित नहीं हो जाती सवतफ उसफे सध्या्याधमें मच्रफो प्रकट करना शथ्धारु के 
अनुसार म॑श्रभेदझा पारण माना गया ऐ। यह दोप गुरुफे (नवासस्थानमें नही समझना चाहिए | 


प्रस्तावमें आवेग 


सगदि--राजा भ्रीरामफे अभिपेफकी छल्पनाम॑ स्पय॑ पुलकस हूँं। प्रसन्नताफे अतिरपसे अत-करणमें 
आंवंग है । पृद्धायस्थामें मी घारीरमें दृठगतिफा दिखायी पड़ना उमी आयेगका परिणाम है.। गुरुफे द्वारा 
प्रइनकी प्रतीक्षा न फर राजा स्वयं अपने मनोनीत प्रस्तायफों गुरके सामने रखते दँ--यह भी जायेगका 
दूसरा परिणाम है । 


चौ०--ऋहइ उुआहु सुनिअ घ्ुनितायक | भए रास सद विधि सघ लायक ॥१॥ 
॥ “ऐपेंक सचिव सकल पुरवासी।जे हमार अरि मित्र उदासी ॥र॥ 
भायार्थ--रादा दफप्तरप गुप्दीक पास पहुँच कर कह रद्द ई कि “दे मुनिर्भ्ट ! भीराम सब हीतिसे सर्बसमर्थ शोर 
गोग्य दा रप हैं। ( सप छापक! का साप्य आगे च्ां* ४ में जशष्ण्य दे। ) सेबक गण कौर समस्त 
पुरपासी ८या हमार एाप्रु भिन्न, डदासी सबको भीराम प्रिय हैं । 


राण्पारोहणसोर्यता 


शा० ज्या०--राम्यारोहणरी योग्यवा राजपुश्ममें उनफे आशिगासिफ गुण-आत्मोपफारिक-गुण्थुक्धि गुण, 
सस्साह-गुण सथा बिजिगीपु-गुणपर निर्मर दोसी हैँ । क्रास्मघान्‌ भीरामें रक्त गुणोंकी सम्पत्तिसे स्पेकप्रियता 
है। भीरामये दाथोमें राम्पफा अधिफार पेससे समर्पित होने सवा रद्य हे न फिदायप्रयुक्त दोनेसे। 


प्ञातब्य दे कि “छोमु न रामहि राज कर” कौर “चद्वत न भरत सूपतिष्टि भोरे” की स्थितिमें श्रीरामफो 
हृठास्‌ राजपद दुनेझा निणय अथया उसमें ब्यबयघान होने पर भरतके झूपर दृठास्‌ राम्य संघालनका भार 
झादि निणयकों वेस्मरर कहना होगा फि श्रीराम और मरसको अथे प्राप्त होनेमें अ्शास्तरमें कही नीति 
ही साघन हुई है'। [ प्रमाण टिप्पणी में दर्खे' ] 


भारतपपंमें अर्थेफे झजनफा यद्दी आदएा रहा है' अर्थात्‌ रक्त नीतिसे प्राप्त सम्पत्ति किसीफे भी छिए 
आसमिपः ल्र्थात्‌ आंसमें गड़नेवाडी नहीं होती । 


$ जितेस्िसर्य विवयस्प छक्षर्ण शुणप्रकर्पों बिबयादकाप्यते। 


गुणाधिक॑ पुंसि जनोउ्मुरम्पते कषताशुरागप्रसचा द्वि संपद'॥ कामन्दृदी ण 


१६ भावाथे, शाख्रीयव्याख्या समेतम्‌ 


गुण-सम्पत्तिका उद्देश्य 


प्रईइन--श्रीरा मने समस्त गण सम्पत्तिका अजेन क्‍या राजपद ग्राप्तिके लिए किया है हक 
उत्तर--भारतीय शाझ्मसयादार्में विहित जो भी काये हैं उत्का अर्जेन धर्मके उद्देशय एवं कर्तेव्णब् 
इष्टिसे ही शास्त्रोपासक करते रहते हैं, फछकी आकांक्षासे नहीं। यह सिद्धान्त गीतामें सी स्पष्ट है'। 
फलत' शाम्रोपासकके कार्य अथप्रधानभावमें परिणत नहीं होते । उसका दृष्टफल यह है' कि गुणोंके अजेनसे 
प्रजामे प्रीति एवं तत्प्युक्त हृषोनुभावात्मक दान आदि कार्य प्रेमियोंके द्वारा स्वयं सम्पन्न होते रहते हैं 
ऐसा साहित्यका सिद्धान्त है'। तदनुसार राजा एबं प्रजा दोनों ही श्रीरामकी प्रीतिका अज्ञभव करते हुए 
उनको राजत्व समर्पण करनेके लिए पअवृत्त हैं । एवंच राजसभार्पे चर्चित राज्यप्राप्ति आदि दरृष्ट फल 
प्रभुके लिए आनुपंगिक हैं । इसी व्याख्याको कवि ने राजाकी भापामें अनूदित किया है. । 


सब विधि का भाव 
“सब विधि सव छायक” की व्याख्या निम्न प्रकारसे समगनी है' जैसे--श्रीरासके राज्यपंद प्राप्तिके प्रति 
भरतका अभिमत तथा पुरजन परिजन, की सम्मति और कैकेयीकी रामके प्रति प्रीतिको (चौ २ ढोहा ७० में 
की उक्ति ) समझ श्ञात्न बिधिको मानकर कुछरीतिके अनुसार ज्येष्ठ पुत्र श्रीगमको युवराज पदसे 
अभिषिक्त करनेका निर्णय राजा ने किया है । 


अथवा दशरथके सेवक श्रीरासकी सेवा करनेपे अपने भविष्यत॒को धन्य मान रहे हैं। यही 
श्रीरामकी आत्मसम्पत्तिका प्रभाव है'। मंत्रिपरिषद भी यवराजावस्थापन्न रामकी व्द्िक्त है'। ऐसे अवसर 
पर महाराज दशरथ श्री रामको सब विधि सवछाय क! विशेषणों से विभूषित कर रहे हैं । अथवा उसी के 
अनुभव में राजा कह रहें हैं कि सभी पुरवासी पुत्रके प्रति अपनी अन्रक्ति प्रकट कर रहे हैं। साथ ही 
पुरवासियोमे शत्र, मित्र एवं उदासीनका विशेष उल्लेख करके राजा अपनी आन्तरिक आशंकाको भी व्यक्त 
करते माल्यूम पढ़ते हैं। क्योंकि पुरमें शत्र, मित्र एवं उटासीन रहते हैं। सम्भव है' कि श्रीरासको राज्य देनेसें 
सित्रभेद हो जाय । पर वैसी संभावना कम है'। उदासीन वर्ग उपकारकतस्व एवं शत्रत्व से विरत है'। चूँकि 
सभी प्रस्तुत मंगलकायेमें मित्रभावसे आये हुए हैं, अतः रामको राजपद देनेमें यह दोष भी निरस्त है'। 

सब विधि! कहकर राजाने यह दशोया है' कि श्रीरामके जैसी योग्यता भरतमे भी निर्विबादः है' तथापि 
रासके व्येप्त्व से सस्पर्ण बिधिकी व्याप्ति श्री राससें ही है'। यशपि यही परम्परा हमारे बंश में हृहप्रल 
है! तथापि राज्यानुरवेधिकछेता दोनों पुत्रों सें होने के कारण मेरा बंश 'कुल राज्य” में परिणत होकर 
प्रजाकी सम्मतिसे भरतको भी राज्याधिकारी चना सकता है' ---महाराजा दशरथ ऐसा विचार करते हे 
निर्णय कर रहे हैं कि भरत राज्यामिलापी एवं अर्थी न होनेसे वह वंशपरम्परा का अतिक्रमण करने में 
समुत्सुक नहीं होगा । 

अथवा ज्ञातव्य यह भो है की राजा अपने पुरमें अन्र-मित्र उदासील 
राजाके घरमे ही तीनो रानियां झ्षत्र मित्र उदासीन भेढ से विभक्‍त हो कि दे 
सुमित्रा उदासीत हैं और माहकुलको देखते हुए सन्थरासहित कैकेयीके वारेसें कहा जा सकता 
है कि यदि राज्यको समुचित व्यवस्था किये विना राजाके शरीरका स्याग हो जाता ह्ढे तो 
बह माकि दोनेसे सम्भव है, कि किसीके वहकावेगें आकर अर्सिवको ग्रहण कर सकती है'। यद्यपि 
उसने अभीतक ऐसा कोई व्यवहार नहीं किया है' तथापि उसमें क्रन्निम झत्रताका होना असम्मव 
नहीं हैं। इसके उत्तरमे राजाने 'सवबिधि” कहा है'। अथौत्‌ श्रीरामने ऐसा कोई कार्य नहीं किया है' जिससे 
केकेयी उन्मे दोप निकाल सके। फिर भी उक्त सम्भावनाको ध्यानमें रखकर राजा दशरथ अपने जीवन 
मे ही गुरुजीकी अनुमतिसे श्रीरासके राजत्वको निर्णीत कर देना चाहते है जिससे श्रीरामका जग 
सबेदाके लिए सुरक्षित हो जाय । यही 'सव विधि? का सदुपयोग है'। 


३ अयोध्याकाण्डम्‌ : १७ 


शझास्पानुयायिव में प्रतिघ्ार्थनिण्दण 
उपरोक्त दौपाईमें 'सदबिधि” फद्नेका दीसरा तास्पये यह मी हैः कि राजा पिघिफा शनुसरण करते 
हुए अपनी सस्यसंघदाफे चछ पर भीरासको राम्यामिपेक फरना चाहते हूं। चनफे सामने ऊड्डापोह की स्थिति 
शी है।। पूर्पापरपिधिफे समन्ययफों ययायस्‌ न जाननेपर उनकी कषस्था किफतेब्यथिमूढ़ जेसी है'। 
एक सरफ कैफेयीफे साथ वियाद फरने फे अपसर पर क्रेकेयीम्रुत भस्तफों राज्य दने की प्रतिशञा है) 
( सैसा चौ० १ दोद्ा २९ फी छ्यारुयामें स्फुट दिया गया है) दूसरी तरफ समस्त आत्मगुणसम्पन्न 
हयां को वादा पदफे थोग्य शीरामफो राग्यासिपेक फरने फा अपना निर्णय है'। इसफे छिए 
राजाको बपपरिधिका: समन्वय करना है। इस समन्ययमें इतिकदख्यता फा मीमांसाके द्वारा निर्णय 
करके ही राजाने भीरामफा राम्याभिषेक निर्णोद फिया है | जिससे सत्यसेघता पर भी जाबर से आये और 
इएलपिपरीत फाय मी न दो । 
भीरामफो राग्य फा छोम मद्दी है और मरत राज्य छेना चाहते नहीं जेसा (दोहा ३१ में ) 
“छोमु न रामहि राजु फर” और (घी १ दोद्दा ३६ ) “चहदत न भरत मूपतह्द भोरे” से स्पष्ट हे। 
अपनी फस्पनामें राजा ऐसा नहीं घोल रहें हैं. वर्फि श्रीराम और मर्तफा क्भिसत जानफर ककेयीसे 
कह रहें हैं। ऐसी परिस्थिति राजपद फिसको दिया जाय यह प्रभ्न ह'। इसफे ससाघानमें राजाने शास्र 
का सद्दारा ऐफर कुछरीसिफे ऋअजुसार स्येप्टत्य दोनेसे भीरामफो हठास्‌ युवराज चतानेफा निर्णय किया हे.) 
इसपर पुरजन-प्रशाफी सम्मति और फैफेयी फ्री इब्छाफा आलजुफूल्प समझनेसे अपनी प्रतिक्षाको मिध्या 
करनेफा फारण नहीं है । न तो भीरासम या भरठफे प्रदि पश्तपाठ ऐ। श्ासख्र का नियामकत्प माननेसें 
राजाकी जिसेन्द्रिया भी प्रकट है। शादण्य हे. फि राजा ग्रदि अपनी प्रतिशाकों ही क्पनाते हैँ दो 
राजनीवि का छोप दोनेसे राम्य और देशका पिनाएा हे! शास्त्रानुयाथी सत्यर्मथ मफक्तके द्वारा यदि 
ऐसा कोई संरुल्प दो जाता हैः जिसको पूर्ण फरनफे छिए शाखविधानका श्रनुसरण करनेमें क्षपत्ती 
पतिशा असत्य होती दो हो प्रमु मुक्तिसे उसफो प्रणे फरते हैं। लेसे राजाका यह प्रभाय फद्ा जायेगा कि 
प्रमुकी अनुफम्पासे पेसा पिधि विधान बन गया फ़ि राजनीछिकी छत्रछायामें प्रयोफा प्राघान्य रहते 
हुए ( मरद के राश्प संघाउन से ) राजाफी प्रतिज्ञा भी रद गयी और भीराम एव मरतफे प्वरिश्रसे राजाका 
बचन भी सत्य प्रमाणित रहा । 
न राम फे आस्मसंपदादि गशुर्णों के साय रपरोक्त दष्यों फा निरूपण राजा ने गुरु पसिप्त के 
सामने किया | 


चौ०-संपह्ि राष्ट्र प्रिय जेद्दि विधि सोही | प्रश्न अत्ीस बच तनु घरि सोहो ॥३॥ 
निप्र सहित परिवार गोसाई। करदिं छोहु सब रोरिद्दि नाई ॥४७॥ 
भाषार्थ--संपूर्ण सेदक पुरजत आदि सभी को भीराम पैसे ही प्रिप हैं श्लेसो डगकी प्रियता सुप्मों है । औराम 
देसे हैं. मानो लापका झाधीयोव्‌ दी धूर्विमात रूप में सुधोभिद »है | दे गुसाई फो ! संपू्े दिप्र समाज परिषार 
सौददेठ, मेरे पु पर ऐसा दी प्रेम करता है सैसा कि भाप । 
सबझायक की उपादेयता 

छ्ा० र्या ---पुर एबं जनपद में स्थित सभी पर्गो' को जो प्रिय है पही राजा फे लिये परम कर्तन्य माना 
गया दे। अस' भ्री रास को राजपदाधिप्ठिप चनाने में यह उत्मय निर्दिष्ट है। परसम्ध से झोकसंमह 
प्रकरण को घ्यान में रखते हुए राजा का कर्तेब्य होता हे कि घद अपने प्रस्ति छोकसम्मति ( जनातुराग ) 
को स्थायिनी बनादा रहे । रारा दश्शरथ ने इसी छोकप्रियता को (सवलायफ! से दुश्ोया है। इसफो भी 
शाम ने आत्यकाऊ से ही स्वमावद' क्र्फित कर रखा है। शेष दोहा ११ देखें 


भावाथ, शासीयव्याख्यासमेतम 


गुरू एवं विप्नों की भी प्रियता 
“0 घ 
आत्मारामाथ मुनयो निग्नेन्था अप्युरुक्रमे | 
कुवन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्यंभूवगुणो हरि। ॥भा०१७।१०॥ 
कि विश्वामित्र स््पे ज्येप्ठपुन्न श्री राम 
श्रीमद्भागवततोक्ति के अनुसार आत्माराम विम्र, विश्वामित्र बसिष्ठ जैसे मुनि भी उ्येप्ठपु 
आल अपनी निरतिशय प्रीति रखते है। जो श्री रास की श्भुुता एवं नीतिमत्ता का परिचय करा रही 
है'। इस प्रकार 'सबछायक के अन्तर्गत नीतिसंपन्नता, आत्मसपढा, तथा अभुत्य दण्डप्रणयन आदि 
सभी गुणों को श्री राम ने अ्रकट किया है । हे हे 
गुरुजी से आशीर्वाद हेतु उनका कीतन एवं उनसे प्राथना 
गुरुजी का आशीवीद ही राजा के घर मे पुत्र रूप मे अवतीण है'। अत' राजा पुनरपि गुरू बसिष्ठ 
से आथैना कर रहे हैं कि विप्नों को साथ मे लेकर वे राज्योत्मव कार्य को संपन्न करने भ सहयोग 
प्रदान करें । ह 
संगति--राज्य में राजा को गुरूजनों की अपेक्षा क्यों रहती है! ? ऐसा प्रदन उपस्थापित फिया जाय तो 
उसके समाधान में राजा अपने अनुभव को सुना रहे हैं । 
चौ०-जे गुरुचरन रेनु सिर धरदीं। ते जनु सकल विभवत्रमु करहीं ॥५॥ 
भावाथे--जो गुरुचरणरज को अपने सिर पर चढ़ाते हैं. थे मानो समस्त विभवकों जीत कर अथीव्‌ सर्वगरुण- 
संपत्ति को अपने अधीन करते हैं । 
शिरोध्त गुरुचरणरज का वेभव 
शा० व्या०--विवेकब्ृत्त्यवच्छिन्न चेतन्य जिनसे प्रकट है' वे गुरु है। उनके चरण तर्फ एवं प्रमाण दै ।१ उन 
दोनों का लेश भी यदि शिष्य को उपलब्ध है तो गुरुचरणरज की उपलब्धि कही जा सकती है. । यह 
उपलब्धि जिसको सौभाग्य से हो गयी है' वह अविनाशिनी संपत्ति से प्रणे है' तथा यथोचित प्रतिभा से 
संपन्न हैं। यह व्याप्ति है'। इसकी उपादेयता तब समझमें आती है! जब कि शिष्य सदगुरु को पाकर 
उनके आदेशों को आत्मीयता से ग्रहण करते हैं। निर्मल अन्त'करण मे सीत्युचित यथाथे तत्व का भान 
होने से संपत्ति भी सुलभ होती है। अकाये से निवृत्त होना वैसे शिष्यों का स्वभाव चन जाता है । 
संगति--इस रवभाव को राजा ने अपनाया है' अतः वह उक्त व्याप्तिका अधिकारी होता हुआ निवाध 
समद्विसान्‌ है'। उसी को राजा अपने अनुभव से प्रमाणित कर रहे हैं। 
| चौ०--मोद्दि सम यहु अनुभयठ न दूजे | सब॒पायड रज पावनि पूजे ॥६॥ 
भावाथे--मेरे समान ( भाग्यशाली ) दूसरा कोई नहीं हुआ। आप जैसे समथे गुरु चरण की पूजा कर उसकी 
कृपा से सौभाग्य ( रानिया, संपत्ति अखण्ड ऐश्वये, चिरंजीवित्व, अनुशासन का यथार्थ जादर्श 
पिठ्भक्त पुन्नचतुष्टयोपलब्धि ) अनायासेन प्राप्त है | कवि ने इसे “सब” शब्द से बताया है । 
राजा का असाधारण सोभाग्य और उपपत्ति 
दा व्या हक 5 पक स्थित राजा 42428 भारतीय राजनीति की शिक्षा 
छावान्‌ बना कभाव में रह कर राजा ने भी अनुष्ठानतः नीति शास्त्र की ग्रामाणिकता 
स्फुट फी है । १ 
१. न्याय कुसुसांजलि मंगलाचरण टीका-- 


श्ट 


// अयोष्याफॉण्डम्‌ १९ 


राजा दयासफ होता हुआ भो अपनी एयक्‌ स्पठस्ध्रवा को पिदीन फर मंत्र फे सर्यस्य गुरु मुनि की 
सयौदा में रहने को इृष्ट मानता है'। उसद्धा प्रस्यक्ष फछ है फि श्री राम मय पुत्र फे रूप में एपत्यित हैँ । 
यदद श्ानन्दातिरेफ तया परम सौभाग्य राजा दृष्टरथ फो असाधारण रूप से प्राप्त है 
के व सनोर्य पूह फो दस्स फर राखा को पिद्यास दै कि अपशिष्ट सनोरप भी 
पे दोगा। 
चौ०-अप अमिलापु एूं मन मोरे। पूजिदि नाथ अनुग्रह तोरे ॥ ७॥ 
सापाये--इच्तरकार को देरते हुए मेरे मस में केपर एक इच्छा रए पी है बद भी भाषकी दी हुपा से पूर्ण शोगी। 
काप पम्बोधण से राम्ा कट रऐे हैं कि छाए उस अमिकापा को पूछे करने में समर्थ है । 
गुरु के आशीर्वाद का विशेष अयोजन 
ह्वा० ध्या८-ऐसा ४३ म होता दै फि भमरद है+7६६ ४४५० में समयसापेक्षताफे कारण मनोर्थपूर्दि 
फे बारे में राजा फो सदेद है। झत' राजा फा यह है फि क्रमी वे जिस अभिड़ापा को व्यक्त 
करने जा रहे हैँ. रमफी पृणेठा फा भार गुरु बमिप्ठ फे ह्वीअपीन ह। राजा स्प्य फो इसी देसु से महस्य 
न देफर फेपल गुरशी फी इच्छा फा अनुसरण फरना घाहसे हैं। पिन्तनीय पिपय यद् है कि गुरुप्साद 
से दी शिप्प फे सप मनोरय पृण होते हँ। इसफा अथ यह नदीं फि भ््लेसन फे यष्ठा गुरु शिष्य को 
पराघीन चनायें। अपितु उसफ्रो य्रोग्यथम बना फर उसफो पूर्ण स्वतम्त्र बनाना ही भारतीय राजनीति 
फा गौरष हे। 
संगति --अपनी इच्छा को ध्यक्त करने फी अनुमति मांग रहे दे'। 
घौ«-सुनि प्रसप्त लखि सहत सनेह । कहेठ नरेस रजायसु देह ॥८॥ 
सापाय--शाजा इशएंप का अ्रपमै प्रति सहज स्नेद देखकर मुगि बसिए प्रसघ् हो शपे । उसकी धसडइता को देशकर 
झुनि मे राजा से भ्राक्षा की मांग की । 
गुरुप्िष्पप्रेम 
छा प्याब--गुरु फे आश्वीयाद की काफाक्षा को सुनफर मुनि इस निणय पर पहुँचे फि राजा 
घनफे आएीर्पोद फा पिश्ञेप आफांझी हे। शुरुजी फो भी स्पपरियार में अभिन्न अंग देखता हुआ राजा 
इनपर अति भीठिमाम हई। राजा ने यथायवया गुरुसेपा फरफे श्साध्य फो साध्य बना छिया को 
इविद्दास से मिद्ध दे। 
इसकिए राजा के अन्दिम मनोरथ पी पूर्ति करने में सहायक दनने का धिचार कर गुरुजी ने उससे 
अमिदापा छो.रप्टथया प्रफट करने का आदेक्ष देते हुए क्‍या थाज्घा दे ऐसा का । 


हु रजायसु का जौचिस्य 

राजा से मुनिका 'राजाज्ा! फदना अनुचित दिखता है। परम्तु राजमाय में उपस्थित राजा स्थामी 
है। मन्त्री पुरो्तित पसि्ठ दृब्य प्रकृति स्थ माने गये हूं, यद भारतीय राजनीति सिद्धान्त है। सके 
अनुसार गुरु यसिप्त ने 'रजायमु! का प्रयोग किया है। 

4 2 विर्य है कि समयसापेक्षता में रक्त कार्येसिद्धि फे सबेह का दिघार फरके उत्तर से गुरत्री 
अदा रामस्य युबराजस्व मद्रिता तदा सुदिनिझ! ऐसी काछिफ व्याप्तिका निर्देश करके भीरास के प्रमुस्य 
को प्रदद करेंगे। उक्त स्याप्ति में छुदिनित्य साध्य द राम्यामिपेफका साविस्य देसु हैं अत' सुदिन का भमी 


० भावाये, 'शास्तीयव्याख्यासमेतम 


री] ३.५ | 

निणय नहीं है'। फिए भो राजा को बढावा देते हुए ऐसा कहेंगे कि तत्काल भे॑ राजा का प्रभु में परण 

सनोयोग हो जाय | इसलए भाव अव्यग्हित दिन को मुटूते ककर रामराज्याशियेक की तेयारी करानक 
हेतु से राजा के मनोर॒थ पूर्ति की प्रशसा कर रद दे | कर 

संगति--पुर्वे चौपाई मे कही राजा दशरथ फी आज्ञा का क्‍या महत्त्व है इसको यों स्पष्ट फर 


रहे हे । 
दो०--राजन राउर नाम जसु सब अभिमत दातार | 
. फूल अनुगामी महिपमनि मन अभिलापु तुम्दार ॥ ३ ॥ 


भावार्थ --हे राजन्‌! आप के नाम की कीर्ति ही मनोरष को संपू्ण करने घारी है । है राजाओं से भ्रष्ट ' आपकी 
मन!कामनाका विपय ठो आपकी इष्छा के पीछे चछने वाला हू अर्धात्‌ आपकी झ़च्प्ठा शी तरकाट पश 
देनेवाली है । 
इच्छासिद्धि निर्विकारिता में 
जश्ञा० व्या८--शुरु वशिष्ठ राजा दशरथ फी स्तुति करते हुए फहते है फ्रि आप मर अधीनस्थ नहीं हैं 
बल्कि स्वतन्त्र है। आप का यश इतना विस्तृत है. कि संपूर्ण वर्ग आपके यश का अलुगामी हो रहा दे । 
आपकी इच्छा भी इतनी सुनियन्त्रित हैः कि वह कमी व्यर्थ नही होती । आपकी जो भी अवशिष्ट अभिलापा 
होगी वह स्वयं द्वी पृणता अदान फरेगी क्योंकि आपफा अन्त'करण अशक्य, अकल्प, और अभन्‍्य 
की ओर झुकता द्वी नहीं । यह आपकी निर्विकारिता का परिणाम है| 


राजा को करपना में ग्रामाण्य 


राज सुख से उच्चस्वर्ग सुख यहाँ दशोया है। भारतीय राजनीति फो ऐसा ह्वी मुख अभिमत है जिसमे 
नीतिमान्‌ राजा को इच्छा होते द्वी दूसरे क्षणमे तदलुकूल घटना वन जाय। राज़ा दशरथ की सत्य 
संकल्पता वसिष्ठमुुनि द्वारा श्रमाणित हो रहो है. । राजा दशरथ की सत्संकल्प स्थिति होते हुए भी गुरुजी की 
और शिवजी की कृपा से सब काम अभीतक पूर्ण हुए हैँ। यद्दी कल्पना का प्रामाण्य है फिर भी 
अवशिष्टा अ्रस्तुता अभिापा एकमात्र यद्दी ( रास राज्याभिषेक फी ) जीवित रहते पृ्ण न होने मे प्रभु की 
इच्छा को ही कारण कहा जायगा । 
राजेच्छाविषयत्व हेतु में निरुपाधिकत्व 


मुनि की इस उक्ति मे पविच्रास्मा नीतिकुशल राजा की इच्छाविपयता हेतु है। भनोरथपूर्ति साध्य 
है.। यह द्वेठ निरुपाधिक द्ोने से सत्‌ हे अथोत््‌ मनोरथपू्ति का व्याप्य है तथा उससे पक्षथर्मता भी सिद्ध 
है. । यह व्याप्ति तवतक है' जब तक राज्य पालन का फलूस्वास्य राजा मे था। उस दृष्टि से राजा के हृदय 
मे राज्यफल की प्॒णेता है। अभी तत्सवन्धिनी कामना नहीं है.। यह्‌ राजापर प्रभु की कृपा है'। है 


राजा जब अन्तिम अभिलापा को व्यक्त करेंगे तव उसके द्वारा संकेत यह होगा कि राज्य का फल- 
स्वाम्य श्री रास मे रहेगा । तत्संवन्धित्ती यह अभिलापा होगी । उसका विषयत्वरूप द्वेतु सनोरथ पूर्तिरूप 
साध्य का व्याप्य नहीं होगा यत यह सोपाधिक होगा। उपाधि श्री राम ने बतछाया हुआ अनौचित्य होगा। 
इस रीति से मुनि के उक्त वचनों मे असंभावना आदि दोष निरस्त है'। 

संगति--मनोरथ को सुनाने के लिये आप आये हैं तो मै सुनना चाहता हू । 


चौ०--सब विधि गुरु प्रसन्न जिय जानी । बोले राउ रहसि मदु वानी ॥१॥ 
भावाथे.--गुरुजी सव प्रकार से भ्रसन्न हैं समझ कर राजा इंसते हुए भ्दुबचन बोले । 


श्योप्याफाण्टम्‌ २१ 


गुरु का आमिपुरुप 
झ्ञा० ष्या«--गशुरुणी फा आभिमुस्य प्राप्त फिये दिना अभिढापा फो प्रकट फरना उचित नहीं था पेसा 
सोथ फर राजा ने अपना सनोरष प्रपट नहीं क्रिया था। अभी गुरुजी फो प्रसप्त देखफर राजा ने निर्णय 
किया फि सनोरथपूर्दि मे गुरुषी फा आशीषाद अपदय प्राप्त होगा। 


संगवि--पसा सोच फर राजा अपनी अभिछापा (जो फ़ि सोपाधिफ होगी) मृहुधाणी में सुना रहे हैं । 


चौ०--नाथ राप्तु फरिअद्दि जुपराजू | फहिअ कृपा करि करिआ स्माणू ॥२॥ 
भमायाथे --ऐ साथ | श्रीराम को युपराज पनाला चाहता हूँ। झाप हा करके कट्दिये हीक है तो इसकी दैयारी कई 4 
मनोरथ का प्रकाश्नन 

झ्ञाप्ण्या०-भद्दाराव दशरप भीरामफो युपराज पद देना चाहते हूँ। पर उत्तरसश्रिपरिपद में इसका 
अन्विम निणय कपणछ्िष्ट या, उसापर सम्मदि पाने फे लिए पूर्षोदित प्रस्ताष गुरुती के सामने राजा ने 
रखा | युपराज पद दने फे अनम्तर यरद्ाँ यद् नहीं समझना चाहिये फि राजा राम्य से अझ्ण नहीं होंगे। 
यास्दपिफ्ता हो यदू हे कि भी राम का राज्यभिपफ स्पर्य संपन्न फराफे “योगेनाम्ते उनुस्यजाम? 
फाल्दिासोक्ति पे' अनुसार अथात्‌ योग आराधना से शरोर फो स्यागना चाइते ई । 


चौ०--मोद्दि अछत यहु द्दोइ उरह । लद्ददं लोग सब लोचन लाहू ॥१॥ 
भआापाये-मेरे रइत पद्द इस्सप दो तो सय छोगों को सपनों का फ्वाम प्राप्त पो । 


मोद्ि अछत छा घ्वनितार्थ ह 


श्ञा० स्या-न्यद्ोँ बन्तप्पनि ऐसी मादुम दोती हे फि गुरु ने कहा होगा कि जब समय आयेगा 
उद भस्ताप फा अनुमोदन फिया जायगा, अमी छीघता क्‍या दे ९ इसफे उचर में राजा 'मोहि झ्ततः कह 
जा हैं। अयात्‌ मत्यु अत्यन्त सप्रिफट दे! जैसा दांह्ा २ पौ८ ६-७ में पणित रुक्षणों--मुकुट के टेद्ेपन से 
(्‌ फे दुस्यप्न से ) राजा फो ज्ञात दो चुफा है। अति शी आंख मूँदने क्री संभाषना हे इसलिए 
राजा चाहते हैं फि रफम्योस्मण रनपे' सासने हो हाय और समाज उसफो देखकर सुखानुभष करें। 
चौ०-अद् प्रसाद सिद सबइ नियाद्दी । यद छाउऊसा एक मन माही ॥ए॥ 
सायाथें--शापदी प्रसप्रता होमे से क्रपात्‌ गुए की हृपा से शंकर प्री ले सय काम पूरा किया है ।, बय केगरू घटी 
पुक भमिझापा मन में दे । 
श्ा० स्या-गुरु की एपा यिना कार्य निविश्न नहीं शोता--इसका वियेयन अरण्य काण्ड सें 
किया गया है.। 
एकत्व लालमा में 
भुस्य क्रमिछापा रामराज्याभिषेक की दे और एत्मव लादि सदिष्छापीन है' इसीको कपिते “यह पक 
छाछसा सन माही! से दशाया है। न्‍्यायभाषानुसार एफ छाछसाफा अरे हे--फलेच्छानघीन इच्छा 
निष्फप यह है फि स्यायद्वारिफ कार्यमें फेच्छा दी सामानों को जुटाने में फारण होती है. पर मक्तों की 
इच्छा फशेच्छा के श्रपीन नही होती हे! कपः छाहसा में एकत्य रुपपन्त है। दक्तरय की उपयुक्त फ्ाससा की 
प्कपाक्यता घाडकाण्ड में सन के पूर्येजम्स के प्रसंग से शातव्य दे । | 
१ यथा--एक छाछसा चढ़ि उर माही। चाहउ मुम्दधदि समान सुद । सनि विमु फनि जिसि लछ बिनु 
भीना | ससडोबन ठिसि हुम्ददि शूपीना आदि । चौ० ३ दोहा १४९ था चौ० ६ दोहा १५९ चा० का० 


२२ भावाथे, शास्त्रीयव्याख्यासमेतम 


लालसा हेतु में सोपाधिकल 
, यह अमिलापा दो० ४ के निर्देशानुसार श्री राम के भोग्यफल्त्याम्यसत्रन्धिनी है वह सोपाधिक है । 
उसका प्रक्राशन मुनि पत्युत्तर मे करेंगे | 
संगति--राम राज्य देखने के वाद पुनः दूसरी अभिलापा प्रकट करे तो फट्ठां तक पूर्ति फी जाय 
इूस प्रदन के उत्तर मे राजा का अग्रिस कथन उपस्थित है! । 
वो०-पुनि न सोच तनु रहठ कि जाऊ | जेहि न होहइ पाछे पछिताऊ ॥५॥ 
भावार्थ--फिर शरीर रहे या जाय इसका सोच नहीं रहेगा बादस ऐने बाला कोई पछताया सी नहीं रऐगा । 
राज्याधिकारनिर्णयसंवन्धिनो विनिगमना 
क्ञा० व्या०--राजाने कहा एक मात्र यही मनोरथ आपके सामने रखता हू । यदि यह अ भिल्यपा घोषित न 
कहूँ तो मेरा अन्तःकरण सुस्युके समय उसीमें अ्मण करेगा और मुक्तिम बाधक द्ोगा । अभिलापाऊी पूर्ति 
हो जानेपर चतुर्थ पुरुपाे (मोक्ष) भी निवाध है'। झत्यु अति सन्निकट है, इस समय जीवित रहते यदि 
मैं श्री रामके लिए युवराज पदकी घोषणा नहीं करता तो भविष्यत्‌्म प्रजाको सताप का अनुभव करना पड़ 
सकता है'। चार पुत्र हैं राज्यदानके अनिर्णीत होनेकी स्थितिमे पुत्नोंमि एकाथोमिनिवेश प्रयुक्त कट 
खड़ा हो सकता है', तव राजपद्‌ किसने पाना ? यह समस्या अससाधेय होगी। कुलराज्य फिवा एक राज्य 
फा निर्णय न हो पायेगा । वंशकी मयोदा भी उच्छृंखलित हो जायेगी। अतः में ही विनिगमक वनफर 
राज्याधिकार की घोषणा कर दूँ।” 


यद्यपि राजा दशरथ की अभिलाषा पूर्ण न होगी फिर भी श्री रामको राज्य देनेका निणय स्थिर रहेगा। 
उक्त निर्णयकी साथेकता आगे सिद्ध होगी । 


" संगति--राजा का उपयुक्त मनोरथ सुनकर गुरु वसिष्ठ अत्यन्त असन्न हुए । 
., ... चौ०-सुनि शनि दशरथ वचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन साए ॥६॥ 
भावाथे--मंगल और मोदका सूछ राजा दशरथ का वचन सुभकर मुनि वसिष्ठ फे मनको अच्छा छुगा। 


अभिलाषा का ओवचित्य 
शा।5 व्या"--राजा का उपयुक्त सनोरथ सुनकर मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए। यह राजकीय मनोरथ सूर्चवंशके 
लिए ही नहीं, सबके लिए मंगलदायक है, इष्टलाभजन्य सुख वढ़ानेवाला है' लेसा राजाने आगे कैकेयी 
द्वारा, विन्न उपस्थापित करने पर भविष्यवाणी करते हुए स्पष्ट किया है'* । 
सन भ्राए का भाव 


“समन भाए से गुरु वसिष्ठका समर्थन व्यक्त है'। रामराज्यामिषेक अभी होगा कि 
विषय है' जि । कि नही: 
विषय है' जिसका समाधान दोहा ४ की व्याख्या से स्फुट है'। द्द नहां, यह दूसरा 


 संगति-+राजा दशरथ को अभिलाषा में निरत रखकर रामके प्रति उनका 





भ्रविष्यतको )॥ न 
भविष्यत्को देखते हुए गुरुजी श्री रामका वास्तविक स्वरूप समझा रहे हैं.। का चिंतन छ्यानेके हेतु 


(१) सुबस वसिद्दि फिर अबध सुहाई । सब गुनधाम राम ग्रश्ुताई। 
“करिहृदिं भाइ सकल सेवकाई । होहृहि तिहूँ पुर राम बढ़ाई । चौ० ३-४ दो० ३६ 


५ ४ 4 


(5 मे 


ख्मयोध्याकाण्डम्‌ श्ड 


चौ०-सुनु रूप घास पिम्यख पछिताहीं । घास मचन बिनु जरनि न बाहीं ॥ण॥। 
मयठ छुम्हार सनय झोह़ स्वामी । राम पुनीत प्रेम अनुगामी ॥८॥7 


सामार्थे--गुरुदो ने कद्दा ऐ राजन सुरो । जिससे दिमुर होमे पर छोडको पछतामा पड़ता हैं। छिसका सदन 
किपे बिहा समड़ी जद़़न जाती हीं वही सबका स्‍्वासी श्री रास है जो तुम्दारे पवित्र भेमके अपौन दो 
शुम्दारा पुप्त हुला है । 

प्रशुत्व 
क्षा० ध्या<--प्रमु भद्ी हे जिसकी विमुखामें पश्मात्ताप, जरा जजेरत्व ( बुद्रापा ) भौर शरत्यु पर्यव 
सानमें उपलब्ध होते हैं। जिसके सामुस्यमें ध्यसनमुक्त झानन्द की उपब्य्धि होसी है" | ऐसा स्वामी 

(ईंदघर ) पुश्न रूप में जापके घरमें उपलब्ध हुआ है। 

पुनीत प्रेम का भाव 


धयुनीत प्रेम अमुगामी? 'का भाष है. कि ईप्यों, मात्सयय, द्वेष आदि दोपों के क्रमाषें प्रेसकी पतिश्रता 
प्रकट होती द। प्रेमकी प्रघानता में कर्तव्य पिमुस होना इष्ट नहीं है'। छुद्ध प्रेम दी रामदत्व है। रामको 
युवराज ऐोना प्रिय नहीं हे अपिछु युवराजत्थ रामको परण करना चाहता है'। अत' एस निर्मछ प्रेमतत्व 
के अपिन हो काये फरते हैं तो सापका सनोरथ सराहनीय माना जायगा। म॑ंगछक़ी कामना करमा 
लपना काये है) अर्थात्त राग्यफछ फे स्थामी प्रभु होंगे इसमें उनफ्ी इच्छा उपाधि द उसके रहते 
निणेय फरना संभव नहीं | उपाधिफा निर्णय श्री राम के धैमुस्प को प्रन्यकार स्यक्त करेंगे। 
(घौ० ७ दो० १० में ) 


पैम्नष्यय का ध्वनन 


धसाह्ठु धिमुख' से गुरुजी ने राम्याभिषेफर्मे श्री रामकी प्रिमुख्ता ध्यनित की द जो श्री रामके 
सनोसाथ--जिसछ पंस यह अनुचित एकू। पधु विद्ाइ बढ़ेद्टि अमिपेकृ” में प्रकट है। “सासु विमुख 
पछिदाद्ी” से यदु भो ध्वनित दे कि पनगमन से भी रामकी पिमुझताका अनुभव करके राजा पछतायेंगे 
जैसा कैफेयी के सामने राजा को कहना पढ़ा” होर कर्लछकु मोर पछिताऊ” (चौं० ५ दोष ३६ ) । 
५ज्ञाप्रु मजन बिनु जरनि म जाह्वी” फा यह भी भाय है. फि अन्तकालमें रामका पैमुस्य होगा तो उसमें 
तम्सय हो नामोस्चारण करते हुए शी रास का जो मजन होगा, उससे रामाक्ा-संताप चछा जायगा। 
राजाके जन्मान्दरीय (मनुके) इतिहास से प्रमाणित दोकर मुनि पसिष्ठ के पक्त घबन फख देने घाछे होगेन 

संगति-अमु की यह सेदा द इसमे पिलंद का निपेघ कर उत्साह जड़ा रहे है। 


दो०-बेगि विलंगु न फरिय जप साजिअ सघुइ समाझु। 


छुद्दिन सुमंगठ तय लब राप्त शोहिं जुबराजु ॥४॥ गए 
सावाे>--देर मठ करो। ( झीरामक्य राग्यासियेक करने का ) सब समा छुटाणों। ऊब पी राम जुघराज हो 
ठप्ती मंररूदापक छुम दिल दोगा। 


$ तज्म ्रबघसोउप्पासन्‌ शुषानोशठिषरकोधुसः । रे 
पिक्ल्तोअश्रमुंकुश्युस्प सुखाम्बुअलुर्धा मुद्ृःत।.. ( झी* सा+ १७ स्कत्ण ४७-१९ 2.८ 


२४ भावाथ, शासत्रीयव्यास्यासमेतम 


प्रभुत्य का साधक है 

क्ञा० व्या०--वसिष्ठ मुनिने युवराज होने के अलुक़ल मंगल दिन नहीं बनाया ( क्योफि बह जानने हैं 
कि श्री रामको वन मे जाना है! ) अपितु यह फह दिया कि जिस दिन श्रीराम सुयराजपद पर बटेंगे वही शुभ 
दिन होगा | इसके लिए कल ( भविष्यत्कालीन दिन ) की प्रतीक्षा नहीं फरनी हट । फ्राल, देश, नियति 
रागादि से फंचुफित जीव है, उसको काल देशादिफा विचार करके कार्यडरा आरंभ करना पढ़ता ड्ढे। 
ईश्वर उनके अधीन नहीं है, वह जब इच्छा करता है! तभी सुदिन होता है । ईखरकों देशफराल_नियतिकी 
प्रतीक्षा नहीं फरनी होती, इसका यह अर्थ नहीं है! फि बह शामखमय दिक्रा अतिक्रमण कर काल फो अनुकूल 
चनाता है। फहने का निष्फपे इतना ही है. कि प्रभुको जिस समय कार्य की चित्रीर्षा होती हे! वह समय 
शास्त्रोक्त शुभ दिन वनकर उपस्थित हो जाता है। गुरुजी ने राज़ाफो यही समझाया कि “रामोध्य ईश्वर: 
फालप्रतीक्षणकर्देत्वाभावे सति सकल्पकालीन कार्योुवन्धि जात्रोक्त सकलगुट्टत प्रत्तित्वान!” 

इस प्रकार श्री राम मे ईश्वरत्वका संकेत राजा दशरथफी समय समयपर उपलब्ध ऐोता रहा । राजाफो 
श्री रासमे ईश्वरत्वके प्रबोधकी प्णता आगे होगी जैसा दोहा ७७ की व्यास्या में स्पप्ट फिया जायगा । 

मुहूत न बतलाने का व्यावह्ा रिककारण 


व्यावहारिक पक्ष से गुरुजी के वचनों फा भाव यह्द हैः कि श्रीरामफों जब युवराज हानेफा योग हैः ही 
नहीं तब मुहूर्त क्या वंताना ? उनको तो राज़ा होनेका योग है! जिसके लिए मुहूर्त गौण है। अभी 
श्रीरामको राज्याभिषेक इष्ट नहीं है! जेसा चौ: ७ दोहा १६ मे 'अनुचित एकूः से स्पष्ट है'। मुनि बसिष्ठके 
बचन से भी यह स्पष्ट है' कि राजाकी राज्याभिपेककी तेयारीमे दवानुकूल्य नहीं है'। इस प्रकार आम्- 
प्रमाण ( दुनिमित्तकी सूचना ), अंधशाप तथा केकेयीके दिये थातीरूप मे बरके आधारपर गुरुजीके उक्त 
वचन प्रमाणरूपमें प्रूल्यांकित हैं । 

युवराजत्व 

विष्णुधर्मोत्तर पुराणमे यौवराज्यसवधी उल्लेख" से ज्ञात होता हैः कि स्वस्थ राजाके रहते यौचराज्य 
का अभिषेक मुहूर्त देखकर होता है'। वसिप्ठजी ने मुहूर्तका विपय टालकर कह दिया कि जिस दिन 
श्री राम राजा होंगे वही मुहत होगा। उनका वचन उत्तरकाण्डसे रामराज्याभिपेक के अवसरपर कहे कथन 
सा होता है आग से दिन सुदाई”। (चौ० 2दो< १८ उ० का० ) 

तात्पयं यह कि राजा मंगल कार्यक्रम शुरू कर दें। भविष्यत्‌ मे जो होना रहेगा 
प्रकार गुरुने राजा की मनोरथपूर्ति के बारे मे अपनी सुस्पष्ट सति प्रकट कक जज 
हृतोत्साहित किया क्योंकि दशरथजी का अन्तिम सनोनीत निणय साक्षीरूप मे सब फो 
रखना अभीष्ट है'। न सुनाकर 

मुनिने खासतौर से यह समझाया कि जब श्री राम को युवराज बनाने के लिये संवासियों ( पौर जान- 
पदों ) का मत 2 हो चुका है तब राजाको अपना निर्णय सुनानेमे विलम्व नहीं करना चाहिये। राजा 
डे जा राजनीतिसिद्धान्ताइसारेण श्रीरास युवराज मान डिये गये हैं। उत्सवका फार्यक्रम 

प्रेमफी विहलतावश राजादशरथने श्रीगुरु के छिपे हुए आशय को नहीं समझा | 


१. नोट :--छते राक्षि न कालस्य नियमोउत्र विधीयते। 
तस्यास्य स्नपन॑ कार्यम्‌ विधिवत्तिलांजलिसर्षपैः ॥ 
रत इति स्वस्थस्याप्युपलक्षकम । 
* थदा प्वोस्मिन्‌ राज्षि शतेउस्वस्थे वोत्तरस्यासिषेकस्तदा स्नंपनादो न कालनियम. | 


४ श्रयोध्याकाण्डम्‌ २५ 


राजा के लिये समाणियोग 


गुरुजीने राजाफे श्रन्विस फल्याण फे चारे में यह भी सोचा है कि रत्सघ के निमित्त से ही चिन्दन 
करते हुए राजा भीरामसम्मुस्य हो जायेंगे भौर जीपनोपरान्त ढहूँ साफेवछोकप्राप्ति सहझ हो जायगी। 


संगति--झुनि फा मंगछमय पर्नन सुनकर रासखा भीरास के रान्योत्सव में धन्मय हो मुनि षसिष्र 
के साथ राजप्रासाद में आ पहुँचे 


घौ०-मुदित मद्दीपति मंदिर आए | सेवक सचिव सुमंश्रु पुठाए ॥ १॥ 
भाषा --गुर बशेए के रुचत झुनकर रासा भ्रस्न हो अपने सइछ में झ्माये और उन्दोंने सेवकों तथा मंत्री 
सुमस्त्र को जुछाया। 
| 
८ स्या“-पहाँ यह श्ञातमब्म है कि दो० ने० ३ में घूचित मनोरथापि रूप साध्यके अमाषपर 
झाहयफ़ो न समझफर राजाने मंदिर ( महछ ) में सेयफ़ों और मंत्री सुसन्‍्च्र को युछाया। 


अस्पष्ट मन्त्रणा फा घीन और औषित्य 

अदन-गुरुखी ने अस्पप्ट संकेत से युक्त मंश्रणा क्यों प्र ९ 

उत्तर-अरयैशात्र के निरेंशानुसार राजा एवं राज्य फा रक्षण करना पुरोहित एपं सन्त्रीका क्रतेघ्य 
होता है फो थसिछपुनि पूर्णदया निमा रहे हैं। रामसदश नीहिसान्‌ पुत्रझो उपलण्य कराकर मुनिने राजा 
दृशरथ का रक्षण किया है। ( मनुशवरूपा प्रसंग में ) पूर्वशम्म में राडाने मगववृदर्शन सो किया लेकिन 
झ्रम्त'करण फा द्रपीमाय प॒णेरूपेण न होने से स्पर्गेोक में थे प्राम्यघर्स का सुखाजुभष करने छगे। क्षमी- 
भी प्रमुको पाकर राजाफे चित्त का पूर्णे दरधीमाय भ दोने से इनके हृदय में भीरामकी मूर्ति लैसे बेठनी 
भाहिए पैसी नही चेठी दै'। जिसफा परिणाम यह होगा फि परछोक में जाने पर उनका हृदय फठिनता की 
अपस्पा में मूर्विशुल्य हो साएगा। उस अवस्था में राजा फो सुगति में पहुँचाने का काये अपू्णे रह 
जाएगा। इस हेसुको घ्यान में रखकर गुरुडी मे सोचा कि शीरामफे राम्पारोहण में मुहृर्तोमार के 
संबन्ध में सुस्पप्ट मंप्रणा फरने से राज्योस्सथका क्षानन्द खटने के छिये राजा कषतिप्रीति में उल्ठसित न 
होंगे। अत' इस छत्मय के प्रति राजा प्रो उल्ठसित करना दोगा। आज की राध्रि में अचानक पिप्ल 
उपस्थित होने पर जब उनका मनोरथ ऊपरिपंणे होगा स्व चित्त में शोफ भी उतनी ही भातरा में उद्ति 
दोगा। फर्त' राजाफे हृदय में क्षपेक्षाउत द्रवीभाष का होना अषश्यंमापी हे। उस अपस्था में चिन्तन 
फरते-करते प्रमु राम फी मूर्ति चित्त में प्रविष्ट होकर संस्कार या घासना के रूप में श्सनी सुटदद होगी 
फ़ि जन्मजस्मान्तर में पह पियद्धित नहीं हो सपेगी। इस प्रकार भणछ्िसेपंत्ति के द्वारा ( साकेव ) 
परछोक प्राप्ति सी राजा को होगी। 


द्रवीमाव समृद्धि का उपक्रम 


क्ाठण्य है फि विद्वासित्र मुनि के साथ पन में भीराम फे लाने फे समय शाजा का चित्त फणिमणिसम 
हो गया। छेफिन राजा फे भित्त का द्रमीमाद जितना क्रपेक्षित था उतना नहीं हुआ। शीरास के वियोग 
को एस समय राजा दृघारथ सरत की रुपस्थिति में सहन कर गये । रक्त अवसर पर श्री रामके प्रति पूर्ण 
ड्रषीसाय न होने का कारण सरत की उपस्थिति है। क्रयोत्‌ भरत रूप दर्पण में भीराममूर्ति का वशेन 
ऋरते हुए राजा दशरथ महऊ में स्वस्थ रदे। जैसा कौसस्मा का अलुमव चौं० १ दो० १६५ सें घ्यक्त हे। 
लयोत्‌ मरद में भीराममूर्दि को दर्शन फरते हुए छौसल्या जीवित रह सछी। इसडिये शुरू षसिष्ठ ने 
पपयुक्त द्रदीमाद को सम डनाने का यह शपक्रम किया दे। 


२६ भावार्थ, शास्तीयव्याख्यासमेतम 


संगति-गुरुजी से मंत्रणा संपन्न फरके कलका ह्वी दिन थोग्य है ऐसा समझकर राजा ने अग्रिम काये 
के प्रयोगचिधिनिधोरणाथे सेवकों को बुलाया हे। 
चौ०-कहि जय जीव सीस तिन्द्र नाए। भूप सुमंगलबचन सुनाएर ॥ २॥ 
भावार्थ :--उन्होंने 'जय जीव” कहकर राजाको नमस्कार किया। राया ने ( रामराज्याभिपेकर्सब्रधी ) मंगरपूर्ण 


बात उनको सुनायी । 
उपस्थित सेवकों की मंगल का श्रावण 


ज्ञा० व्या“--थुवराज के अभिषेक की सामग्री एकत्रित करने के उनइय से सेचर्फों एवं ऊमेसचिव तथा 
अपने सम्मान अनुभवी सूत सुमंत्र की राजा ने बुछाया। उन्होंने अरथज्यात्र के निर्रशानुमार 'जय जीव! 
का उच्चार करते हुए राजा के अभिमत को सुनने की इच्छा व्यक्त कर 'आज्ञापय! ऐसी प्रार्थना की । राजा 
ने महामंगल सूचक रामराज्योत्मव की बात सुनायी। इस मंगल को राजा ने आगे “होइड्ि तिहु पुर 
राम वडाई” ( चौ० ४ दो० ३६ ) कहा है' जो उत्तर काण्ड मे राम राज़ बढ़े ब्रत्योफ़ा? से संफेतित है। 
संगति--उस पर पंचों का मत जानना चाहा । 
चौ०--जो पॉचहि मत लागे नीका | करहु दरपि हिय रामहि टीका ॥ ३ ॥ 
भावाथे :--बदि प्चो को मेरा सत ( रामका राज्याभिपेक करना ) अच्छा छगे तो आप छोग मह में प्रसम हो 
श्री रामका राजतिलक संपन्न करें । 


राजा के निणय में प॑चों के मत का आदरसंवन्ध 


ज्ञा० व्या०--अपने राजशासन का वलू छोडकर महाराज निष्पक्षपातिता की दृष्टि से यान्नवल्क्य स्मति के 
संविब्यतिक्रम प्रकरण को स्मरण मे रखते हुए अपनी निर्दोपता प्रकट करना चाहते है। यदि समूह- 
हित वादि्यों ( पंचों ) का आदेशपरिपालन नहीं करते तो धर्मशासत्र के अनुसार राजा दण्डभागी 
समझे जाते हैं। अतः राजा ने पंचों ( समूहहित वादियों ) की मयोदा तथा अपने नरेशत्व को ध्यान मे 
रखते हुए कहा कि "में श्रीराम को युवराज पद देना चाहता हू”! | इस पर सभी की सम्मति हर्पोल्लास के 
साथ प्रकट हुई | 

अत्येक श्राम सें. समूह हितवादी सस्थाएं नियुक्त हैं। सभी प्रत्यक्ष या अम्रत्यक्ष रूप से रामराज्य 
देखना चाहती हैं.। राजा के सन्‍्तोपाथे सनोनीत काय फो सपन्न करने मे सहायता प्रदान करने मे सेवकों 
का उत्साह देखकर राजा अत्यन्त प्रमुदित हुए । 

संगति--मंत्रिगण भी जयजयकार कर रहे है। सानो मनोरथ रूपी पोधे को पल्‍लवित होते समय जल 
का सिश्चन् हुआ हो । 


चौ०--मन्त्री मुद्ित सुनत प्रिय बानी | अभिमत विरें परेड जनु पानी ॥४॥ 
बिनती सचिव करहि कर जोरों | जिअउठ जगत पति वरिस करोरी ॥५॥ 


भावाथे :--राजा की प्रिय बाणो को सुनते ही मन्‍्त्री प्रसन्न हो गये मानो उनका चाछित सतरूप पोधे में पानी 
सींचा गया हो । मन्त्री हाथ जोड़कर विनति करते हुए कहते हैं. कि राजा करोड़ों वर्ष तक जीवित रहें: । 


। कोटिवर्ष का दीरघगीवन 


शा० व्या०--अत्यानन्द में मंत्रिगण राजा के करोड़ वे जीने की कामना कर रहे हैं। भाव यह कि 
राजा के यशइशरीर की दीघेकाछता अभीप्सित है क्‍योंकि पार्थिव शरीर का जीवन सौ करोड़ वर्ष 
रहना असंभव है'। 


| 


क्योध्याकाप्डम २७ 


स॑ंगति--उपरोक्त ौ० २ में कही सम्सति को पंच छोग स्यक्त कर रहे हैं।। 
चौ०-शग मंगर भल काजु विचारा | पेगिम नाथ न लाइअ यारा । ६॥ 
माषाशे --रासराग्पामिपेका विचार द्लुम जगस्मंगछकर है | उसकी संपत्ति में वि्रंब न करें । 
संगतति--विलंध न दो इस छिये सेमर्कों ले निर्देश देने की प्रार्थना फी। 
चौ०-नृपद्दि मोद सुनि सचिय सुभाषा । पढ़ुत यौड़ जतुलही सुसावा॥आ 
साधा --मंप्रियों के सुसापित्त ह्प्दों को सुत्कर राणा को आमस्द हुला। सातनों बढ़ते हुप पौधे ढी झासाएँ 
मिकशी हों । 
ज्ञा० ब्या--राम्यामिपेफ के लिये राजा फी शीघ्रता फो देखते हुए कमि मी इस दोहे फो साव द्वी चौपाइयों 
में पूर्ण फर देते हैं. और अप्रिस कार्य फा संकेव करते हैं। “वद्वत यौड़ लनुख्यों छुसाक्षा” की एक 
याक्ष्यदा भागे बी० ८ दो० २९, चौ० ८ दो० १६१ में द्रष्टम्य होगी । 


संगवि--सामप्री फो पुकम्नित करने में श्रतिश्षीघ्रदा का पिघान है क्‍योंकि यह्‌ प्रयोगमिधि है. 
दो०--फर्ेठ भूप मनिरान कर णोहई गोह आम होइ। 
राम राज अमिपेक हित येगि करहु सो£ सोह ॥५॥ 


माषार्थ --हाजा ले कइा कि सुलिवर दसिए स्री का प्रो छो भादेश दो पद सब रामराफ़्य के क्सिवेक के मिमित्त 
आप फोग झीए कार्पास्थित करें । 
वेदिक पिधि की उपयोगिता 
हा» ण्या८--एम्पोस्सय में निर्विकारिता ( सत्वगुण ) प्रकट करने फे छिये पैदिक विधान क्ेन्य है। 
गुरुभी के णादेश से दी राज्यामिपेक परिपूर्ण होगा ऐसा सोचकर राजा ने क्रमाभिदपवार्थस्पानापन्न 
सामप्री फो परश्रिद करने का मार गुरुजी पर पे रखा है। 
चसिष्ठ के निर्दोपिस्य फ्री उपपत्ति 
मुनिराज फे एल्लेस़ से यद् सूचित होता है! कि राज्यासिपेक के प्रयोग फो संपन्न करने में गुरु 
यसिए्ठ एक सात्र उपादानगोचर अपरोध्षक्षान से पृण हूं। प्रघानदा उन्हीं 22430 फीदहेजफो 
'आयमु दोइ! फे रस्छेख से स्पष्ट ऐ। इस प्रकार नीठिसिद्धान्द फे श्नुसार के समक्ष राम्या- 
भिपेक की संपत्ति फे लिए राजा ने गुरु यसिए्का यरण किया। 
स॑ंगति--अनन्तर गुरुजी ने पदार्थों के संभार फा पिघान सुनाया । 
जौ०-हरपि पुनीस फट्दैउ सदु घानी । आनहु पक सुतीरथ पानों ॥१॥ 
और मूल फूल फठ पाना | कह्दे नाम मनि मंगठ नाना॥शा। 
चामर चरम पसन पहु भांती | रोमपाट पद अगनित जांवी ॥र7 
सनिगन मंगल पस्तु अनेका | जो लग घोगु भूष अभिरेश (व 
पेदविदित कद्दि सकठछ विघाना | छहेठ रचेहु पुर विति्भ हि 
फठ रसाऊ पशु फेरा। रोपहु यीयिए बु+ 
रचहु संझु मनि चौके घारू।फरहेह् प्री - 
बूजड गनपति गुर इुठदेवा | समर कि हि 55 


२८ भाषा? शाद्वीयध्याख्यासमेतम्‌ 


दो०-ध्यज "पताक तोश्च कस सजहु तुरग रथ नाग। 
सिरधरि सुनिवरवचन सबु निज निज काजहि लाग ॥६॥ 
भावाथे- तीर्थजल, औषधियां, मूल, फल, पान, सुपारी, केछा आदि अनेकों मंगछ पदार्थ एव चामर, रोमपाठ, 
सूगछाला, ऊर्णावस्र, मणि, आदि एकत्रित करने का आदेश है। व्यक्तिपरत्वेन मंगलवस्तु की गणना 
करने पर भी पुनः गुरुजीने “मंगलवस्तु” का उब्लेख किया है जो जातिपरक होने से पुनरक्त नहीं 
समझ्षना चाहिये । 
मंगलकी पुनरुक्ति का परिहार 


शा० व्याप--प्रथमतः संगल का उल्लेख करने के अनन्तर कतिपय सगर पदार्थो' की परिगणना का 
तात्पये परिसंख्याविधिमें भी हो सकता था जिसका अथ यह होगा कि राज्याभिषेक के लिए उपयुक्त 
परिगणितवस्तुओं के अतिरिक्त पदार्थ को एकत्रित नहीं करना जैसे वाद्य-वादनादि। ऐसी परिसंख्या न 
समझी जाय इस दृष्टि से परिगणित से इतर ( वाद्यवादनादि ) मंगलपदार्थ को भी एकन्रित करने में 
गुरुजी का भाव ध्वनित होता है. ।” 
एकवाक्यता 

मगलरव्द से परिगणित पदार्थो' का संग्रह करते हुए भी कदली आदि का नाम छेना अदृष्टसंवन्धिनी 
अतिशयितता का द्योतक है'। यह वाल्मीकिरासायण की एकवाक्यता से स्पष्ट है'। इसलिए यह' 
ज्ञातव्य है कि राज्याभिषेक का यह प्रयोगविधि अन्यान्य कवियों के मत की एकवाक्यता और एकरूपता 
मे सपन्न होता है'। ऐसे प्रयोगविधि मे कल्पना छाघव नियामक है । 


प्रयोगविधि की एकरूपता में छत्र, चाय आदि का ग्रहण 
ज्ञातव्य है' कि मानस में अभिषेक सामग्री के अन्तर्गत छत्न एवं वाद्यवादन का उल्लेख नहीं है'। फिर 
भी प्रयोगविधि की एकरूपता में वाल्मीकिरामायणोक्त पदाथ का संग्रह” समझना .इष्ट होगा। अतः 
मानसोक्तवस्तुसात्र पर ध्यान न देकर अभिषेकसंभारसंपादन में छत्न आदि का ग्रहण करने में कोई 
आपत्ति नहीं समझनी चाहिये । 
एच वाल्मीकिरामायण में वर्णित समस्तसामग्री सानसरासायण में भी विवक्षित समझता शास्त्र- 
विधानों के अन्तर्गत ठीक ही है'। उक्त सामग्री में वाद्यका उल्लेख है'। अतः 
वादिन्राणि च सवोणि सूतमागधवन्दिन:? ( बा० रा० बा० ) 
इसके आधारपर मानस राभायण सें वाद्य का उल्लेख भी अपना औचित्य रखता है'। एवं च कतिपय 


उपलक्षण पदार्थों का उल्लेख मानस की दृष्टि में अभ्युच्चयमात्र है' इससे 'संगल नाना? 'मंगल बस्तु अनेका! 
की सरसता प्रकट होती है'। 


मंगल वस्तु के कीतन का प्रयोजन 


राज्यामिपेकात्मक पूर्वोक्त विधि' मे अच्टातिशयसंपादनाथ सानस में अत्याव 
ंघि से इयक वस्तुओं का 
नामग्रहण हुआ है । अतः अजाजनों ने उपयुक्त विधि की एकरूपता को देखते हुए मानसोक्त पदाथेविशेषों 
के अतिरिक्त मांगलिक वस्तु का संग्रह किया, वह भी गुरुसम्मत ही समझना चाहिये। जेसे साधु- 
पूजन वाद्यवादन आदि । 


१. चामरे ज्यजने चोसे ध्वर्ज छत्नं व पाण्छुस्म्‌ | 
शत च शातऊुं भाना कुम्भाना अग्निवर्चसाम्‌ ॥ 


+'. क्षयोभ्याकाण्डमू : २५ 


बरायपादनमें गुरुसम्मति के प्रति न्‍्याव 


पस्मुत+-गुरुणीने अनेफों मंगठ कांये छरनेफ़ा संफेत पूर्येमे किया है, उनमें स्मेकष्ास्त्रसम्सत 
साधुपूजन याद्यपावन भी संफेतित है। (जैसा याश्काण्ड दो १५४ में स्पष्ट है) इसहिए प्रस्तुत अवसर 
पर बाण्वादन एपे साधुपूजनप्का एघ्लेख कण्ठस न होने पर सी उसकी प्राप्ति की उपपक्ति में पश््ममाण 
न्याय स्मरणीय हे। 

दोठाफाधिकरण में दसन्दोत्सवादि काये शास्त्रों में उहिखित न होने पर मी पघस्ये है क्यवा नहीं 
इस संदेह फे रक्तर में भाष्यफार कहते हैं: कि शिप्टसदाघारप्राप्त और ह्येकप्रसिद्ध होने से धसम्तोस्सव 
का उस्‍लेख घास्तरोंमे न दोने पर भी पमेश्ास्त्रानुकूछ साने जाते ईं। पैसे ही साधुपृजन पाशषादनावि 
फाय॑ भी फषिसस्सस साना चाय दो अनुघित न होगा। 

आरादुपकारक मंगरुषस्तु 


मणि शादि रण्नों से चौक पुरयाना (रंगोली चनाना ) और चादार सजाना इस्यादि क््येक्रम 
गुरुपदेधा से संगृह्दीव एप उछ्चिल्लित है! । ये सभी काये जन्मप्रसंग में भी पुरजन एं स्त्रीजर्नों ने किया था । 
यह प्रेमपशात्‌ मगछ ने से श्रथेप्राप्त था। पुन' इस कपषसर पर भी वासार की शोभा बंढ़ाना भौर 
चौके परना भादि रा निर्देश इसछिए ऐ फि ये समी फतन्य आरादुपकारक होते हुए रान्यासिपेकोत्सव सें 
पिछयेपदया झास्त्रपिद्दिद हैँ.* | 

उत्तरकाण्ड में सुरदुंदु्ि फा निर्देशन 

पिश्लेप शातध्य यह है फि जगन्संगछ फारफ राम्यामिपेक फ्रे श्यसर पर पेद्रि पिघानकी रीति से 
याद्ययादनादिफा संप्रद बंसछाया है। कपिने यहां सुरुन्दुर्मि एवं देवस्मुति का घणेन नहीं किया है। 
उत्तर काण्ड में राम्यविछफ के शपसर पर ऊपर फट्टी गयी सामप्री फा वर्णन न कर देधदुन्दुमि पवे देष 
स्तुदि का उल्लेख करविया | क्त* प्रस्तुत राजसिरिकफे अयसर पर 'बाज गहा गह से पाद्मबावन का 
प्रदण प्रम्दपुराणोक्त विधानोक्त होने से शास्व्रसम्मद पुर्संगत समझना भाधिये। 

छाठस्य हे कि गुरुधी फे मिर्देश में गणेस, गुरु, कुछपेवदा ष पिप्रों के पूजनका रस्छेख है जिसको 
राजा पूण करेंगे । 

बल धशाक्ति ( सैन्‍्यपाक्ति ) राज्य फा अज्ञ है। श्रतप॒प धसिप्ठ मुनिने इस अघसर पर थक शाक्तिफे 
पिविय अंगों के सम्मानका भी रुस्लेख फिया है । 

संगति--शुरु सुनि के आदेश फो पाकर सभी सेयक घर्ग क्पने अपने कार्य में छग गये। 
शुरूती मी चले गये। यो आगे घरी० ९ दो० ९ में (दब नरनादह बसिप्ठ थुछाए! से स्पष्ट है । 

बोौ०-जो धनीस जेहि आयछु दीन्‍्दा । सो ऐहिं काज प्रथम जनु फीन्दा ॥१॥ 
भाषार्थ--सुततिवर घसिप्द मे जिसको लो भाशा दी उसे उसमे सब प्रथम किपा। “चतु! कहकर कबिते यह ब्प्त 
किया कि शाब दशरथ का संपूर्ण समपसासुप झारस्द! ( स्वर्ग सु ) की उपकब्धि में बीता दे । 

डिस प्रफार स्पर्गस्थ पुण्यास्माओं फ़ो अमिलापासात्र से विपयक्ती इपलण्धि होती है, काऊविसम्व 
भोड़ा भी स्थीफार्य नहीं है, उसी प्रछार अभिपेकर्समार को एकप्रित करने में पिछम्व नहीं हुआ इससे 
रासाका एचचकोटिफा घासनसुस व्यक्त होता है| 

३ छगर तत्न कर्तर्ण  पताका-प्यज्संकुकम | 
शीराजतास्वपा कार्यों: राध्मागों। झमैचेकेः ॥ 
३ ब्यूज़ पताका तोरण ककूस | सजहु तुरण रय लाग । दो ६ 


३७ भावाथे, शाखीयव्याख्यासमेतम्‌ 


गुरु के द्वारा आदिष्ट होते ही अवधवासियों ने शास्त्रमयोदा के अनुकूछ सपृर्ण संभार एकत्रित फर 
दिया । यह विद्याग्रचारका असाव है'। 

संगति--सस्पूर्ण काये को सम्पन्न करने के देतु अजमानस्वरूप राज़ाने गुरु के 'पूजहु गनपति 
गुरुकुछ देवा, सब विधि करहु भूमिसुर सेवा के निर्देशका अज्ञसरण किया। 


चौं०-विग्न साधु सुर पृजत राजा । करत रामहित मंगल काजा ॥ २ | 


भावार्थ--राजा दुशस्थ त्राह्मण साधु और देवताओं की पूजा करने छगे। और भी जो रामके हित से मगल कार्य हे 
उनको करने रंगे । गोसाईजी ने विभ्रपूजा से शास्त्रसिद्धान्ताजइसार अनेक आशय ध्यनित किये है 
न्रह्मतेज, प्राप्ति में विलीन सत्वगुण सम्पन्न विप्रकी पूजा यजमानों के लिए अत्यावश्यक है। यदि सस्व 
शीलसम्पन्न ब्राह्मण यज़मान को आशीर्वाद देते हैं तो वे निप्फल नहीं होते । 


विप्र पूजन से ध्यनितार्थ 


शा० व्या०--राजपूजित व्यक्ति जनपद मे पूजित होते हैँ । इस हेतु से त्यागमय जीवन विताने वाले 
ब्राम्हणों की जीविका की समस्या का हल हो जाता है'। 
महत्वपूर्ण शुभ अचसरों पर विप्रों, साधु-सहात्माओं का पूजन होते रहने से वेदिक परम्पराको चालू 


रखने की अवृत्ति भी बनी रहती है! जो सबेदा हितकारक होती है। विप्न आदिकों के पूजन से राजा का 
भयोदा-पालन एवं स्वातन्ञ्यहीनता प्रकट होती है । 


शुचिरास्तिक्यपृंतात्मा पूजयेदेवता: सदा, इस उक्तिको ध्यान में रखते हुए राजाने देवताओं और 
साधुकोटि में नीति भयोदा का अनुसरण करने वाले भगवदुपासकों का पूजन किया। 


विग्रपूजन की सफलता 


प्रश्न-राज्यासिषेक में विघ्न उपस्थित होने से उक्त पूजा की सफलता कैसे मानी जाय ? 


उत्तर-इसकी कारण सीसांसा सें शाख्रकार कहते हैं. कि पृेजन्सान्तरीय उत्कट देव अथवा प्रवल ईग्वर- 
इच्छा के रहने पर पुरुषाथे सुसम्पन्न नहीं होता | यही स्थिति इस पुजन के सम्बंध में स्मरणीय है'। अथवा 
श्री रामका वनवास होने पर राजा किंवा अजा के हृदय में राज्याभिषेक सम्बंधी साधु एवं देवपजन की 
न्यूनता में होने वाछा सताप का असंग नहीं होगा। यही उत्तपुजन की सफलता है'। अथवा चतुदश- 
वषोबधिक विघ्न के दूर द्ोते ही श्रीराम का अभिषेक होकर रहेगा । यही पूजन की सफलता है । 


वस्तुतः राजा के प्वोपर चरित्र फो देखते हुए कर्पना के लिए यह भी एक अवसर है' कि राजाने 
तत्काल गणेशप्‌जन का ही संकल्प किया होगा जिससें राज्याभिषेक के संकल्प या पुण्याहवाचन का 


समावेश नहीं है'। अतः तत्काल में रानियों का सान्निध्य पूजन में नहीं हुआ। या राजा की घोषणा फी 
सफलता के लिए राजा का उक्त पूजन है । 


सगति-पूजनकाये सम्पन्न होने के अनन्तर राजाद्वारा दिये गये गुरु के निमंत्रण का प्रसंग कवि को 
कहना चाहिये । घेसा न कहकर मंगल के उल्लेख से अन्यान्य मंगलकारयों का स्मरण होने से रनिवासके 
संगलकार्यो' का निरूपण कवि कर रहे हैं । ह 


चौ०-सुनत राम अभिषेक सुहावा । बाज गहांगह अवध बचांवा |। ३॥ 
भावाथें: --सबको जच्छा रूगने चारा श्रीराम का अभिषेक सुनते ही जवधपुरी में धूम-धाम से बाजा 
बजने कगा । न्‍ 


रै रँ 


श्योध्याफाण्डम्‌ ९ 


देवदुंदमि फा अपादन और प्रियश्रवणन आपेग 


जआ्ञा० ब्या“-प्रभ्न-राज्यासिपेफ फे भयसर पर राम्य शासन के प्रभाव से प्रमाग्रित होकर देषदुन्दिमियाँ 
भी बजनी चाहिये थी। पैसा क्यों नहीं हुआ। 
एशर--इसफी सूचना फपि स्पर्य आगे देंगे। इस निमित्त से उसित यह छोता कि राजा से छेफर 
समी ये द्यदुन्दिसि घाययामाय से उसफी उपपत्ति फो समझने फ्रे द्ेतु मन्प्रि-मण्डछ एकतद्रित करते। 
पैसा न फर समी अपने ऋपने फाये में संलग्त हैं, यद्दी अयोप्यावासियों फे राम्याभिषेफात्मफ म्ियभपषण 
दृश्नजस्य आपेगमे द॒पे एयं जड़ता प्रयुक्तपिनेकामाष है। यद्द दोप प्रमु राम में नहीं हे। ये नो 
मगलपाय ही मुनते हैं. न सो राश्यामिपेफ फी फस्पना से युक्त दी हैं। हसढिए सीता राम दोनों प्रस्तुद 
समारंम से दूर थैठे समझ में भारहे हैं। अमी दोनोंफे स्लंगों में मंगल सूचर स्फूरण हो रहा है। जिसका 
फछ पिपयोपरुण्धि न होफर सन्‍्तमिलन सोचा जा रहा है| 
संगति--रशाज्यामिपेफसंमार फे निरूपण फे बीच में मंगछ का स्मरण होने से प्रमु फे अंगस्फुरण 
फसपिन्तन फा अनुबाद शिषल्री फौछुक रूप से पार्यती फो सुना रहे हैं।। 
चौ०-ताम सीय सन सगुन जनाए । फरफहिं मंगल अंग्र सहोए |) ४ )) 
भायाथे --भीराम भौर सीठा के जो झोमाइायक मंगछ अंग है उस ध्ंगों में घ्रम शकुस दिखायी पश़मे छगे । 
मंगल के प्रसग से प्रश्ुुका चिन्तन क्रम 
धा।० ब्या--इस निरूपण में झ्लिपजी अत्यन्त आनन्दित ऐते हुए प्रस्तुत विपमको छोड़कर मारतीय 
राजनीति सिद्धान्त फो प्यनित फर रहे हैँ ( जैसा चौ८ २ दोहा (२ में स्पष्ट है )। माय यह फि गुरु सेधा 
में दस्पर राजपुत्रों को पूर्ष परम्पराप्राप्त झास्र प्रसूद निर्मेड नीतिसंगत शान की प्रया में पूणे आनन्द का 
झ्नुभय फरते रहना चाहिये, पेयक्तिफ 42058 पर ध्यान नहीं पेना चाहिये। सस्यर्सघ पिता के 
क्ादेश फा अनुसरण करते रद्दना एयं द्वप बिपाद से शूय दो राजम तामस सुख्तों से परथफ्‌ रहना 
चाहिये। 
संगठि ।--मंगछ घूचफ अंगस्फुरण को देखकर दम्पती ( राम-सीता ) पुराण निर्देशा समन्धित प्रमाण 
का उपयोग फर रहे ई। 
चौ०-पुलकि सम्रेम परस्पर कहदी | मरत आगमलु प्रचक अहद्ठी ॥ ५ ॥) 
भाधाशे --हंगस्फुरण से पुझकित दो झापस सें कद रदे हैं कि ये भरत के झाने फे सूचक विश्व हैं। 
स्फुरणफलचिन्दन 
शा० झ्या० -- 'अद्द प्रियमिलनवाम्‌ दृक्षिणागस्फुरणतत्वास्‌। प्रियो भे मरत.. ल्र्थोत्तू उपस्थितिकृत 
छापषे” से दम्पही को भरत से भेट दोने की कल्पना संसयप्रमाण फे आभार पर हो रही है'। 
स्यातब्य दे कि श्रीराम एव सीता को भरह मी निम्चय है! कि “संप्रति सरतात्‌ अन्यो न में दया प्रिय' 
पेनाया तबि्तर्न कुय्ांय” । 
प्रदन--कैकेयी के संवाद से स्पष्ट होता ऐ कि राजा की राश्याधिकार प्रदान की घोषणा सफछ नहीं 
रही तो झकुनशास्त्र का प्रसाण्य लपपन्न कैसे होगा ९ 
उत्तर--प्कुनशास्र के प्रमाण्य को पिचार॑ंते हुए शंगस्कुरण के फल को ध्यानमें रखकर दम्पतीने 
निर्णय किया कि भर फा खागमन होगा। पुन' ककुन फा बिघार कर पूसरा निर्णय किया 
कि सरत फी सेंट अबदरंसाती दे । । + ) 


३२ भावार्थ, शास्त्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


संगति :--भरत की सेट ही फल समझ रहे हैं, न कि अनुचित होने से वर्तमान राज्याभिषेक । 
चौ०--भये बहुत दिन अति अवसेरी । सगुन ग्रतीति भेंठ प्रिय केरी ॥६॥ 


भरत सरिस प्रिय को जगमाहीं । इहइ सगुन फछ दूसर-नाहीं ॥७॥ 
भावार्थ--बहुत दिन हो गये, ( प्रियसे भेंट हुए ) बहुत देर हो गयी । श्ुन विश्वास दिला रहे हैं कि प्रिय भरत 
से भेंट होगी । भरत के समान संसार में कोन प्रिय है । शक्ु॒त का यही फल है, दूसरा नहीं । 


भरतमिलनफल की उपपत्ति 
श्ञा० व्या८-प्रहन--शकुन का फछ भरत की भेंट केसे कही जायगी, जबकि भरत का आगसन या मिलन 


उस समय नहीं हुआ | 
उत्तर--चित्रक्ूट में पहुँचने के पे भरत से भेंट होनी नहीं है'। इससे निष्कषे यही निकलता है कि 


भरत से मिलन का समय तो सन्निकट है, पर फब ? यह कहा नहीं जा सकता । 

इस रीति से यहाँ 'माहों? एवं “नाहीं” से दो 'नज! प्रयोगसार्थक है'। 

प्रभुचिन्तन 

प्रभु राम की चिन्ता के माध्यस में सदा भरत ही विषय रहे इसलिए शकुन का फल भरत का 
आगसन ही मान्य रहा, यह 'उपस्थितिकृत छाघव? है'। भक्तवत्सलता में प्रभु का स्वभाव है' कि वे अपने 
अनन्य भक्त का चिन्तन करते रहते हैं जिससे भक्त सदा सुरक्षित रहता है'। प्रश्न है' कि इस व्यापार 
से चित्रकूट में भरत से भेंट होने तक प्रभु को यह चिन्ता बनी रही तो कैकेयी के वरदानाजुसार 
श्री राम का उदासीनत्व संगत नहीं होगा । इसका समाधान दोहा २९ चौ ३ में उदासी? की व्याख्या में 
फिया गया है'। 

अभी ग्रभुने भरत भेंट को ही शकुनफल माना है' जिसका अथे है' उद्देदय । इसी स्वभाव को समझकर 
बसिए्ठजी ने चित्रकूट में राम को सुना दिया कि भरत की सम्मति प्राप्त किये बिना वह आगे नहीं जा 
सकते जिसका समन्वय इस चौपाई से समझना होग। । 

भरत के लिए प्रभु के इस स्मरण का उद्देश्य चो ५ दो १४१ में “घीरज धरद्धि कुसमय विचारी” 
से स्पष्ट होगा। अथीत्‌ भरत को अयोध्या में आने पर जिन विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़ेगा 
उनमे भरत की उचित कतेव्य का मार्ग प्रशस्त होता रहे | 

प्रभु के इस स्मरण से भरत के शील स्नेह शुचित्व अनुभित हो + हैं. जैसा चित्रकूट में प्रमु के स्मरण में 
सुभिरत भरत सनेहु सीछु सेवकाई” से स्पष्ट होती है' । 


स्तृति विषयत्व का व्यतिरेक्यनुमान 


उपासकों ने शुचिता शील स्नेह फो अपनाना होगा अन्यथा इन तीनों के अभाव से श्रीरामकर्तक 


विपषयत्वाभाव ८ 
स्ट््ति यथा्थतया अनुमित होगा। उस अवस्था में रामनाम की साथेकता द्दोगी द्वी नहीं 
कहा जा सकता । 


राजा एवं श्री राम के उपयुक्त विचारों से यह निणेय होता है. कि प्रस्तुत शकुन से श्री रासको राज्या- 


धिकारप्राप्ति तथा भरत से भेंट दोनों फल अवद्यंभावी हैं। उसमें भरत भेंट मुख्य तथा राज्याधिकार 
स्वामित्व आजुषंगिक है'। 


संगति--भक्तों के जीवनाधार प्रभुके द्वारा अपनाया हुआ भक्त तब चिन्त्य है' जब वह नियमेन प्र्भु 
का चिन्तन करता है, इस सामान्यव्याप्ति को समझा रहे है'। 


चो०--रामहि बंधु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठहृदउ जेहि भाँती ॥ ८ ॥ 


भावार्थे--भीराम भाई भरत का दिनरात चिन्तन करते हैं जैसे कछुंई अपने अंढो का ध्यान मनमें करती रहती दे । 


हे अ्र्योप्याफाण्ठमू.। इ्३ 


स्याप्रिनिर्देश 


शझ्ञा० स्या०--यश्पि फ्पिने बन्धु! फहफर सरठ फो ही सैपेतिस फिया है' तथापि भजनात्मफ क्रिया 
फरत्यास्मफ चन्धुस्य सभी भक्तों में [सप्तान रुप से स्थित है। जत पक्त सामान्यय्याप्ति निर्षिवाद है'। 
इस ध्यप्तिफो समशाने फे छिप फपिने फछुएफा चरित्र उपस्थापित फ्या हैं.) जिस प्रकार ऋच्छपी 
अपने यश्चेफा योग छेम स्थषिन्दन से फरती है, उसी प्रमाप से समीपवर्ती छल वन्चेफे छिए 
सीषनाधार दोता है। उसी प्रफार मक्तोंकी स्थिति प्रमुषिम्तन में ऐै' मरतफी सी गद्दी स्थिति दे। 
अदइन्दि कमठ हृदउ जेहि माँती” से ओ शाम भरठफा चिन्सन करते हुए “मरद सनेहु सी सेपकाई” 
का स्मरण करते हूं । सैसा झागे ( चौ० ०-० दोहा १९१ में ) स्पप्ट होगा । इसीको तीथैराजनिवासिर्यों ने 
(चौ० दोहा २ ६ में ) “मर सनेह्ु सोल सुचि साचा”? कहकर गाया है । पिश्लेप व्यास्प्या चौ० ३ दो८२१९ 
में इ्ष्टब्य है। सपत के धप्रिस चरित्र में मरत पी शुघिता स्नेह और सेचदस्य फा निरूपण किया जायगा। 
भक्त के हृर्दय में ग्रिपरितार्थचिन्तनामाब 


यहाँ फवि यह समझा रहे हैं. फि ययपि प्रभुछो अयोष्या छोड़कर जाना है! तथापि उनके चित्त में 
भरत निवास फर रहे हैं। सत' मक्तफी प्रतिमा में पिपरीतार्थ छ्ृता ही नहीं । रक्त घ्याप्ति जिस मक्त के 
हृदय में स्कूरिव हे पद अपने को सदा सगयान्‌ फा सेयक सम्क्षता हुआ मुगयदू रुचि फे कनुकूछ सये 
भर्मौध्मफ भागषतथम फो अपनाने फा सकरूप करवा है! मरव घरित्र में इस स्याप्तिकी चरितार्येता 
यसिप्ठजी फे राजपदप्रदष प्रस्ताय फे भपरस्युत्तर मे द्रप्टट्य हे 


५८ प पसिप्ठने रायाभिषेकसमार का आदेक्ष स्पोंद्दी दिया स्योंद्दी भन्तापुर में पद सूचना 
गयी। 


संगति-अभुफे घरीर में आये हुए पुरुझ फे फीतुक में छियवजी प्रस्तुत राग्यामिपेफ फे हेतु अपक्तिष् 
संभारफा पर्णन फर रहे हे। 
दो०-एहि अवसर सगठ परम सुनि रदंसेठ रनिताप्त। 
सोमत छत विधु पढ़त जनु धारिधि घीचि विलासु ॥ ७॥ 
सायासे--इस परम मंगझ ( रास राग्पामिवेक ) अवसर फो सुलकर रनितास प्रफुड्छित हो रया। उसकी पेसी 
शोमा दिखादी पहटी कि मानों पूर्ण धस्द्रमा को देसकर समुद्के थीय छटरों का डस्णस थड़ता हो ! 


हा ध्या०-समुद्र फी दर्रंगों फे सभ्यमें घियित घस्द्रमा जिस प्रफार सुशोमित होता है! उसी प्रकार संग 
को मुनफर पे फी धरंगों में झम्त'पुर शोमायमान हुआ | 


संगति--रनियास में ह॒र्पप्रयुक्त आवेग में सम्पन्न हुए फार्यक्रम फो शियडी सुना रहे हैं। 
चौ०--प्रथम जाए जिन्द घचन सुनाए | भरूपन बसन पूरि विन्द पाये ॥ १॥ 
पायार्थ-- रनिबास में छाकर जिसने सबसे पइछे ( रास शाब्यामिवेक की ) चात धुमायों उसको यहुतसा बस्त 
अआमभपण ग्योठाबर में मिम्ठा । 
पारितोपिक्विवरण 


श्ञा० न्‍्या०--जब मुनिके जादेश पर राजा ने संगलझायें का भीगणेश किया सव राश्यामिपेश के प्रति 
राजकर्मेचारी पिश्वस्स हुए और रनियास में जाकर मंगछकायें झुनाने ऊंगे। दिनों से अछाया 
हुआ सनोरथ (एं हो रहा है | यह सोचपर ६. यप्रषण प्रयुक्त दऐ में रानियों ने पारितो परकषितरण फिया ) 


इ२ भावार्थ, शास्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


संगत्ति :--भरत की भेट ही फल समझ रहे हैं, न कि अज्लुचित होने से बतेमान राज्याभिपेक | 
चौ०--भये बहुत दिन अति अबसेरी । सगुन ग्रतीति भेंट प्रिय केरी ॥६॥ 


भरत सरिस प्रिय को जगमाहीं । इहइ संगुन फछ दूसर नाहीं ॥७॥ ॥॒ 
भावाथै--बहुत दिन हो गये, ( प्रियसे सेंट हुए ) वहुत देर हो गयी । शर्कुन विश्वास द्लि रहे € कि प्रिय भरत 
से सेंट होगी । भरत के समान संसार में कौन प्रिय है | शक॒न का यही फल है, दूसरा नहीं । 


भमरतमिलनफल की उपपत्ति 

शा० व्या८-प्रहन--शाकुन का फल भरत की सेंट केसे कही जायगी, जवकि भरत करा आगमन या मिलन 
उस समय नहीं हुआ। 

उत्तर--चित्रकूठ में पहुँचने के पूर्व भरत से भेंट होनी नहीं है'। इससे निष्कपे यही निकलता है कि 
भरत से सिललन का समय तो सन्निकट है, पर कब ? यह कहा नहीं जा सकता | 

इस रीति से यहाँ 'माहों” एवं “नाहीं” से दो 'नञ' प्रयोगसार्थक है'। 

प्रभुचिन्तन 

प्रभु राम की चिन्ता के माध्यम में सदा भरत ही विषय रहे इसलिए शाकुन का फल भरत का 
आगमन ही मान्य रहा, यह 'उपस्थितिकृत छाघव? है'। भक्तवत्सल॒ता मे प्रभु का स्वभाव है' कि वे अपने 
अनन्य भक्त का चिन्तन करते रहते हैं. जिससे भक्त सदा सुरक्षित हब । प्रश्न है! कि इस व्यापार 
से चित्रकूट में भरत से भेंट होने तक प्रभु को यह चिन्ता चनी रही तो कैकेयी के घरदानालुसार 
श्री राम का उदासीनत्व संगत नहीं होगा । इसका समाधान दोहा २५ चौ ३ में 'उदासी? की व्याख्या में 
किया गया है'। 

अभी प्रभुने भरत भेंट को ही शकुनफल माना है' जिसका अर्थ है' उद्देयय । इसी स्वभाव को समझकर 
वसिष्ठजी ने चित्रकूट में राम को सुना दिया कि भरत की सम्मति आप्त किये बिना वह आगे नहीं जा 
सकते जिसका समन्वय इस चौपाई से समझना होग। । 

भरत के लिए प्रभु के इस स्मरण का उद्देश्य चौ ५ दो १४१ में “घीरज़ धरहि कुसमय विचारी” 
से स्पष्ट होगा! अथोत्‌ भरत को अयोध्या में आने पर जिन विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़ेगा 
उनमे भरत फो उचित कतेव्य का मार्ग प्रशस्त होता रहे । 

प्रसु के इस स्मरण से भरत के श्ञील स्नेह छुचित्व अनुमित हो । हैं. जैसा चित्रकूट मे प्रभु के स्मरण में 
पुभिरत भरत सनेहु सील सेचकाई” से स्पष्ट होती है' । 

स्त्ृति विषयत्व का व्यतिरेक्यनुमान 
उपासकों ने शुचिता शीछ स्नेह को अपनाना होगा अन्यथा इन तीनों के अभाव से श्रीरामकर्दक 


स्टृतिविषयत्वाभाव यथार्थेतया अनुमित होगा। उस अवस्था में रामसास की साथ्थकता होगी ही नहीं 
कहा जा सकता । 


राजा एवं श्री रा के उपयुक्त विचारों से यद्द निर्णय होता है' कि प्र 
घिकारप्राप्ति तथा भरत से सेंट होता है तुत शक्ुन से श्री रामको राज्या 


ट दोनों फल अवश्यंभावी हैँ। उसमें भरत भेंट भुख्य तथा राज्याधिकार 
स्वामित्व आनुर्षगिक है'। 
संगति--भक्तों के जीवनाधार प्रभुके द्वारा अपनाया हुआ भक्त तब चिन्त्य 
फा चिन्तन करता है, इस सासान्यव्याप्ति को समझा रहे है'। 


चौ०--रामहि बंधु सोच दिन राती १ अंडन्दि कमठहृदउ जेहि भोती ॥ ८ ॥ 
श्रीराम भाई भरत्त का दिनरात चिस्तन करते हैं जेसे कछुई अपने अंढों का ध्यान मनमें करती रहती है । 


न््य है' जब वह नियमेल प्रभु 


भावार्थ-- 


_हैंड% 4 
६8४ ४)325 % 208 .६४॥६ सा 
मु जा ट ॥ ॥९७ 8|६ 8४8२७५ 32२] 


। है 
कि 
लिए आदागेर] डै8 ७)४ हे ॥2०२] ४0२ १३॥६ ॥३8 


। डर 
>%08]॥2५9 38)2 )-०८४ 2]६ 0200६ ४४ ः 
-१20४ (&७2 2] पट ०$%॥९ 0) ४0 ६६ ध्झु हु ॥08 ४8 


॥॥02४ 
%६१४: ।9 ४॥०/0)+ ६ 

हर रेड न्‍ 8॥॥0॥8 ५६ ]|2॥ ७३ ॥॥३४०॥७ 
५९५४ 


2)४८॥+४४९) 
५ ४४] 
| ॥॥0७३ ५६ ७४ ॥६ 2£॥-] ॥9/8 है; 


42७॥७ शक 2 
या विजय तप कक 
&7छनल्नंशु 


॥७ 9५ 0७७ 08 4७७] ७५%] ४॥६ ४|४७७ 


अयोम्याफाएयम्‌ , । श्दे 


ब्याप्तिनिदेश 
झा० स्या>--यद्यपि फषिते 'बन्धु! फशफर मरत फ़ो ही संकेसित किया है. तयापि सजनात्मक क्लिया 
फ्देस्वात्मफ पन्घुत्ध सभी भक्तों में ,सस्नान रूप से स्थित हैे। अत उक्त सासान्यध्याप्ति निर्षियाद है। 
इस स्यप्तिको समप्लाने फे लिए फसिने फछुएका चरित्र उपस्थापित फिया है!। जिस प्रफार कच्छपी 
अपने भ्रच्चेका योग छ्ेम स्धिन्तन से फरदी है), उसी प्रमाव से समीपवर्तीं जछ वच्चेफे किए 
जीवनाघार द्वोदा है। उसी प्राए भक्तोंफी स्थिति प्रमुचिन्तन में है भरतफी भी यही स्थिति है। 
'अडन्दि फमठ ह्दूउ जेहि भाँती” से श्री राम सरठफा चिन्तन करते हुए “मरत सनेहु सी सेषफाई” 
फा स्मरण करते हैं। जेसा भागे ( चौ० ०-५ दोशा १४१ मे ) स्पप्ट दोगा । इसीफो तीयेराजनियासियों ने 
।( चौ० दोहा २०६ में ) “भरत सनेहु साछ सुचि सोचा” कहकर गाया है'। यिश्षेप व्यास्या चौ० ३ दो८२े१९ 
में द्रप्ठब्य है। भरत के अग्रिम घरिध्र में मरत फी शुचिता स्नेदद और सेघऊऋत्य फा निरूपण किया खायगा। 
मक्त क दृदय मे पिपरितायचिन्ततामाय 

यहाँ फयि यह समग्या रहे हूँ. फि यद्यपि प्रभुझो अयोष्या छोड़कर जाना है! तथापि उनके चित्त में 
भरत निषास फर रहे हैं। अत” सक्तड़ी प्रतिभा मे विपरीतार्थे छूता ही नहीं। उक्त स्याप्ति खिस भक्त के 
ह्रदय मे स्फुरित दे यह अपने फो सदा भगवान्‌ फा सेयक सम्रश्नता हुआ भगयद्‌ रुचि फे अनुकूल सर्ये- 
धर्मोत्मफ भागषतथमे फो अपनाने फा सफल्‍्प करता है'। भरत चरित्र में इस व्याप्तिकी चरितार्थवा 
पसिष्ठज्ञी फे राजपद्मदण प्रस्ताप फे प्रत्युत्तर मे द्रप्टठय है'। 
ग 0 यसिष्ठने राम्यामिपेकसमार का आदेश य्योद्दों दिया त्योंही जन्त'पुर में पह खूचना 

गयी। 

संगपि--प्रमुके शरीर में आये हुए पुछक फे फौतुफ में छियजों प्रस्तुत राग्यासिषेक फे देतु अवश्षि् 
संभारफा यर्णन फर रदे दे। 

दो०-एदि अदसर मंगल परम सुनि रहेंसेउ रनिवास | 
सोभत लखि विधु पढ़ुत घनु यारिधि घीचि पिलामु )। ७ ॥) 
भावाशे--ुस परम मगर ( रास शज्यामिपेक ) अदसर फो सुनकर रनित्रास प्रफुक्छित हो रया। उसकी पैसी 
धोमा दिखायी पद्दी कि मामा पूर्ण घर्थम। को देखकर समुद्धके पीच छहरों का रुफ्शास बढ़ता हो । 

शा व्या०-समुद्र फी सर्रगों फे सष्यमें विधित चन्द्रमा जिस प्रफार सुशोमित द्ोता है' उसी प्रकार मंगठ 
फो सुनफर €पे फी तरगा मे अन्त'पुर शोमायमान हुआ | 

संगवि--एनियास में दृपेप्रयुक्त आवेग म॑ सम्पन्न हुए फायेक्रम फो शिवजी सुना रहे हैं.। 

चौ०-प्रथम जाइ जिन्द पचन सुनाएं | भूपन वपन भूरि विन्‍्द्र पाये॥ १॥ 
मायाधै-- रनिबास मे जाकर जिसने सयसे प्रहक्े ( रास राम्पाभिवेक की ) पा छुणाया उसको बहुतसा बस्तर 
अआमृपण स्योछठादर से मिश्ा । 
पारिवोपिकवितरण 


शा० व्या०--जधष सुनिफे कादेश पर राजा ने मंगछड्ाये छा श्रीगणेप् फिया तंद राग्यामिपेर के प्रति 
' राजफर्मचारी पिश्वस्त हुप और रनियास में जाकर गला पान | 5 विनों से खलाया 
हुआ मनोरय 'णे हो रहा है। यह सोभफ्र $ स्भ्रषण प्रयुक्तह पे में रानियों ने पारितोपिफपितरण किया । 


न लेने के कारण प्रत्याहार है'। अर्थात्‌ प्रत्याह्मरन्य 


१४ भावाथे, शाल्लीयव्याख्यासमेतम्‌ 


७ 
कमका अकाशन 

ज्ञातव्य है' कि राजनीति सिद्धान्त में मन्त्रविकत्पके संबंध में कहा हे कि भविष्यत कम्मेफी सन्त्रणा को 
यथाविधि सम्पन्न करके जब राजा कायोरसंभ करदें तव वह के कुल्य राजकमचारियों के सामने प्रकाशित 
होना चाहिये। तदमुसार राज्यासिपेक के अंगभत कायका ग्रारभ होने के वाद रनिवास भे खबर 
पहुँचायी गयी । ३ हे 
कैकेयी को चना न पहुँचाने का कारण 

प्रश्न--राज्यासिषेक की सूचना केकेयी के कानों त्‌क क्यों नदी पहुँची | 

उत्तर--कैकेयी स्वभावत' मानिनी है!। यदि ( कर्मचारियों ) कुल्यां द्वारा उसको सूचना सुनायी जाती 
है! तो उसके रूठने "का भय मानकर राजाने स्वयं ही कैकेयी को राज्याभिषेक का समाचार मुनाना चाद्दा | 
जो भामित्ति भयठ तोर मन भावा? से स्पष्ट होगा । कौसल्या और सुमिन्ना में मानिनीत्व का दोप छुलान्तगेंत 
न होने से कुल्योंद्वारा सूचना पहुँचाया जाना असगत नहीं है'। अतः कर्मचारियों ने कैकेयी को सूचना 
नहीं सुनायी । माल्म होता है' कि इसी कारण गोसाईजी कैफेयी के सम्बन्ध मे इस अचमसर पर मौन हैं.। 

जिस अकार कैकेयी को खबर पहुँचाना इंष्ठ नहीं था 2 प्रकार उसकी अन्तवोसिनी मन्‍्धरा आदिको 
भी सूचना नहीं छगनी चाहिये थी क्योंकि राजनीतिशाश्नसिद्धान्त के अनुसार काय की प्रणता हाते 

न ॥" का ८ रः रे 

होते राजाके कुल्यातिरिक्तों को काये की जानकारी ह्वानी चाहिये। इस सिद्धान्त पर विद्येप ध्यान न 
देने का फल हुआ कि राज्याभिपेक के समारंभ को उसी दिन मन्थराने जान लिया व अपने कुटिल 
कार्य में वह सफला हो गयी । 

संगति--रामराज्याभिषेक को सुनकर रानी कोसल्या और सुमित्रा के शरीर पुरकित दो रहे दें । 

चौ०--प्रेम पुलकि तन मन अनुरागी । मंगल कलस सजन सघ छागी ॥२॥ 
भावाथे :--सब रानियाँ प्रेम में पुछकायमाना हो गयीं तन मन से अनुकूल होकर मगरूकलश सजाने लगी । 
| शा० व्या८-अन्तःपुर में स्थान स्थान पर मंगलऊलश सुशोभित हो रहे हे । 
संगति--कवि रानियों का चरित्र अस्ठुत करते हुए प्रथमतः सूचीकटाह'न्याय के अनुसार सुमित्रा के 
हथे का वणन कर रहे हैं । 
चौ०--चौकें चारु सुमित्रों पूरी। मनिमय विविध भाँति अति रूरी ॥१॥ 

भावारथे :--सुमित्रा ने सुन्दर चौक ( रमोली ) पूरे जो अनेक भ्रकार की मणियों से बहुत सुन्दर छग रहे थे 
शा० व्या०-मणियों से अनेक अकार के सुन्दर चौक पूरकर सुमित्रा ने अपनी कलाकुशछूता को दशोया है'। 
सगति--इसके बाद राममाता कौसल्या के मंगलकाये अस्तुत हो रहे हैं | 


चौ०--आनन्दमगन राम-महतारी ! दिए दान वहु विग्न हकारी ॥४॥ 


९ 
भावार्थ :--राम की माता कौसद्या आनन्द में मग्न हो आाह्मणो को बुलाकर दान करने छूगीं । 


शा० व्या“--राजपुत्र श्रीराम के भाविकल्याण के उद्देश्य से विश्नों का आश्ञी्वा करने की 
कामना व हुवे मे भरकर कौसल्याजी ने दान देना आरंभ कर दिया। निर्वि 3 पम 
आ्रासदेवताओंका भी पृजन सम्पन्न हो रहा है । दि्‌ निविष्नता के लिए अन्यान्य 
अइन--सुभिन्ना और कौसल्या के साथ कैकेयी के नाम का उल्लेख क्यों नहीं है' ? 


उत्तर--मानसकारने मगलकार्यों में श् के 
नसकारने मगछकारयों में कौंसल्या और सुमित्रा का नाम यत्नतत्न लिया है। कैकेयी का नाम 


'येन सबसे वड़ी कौसल्या और सबसे छोटी सुमित्रा 
$. कोपना सेव भामिनी । ( अमरकोश ) 


अयोध्याकाण्डम्‌ ३५ 


का नाम छेने से झैकेयी भी विवक्षिता है| प्रत्येक फाये में ययावद्‌ व्यवस्या फे ढारा सहयोग फरते 
हुए फैफेयीने सब रानियों फो सम॒ति मे घाघ रखा था जो प्रन्थकारने (चौं ३ दो ५१ में ) “राजु फरत 
यह देक्ष दिंगोई, में 'राजु करव' से स्पष्ट किया है|. 
संगति--मंगछ फे प्रसंग से पुरी में स्थित देषतान्दर फा पजा फा निरूपण होरडा दे । 
चौौ०--पूजो ग्रामदेवी छुर नागा। कह बद्दोरि देन बलिमागा ॥ ५॥ 
भावा्थ--मावा कासछ्याने प्रामदेपी, देदतामं भोर नागा का पूथन किया फिर यछिका भाग देमेको कष्ठा । 
दवतापूचन का फछ 


झ्ा० जया --अये शास्त्र म॑ भिन्‍न मिप्न स्थानां में तत्तद्‌ ग्रामदेयदाओं की स्थापनाका यिघान उपलब्ध दोता 
है। देवताओं फी स्पापना से नगर एपं जनपद्‌ फा रक्षण द्वी नहीं अपितु फ्पिप्षास्त्र फे अनुसार क््त फे 
विशेष उत्पादन में देववाओं फा साप्तिप्य सहायक भाना गया दे। राम्य फी तरफ से उनके पूजन की 
मुन्पवस्था होती है। राम्याभिषेफ फे अयसर पर वचवुदेषताओं के विशेष पूजन फा पिघान राजनीति 
क् में निर्दिष्ट है। इसफा अनुसरण फरते हुए कौसत््याजोने पिया एयें सक्ति फा परिचय 
दिया है। 
सगवि-पूजन में फपि छौसल्याजो फ्ा शाविफ माय प्रफट फर रहे ईँ-- 
चौ०-जेद्दि विधि होइ राम फरयान्‌। देहु दया फरि सो परदान्‌ ॥९॥ 
मापाये--माठा कौसल्पा ने उनसे प्रार्थना किया कि झिस प्रफार श्रीरास का कक्त्पाण दो, दुया करफे मुछे पैसा 
बरदान दें । 
फौसरया क प्रस्तुत देवपूलाका उलय 
श्ा० ब्या“--चूँफि पिष्न-यापा फा कमाय तो स्परूपत' हे ही, इससे ज्वाव होता ऐ, कि फौसल्या का 
यह पूजनफाये फल्याण फी भ्रनुकूछता में हुआ दे, न फ़ि पिप्नपाधाओंफो दूर फरने में। राजा दशरथ 
फा इंदना उच्चतर प्रमाय हैः फि पिप्न क्र फत्पना फौसस्याके हृदय में हे! ही नद्ी। 'जेहि विधि होई 
राम फल्यान! कश्फर फौसल्याजी पुत्र फे फस्ष्याण फे लिए यर माग रही दें । निष्फर्ष यह हुआ कि मानप 
फल्पाण चाहवा ऐ पर उसफी सम्झ्राप्ति फप कैसे होगी? यद्द निम्य फएना उसके लिए संमय नहीं है। 
अत' फौसल्याने यह भार दयताओं पर छोड दिया छे। देषवाओंनि सोचा फि मध्यावधिमें उपस्यित 
अभिपेफात्मफ फायमे पिप्नपाधाओफो दूर फर प्रमुझे यघनयासफाये में सदयोग दिया जाय रायणयघ फे 
पश्चात्‌ फौसज््याद्वारा याचित फल्याण का सम्पत्ति पूर्ण फी जाय | इस माप से दृवताओंने फौंसल्याका 
पूजन स्वीफार फिया। अव* यह पूजन निप्फछ नहीं समझना चाहिये। 
फौसरपावचन को श्रामाणिकता 

मिन्दनीय यह है कि यदि पतिश्नवा फौसस्याफे सुस्त से राम्याभिपेफका स्पष्ट धल्छेख होता तो 
उपयुक्त भाषिफल्पाण में सद्दायता फरने फे विचार में वेयवाओं फो छूट नदी मिछ्दी। न तो पहिप्र्ता फे 
यचनपिरेध में सापिझल्‍्याण का पिचार संगत हीं झदुरवा । है 

फौसत्त्याद्वारा राम्याभिपेफ का उल्लेख दोने पर यदि पृषताओं ने अभिपेकसभारंस में पिध्नवाभा 
फरते हुए राषमपघफ्ी फल्पना फो द्वोती दो पतिप्रवा फौसल्या के बचनों रा अम्रामाण्य द्ोदा। यह दोप 
“क्या? पन्द से निरस्त छे। इस प्रफार सती फौसस्याफे बचन ही सार्थछूता और पेववाओं फी लनुफूब्वा 
दोनों का निषाद फरते हुए फपिने शब्दप्राभाण्य फी हवा प्रदष्चित फी हे। 


१४ भावाथ, शाज्जीयव्याख्यासमेतम 


७ 
कम्ंका अकीशन 

ज्ञातव्य है' कि राजनीति सिद्धान्त मे मन्त्रविकर्पक्रे संबंध मे कद्दा 54 कि भविष्यत्‌ कर्मकी सन्‍्त्रणा को 
यथाविधि सम्पन्न करके जब राजा कार्योरंभ करदें तब वह कर्म कुल्य राजकमचारियां के सामत सक्ाक्षत 
होना चाहिये। तदूनुसार राज्याभिपेक के अंगभत कायका ग्रारभ द्वान के वाढ़े रमनिवास भे सबवर 
पहुँचायी गयी | रु 5 
कैकैयी को घचना न पहुँचाने का कारण 

प्रशन--राज्यासिषेक की सूचना कैकेयी के कानों तक क्यों नदी पहुँची है 0 

उत्तर--कैकेयी स्वभावतः मानिनी है'। यदि (कर्मचारियों ) हुल्यों द्वारा उसको सूचना सुनायी जाती 
है' तो उसके रूठने “का भय मानकर राजाने स्वयं ही कैफेयी को राज्यामिपेक का सम्राचार मुनाना चाह । 
जो भामिनि भयउ तोर मन भावा? से स्पष्ट होगा। कीसल्या ओर सुमितन्ना से सानिनीत्य का दोष ऊछान्तगत 

०] 0-4 हे' ञअ + के लक हर 32 

न होने से कुल्योंद्वारा सुचना पहुँचाया जाना असगत नहीं ढ। अतः कमंचारियों ने कक्ैयी को सूचना 
नहीं सुनायी । माल्यम होता है' कि इसी कारण गोसाईजी कैकेयी के सम्बन्ध में इस अवसर पर मौन दे । 

जिस प्रकार केकेयी को खबर पहुँचाना इष्ट नहीं था रा प्रकार उसकी अन्तवोसिनी सन्‍्धरा आदिको 
भी सूचना नहीं छगनी चाहिये थी क्योंकि राजनीतिशास्रसिद्धान्त के अनुसार कार्य की प्रणता द्वोते 
होते राजाके कुल्यातिरिक्तों को काये की जानकारी हानी चाहिये। इस सिद्धान्त पर विश्येप ध्यान न 
देने का फल हुआ कि राज्याभिपेक के समारंभ को उसी दिन मन्वराने जान लिया व अपने कुटिल 
कार्य में वह सफला हो गयी । 

संगति--रामराज्याभिषेक को सुनकर रानी कोसल्या और सुमित्रा के शरीर पुछकित हो रहे दूँ: 

चौ०-्रेम पुलकि तन मन अनुरागी । मंगल कऊूस सजन संघ लागी ॥२॥ 
भावाथे :--सब रानियाँ प्रेम में पुछकायमाना हो गयी तन मन से अनुकूल होकर मगरूकलश सजाने रूगी । 
| शा० व्या५-अन्त'पुर में स्थान स्थान पर मंगलऊलश सुशोभित हो रहे है । 
संगति--कवि रानियों का चरित्र भर्तुत करते हुए प्रथमतः सूचीकटाह'न्याय के अनुसार सुमित्रा के 
हथे का वर्णन कर रहे हैं । 
चौो्‌ रोके है ८5 गे ८ कप छ] अ तति 
०--चौक चार सुमित्रों पूरी । मनिमय विविध भमॉँति अति रूरी ॥३॥ 
भावाथे :--समित्रा ने सुन्दर चौंक ( रंगोली ) पूरे जो अनेक प्रकार की मणियो से बहुत सुन्दर छग रहे थे । 
शा० व्या०-सणियों से अनेक पका के सुन्दर चौक पूरकर सुमित्रा ने अपनी कछाकुशछूता को दर्शाया है'। 
संगति--इसके बाद राममाता कौसल्या के मंगलकायं प्रस्तुत हो रहे है । 
चो०--आनन्दमगन राम-महतारी ! दिए दान बहु विग्न हेकारी ॥४॥ 
७ 

भावार्थ :--राम की साता कौसढ्या आनन्द से मग्न हो ब्राह्मणो को घुछाकर दान करने ऊूगी । 


शा० व्या“-राजपुत्र श्रीराम के भाविकल्याण के उद्देश्य से विश्नों का आशीवीद प्राप्त करने की 


कामना व हथे में भरकर कोंसल्याजी ने दान देना प्रारंभ कर दिया। निर्विष्नता के लिए अन्यान्य 
आमदेवताओंका भी पूजन सस्पन्न हो रहा है'। दिया। निर्विष्नता के लिए अर 


प्रश्न--सुमिन्ना और कौसल्या के साथ केकेयी के नास का उल्लेख क्यों नहीं है! ? 

उत्तर--मानसकारने मगलकार्यों में कोसल्या और सुमित्रा का नाम यत्र तत्र लिया है। केकेयी का नाम 

न लेने के कारण अत्याहार है। अथौत प्रत्याह्रन्याथेन सबसे वड़ी कौसल्या और सबसे छोटी सुमित्रा 
$. कोपना सेव भामिनी । ( अमरकोश ) 








३६ भावाथें, शाख्रीयव्याख्यासमेतम 
मविष्यतमें देवताओं के जो भी विचार मस्तुत किये जाय॑गे वे इस चौपाई से समन्वित समझने होंगे 
संगति--आगे कवि रनिवास में हुए प्रेमातिरेक से प्रकट गायनात्मक अजुभाव प्रदर्शित कर रहे हैं. । 
चो,--गावहि मंगल कोर्िल बयनी। पिधुचदनी मृगसावकनयनी । ७॥ 
भावारथे--चन्द्रमा के समान मुखबाली और वाल्झूग के समान नेश्नवाली सुन्दरियों कोयल के सामान भीठटे स्वर भें 
मंगछगीत गाने लगी। 
जश्ञा० व्या०--इस अभिपेक-्रसंगमे कविको नरनारियोंका हपे सुद्यवना नहीं छग रहा है। इस लिए 
दोह्दान्तर्गत चौपाइयों के ऋ्रममें न्यूनताकर सात ही चौपाइयों मे दोहा समाप्त कर दिया। 
संगति--रनिवास मे हुए उत्साह्द तथा गायन आदि का वर्णन करने के पश्चात्‌ राज्याभिषेक फी तेयारी 
में किये गये पुरवासियों के चरित्रों का वर्णन हो रहा हे 
दोहा ०--राम राज अभिपेकर सुनि दिये हरपे नर नारि । 
लगे सुरंगल सजन सब विधि अनुकूल विचारि ॥८॥ 
सावार्थें--सब नर नारियां श्री रामका राज्यामिपेक सुनकर आनन्दित हो गये | विधाता को अनुकूठ समप्तकर 
मंगलसूचक सजावट भी करने लगे । 
सुखप्राप्त 
ज्ञा० व्या०-राजपुत्रों के गुणाकपंणपर पुरवासियों ने अपने विचार में विधिको अनुकूल समझा है । 
४ हे में उन्हें सुखकी उपलब्धि दो रही है'। “अनुकूल वेदनीयं सुखम! का यह समन्वय दृष्टिगोचर 
रहा ६ | 
संगति--आसंगिक भगलछका निरूपण होनेके पश्चात्‌ चौप।ई २ दोहा ७ मे निर्दिष्ट सुरपजन के 
अनन्तर दोहा ८ में 'तव” शब्दसे जो सकेत किया गया हैं, ज्सके अनुसार राजाके भावि कार्यक्रम के 
बणन में प्रथमतः राजाने गुरु वसिप्ठको आमन्त्रित किया है| 
चौ०--तव नरनॉह वरिष्ठ बुलाएं। राम धाम सिख देन पठाए॥ १॥ 


भावाथे--राजा दशरथ ने वसिष्टजी को घुछाकर श्री रामके समीप उनके घर में ( राज्याभिषेकोचित ) दीक्षा देने 
के लिए भेजा । 


शुरु के तत्काल पहुंचने व बुलाने में उपपत्ति 


श्ञा० व्या“--तत्काल गुरुजी फा राजमहल में शुभागसन हुआ। इसफा कारण वसिष्ठ 'मुनिका 

ः हु का निवास 
राजहुगसे उत्तरदिशाकी ओर होगा जैसा राजनीति शास्में विहित है'' । अर्थशाल््रकारोंने द्रव्यप्रकतिका 
स्वामी राजाको ही माना है। वसिष्ठजी गुरु द्ोनेके साथ साथ मन्त्री भी हैं। अतः उनको अपने यहां 
बुलाने में राजा का व्यवहार भी सोपपत्तिक है । 


दीक्षाकी ग्रेरणर्थ शुरुणमन 


राज्याभिषेकविधिको सम्पन्न करने के लिए अधिकतों को दीहि 

क्षत होना आवश्यक है'। दीक्षा शुरु 
देते हैं। यह विचारकर राजा गुरुजीको कुमार श्री रामके' महल में-जानेका संकेत फर रहे हैं गा हद 
संगति--गुरुजीका आगमन सुनकर ग्रेमपुछकित हो श्रीरामजी द्वार पर स्वागतार्थ उपस्थित हैं। 


' (१) तस्य पूर्वोत्तर भागसाचार्यपुरोहितेज्यातोयस्थानमधिवसेयु, ( अ. २-४ ) 


अयोधष्याकाण्एंम है 


चौ०-गुरु आगमनु सुनत रघुनाथा | द्वार आई पद नायठ माथा ॥र॥ 
साइर अरघ देह धर आने ।सोरद माँति पृज्नि सममाने ॥शा 


सायाये--श्री रामजी गुददी का क्षामा सुमते ही द्वार पर उपस्पित हो सुनि के चरणां पर मस्तक झुकात हुए जादर 
पूर्धक रूप्पे दुंकर उनको महृए से छे गये पश्मात्‌ पोशशोपचार से पूजा कश्मे छगे । 


गुरुमी के स्वागृत पूजन फा नैतिक उपयोग 

झ्षा० स्या“--शुरुती फे पर में आने पर उनके स्थांगत में क्‍या कर्सन्य होता है'? इसको भीरास ने 
समझाया हैं। इसका नैतिफ उपयोग छोकर्सप्रह हे। अम्दयुन्द एर्य गुरुपन्द को प्रसन्न करने के छिये 
झआाख़ाफाएँ ने देवों फी पा के समान उनका पुथनन करने फा विधान बताया »औ। उसी का शतुसरण 
प्रमु राम फर रहे हैं । 

जैसे फामन्दफ ने पूजा फे पिघान में देषदा य गुरुजन फा संकेत किया है! पैसे ही भन्यत्र झुमाषितों 
में पद्वेजमादरेण” और "गुर प्रणतिभि” फट्दा ऐै। 
संगवि--गुरु की पूजा फरने फे याद भीरास ने फिस प्रफार गुरु से प्राथ्ना की ९ शिवजी सुना रहे ईं ) 

चौ०--गद़े घरन सियसद्दित बहोरी | योले राम कमलकर छोरी ॥ ४ ॥ 

भांयार्थ--सीवासदिद श्री राम ले शुपत्री का अरणस्पशे करके दोनों हाथ जोड़कर पिशति की । 


परिचय रहते मी अवश्षा फा अमाय 
च्वा० स्या८--यहां श्ाठज्य ऐ कि भी रास फो गुरु षसिष्ठ से परिचय जन्मत है'। क्रृतिपरिचय होने पर 
अयज्ञा की संभावना रहती है। पह दोप भी रास के घरिध्न मे नहीं हे। 
संगति--शुरुतनों का आदर भरविष्यतूसफछ्ता फा थीज ह। उत्तमप्रकृति होने से श्री राम धक्त सध्य 
को समझ रहे हैं. उसी फो कपि स्फुट फर रहे हें। 
घी ०--सेपक-सदन स्ामि आगमनू | मंगठमूल अमगरुदमन्‌ ॥५॥ 
मायायें--दे स्थामित्‌ | सुप्त सेदक के धर में गुदसी का झासा संग का सूछ और खसंगझ का गाशक दै। 
झमंगछसे विप्णकार्य भी ध्वमित दें । 
ज्ञा० ध्याप--सेव्य के घर सेयक ने जाना घचिद है'। फ्योंफि सेब्य फे संयध में शाखकारों का विधान 
ह कि उसने पिना विशेषपयोजन फे सेवक फे घर नही जाना चाहिये। इस विधान को एपेक्षित फर 
गुरुणी फा सेषकभीरासके घर पहुंचना उनकी अल्पक्षता या आाषंग का परिचायक नहीं किन्तु 
भर्थात्‌ पिछ्लेप प्रयोजन रखदा है.। 
गुरु-पेग्य का सेवक-भीरास के यहा जाने भे आरादुपकारकल 

महास्माओं को दृष्टि में यद छुमागसन महदूमशोरूप मगछ फा ( प्रेछोक्य गासिनी फीर्दि ) ग्रोसक 
है। यहां स्मरणीय है फ़ि दूसरे दी दिन प्रमु घनमें जाने का कार्यक्रम प्रारंभ करेंगे। यह्‌ काये छोकरएपा 
प्रसंगछ दिखायी देवा हुआ भी सादी यशस्‌ का साधन है। इसको दृष्टि में रख़कर णागे (चौ० ६ दो८५३ 
में) काननराजू! फद्दा गया हैः। उसमें नान्तरीयकतया जो मी दुःश्त फद्दा गया है पह झसगएछ में पर्यवर्तित 
नहीं कट्दा जा सफता, इस दृष्टि से 'संगड्मूठ समंगठद्मन्‌? साय है। उसेका निष्कर्ष यद फि-- 

कि सेन्यगुणसंपम्रस्थ सेयरगृद्े यद्यस्‌ शुमागसर्न मधति सस्‌ सनम॑गछमूर् भपति! यह निर्दुष्ट 
व्याप्ति है 

(१) सी सास ४। न्‍ 


के 


अयोष्याकाण्डम्‌ इै० 


चौ०-गुरु आगमनु छुनत रघुनाथा। द्वार आर पद नायठ माया ॥रा। 
साइर अरब देह घर आने । सोरह माँति पृत्मि सममासे ॥३॥ 


माया्य--्ली रामजी गुरुमी क्र भागा सुमसे डी द्वार पर वपस्थिप् हो मुनि के चरण पर भस्वक झुकासे हुए आदर 
घूर्दक भ्रप्पे दुकर इनको सदर से छ रापे पश्चात्‌ पोदपोपचार से पूस करने छगे ! 


गुरुजी क॑ स्वागत पूजन का नैतिक उपयोग 

क्ञा० ब्याई--शुरुजी फे घर में आने पर उनके स्वागत में क्‍या फ॒त॑न्य दोता है) इसफो भीराम ने 
समझाया ऐऔ। उसका नैदिफ उपयोग छोफसंमरह छ। प्म्दहयुन्द एय गुरुपृन्य फो प्रसन्न करने के फिये 
शाक्षाकारों ने देयों की पूजा फे समान उनका पूजन करने फा प्रिघान वताया है!। उसी का अनुसरण 
पभु राम फर रहे हें! । 

जैसे फामन्दफ ने पता फे षिधान में देयदा य गुरुजन फा संकेत फिया है! यैसे ही अन्यत्र सुभापितों 
में 'दिल्लमावरेण” भौर “गुर भ्णविभि” फद्दा है । 
संगति--शुरू फी पूजा करने फे याद श्रीराम ने फिस प्रद्धार गुरु से प्रार्थना फी ? शिवजी सुना रहे हैं। 

पौ०--गद़े चरन सियसहद्दित वद्दोरी | वोडे राम कमलकर जोरी ॥ ४॥ 

भायाथैं--सीठासदित भी रास मे गुझमी का चरणप्पश करके दोनों इाप जोड़कर विम॑त्ति क्री । 


परिचय रहते भी अवज्ञा का अभाव 
ज्ञा० स्या“-यहा ज्ञादज्य ऐ कि भी राम फो गुरु पसिष्ठ से परिचय जमत' है। अतिपरिचय होने पर 
अप्ठा फी संमायना रहती ऐ | घ्ट दोप भी राम फे 'घरित्र में नही है । 
संगवि--शुरुतनों फा आदर भपिष्यतसफछता का वीज़ हछ। उत्तमप्रकति छोने से ही रास उक्त रथ्य 
फो समझ रहे दे उसी फो कृषि स्फुट छर रहे हैं. 
चौ०- सेवक-सदन स्वामि आगमन्‌ | मगलमूल अम्गठदसन्‌ ॥५॥ 
भायाये-दे स्वासिग्‌ | मुप्त सेवक के पर में गुरुजी का भाता संगछ का भूछ भौर अरमंगफ का साशक दे। 
अमंगढसे बिप्नकार्य मी प्वमित दें । 
शा व्या--सेख्य फे घर सेषफ ने जाना उचित है। फ्योंझि सेव्य के: संघघ में शास््रकारों का पिघान 
ह कि उसने पिना पिशेपप्रयोजन फे सेव फे घर नहीं जाना चाहिये। इस पविघान फो उपेक्षित कर 
गुरुजी फा सेयकभ्रीरासफे घर पहुंचना उनकी अल्पक्षता या आवपेग का परिचायक नहीं किन्तु सहेतुर 
शर्योत्‌ बिशेप प्रयोजन रखता है । 


गुढ-सेम्य का सेपक-भीराम के यहा जाने मे आरादुपकारकत्व 

महात्माओं की दृष्टि में यह ध्रुमागमन महृत्यशोरूप मंगछ फा ( ब्रेडोक्य गामिनी फीर्पि ) ग्ोतक 
है। यहां स्सरणीय है कि दुसरे दी दिन प्रमु घने जाने का कार्यक्रम प्रारंभ फरेंगे। यह फाये छोकरछ्या 
झसगछ दिखायी देता हुआ भी भाषी यशस्‌ का साधन दै। इसको दृष्टि में रखफर आगे (चौ० ६ दोौ८५३ 
में) 'काननराजू! छा गया हद | उसमें नान्तरीयकतया जो मी दुःस्त फटा गया है पह अमगछ में पर्यघर्तित 
नहीं छह जा सफसा, इस दृष्टि से 'संगूछमूछ अमंगढबुसन्‌? साथक है। उसेफा निष्कर्प यह फि-- 

अत सेन्यगुणसंपन्नस्थ सेवफयूदे ययत्‌ शुभागस ने मबति दस सनमंगढभूछे भषति! यह तिदुंश 
ब्याप्ति द। 


(नी स्ास३। 


३८ भांवाये, शासीयव्याख्यासमेतम्‌ 


मंगलमूल की ज्याप्ति पर विश्वास 


गुरुजी द्वारा राज्याभिषेक की सूचना ग्राप्त करने के बाद दूसरे ही दिन बह काये संपन्न नहीं हुंआं 
ऐसा दृष्टिगोचर होते हुए भी श्रीरासजी उपयुक्त व्याप्ति में अपना विश्वास दृद्‌ बनाये हुए हैं. | उसका भाव 
यह कि राज्याभिषेक स्वल्प मंगल है, उससे भी अधिक कोर्तिमंगल होने वाला है!'। उस मंगल विशेष के 
घटित होने के लिये राज्याभिषेक का कार्यक्रम स्थगित होना अपने हित में श्री रामजी अच्छा समझ- 
गे। इसमें हेतु उनका उपयुक्त व्याप्ति पर अपना विश्वास छै। उसी विश्वास पर भाविसंगल को 
उपलब्ध करने के लिए श्रीराम जी हृए के साथ वनगमन की तैयारी करेंगे। इस श्रकार गुरुजी का 
शुभागमन राजकुमार के यशस्‌ को बनाने मे आरादुपकारक है'। 
संगति--मंगलमूछ अमंगल दमनू” की उपपत्ति अग्रिम चौपाई में समझाई जा रही है | 
चौ०--तदपि उचित जनु बोढि सग्रीति | पठढइअ काज नाथ अस नीति ॥६॥ 
भावाओ--हैं नाथ ! नीति तो यही है कि कार्यविशेष की प्रसक्ति पर किसी के द्वारा सेवक को सेब्य घुछावे और 
उचित समझकर सेवक को आज्ञा करे । 


वाणी या कृति का अन्नुगामी अथे 


शा८ व्याॉ०--मर्यादातुसार यही उचित है! कि सेवक ने ही सेव्य के सामने उपस्थित होकर उनसे आदेश 
प्राप्त करना चाहिये। किन्तु सेव्य ही सेवक श्रीराम के घर पहुंचकर उसको आदेश दे रहे हैं. इस क्रम 
को सर्वेथा अनुचित कहना ही अनुचित है! । क्योंकि-- 
ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोइनुधावति? 

इस उक्ति के अनुसार महात्साओं के पदक्रम वथा होते नहीं। इसलिए 'मंगछमूल अमंगलू दभनू? ही 

पारिशेष्यात्‌ सान्‍्य होता है'। 
मुनि गुरु का शुभागभन यशोबीज 

निष्कर्ष यही कि राजकुमार श्रीराम के महान्‌ भावियशोरूपी फछकी उपलब्धि में श्री गुरु मुनि का 
शुभागमन आरादुपकारक ही नहीं किंवहुना मंगल बीज का भी काम कर रहा है'। जैसे बीज तिरोदित 
होकर अंकुरोप्पादक होता है! उसी प्रकार गुरु वसिप्रमुनि का आगमन अन्तस्तिरोहित हो मंगल के लिये 
बीज के रुप में ऐकान्तिक है। अतएव गुरुजी ने श्रीराम के यहां पहुंचकर अपने शुभागमनात्मक मंगलूबीज 
3० के न कर उसे छिपा रखा है'। महाराज दशरथ की सत्यसन्धता को प्रकट कर उसको अंकुरित 

हे 
सगति--भविष्यत्‌काडीनफल का निरूपण कर तात्कालिकिफल फा निरूपण कर रहे हैं। 
। चोौ०--परशुता तजि प्रद्ध कीन्ह समेह | भयउ पुनीत आज्ु यहु गेह ॥७॥ 
भावायं--दे श्रभो ! आपने अपना बड़प्पन छोड़कर जो स्नेह दिखाया है । उससे हमारा घर आज पविन्न हो गया । 
|॒ सन्तोंके आगमन का तात्कालिक फल 

शा० व्याप-- गुरुजी के आग तात्का 
हक मर रे रु गुरुजी के आगसन का लिक फल प्र अपनी व घर की तथा पूर्वजों की 
संगति--उत्त फल को समझ कर असन्नान्तःकरणसे 
व्यक्त कर रहे है । 


५ "०-आयछु होइ सो करों गोसाई । सेवकु लहइ स्वामिसेवकाई ॥ ८ ॥ 
भावाथ--भापकी जो जाज्ञा हो वैसा करूँ, जिससे सेवक को स्वामी की सेवकाई श्राप्त दो ) 


रणसे प्रभु श्रीराम गुरुके आदेशपालन की अविज्ञा आगे 


अयोध्याफाण्दम्‌ ३३९ 


आदक्न का प्रतीक 
झा व्या<--श्ञाठण्य है कि गुरुप्साद ही मयिष्यतछालीनफलोपलब्धि फा चीज चनफर यथायें प्रधिमाझा 
हत्पावर दोता है'। इस प्रकार श्रीराम फे गृद्द में उपस्थित गुरु का प्रेमसाव तथा स्येप्त राजफुमारकी 
आवेशपासन फी प्रतिज्ञा स्थामिसेवकभाष फे आदर फा प्रतीफ है | 
संगदि--षसिप्त मुनि आदेश सुनाने फे पूर्ये प्रभुछी निप्फपटप्रतिज्ञा हथा उपपत्ति को सुनकर रनके 
पिवेक फी प्रशंसा फर रहे हैं। 
दो०-सुनि सनेद साने घचन पयरुनि रघुवरद्ि श्रक्षस ॥ 
राम फस ने तुम्द फरंहु अस इँसवंश अबतंस।॥ ९॥ 
भायार्थ--मुनि दसिए रघुबर भीराम फे प्रेमसप पर्चर्णा को सुनकर उनकी प्रशंसा करते हुए कइस छरगे कि सूर्यदंसध 
के भूषण | राम | तुम बयां न पूसा कहोगे 
श्रीराम के विवेक ( आन्वीक्षिकी ) को प्रश्मसा 
ज्ञा» ब्या०--हस फे समान पियेझपूर्षफ फास फरने में वक्ष सू्येचंश में भीराम का जम है!। अठ 
उनके इृदय में आन्यीक्षिफी पिया सपय॑ श्रफट है जो भीरामजी फे संगछमूछ अमंगलदमन्‌” निष्कर्ष से 
सूचित द। वेद एवं शार्ता फे गठ से आन्यीक्षिकी फी शोभा तव मानी जादी है जब यह धर्म एवं झा्ों 
से परिष्कृत रहती है । 
संगवि--शियजी उसी फा संफेत फरते हुए मुनि फा आदेश सुना रहे हूँ। 
चौ०-घरनि रामगुन शीछ छुमाउ | बोले ग्रेम पुलकि प्वनिराठ ॥ १॥ 
भायार्थ--भीराम के गुण शीछ छाप का वर्णब करके मुमि प्रेस में मग्न हो गये ।* 
सगछि--शुरु फे आादेश फा साराए इस प्रफार ऐै। 
चौ०-भूप सजेउ अमिपेक समाजू। चाइत देन तुम्ददि जुबराजू ॥ २॥ 
भापाय्थ--राज्रा तुमको युबराजपद्‌ पेसा अइपे ६। उसके छिये राम्पामिपेक की ठैथारी पूर्ण हो रद्दी है। 
राजमनोरथबचना एवं राजपद्‌ में सर्वलोकनमस्क्ृवत् 
श्ा० ज्या“--राजा वृशरथ राज्याभिषेफ फी तेयारी फर रहे हं। संपृणजनसमुदाय से राम्याभिपेक की 
शमुसर्वि प्राप्त दे । पिशेषांश ३२ दो ६ घौ मे द्रष्टल्य है'। 
प्रमु राम फ्रा राज्यारोहण सबसोकनमस्क्ृत तया छोकसम्मत है । नकि स्वेच्छा से प्रेरित दो प्रियवर्धन 
या प्रियभयणप्रयुक्त आावेग में राजा औराम फो पदालंकृत करने में उच्चत हैँ अतः हे राम! श्लाप 
मुषराजपद फो स्वीकृत कर प्रसासमेत पिता के सनोरय को पण्णे फरे। 
संगति--राज्याभिपेकफर्म में दीक्षित होना उत्तरकाठीनस्थासी यज्मास (भीराम) फे छिये अपरिदार्य है। 
इसछिए उस फर्वेग्यपाछनावेश फो, पुरोद्ित होनेफे कारण गुरु मुनि वसिध्त सुना रहे ईं। 
चौ०-राम करहु सद सथम आजू | जौ विधिकुश्नल नियाहे काजू ॥ ३॥ 
मायाथ्थे--दे भ्रीराम | राग्याभिपेक के मिमित्त को सुनकर संपूर्ण संपन भाज करो । छिससे पिध्वाठा सापिकार्य को 
कुराकतापूदेक पूर्ण करे । 
३ ग्रुण सी एबभाष को ध्पाश्पा हूपो दो 3 चो< में मध्य्य हैं। 


भावार्थ जश्ञास्घीयव्याख्यासमेतम्‌ 


एकराज्य 
शासन दो प्रकार का दोता हैं--एकराज्य और कुछराज्य। एकराज्य 
राजनीतिसिद्धान्त के अजुसारात क्रम में ज्येप्रपुत्र ही राजपदाभिपिक्त होता हे 588 व्रातव्य है कि 
की स्थिति स्पष्ट है, क्‍योंकि परंपराकी प्‌ृर्णकुशलता ज्येठ कुमार में होनी ही चाहिये। अन्य कुमार दे 
वंशपरंपरा मे राजनीतिसंचालन प्रंसंचालन भे अनिपुण या राज्य के प्रति निराकांक्ष दूँ, वे दृटा दि 
आत्मगुणसंपन्न होते हुए भी राज्जपद में स्थापित किये जाते हूँ । 


जाते हैं. अथवा नवीन सांडलिक राः कुलराज्य तथा उममें दोष 


न्तर्गेत एक से अधिक राज्य-उत्तराधिकारी राज्यमचालन में निपुण हैँ. 

दूसरा कुलराज्य है' । उसके अतिनिधि के सर्प में उन उन व्यक्तियों को शासन मे क्रेसश: अधिकृत 

तो कुछ की भर्यादा के अजुसार प्रा होता हुआ भी तवतक टिका रहता है! जवतक कुछमे सघमेद या 

किया जाता है' । यह राज्य बलवान 5पट €ं। अर्थात्‌ जहाँ संबवृत्त की अभेद्यता नहीं हे बहा का कुठराज्य 

व्यसन की स्थिति नहीं आती पर बहतः शाख्रकारों ने चिरस्थायी एकराज्य मे ही सर्वांगोपसहारात्मकप्रकृति 
शीघ्रातिशीघ्र क्षीण होता है'। (१) अ 


का निर्देश किया है'। 'कराज्य की परंपरामें कुलराज्य 


ए पूर्वपरंपराप्राप्त है' । इसमें विचारणीय यह हैः कि तत्काल में पिता 

सूर्यवंश में एकराज्य की स्थिति कि निर्मल हैं. तब एक व्यक्ति को ही राज्याधिकार देने के अपेक्षया 

श्री के दोनों बंद राम एवं भरत जवां व्यवस्था करना कया ठीक न होगा १राजनीतिक दृष्टि से इधर ध्यान न 
: कुलछराज्य या द्वे राज्य (दो राजा) की 


देना अनोचित्य है'। अनीचित्य का विवेचन 


पन्त सार्थक है'। जन्म से लेकर अव॑तक के सपूर्णे सस्कार या मगछ कार्य 
यहाँ अनुचित एकू? का प्रयोग अल्डँ जो कि उचित ही था। श्रीराम का राज्याभिपेकसंस्कार अभी जो 
चारो भाइयों की उपस्थिति से हुए गे रहा है वह प्रभु को हपग्रद नहीं हो रहा है, क्योंकि शास्त्र की दृष्टि से 
भाइयों की उपस्थिति के अभाव में हैँ जो राजा, गुरु, और देव से समथित होते हुए उनके लिये सुखद 
उसी कार्य में ओचित्य सिद्ध होता हान करता हो। रामराज्यासिषेक के बारे मे राजा ही एकमात्र शीघत्नता 
द्ोता हुआ अपने को अभीष्ट फल प्रदा अभिषेक का अनुमोदन नही किया है' किंवहुना उनके बचनों से उनकी 
कर रहे हैं। गुरु वशिप्ठजी ने स्पष्टतय वे इस मंगल कार्य को विष्न समश्न रहे हैँ। देवताओं का अलुमोदन 
उदासीनता ही परिछक्षित हुई है*।क्ाये में जगद्धितार्थ विघ्नों का उपस्थापन करना चाहेंगे? । उन्होंने 
तो कथमपि नहीं है। वे इस अंगलफ़रते हुए ऐसा ही कहा है'* । 
सरस्वती माता से बारवार विनन्ती 
हआाप+भ++++-ततततत.. पा दुर्जय: । 
१. कुलस्थ वा भवेद्ाज्यं कुलसडघ क्षितिम्‌ ॥ भ, १ | श्र | १७ अ | 
अराजब्यसनाबाघ शरचवद वर्सा 


४२ 


'दोहि' जुवराजु । अयो० का० दो० ४ 
२. सुदिन सुमंगलु तबहि जब राम किल सुरकाजु ॥ 


ई. रामु जाहि वन राजु तजि होह सै 


विघन मनावहि देव कुचाली । 'तु करिझ्न सोइ जाजु । 
४. विपति इमारि विलोकि बढ़ि मा 


अ्योध्याफाण्दम्‌ ४३ 


राज्य फी सत्पाप्नश्नतिप्ि में अनोचित्य 

यहाँ यद््‌ भो पिघारणीय ऐ फि राजा वृशरथ छाया दोने याठा राज्यासिपेक अरपक्षक्ति को पैदा फरने 
पाठा है। धदपेक्षया रष्ट फछ प्रघठ छ। उसको देखते हुए भव फी उत्पत्ति से राम्य के विनाशफी संभायना 
अधिफ है। अव* उचित यह द्वोता फि तत्फाछ में अभिषेक फा फारयें संपन्न न हो। फिन्तु ऐसा हो छि 
प्रस्तुव साम्राज्य फी यद्‌ सत्पाश्रप्रतिपत्ति झुछराज्य फे अनुसार दोनों माइया में समान रूप में फी जाया। 
उसफ अभाय म॑ राजफसुफराग्यामिपेफ में अनौचित्य दे। प्रभु सोच रहे हू कि छचित दो यहदी होता फिः 
राजा फे पग्मात्‌ इस राज्यधन फे 0९४ दोर्ना दो जाते, पश्चात्‌ हम दोनों माई मिछ फर जनता फी 
जनुफूछवा में रायय फी ल्ययस्था फर लेते-जेसा कि श्रीराम ने भरत से चित्रकूट में कहा हैन- 

“याँटी पिपति सवद्दि मोहि भाई” ॥ 
पिग की आशा के बिना बन में खाना असंमप 

प्रश्न--भीराम राज्याभिषेफ फे सपन्‍्ध में “अमुचित एपयू फह रहे हूँ तब प्रइन उठता है' फि पिलामी 
फी आज्ञा फे पिना दी श्रीराम यन में फ्यां नहीं घछे गये १ 

उच्तर--उसफा समाधान दोहा ५३-ची ५ घरसु घुरीन घरमु गछि जानी! में स्फुट होगा। 

राज्यामिपर के राजकरदृत्व म॑ देपानु हुरय के अमाव से अनौचित्य 
प्रश्तु अमी राम्याभिषेफ मं पघुफी झनुपस्थिति मे देय फी अनुफूलता नहीं समझ रहे हैं। अव' यह 


अभाष अमंगल या दुघटना फा सूचक हो सफता है जैसा आगे घौ ५ दो १४१ में 'कुसमय विधारी/ 
से सपप्ट होगा इस माय से प्रभुने तात्फालिफ राज्यासिपेफ फो अम॑गछ फे हेसु से अनुचित फद्टा । 


देबप्रातिकूरय फ रहते अभिपकमें दोप 

मरत फ्रे उपस्थित न रहुत श्रीराम फा राज्यमिपेंफ स्पीझार फरना उनका राज्यव्येभ कह जा रुझता है 
जो भाईया फी पारस्परिक प्रीति म॑पिपटन फा भाष पैदा फरफे मरत फे अनुयायियों में मतभेद फा 
फारण वनफर राज्य फा पिनाशफ दो सफता ऐ। इस शंझाफो ध्यान म॑ रखकर भीरास मन में राम्या- 
मिपेक फो अनुचित समझत हू। इसमें अनुभानप्रणाली टिप्पणी में उद्धूषत है! । 

राजनिष्ठकर्त॑ता में अनौचित्य 

जैसा पूप मे फह्दा गया हे, अभी तफ सथ भाश्यों फे संस्फार एफ साथ हुए दें। इसमें राजाफी 
फछदा फा ओऔदचिष्य धा। रायाभिपेफ तो एफ भाइफा हो शोना है, इसलिए 'येडेदि अमिपेकू/ भ्रधोत्‌ स्पेष्ठ 
पुष्र भीरामफा राश्याधिपे८ उचित दी ऐ। (जो श्रीराम फे अयोध्या ढौटने पर होगा द्वी) पर राजा के इस 
राम्याभिपफर्दस्य म॑पंघु पिहाइ! दोना अनौषित्य फा फारण हे ।* 

छाठच्य हे फि गुरुजी फी उक्ति ( भूप सजेड अभिषेक समाजू। घाह्ृद देन तुम्द॒द्दि जुबराजू? ) फे 
पिखारमें श्रीराम फे रक्त सनोभाष फो फपि ने भ्रस्तुत स्या दे । 


१ धई राम' ले राम्पस्प स्पामी भविसुमाई/ छाकसमम्रेवाया, मरतासाक्निष्पे राश्याप॑छोमप्रयु्प्रेरणादस्वे छति 
स्वामिध्वमपोडका प्मगुमसंपत्तिपर्याषप्पमावसमानाधिकर पड़ी टित्पघान्‌ राम! इपि कश्पदाया विपयत्वाव'। 

२, अनौबित्य के संयम्द मे पाप पिघयत दो» ४२ भौो० ३र्म 'केदि पिपु सागी? कश्कर प्रभुनेथ्यक्त 
किपा है । 


४४ भावा4-शास्तीयव्याख्यासमेतम्‌ 
९ 
बढ़े हि! शब्द की साथंता ु 
“बड़ेद्दि अमिषेकूः में (हि? शब्द देतुत्वार्थंक हे, जिसका अर्थ हद्वै कि पिताश्री 25 को छोड़कर 
व्येष्टल्वहेतु से मुझे अभिषिक्त करले की अभिलापा पूर्ण करने मे अपनी कर्दता को अधानता दें रा द्द 
वह अनुचित है.। क्योंकि भविष्यत्‌ मे भरतके अनुयायिआओम यद्द भावना ही सकती ह्वेफरि 2 
प्राप्ति की पूर्णयोग्यता रहते केवल ज्येष्ठत्यके अभाव से भरत राज्याभिपेक स वंचित मा हे गये । 
जिसकी विचारप्णाली इस प्रकार होगी--यदि भरतः उ्येष्ठः स्यात्‌ तहि स एव राज्यासिपिक्तो भवन! । 
उस अवस्थामे माइयोंमे मतभेद ओर पारस्परिक ग्रीतीकी न्‍्यूनताकों अवकाश मिल सकता है। यह दोष 
पिताद्वारा अभिषिक्त होने मे है. जिसको (हि अजुचित एकू? से बताया दै। सब विधि सब लायका स 
उ्येष्ठताका परिहार हो नहीं सकता, इसलिए उक्त दोपका परिहार राज्यत्यागस अश्ठु करना चाहत दू । 
कि कप ् अनु चित | 
पाती के अश्ष के समाधान में अनुचित एक 
ज्ञातव्य है' कि पादेती के अरन “राज तजा सो दूपन फाही” ( चो. ६ दो. ११० वा० का? ) के उत्तर 
में शिवजी पावेती को सुनाते हुए अभ्ुुके मनोभाव को (“अनुचित एक! ) कददकर राजा क्री र। ज्याभिपेक- 
क्र्तृता में अनौचित्य दोष को राज्यत्याग का कारण समझा रहे हू । इस प्रकार उक्त चौपाई की एफचाक्यता 
यहाँ स्मरणीय है. । े 
राज्यस्याग की योजना में ग्रश्ठु की रूपा 


जब उपासक जीव भगवान्‌ को अपनी स्व॒तत्र कर्ता में बॉधना चाहता हैं तव उसकी केता के 
अधीन हो प्रभु जड़वत्‌ परतन्त्र बनकर उपासक की मनोनीत क्रियाकों पूर्ण करते ६ जैसा श्री रामने गुरुजी 
के द्वारा राजाके आदेशको सुनकर उसका विरोध नदी किया। पर राजाकी कर्ताम राज्याभिपेक हो 
जाता तो भेद्नीतिमें फँसकर अनैचित्य के परिणाम में राज्य का विनाश हो जाता । इस कुपरिणाम को 
प्रभुने अनुचित एक” से ध्यनित किया। अतः राजाकी कठृताम होनेवाले दोष से राजा को बचाने के 
लिए राज्याभिषेक में सरस्वती द्वारा विध्त उपास्थापित होंगे यद्द राजा के ऊपर ग्रज्जुकी कृपा है'। जहाँ 
सख्तन्त्रताभिभानी जीवके अनुचित क्रियामे प्रभु जड़वत्‌ सहायक होते हू वहाँ प्रभु की कृपा नहीं होती 
उस दश्ामें जीवका नाश हो जाता है'। जैसा द्रोपदीचीरहरणमसे दुर्योधनकी कर्द्वाका अनोचित्य बताते 
हुए भी सीष्सने प्रभुके विधानकी कायकारिता को समझते हुए हस्तक्षेप नही किया। परिणाम मे दुर्योधन 
का विनाश हो गया। 
बिक घ2 ८ ९ 
अनोचित्य के प्रकाशन में प्रीति का आदर्श 


अनौचित्य के उपयुक्त चिन्तन में अभ्रु के भरवविपयक ग्रेम में कौटिल्य का अभाव प्रकट हो रहा है'। 


प्रेस के न रहते पर स्वार्थपरायणता से अभिभूत व्यक्ति को वंचना करने की प्रवृत्ति जागृत होती है'। 
इस दोष से अपने को बचाते हुए प्रभुने महान आदरो प्रस्तुत किया है । 


अनीचित्य से उदापीनता 


बन्धु विहाई” में उक्त अनौचित्य को कहकर असु उदासीन दो गये । उसी में उन्होंने 
स्मरण किया | जो वबन्धु विहाई?! से स्पष्ट है । ञ न्होंने प्रिय भरव का 


सीता और लक्ष्मण को वनवास में प्रवृत्ति 


अनुचित एक” समझाकर गरभु ने सेवक भरत का स्मरण कर स्वामिसेवक भाव की पविन्नता दिखायी 
स्वामी का फाय-- 


अयोध्यफाण्दम्‌ छ्ष 


“पोय लखन जेदि विधि सुख लद॒दी । सोए रघुनाथ फरदि सोइ कहदी!!.. 
में प्रसट है । और सेपफ फा फाये-- 
“लपि सिय रुखनु पिकल दो£ जाही | जिमि पुरुपदि अनुसर परिष्ठाही”-_ 


से दिखाया पे । सीवा और ढक्ष्मण ने स्थामी फी उदासीनवा फो परस्ध झर तदनुकूछ आघरण किया और 
श्रीराम फे पनगमन में सहयोग दिया। 
राजा के पद्॑पात फा समाधान 

प्रश्न--राज़ा दृशरध ने जानबूझकर भरत फी अलुपस््यिदि छा छाम्र उठाते हुए रामराज्यासिपेफ फा 
आयोजन फरना घाद्या उसे 'अनुधित एयू” से प्रभुफो निरस्त फरना पढ़ा, एसा फहना ठीऊ पे कया ९ 

पत्तर-यद ठीफ नद्दी इसछिए फि यिद्धत्संगधि में रहने पाले सत्यसथ राजा फे हृदय में मरत फी 
अत॒पत्यिति से छाभ पी फत्पना द्वो द्वी नद्दी सफ्ती! अत यह फहना होगा छ्ि रामराज्यासिपेर की 
फवूदा में भरव पी अनुपस्थिति का संयोग ईयात्‌ दो गया है'। अपनी आसभप्रर॒त्युकों वृस्ते हुए राजा को 
रामराम्याभिषेफोरसव म॑ मरत फी अन॒पस्थिति फा संयोग अभिष्छापयफ सदना पढ़ा जो गुरुजी फे समावेश 
५बेगि पिर्लचु न फरिअ” से भी स्पष्ट ऐ। 


प्रयोगविधि म जननुम्ठानलक्षण-अग्रामाण्य 


रामराष्याभिषेफ फे आयोजन म ग़ज्ा फे द्वारा फह्दी जिस पिधिफा अ्रनुप्ान प्रमुफो करना है यह 
प्रयोगयिधि हैै। यत उसमे दृष्धा-फाउ-कर्ता भौर क्रमफा यिचार निरूपित है'। परन्तु इस अयोगयिधिफो 
प्रमु अनुछ्ठेय नही समझते फ्योंफि नीतिद्ष्टि से सम पूर्वाक्त अनौचित्य दे। अत प्रभुने तत्फाठ फे लिए 
इस पिधिफो अलुप्तानत प्रमाणरूपर्म स्थीफार नहीं फिया। इसका सफेत गुरु घसिप्ठ फे पथन (“जा पिणि 
छुसछ निषाद फाजू?) म फट्टे 'वी पिधि! से पिन्त्य है। 
मनोरथमिद्धि में बलावल 


एफ आर राजा दृशरथ फा छाष्टसाप्रयुक्ष 'बरेहि अभिषेक! का मनोरथ ऐे। दूसरी ओर चौ २३ 
दो <५ में फट्ठा फैफ्रेया फा रामपनपघासात्मफ सनोरथ? प्रफट होने थाठा दे'। धर्मफा घल दोनों में वराबर 
होने पर भी नीदि फे घछाचछ फा पिचार फरफे पमुने राजा फे सनोरथ फो “अन्नुधित पयूए फदफर स्यून 
टरायाहे। अत' राजा फे पचन फा प्रामाण्य अभी दुयछ दे । 

विमलद्य फा भाव 

पिम्य॑श पड़ने फा भाव यद दे कि सूययंश मे फिसी प्रफार फा सछ ( पाप या घोप ) नहीं है ।* 
यही एम मात्र मछ इस पं म॑ असफ दोने जा रहा है'। यदुत उत्तम दुआ फि अमी महोत्सव फा संकर्प 
दुआ नहीं है!। फेपठ उप्रफा विचारसाप्र प्रभु फे सामने मुनाया गया है'। ढोफ उसो समय यघु फे कअमाप 
को ध्यान म॑ छाकर धीराम फे हृदय म॑ अनौचित्य फा प्रकाश हुआ। यही सूर्यर्धश् फी निमेझ्वा का फऊ है। 

“पिमछ पंश्ठ” पा भाय यह भी ऐ फि यंद्ाम पिमल्ता है तो सघ भाईयोमें मतभेद या झुटिर्सादी 
संभायना कभी हो दी नहीं सफती । अत सभी भाई मिलकर बड़ेदी को राज्यपद पर आसीन करेंगे दी । 
इस प्रफार घड़े दि अभिपेषृ” मे सघ भाइयों की फछूता उपयुक्त एयं उचित द्वोगी फ्योंकि उपयुक्त दोषों की 
संमापना उत्र्म नहीं है। 


$ भछ का स्वरूप कौपएया कफ सामन सुनाय भरत के यर्र्ता स॑ ध्पए है। (चघी« ५ वो» १३० चौ* < 
दोहा १६८ ठक ) 


४६ भावाथ-शास्लीयव्याख्यासमेतम्‌ 
देववाओं को बल 


प्रभु के अनौचित्यमूलक विचार से ह्वी देवों को उनके अनुकूल ( राज्योत्सव में विध्न पहुंचाकर 
वनगमन में प्रभुको उद्यक्त करना ) कारये करने मे माता सरस्वती से सहायता मिर्ठी । 


घिमलवंश होते राजा के मति में परिवर्तेन का कारण 


देवयोग से प्रेरित यह राजोत्साद दृष्टाथे मे राजा के भाविमरण का सूचक दे! क्योंकि उनके जीवन में 
यही एक मात्र नीतिविरुद्ध काये सकल्पित हुआ है' । उसके उपब्ृहण मे किरीट के देढ़ेपन का पृर्वेनिरूपित 
दर्चन और निरूपयिष्यमाण केकेयीस्वप्न हैं! । 


गुरु के सामने श्रीराम का अत्याझ्यान न करना 


प्रइन--राज्या भिषेक अनौचित्यपूर्ण है' तो गुरु के समक्ष श्रीराम ने उसको अनुचित क्यों नहीं ऊद्दा ? 
उत्तर--देव स्वयं ही राज्योत्सव मे विध्न पहचाने के लिये उद्यत हू तो शत्याख्यान करके पिता श्री को 
दुःखी बनाना प्रभु ने डचित नहीं समझा। अत्याख्यान न करने का प्रयोजन यह भी दे! क्रि राज़ा के 
हृदय में होने वाले द्रवीभाव मे वाधा न हो" 


निर्मछता में प्रजारंजन 


संगति--रामच रितमानस नीति एवं भक्तिग्रधान अंथ है' । निरमेता के अन्तर्गत प्राचीन राजनैतिक 
अर्थैसवन्धिनी निर्मेछता भी भक्ति के साथ विचारणीय है' । अत'* स्थान स्थान पर युक्तिसन्मत नीति का 
भी आश्रय लिया गया है'। रामचरित्र से उसका प्रकाशन कर जनपद के हृदय में अपने विश्वास की 
स्थिति बनानी ढै--उसके विपरीतभाव में काये करना कुटिलता सिद्ध होगी। कुटिह्ता के अभाव में 
दी वास्तविक ग्रेम अ्रकट होता हैं! जो अ्जारजन का मूल है'। ग्रमु ने इस चरित्न से यही शिक्षा दी हैः 
कि उपासकों को किसी भी धर्माथंकामसवधिकार्य में अनौचित्य को दूर करते हुए ओचित्य पर सदा 


ध्यान रखना चाहिये* । यही सोचकर जनमानस मे से सभाव्य कौटिल्य को निरस्त करने की प्रार्थना 
शिवजी कर रहे हैं। 


चौ०-अश्ु सग्रेम पछितानि उुद्दाई। दरठ भगवमन के छुटिलाई ॥ ८ ॥ 
भावाथे--प्रश्ु रमका यह प्रीतिभरा पछतावा सुहावना है | वह भक्तो के मन की कुटिलता को दूर करे । 


कुटिलता का स्व॒मण्डल में सब था हरण 


शा० व्या०--श्रीराम का उक्त आदशे आगमशुद्ध होने पर भी तादा 


गुद्ध ग/त्विक ( तात्कालछिक ) अभिषेक 
भरतके अजुयायियों के हृदय मे चौ ७ दो ८ के निर्देशालुसार शकोत्पादक होने से वह यत्यक्षानुमानतः 


हितावह्‌ नद्दी है, यही अनौचित्य अभुने अनुचित एक? मे ध्वनित किया है'। जो अनुचित कार्य होता है' 
बही 3 कहा गया है'। भक्तों को अत्यक्षादिप्रमाणत्रय का समन्वय अनुष्ठेय कारये मे न होने पर उसको 
कुटिलता का उत्पादक सभझना होगा। उसी को श्री शिवजी ने “पछिवानि सुहाई” कह कर दश्ौया है.। 


तकेशुद्ध रीति से समझाये हुए ग्रेम मे निमग्न हो उपासक कुटिल्ता को ्यागेंगे य 
अध्ययन सफल है' ) गे तो इस चरित्र का 


$. छू० २५ मे द्रष्ठव्य है । 
२. शेष १५६ दोड्ा तथा १६५ दो० ७ चोपाइ में हृष््य है । 


अयोध्याकाण्डम्‌ ७ 


शिषजो की कुटिलताइरण फे लिए प्रार्थना 


खहरहु मगतसन कुटिछाइ! फहफर प्िषजी भी राम से प्रायेना कर रहे है' कि अनौचिस्य प्रयुक्त फुटिउता 
का साध भक्तों फे मन में फभी आये तो प्रसु उसफो दूर फरके भक्तों फी रक्ता फर्रे। उदाहरणार्थ राजा 
पृशरथ फे सन फी, फेफेयो, गुद्द, इन्द्र लस्श्मण फी कुटिझ्ता फा निरास झागे फद्ठा जायगा जिसमे भुस्य- 
ठया छत्त्मण फे मन फी फुटिक्ता यिषक्षित है! जिसका सफेद चौ० ४ दो ९६ में है'। उसछा पूर्ण उज्चाटन 
चैश्रफूट में मरतागमन फे अबसर पर हुआ । 

इस प्रार्यना में शियजी का द्वित मी पियक्षित ऐै। उदाहरणार्थ सेषफत्थ फे चछ पर छक्ष्मण मरत के 
सहद्ायतार्थ आने पर शिवज्ती फो भी परास्त फरने फी शपथ छेंता है'। 

संगति--गुरुने दृष्तर्धवनय को दो० ८४ चौ० ८ में स्पामी? फदुफर उनके अमिमुख रददने फे छिये 
फटा है। छक्ष्मणजी भी रान्योत्सव फो जानफर प्रथमत" स्थामी फे आभिमुर्यकों समझने दतु प्रमु के 
यहाँ घुभागमन फर रहे है'। 

अथवा 6 अर राज्याभिपेफ फे प्रदि औदासीन्य व्यक्त फिया पैसे ही पनघास की तैयारी फे हेतु 
सहज और छक्ष्मणञी प्रमु फे रुखफो समझने फे लिए शुभागमन कर रहें हैं. । 

दोद्य--तेहि जधसर आए लखन मगन प्रेम आनन्द | 
सनमाने प्रियवचन क्रद्दि रघुकुलकैरपचन्द ॥ १० ॥ 


भाया्थ--प्रेम में सग्न भामस्दिषठ छक्ष्मण भ्रमु क॑ पास उसी अवसर पर आये जय थी राम को उक्त विस्मय हो रहा 
था | स्घुर्वश-ऊुसुदिनी फे अस्ट्षमारूप भ्री रामने भाडका सम्मान किया" ओर मरप संपपी प्रियवचन कहा । 


रामराज्य क प्रति सदज-औरस मिम्रकी प्रतिक्रिया 


श्ञा ० छया --तेहि अपसर! से श्री राम फे उक्त संफल्प फा यरिचार फरने फा समय प्रफट छो रहा है'। 
छसी अपमर पर छोफप्रिय स्थामी फे उत्फपे फो सोचफर छक्ष्मणज्री श्रीतिमम्न हो सर्यसम्मतिसमन्वित 
राज्याधिफारानुमतिप्रदाननिमित्तफ आनन्द मे विमोर हो रहे हैँ. 

प्रदन--छक्ष्मणजी फा एक्काएक श्री रामजी फे पास आना और उन दोनों फे वीच फोइ संयाद न होना 
कया पिस्मयफारफ नहीं है ? अथपा एसा निरूपण क्‍या सप्रयोजन है ? 

उत्तर--दुशारथ फे राग्याभिषेफ फी फदेता के प्रति भीरामजी की अप्रसन्नवा फा विवेचन उपर दो चुका 
है। प्रेमनिमम छक्ष्मणजी फे आगसन से विमव्य॑ध्योक्ति फी सायफदा प्रफठ हो रह्दी है'। अर्थात्‌ लक्ष्मणजी 
फी भैसनिमम्ता (१) यह सूचिद फर रही ऐ फि भी रामजी फे द्वार्थों में राग्य फा सॉपना देखकर अस्य वचघु- 
जन समी प्रीतिमान हो रहे ईं.। श्रीराम फो यद्यपि राज्यामिपेरुसंस्कार से संस्कृत द्दोना अन्‍य यचुओं फे 
अनुपत्यिति में पसन्द नहीं है: तथापि भीरामफे राम्यामिपेकर्मे छक्ष्ममजी क्षपना शार्दिक स्नेहमात्र प्रफट 
कर रहे एँ। अथात्‌ यद्द उत्सव समस्त भाइयां फो सान्‍्य प इष्ट समझाना ही उतक्तनिरूपण का प्रयोजन हे । 

सेवक फो गाहंस्प्यमुख स्थागने की ग्रेरणा 

यहा स्मरणीय है फि छक्ष्मण ने प्रमु फा उदासीन होना लिखता फ्यों फि “अनुचित एकू” सोघने के 
अयसर पर ही छक्ष्मणजी आ पहुंचे हैं। भोरामजी भी अपने सनोमाव फो छक्ष्मण से नहीं छिपाते 
जैसा फि चाकफाण्ड में फुछपारी फे प्रसंग में स्पष्ट है। राज्य फे भति प्रमु फी छदासीनता फ्रे देखफर 
उल्त्मणजी समझ गये फि पिता भी फे द्वारा फिया जाने षास्म्र राम्याभिपेक प्रमु फो इछ नहीं है। अदः 


शोर--१ अौ* « दोहा ७ में दी भरठकी प्रिषता स्पष्ठ दे | 


घ्८ भावार्, शास्तीयव्याख्यासमेत॒मत 


प्रभु के राज्यत्याग में लक्ष्मणजी भी गृहमेधिकर्म को त्याग कर बनगगन के लिए तयार हो गये, यही 
सेवक का चरित्र है। सेवक के अनुरूप मरतका चरित्र भी आगे निरूपित किया जायगा। ठद्मण के हट्त 
को उपयुक्तकर्मौनुरूप देखकर प्रभु ने उनकी सम्मानित किया ओर भरत स्मरण भें धीतिबसन कही ।! 
संगति--बाह्म मित्रके अन्तर्गत प्रजाजन का उत्साह समझा रद्द दे | 
चौ०--वाजहि वाजन विविध विधाना | प्रस्थमोद्‌ नहि जाह बेखारा ॥?॥ 
भावाथै--भनेक प्रकार के घाजे बजने छगे | नगर से दोने वाढी खुशियाली का वर्णन नहीं दवा सकता । 
प्रभु को एकाग्रता 
झ्ञा० व्या०--विद्या तथा सर्वान्तगत आत्मचिन्तन मे तत्पर शोराग एकाग्रता भे सयमस कर रद $४। 
पितुकुकराज्याभिपेक मे रुचि न होने से पौर के उत्छास में उनका ध्यान नही 2, यह दसये दोडे से स्पष्ट 
है'। तथापि पौरजन अपने वाद्य खरों से प्रभु को आकृष्टठ करना चाहते 6.। पुरवासी स्वय्र प्ररित होकर 
नगर को सजाने मे व्यस्त हैं। उनकी इस गतिविधि का वर्णन करना कवि की बुद्धि के बादर दे । 
बाद्यवादन का उपयोग 


देवों के द्वारा विष्नवाधा पहुंचाने मे उनकी हछूचछ वाद्यवादन सुनकर हुई छे 

संगति--चौपाई ७ दोहे १० मे उद्धृत अनुमानग्रणाढी को स्वरूपामिद्ध ( 
करने फी अभिलाषा से पुरवासी भरत के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे &ै। 

चो०-भरत आगमनु सकल मनावहि । आपहु वेगि नयनफछ पायहि ॥२॥ 
भावाथें--सव छोग मना रहे है कि भरत आ जाय । हम ओर वे उस्सवको देफकर नेत्रो को सफछ करें । 
श्र ए #: ० 
भरव के आगमन की ग्राथना एवं जंका 
शा० व्या०--राज्योत्सब का आनन्द पाने मे अभिदापुक प्रत्येक पुरवासी भरत के आगमन की चाह कर 
रहा हे । आत्मगुण मे सपन्न सेवक होने के कारण भरत से ग्रत्येफ व्यक्ति परिचित हैः । अतएव जनालु- 
रागसपन्न भरत की अनुपस्थिति मे पौर वग शकित है. कि श्रीराम वन्धुविहाइ' की दशा भे राज्याभिपेक से 
विरत हागे तो नयन राज्यामिपेकोत्सव के दर्शन से वंचित हो सकते हू । 
भरत म॑ इच्छाउमाव तथा विमठ्बंशता की बचना 
कप चर ८ 

उपयुक्त उक्ति से यह स्पष्ट है कि राज्य के प्रति भरत का इच्छुक न होना प्रजाऊ्रो ज्ञात था। इसी 
अभिम्नाय से दो ४८ के अन्तर्गत चौपाइया तथा दो ४९ की उक्तियाँ समन्वित समझनी होंगी। तथा 
श्री राम का विस्मय भाव तथा विसछ बश पुरवासियों की उक्ति से प्रतिध्वनित हो रहा दे'। 

सगति--ऐसा छगता है' कि भरतके न रहने से ही ग्रर लक 80% 5 तल 

; है। अत' शक पतला ही प्रत्येक व्यक्ति के हृदय मे राज्याभिषेक के प्रति 
आशंका दो रही छे। अत' प्रजा विधि अथोत्‌ विधाता (भाग्य) से प्रार्थना कर रही हैः । 


चो०---हाट वाठ घर गली अथाई। कहहिं प्रसपर छोग लोगाई ॥ ३ ॥ 
#.... फीलि लगन भलि केतिक बारा । पूजिहि विधि अभिलाषु हमारा ॥| ७ ॥ 
ड कनक्सिघासन सीयसम्रेता | वैठहि राम होइ चित चेता॥ ५॥ 


भावाथे--बाजारों घरों और गलियों से 
भावार्थे--ब र गलि नर नारी आपस में बाते कर रहे है कि अच्छा, वताओ कि कल कब राज्या- 
ह। 


भिषेक का मुहूर्त है ? विधाता हम छोगो को इद ५ 
हि ग्ेगो च्छा को प्ण क्र । € ८5५ 
पर बेंढ वो इम छोगो के हृदय की इच्छा पूर्ण होगी । सीता के साथ श्रीराम स्वर्णलिंदासन 


| 
हेतुफा पश्षम अभाव ) 


4. “प्रियवचन? का स्पष्टीकरण चौ ५ दो. २३५ में 'सादर” सनसाने? के प्रसंग में कद्दे गये प्रभु के बचन हैं । 


हि अयोध्याकाप्डम्‌ ४९ 


विधि से प्रार्थना 

श्ञा० ज्या>-राजा ने ५२३४३४१२२ ३ द्निकी घोषणा तो फी पर छग्न भी श्न्ञात है। अत प्रय्या छग्न 
में छ्र्य॑संपत्ति के छिये पिधि से फरपी है'। 

राजा, उसका अन्ठ पुर एय॑ पौरषर्ग समीने परुयफ प्रूथक्‌ देवताओं फो याद्य फे साथ ठपह्दार देना प्रारंभ 
किया है'। राम्याभिपेफ समकी अमिछापा फा यिपय ऐै'। 

पिघ्नयोजना का प्रार॑म 

गिनती भी भषिष्यप्तफायें फे गौरव फो देखफर देववाओंने षिघ्म फी योजना फा उपक्रम 

गुरू फिया। 
पौ०--सकल कहाददि कप दोइदि फाठी । विघन मनावह्दि देव कुचाली ॥ ६ ॥ 
भायायये--इुघर ठो ( अपोष्पा में ) छोग कह रदे ई कप कफ होगा ? उधर (भाकाए में) देवतागण बिष्स मलाने 
को फुचाद्ध कर रहें हैं । 
कुचारी फा निष्कर्ष 
शा० स्या<--फपिने देवताओं फे भाविफासेक्रम फ्रो कुचाडी फहफर समझाया हैः फि प्रस्यक्षाइमान 
झम्द से प्रमिठ छोफसम्मदि फ्रो भ्यान से ठुकरा फर दृथदाओंने पिष्नारंस किया है'। अव' उनका यह 
चरित्र फुषालि है। कुचाल में मतिफेरि एवं फामप्रताप आगे ज्ञातन्य होंगे 
देवों को क्ृचाली में दोपांकुश्वत्व 

फ्रीराम कला राज्याभिषेफककाये छोफसम्मत है। आस्मसंपत्तिमान्‌ ही अ्रभिपिक्त होने जा रहा है। 
इसमें. घाघक होफर देय अपना फाये पूर्ण फरना चाहते हेँ। इस प्रकार स्वरूपत' यह कार्य कुचार होते हुए 
भी दोपाकुष्ा हे! क्योंफि यद्‌ प्रमुफी फी फीर्ति में सहायक दोगा । 

प्रभु फा अवतार परममेस्थापन फे लिए हुआ है। यह फाये राज्याभिपेक सम्पन्न होने फे वाद संभव 
नहीं यां। यव' भ्रमु राज्याभिषेफ फे बाद नरदेय या भूदेय दो जाते तो पृ० ५१ में निर्दिष्ट युक्तियों से 
उठप'प्राफिसंपन्तन रापण फा यघ नहीं दो सद््ता था । 

दृण्डफारण्य फा सद्याम्‌ भू माग 'चकवर्ती सूर्ययंश फे अधिकार से निफरूफर परराष्ट्र के अधीन हो 
गया था। श्रुगुमदर्पि फे छाप से अपधिन्र होने फे फारण राक्षसों ने उस पर अपना अधिफार जमा 
विया था। राग्याभिपेक फे झनन्‍्तर प्स देश को अपने पघीन कर छेना शक्तिसंपन्तरायण के रहते 
असभय था। राषण जैसे परध्प्स राक्षस को पिना तपस्विता फे पराजित फरना भी संभव नहीं था। 

राक्षसों के प्रास से बड़े पड़े मद॒पि स॑प्र॒स्त थे उस समय राज्यारोहण फे अनन्दर भीराम फे प्वारा धर्म 
स्थापना नहीं हो सफती थी। इस प्रकार देयदाओं का भस्तुव फाये में चाघा पदुचाना स्वहूपत' कुचाछ 
होते हुए भी दोपाकुश दे. । 

संगति--वेवताओं ने फुचाडी फ़द फी ? शिवजी अगढी चोपाइ में फड़ रहे हूं। 

चौ०--पिन्ह। सोहदाइ न अबघ वघावा | चोरदि घंदिनि राति न भावा ॥ ७॥ 

भापषार्थ--उसको अ्रयोष्या का दाजा गाजा अच्छा रहीं छग रहा दे । जैसे चोरा को 'रादनी रात लईय। सुद्दादी । 


“चोरहि! तथा चंदिनों का भाव 
श्ञा० स्या८--चोरहिः कइने फा भाव इतना ही है! फि देयठा अयोध्या मे रहते हुए मी राखा दृष्यरथ से 
छिपा कर रामरास्योस्सप को क्लीननेफा शायोजन फर रहे दें! 


५० भावार-शास्तीयव्याख्यासमेतम्‌ 


“्यूंदिनि राति न भावा? का भावाथ यह है' कि राजा दशरथ से अपना मनोरथ कहने मे उनकी 
रुचि नहीं है'। | 

बह हम कुचाली के दोपांकुशत्य पर मीमांसा ; 

जैसा पहले कहा गया हैः कि धर्म की प्रतिष्ठा के अभाव में देवताओं को (8282 88 20 
का समर्पण रुचिकर नहीं है।। अ्रभ्त॒ की दृष्टि मे शाज्या भिषपेफफी कडता के अनीचित्य क्री व्या 38 
गुरु की उदासीनता बतछा कर देवताओं की अग्रसन्नता का उल्लेस कर दिया गया ६ई। उसस जानत 

रै। ;ल्‍ 

थी गन इस यक्ति के अनुसार रावणवधके अनुतप फारय (श्राराम हल 
गमन ) करने का अवसर उपस्थित हैं| क्‍योंकि दशरथ के ज्येप्ठ पुत्र श्री रामजी साथ हुए 2 ६ 
के प्रति अर्थी कद्दे जा सकते हैँ । स्वयं शक्तिमान्‌ ओर विद्वान भी हे । ण्से अवसर पर भा जगत म तक 
फैलाने वाले धर्मह्वेष्ट। प्रजाशोषक रावण का वध न किया गया और वर्भ की प्रतिष्ठा न हुईं तो सूयबध 
के चक्रवर्तित्वका एक महान्‌ दण्डक देश सदा के लिए विदेशियों फे इृस्तगत दी रद्देगा। तपस्ती मुनियों 
का कष्ट भी सदा के लिये वना रहेगा। देव भी स्वस्थ नहीं रह पाएगे। देवद्रोह की स्थिए्ता होगा । 
अतः देवताओं की यह कुचाल दोपांकुश है'। ही मिल हि 

प्रभु के सेवक होने से देव उनके मनोनुकूछ कार्य कर रहे है । इसलिए वे भविष्यत्‌ मे दोगी नहीं 
ठहराये जा सकते । १४ बे के अनन्तर राज्याभिपषेक में वे भी सद्दायऊ द्वोंगे ही । हा 

अथवा दृशरथकदकराज्याभिपेक के छिये वर्तेमान समय मे विव्नवाधा को परुँचाने मे देवों का 
कार्य समयानुकूलछ होने से अभिषेकविरोधी नहीं समझना चाहिये। जैसे शरीरात्मवादी काम ढोभ आदि के 
के दास वनकर शरीर का पालन करते हैं. पर काम आदि का वास्तविक सुख लेने स वंचित होते ह, 
वलिफ रोगों का शिकार होकर शरीर के शत्रु ही कहे जाते है। अध्यात्मवादी णरीर के पति कठोर 
व्यवहार रखते हुए भी उसके पालक होने से मित्र कहे जाते हूँ। वह्दी स्थिति क्रमश पुरबासी ओर 
देवताओं की है । देवों का यह विध्नकाये कुचाल होते हुए भी दोष नहीं, यद्दी दोपाकुश की मीमांसा है' | 

देव एवं मनुष्य-संघटन के न रहने का फल 

देवों की कुचाल से ज्ञातव्य है! कि मानवीशक्ति देवसघटन से प्रथक्‌ होती है' तो दुर्वेल ठहरती है । 
उसका प्रभाव राज्यसंचालन पर पड़ता है'। उसमें उपपत्ति यद है'। 

राज्य के संचालन में तीन शक्तियां अप्रसर होती द। देवशक्ति मानवर्शाक्त और राक्षसशक्ति 
पहली और दूसरी शक्तियां जब आपस मे संघटित होती है. तब राक्षसशक्ति दुर्वल होती है'। देवों के 
पास वरशक्ति है, और मानव के पास बुद्धिशक्ति है'। इन दोनों के सघटनार्थ वेढविधानों मे 
ऐसी व्यवस्था है! कि ये दोनो ( देव और मानव ) परस्पराकांक्षी होकर संघटित बने रहे। मोह के आव- 
रण में स्वतन्त्रता के नाम पर वेदमर्यादा के विल॒प्त होने की अवस्था जब आती है'। तव देव और 
सानव की एकता विस्खलित हो जाती है'। ऐसा विघटन राजादशरथ के चरित्र भे नही है'। किंवहुना 
उनको विश्वास हैः कि अस्तुत राज्यामिपेक के अवसरपर दैवी शक्ति की अनुकूलता स्थिर है'। ऐसा राजा 
के समझने में वसिष्ठ जी फा चचन ( दो० ३) प्रमाण है" । 

चिन्तनीय यह है' कि एक तरफ संपणे राष्ट्र श्रीरामके राज्याभिषेक में एकमत से उत्साहित है, 
दूसरे तरफ महाराज अपना अंतिम समय जानकर श्रीराम को यथाशीद्र उत्तराधिकार सोंपना चाहते 

_हैं। तीसरे तरफ देवताओं के सामने की गयी धमप्रतिष्ठापनात्मक श्रतिज्ञा श्रीरामको अपने कर्तव्य की 
3. राजन्‌ राउर नाम जसु सब अभिमत दातार | फल अनुग़ामी महििपमनि मनअभिलापु तुम्दार ॥ 


अयोध्याकाण्यम्‌ ५१ 


याद दिछा रही है। दौयी तरफ मारतीय राजनांविसिद्धान्त दैयानुकूछता फी क्षपेक्षा रखता है। इनमें से 
प्रथम दो समस्‍्याएँ समाहित हूँ । ४ 

दीसरी और चौधी समस्या फा फायोन्ययन होना दे। इसढिए प्रस्तुत राम्यासिपेफ मे 3८505 
न होनेसे पुरुपाथ सिद्धि फधमपि जहीं हो सकती । इस रहस्य फो समझाने फे छिए फ्षि इृछ्ठ' के 
निरूपण फो प्रधानता दृफर पैयानुफूल्य फे ध्रमाय फो वठा रहे हैं । 


वाद्य में वैस्वर्य 


याद्य फा यज़ना देघताओं फो न मुद्दाते का कारण याद्य फा पेस्परें मी हो सकता है) अपशफुन के 

0478 राजनीविसिदधान्व फहवा है फि फायसिद्धि न ऐने फो अपस्था हो पो वूयेनिस्मन में बैपरीत्य 
7४।" 
रामराज्यामिपेक म॑ पिध्नवाघा का अयोजन 

प्रश्न--राम्याभिपेक हो जाता है! सो राजसिद्धान्द फी दृष्टि से क्या अड्चनें हो सकती हैं 

उप्तर--राम्यारोद्ण फे घाद भ्ीराम फा राज्य फे बाहर जाना संभव नहीं हो पायेगा। रघुयंश के 
राजा अत्यन्त पयिग्रवा से राज्य करते हे खिससे पयिश्नतापृर्णसीमा में राध्षसाँ का भ्रवेज्त संभव न हो, 
फ्योंफि भ्रणु चिता मे हा राश्षर्सा फा प्रयेश्ष होता है'। क्षत रासराज्य में राप्रसबाघा उपस्पित न होने से 
रापणप्रधफे छिए समुचित फारण नहीं मिलेगा। समुद्र फे पार लंफाधीश पर श्रचानफ आक्रमण करना भी राम 
जैसे नीविमान्‌ फे लिए मान्य एये झास्रसम्मत नहों होगा । फठवः रायण अयोध्या पर अपनी कुट्टष्टि नहों 
फरगा, नतो भीराम ही अपनी मुद्माष्टि ढंफा पर फरेंगे। वव राषण फ्रा यथ कैसे द्वोगा ? रही पाल 
दृण्डकारण्य फी जो अपयिद्र हो घुफा दे'। संत मुनियों ने उसको स्यागा दे। श्रोराम के नियास फरने से 
दा दण्ठफरेश फी प्रयिश्नता का पुन'स्थापन संभय है'। पर ऊफारण दृण्डफ पन में श्रीराम का निषास 
युक्तिमंगत नहीं ठद्ृरता। दृण्ठफारण्य जैसा पढ़ा देश अशुचित्ता फे फारण सदा फे छिए छंफापति का 
उपनिवेश घना-फर स्पराष््र से अछग रहे-यद घक्रपर्तित्य फे गौरव फे अनुरूप नहीं हे। अतः पिन्नों फा 
उपस्थापन फिया ज्ञाना ठीफ है । 

रावणवघ्‌ का औचिस्य " 


रायणयथ की चिन्ता इसलिए है कि वद फी मयांदा फो उछिभ कर अनीति में आसक्त राक्सगण 
रायण फे नेद्त्य में देयों फे यश्ञमाग का उपसोग करते थे। खूंदछि राषण भारतवासी नहीं था, इसढिए 
उसे फश्रिम शत्रु घताये बिना रापण फा घघ न्यायसंगत नहीं होदा। इस प्रकार सिमिसतान्तर से भीराम 
फा पनपास, पह सी दुण्डफारण्य में, आपद्यक्र था। 
दूवद्वित में स्वाथविवेक 
। अ्श्र--दियदित लागी? फट फर देवों ने अपना स्याये दर्शाया हैः तो वे वीघेदर्शो रामसेयफ कैसे सससे 
जा सफते हैँ हे 0 
उसए--यधपि हिठढी घर्चो फर दैयों ने स्तार्य फो दर्शाया हैं, तो भी सोचना यह यह स्पा 
उनफी फस्पना से प्रसूत है या फद्धां से प्रद है! तथ कइना पड़ेगा फि देयों फे उद्देदय से यश्ञोत्सष्ट हि 
के भोजन फी थ्यवस्था प्रभु या छम्त दै। राश््सों फे लिये मी उनके जीवन फी ज्ययस्था 
प्रमु ने फर रखी दें जो फ्रि उन उन जीयों की उदये अग्नि फे अनुरूप दें। पर राक्षस पनी दृ्ि को 
संयत न रखकर अपने भोजम फे साथ दर्यों फा दृषिष्ट मी अपडृत फिये हुए हैं। छत' राप्रसों का छाये 


4 व तथा तूयनिस्पस्पना फा० मी ;सछ । 


ण्र भावाय-शाल्लीयव्याख्यासमेत मू 


प्रभु की आज्ञा के विरुद्ध है। देवगण अभु की बतायी हुईं मयादा को भ्राप्त करने मे तत्पर हैं। ऐसी 
स्थिति में देवताओं के हिताथ प्रभु को वन में भेजने का उपक्रम न्‍्यायसंगत एवं उचित समझना द्वोगा। 
इस प्रकार देवों में न असूया है, न तो स्वकर्पनाग्रसूत स्वार्थ ही है'। 
रावण की तपस्या की प्रतिद्वन्द्रिनी तपस्या 

देवशक्तिसंपन्न रावण के आतंक की गतिद्वंद्विता मे कोई तपस नहीं हो सकता था। ऐसी स्थिति में 
यह समस्या थी कि फीन सा धर्म अपनाया जाय जिसके प्रभाव से रावण का वध संभव हो ? अन्यान्य 
धर्मों के विचारविम्नश के उपरान्त प्रभु ने निश्चय किया कि सत्यसन्ध पिता के आदेशवचन का सहष- 
पालनात्मकपिठ्झुश्र॒षा ही सर्वोत्तम धर्म है, उसी में सफलता की कुंजी है। इसी मे मानवता 
हा द्दोगी | हम ९: >> लि. भिपेक ॒ ः 

संगति--उपयुक्त विचार करनेके वाद धर्म एवं विद्यास्थापना के हँतु से राज्या की वर्तमान कहता 
में कुचालके कार्योन्‍्वयनाथे देवों द्वारा माता सरस्वती की प्राथैना करने का उपक्रम शिवजी सुना रहे हैं-- 
चौ.-सारद्‌ वोढि विनय सुर करही । वारहि बार पाय छँ परहीं ॥ ८ ॥ 
भावाथे--देवगण सरस्वती का चरण वार वार छूकर विनति कर रहे है । 
सरस्वती से आ्रार्थना 

शा. व्या.-राजा की रामराज्याभिपेकक्ेता मे विध्त पहुंचाना सरल नहीं सोच कर्‌ माता सरस्वती 
को विघ्नकार्य मे भ्रवृत्त कराने के द्वेतु देबतागण भगवती के चरणारविन्द की वारंबार प्रार्थनापूवेक विनति 
कर रहे हैं । 

सगति--बन्दना में श्रथमतः विपत्ति को समझाने पर देवताओं ने वछ दिया जिसको सुनकर शारदा 
दरवीभूत हो जाय । रा है 

दोहा-विपति हमार विलोकि वाड़ि मातु करिअ सोइ आजु ॥ 
राग जाहि. वन राजु त॒जि होइ सकल सुरकाजु ॥ ११॥ 
भावार्थ--दे मातः ! हम छोगों की महतो विपत्ति को देसते जाज आप ऐसा करिये कि श्रीराम राज्य को छोटकर 
वन चले जायं, जिससे देवताओं के समस्त कार्य संपन्न हो जॉँय। 


आना में कर्तव्य का स्मरण एवं मातृ्वसंवोधन 

शा० व्या०--'भातु'संवोधन का भाव दे कि जिसमप्रकार माता विपदूअस्त लड़के को देखकर उसको संकट 
से बचाने का अयत्न करती दे वैसा ही कार्य सरस्वती को करना है'। 

सरस्वती के लिए देवताओं द्वारा कर्तेव्यनिर्देश इतना ही है' कि श्रीराम राज्य फो त्यागकर वन में 
जाते हैं वो सुरकाये संपन्न होनेवाल्ा है!। अतः उसको ऐसी युक्ति करनी है' जिससे प्रभु वन में चले जॉय । 

संगति--माद्भाव से स्निग्धा होने पर भी सरस्वती अपने को प्रभु की सेविका समझ रही है'। राज्या- 
भिषेक प्रभु का ही होना है'। उसमें वाधा पहुँचाना सेवाधर्म का विरोध करना है। यह अत्यधिक दोष 
है.। उसकी कल्पना में सरस्वती मलिना हो रही है'। 

, . चौ.--छनि सुरबिनय ठाढ़ि पछिताती । भहझँ सरोजविपिन दिम राती ॥१॥ 
भावार्थ--देवों की विनं॑ति सुनकर सरस्वती पछताने छगी कि उसको कम्रखवन के चाज्ञ के लिए बर्फ को वर्षो 


करनेयाली रात्रि जैसा होना पड़ेगा। अर्थात्‌ कमछ की तरह खिलने वाली जयोध्यापर दु.खरूप तुपाराधाव 
करना पड़ेगा | इस वात का पश्चात्ताप सरस्वती की हो रहा है। 


अयोष्यपफाण्दम्‌ ण्रै 


सरस्वती की चिन्ता का पिपय 


हा० ज्या “सरस्वती की चिन्ता फा नैसिझ विषय यह है! फि भ्रीरास नोतिसान्‌ हैं. उन्होंने अपने प्रति 
सबके मानस फो आकृष्ट फर रखा है। सरस्वती भी भ्ीरास फे यष्ोगान में रुचि रस्तती है'। ऐसी स्थिवि 
में राग्यारोदण में घाघा फो उपस्थापित फरना उसफो अच्छा नहीं छग रहा छे। पर देषतार्शा की पिपचि 
देखकर उत्का हृदय फरुणादे ऐ । एक धरफ देवताओं का मद्दान्‌ मनोनीत छाये घर्मस्थापत उसके 
सामने है, दूसरी तरफ आराध्य फे राम्यारोहण में पिघ्न फरना धधरमम है'। दोनों में से किसी एक 
निर्णेय में साधफ हेतु न मिलने से यह फिंकसब्यधिमूद्ा जैसी माद्स पढ़ती हे। 
ज्ाउव्य दे रि जीप फे रागद्रेपप्रयुक्त दोपों फो ६खते हुए देववाएँ यदि फाये फरें तो उन्‍हें पिप्लकार्य 
करने में दोप फा परूछवछ मिख्ता है।। श्रीराम में दो दोप है. ही नहीं। अत देषवाशं फे रक्त कार्य में 
सरस्वती नीति और अन्ीति फा पिचार फर रही है। अनीधिप्रयुक्त होफर राम्याभिपेफ में घाधफ होना 
उसको इष्ट नहीं है । इसी दिचिफिचाहुट में यह पेखताओं फी प्राथेना पर मौन छः भौर सिन्ता सी है । 
संगधि--सरस्थदी झा यह मौन दस्कर वेयताओं ने अपने छाये फो नीदिसंगछ समझाना स्‍भ्ारभ किया। 
चौ -देखि देव पुनि कदृद्दि निद्ोरी | मातु तोदि नद्दि थोरिफ खोरी ॥२॥ 
भायार्थ--सरस्वदी साता को मौन एूखकर दुबता, उसको मनाते हुए विश॑ति कर रहे हैँ कि रामराम्पासिपेकोत्सण में 
बिप्त करने पर सी डसख्मे पापकस्व दोप लरा सी रहीं होगा । क्योंकि प्रभु के सतोसाव (“अमुद्चित पुरू") 
से बिप्रकाप भीरामकी इप्प्ा के अनुरूफ होगा । 


सरख्ती के द्वारा पिप्त पहुँचाना दोप नहीं 
ज्ञा० ज्या५--पिप्लोपस्थापन मे देववाओं ने जो युक्ति समझायी हैः उसका आशय यहीं है कि श्रीराम को 
राज्याणेहण में वन्धु की अनुपस्थिति से सुस्त नहीं हो झा ऐे। अत पृषों का यह फार्य रामसुस्त में 
बाघफ नहों फा जायगा। इस संयध में विक्षेप षिचार पो «दो १८ फी व्यास्या में ड्रष्टव्य हे । 
चौं -विसमय दरप रहित रघुराऊ । तुम्द जानहु सब रामप्रमाऊ ॥३॥ 
भाषायें--सुझूकर शोरामयी इपं-सतोक से रहित हैं | भयांद्‌ राज्पासिपेक से जबको म इपं दे घतो बसबास का 
दुख ऐ। तुम तो ध्रीराम का सम प्रमाद जानती हो । 
ग्रद्ध का प्रमाव ये राज्यारोइण में फौतुफामाप 

्वा० स्या«--अमी भीराम फो राज्यारोहणनिमित्तक हे है नहीं, न तो फौतुक दे । क्यो आमिसानिक, 
किया सानोरसिक, या पेपयिक सुख नहीं दे। फ्योंकि अभी युवराज होना उनफो इष्ट नहीं है। 

भीरास फे प्रमाय फो' अच्छी तरह जानते या समझते हुए शारदा फो भीरास फी इच्छा के बारे में 
सम्देद्द नहीं होना भादहिये। 

मस्त की अलुपस्थिति में भीराम को राज्यामिपेफप्रयुक्त स्थामी होना इष्ट नहीं छे। अमी दो प्रसु 
भाई फे पियोग में सरठ फे दर्शनासिछापुक हैँ? | करत पिप्नकाये प्रसु फे अनुकूल होगा । 

१ बिस्मस भ्रयात्‌ गयंरद्दित स्थिति छा पद वलन दे । 

२ प्रभाष् का श्र्थ है सफछपेरया पा श्रनुस्तासन। 

४ चीो५+६-०८ढो ७सेसस्‍्पए दे। 

9 जैसे सुरगुरु दृददस्पिति ले देणा से राम-भरतमिछ्त में बिह्न करने के प्रमोश सें कहा-- 

( तय किछु कीर्‌इ रासरुल छाती । भ्रप कुषाफि करे होइहि शमी” |! डौ शदो ३३८) 
॥ “बिससर्पस पह अमुदितपुकू | पल्युविद्वाइ बड़ेदि समिपेक” ।! से शोराम का इस प्रकर दे । 


५४ भावार्थ-शास्बीयव्यास्यासमेतम्‌ 


संगति--अभी राज्यारोहण में बाधा पहँँचाकर शारदा को क्या दुप नहीं दीगा ? इस प्रश्न का उत्तर 
अग्रिम चौपाई मे दे रहे हैं. । हि 
चो,--जीव कामनस सुख दुःख भागा | जाइअ अनथ देयदित छागी ']४॥| 
भावार्थ--कर्म के अधीन दु ख सुस्त का भागी जीव है । श्रीराम तो प्रभु दे सब, उबवाओओं के द्वित के छिए तुम 
जयोध्या से जाओ । 
बाधक दोते हुए सरस्पती दृःसफलाधिकरारिणी नहीं 
जीव यजमान ( स्वतन्त्रकती ) होफ़र जब कारये में पग्नत्त दोता दे तब बढ़ हमवश सुर दस का 
भागी होता है'। ( 'फलस्वाम्यं हि अधिकार: यह मीसासकवचन स्मरण यह ) जा अराय दा को प्रगुड्रा 
इच्छा का अनुसरण करते हुए विन्नकाये करना दें। इसलिए सरस्थती में कफ्न्व्राभिमान नहांफद्ा 
ज्ञायगा | फलस्वाम्य न होने से सरस्वती विन्नकार्यप्रयुक्तदु-सात्मक फ फी अधिकारिणी नहीं दे । 
९ मसेव | 
सरस्वती का प्रस्तुत फाये उमसेवा है 
प्रश्न-सरस्वती के प्रस्तुत कार्ये से श्रीराम न ढु सी दंगे न सुली दी, जथीत ये उद्ामीन दू तो देवी 
का यह काय श्रीएम॒ की सेवा में परिणत फेसे होगा १ ढ ४ 
उत्तर-इस प्रश्न का समावान दिय्हिततागीः से स्पष्ट द'। तात्पय यद हे दि देखकाय तथा बमनीत्ति 
की स्थापना के लिए ही प्रभु अवतीण्ण दव। प्रस्तुत विन्नकाये से दोनों 'देचह्वित और धमनीति की स्थापना) 
कार्य सपन्न होने वाला है'। यही श्रीराम को इृष्ट &। अत. शारदा के प्रत्तुत कासय से अभुको प्रसन्नता दी 
होनी चाहिये । 
संगति--इतना कहने पर भी शारदा का हिचफिचाना देख कर देवों ने उसको पुन प्रणाम फिया | 
चौ,-वार वार गद्दि चरन संकोची ! चली विचारि विवृुधमति पोची ॥ ७ ) 
भावाथ--बारंवार देवताओं ने सरस्वती के पैर पकड़ कर उसको सकोच में ठाल दिया । सरस्यती अयोध्या जाने 
को तब तेयार हुईं जब मन में तर्क॑युक्त विचार किया । यही हि देवो की चुद्धि दुष्ट नद्दी दे । 
सरस्वती के चिन्तन का प्रकार 
शा० व्या>--देवों के अनुनय विनय पर राज्याभिपक में बाधा पहुँचाने को तैयार सरस्वती अवध की 
ओर चढी, पर उसके पूर्व सरस्वती ने क्‍या विचार किया, यह शिवजी सुना रहें छ। विचार मे एक पक्ष 
देवताओं के संद्मतिमत्त्व का हैं, दूसरापक्ष देवों के जगद्धित के दीघंद शित्व का है । 
.ज्ञातव्य हट कि 'विद्युधभति पोची, ऊँच निवासु नीच करतृती” आदि से देवां पर आक्षिप करने फा 
भाव नहीं हे । किन्तु स्यात्‌ ऐसी आपत्ति है । 
संगति--सरस्वती उक्त दो पक्षों के चिन्तन मे कल्पना कर रही है'। 
चो.-ऊंच निवासु नीचि करवूती । देखि न सकृदि पराह यिभूती ॥ ६ ॥ 
हज जे व दे ( बे जप ् 
भावाथं--देववाओ का वास तो ऊँचा है पर कार्य नीच है, थे दूसरे के वेभव को नहीं देख सकते । 
यह प्रथम पक्ष हू । 
न्त्‌ अन्वग | श्ल्‌ः बल... पृः बी 
चिन्तन के अन्तर्गत पश्चू-प्रतिपक्ष में दोप-गुण विचेचन 
शा० व्या०--सरस्वती के विचार मे पूर्वोक्त श्रथम पक्ष की स्वीकृति पर अनुमान यह है--- 


“देवा मन्दसतयः स्वहिताय प्रवतनशीलत्वात्‌”? इस अनुमान से यदि देवताओं मे मन्द्स तिमत्त्य साना 
जाय तो उनमें राज्याभिपेक के अति असूयाभाव मानना पड़ेगा । इसके साथ यह भी कद्दना होगा कि 


अयोष्यकाण्डम्‌ ष्छ 


वेषगण उथपद्‌ पर विराजते हुए भी अपने स्पाथे फे छिए राज्यामिपेकोत्सथ फो न सहन कर वाघा 5५2 पचाने 
की सोच रहे हूँ । ऐसी अपरथा में सरस्वती अघघपुरी फी ओर नहीं जा सफती और न तो जाना 5 > । 
हब उक्त अनुसापक हेतु फो घाधित या स्परूपासिद्ध फरते हुए देवताओं के दीर्घदर्शित्य का श्रमुमान 
सरस्वती ने अप्रिम अर्घोी में फिया है। अथोत्‌ उक्त दो पक्तों में उसने दीघेदर्सित्म पक्ष फो सोचा। 
हसका स्परूप यह है फ़ि देषताओं फे चिन्तवित काये को सुनियोज्ित फरने में जगस्‌ का कस्याण और 
उसके साथ देवहित भी होगा । 


संगति-इसी द्वितीय पक्ष फो कयि अप्रिम चौपाई में प्रफट फर रहे हैं.। 
चौ - आगिल छाजु विचारि वहोरी। फरिदृ्हि चाह छूसल फवि मोरी ॥ ७॥ 


भाषाथें--उत्तर में सरस्थदी ने भागे डोने वाछे दितकर कार्प का दिचार करके शिमप किया कि सुजास कथि मेरे 
पिश्काप॑ की प्र्शसा करेंगे । 


नीच करतूति के विघारपरत्व में संदशन्याय 


शा० झया --हसमें झ्ञातव्य है. फि आरंम म 'यिघारी” क्षव्द से फषिमीमासफसम्मत सन्देक्ष न्‍्यायफो(*) 
घ्यनित फर रहे हैं। “चढी घिचारि? और 'काजु वियारि! दोनों फे मध्य में एस्छिखित ऊँच नियास का 
पिचार से संघध है'। अर्थात्‌ वेष यदि स्पार्यी हूं तो उनपर ऊँच निषास फी आपत्ति होगी। वे पो जगत्‌ 
का हित सोच रहे ६ । इस प्रफार यिचारों के प्रस्तुतीकरण से जब सरस्यती ने पिश्न योजना फे औषित्य को 
समझा ठव पह अपने फो धन्या समझने छगी । उसने यह भी सोचा कि मेरी कृति में उत्त घिवेक को 
ध्यान में रख फर फपिछोग रामायण फे यर्णेन में निरन्तर मेरी चाहना फर्रेंगे | 


पिचारित आगिल फाजु' 


सरश्यती हारा प्रेरिषा फैफेयी फे दो घरवान-सरठफो राम्य और राम फा घनघास ऐ,ै। पहले में मघरोग 
का विनाश झौर भपरसपिरति ये दो विषय भरत 'घरित्र से मननीय हैं। चित्रकूढ पहुँचने फे पहले 
छफ भरतचरित्र मपरोगनाप्तक है! और जिप्रकूट में समाप्त होने वाछा भरतचरित्र भवरस पिरति का 
प्रतिपादफ दै। मरतघरित्र फा पूरे खण्ठ मिटा भषरोगूर चौ २ दोहा २१७ तक यर्णित हे । और उत्तर 
झण्ड सोरठा ३२६ में 'होइ भयरस पिरति” से समाप्त करके अयोध्यास्तण्ड पूर्ण किया है 

“आगिछ फाजु बिचारि वहोरी” ( चौ ७ दोहा १० ) में सरस्पत्ती का चिन्तिव जगतहित द्वोने से 
प्रन्यक्वार ले रामघनवास करा पर्णेन पहले किया। उसके चाद्‌ धमम एये घतुर्षिघविद्यास्यापनाप्रयुक्त 
पिरति को समझाने फे छिए प्रतिघन्‍्धफमूठ सयरोग का नाक्त भरतचरित्न में पहले खंताया। फिर जित्रकूट 
में प्रभु के द्वारा मरत फो छौटाने से जगतद्दित्‌ फी स्थापना और उसमें होने घाछे भषरस से बिरति फा 
स्परूप भरत फे उत्तरघरिश्न मे बताया गया है.। 

संगधि--उपर्गुक्त विचारों के सामजस्य में सरस्पती ने देघों के विचारों करा औचित्य समझा ओ 
घकत और क्षाख्रत ठीक दे। दव पह ह॒पे में भरकर अयोध्या में गई । 


१ औिस्मी दिचारि वियुप मदि पोधि भौर “भागिछ कासु दिचारि बहोरी उक्त दोनों विचारि के बीच में 
“डंवरिधास, नौध करतूति' दुक्षि लू सकइ पराइ जिसूति' कशा एया दे। इसको मो विद्वार से संदत करता 
ही सदृक्ष का उदाइरण पा स्पाय दे । 


५६ भावाथे-शास्त्रीयव्याख्यासमेत म्‌ 


चौ०--हरपि हृदय दशरथ पुर आई | जनु ग्रहदसा दुसह दुखदायी ॥ ८ ॥ 
भावार्थ--देवों के विचारों का औचित्य सोच कर सरस्वती के हृदय में दर हुआ और राजा दशरथ की अयोध्य 
पुरी में आयी । उसका अयोध्या में जाना ऐसा है मानो अद्वितीय अहदशा दुःखद बन कर आयी हो। 


देवी का हे में अयोध्यागमन 
शा. व्या.-- श्रीराम के वनवास में छोफ कण्टकाँ की समाप्ति, भारतीय दण्डनीति के माध्यम से वर्णाश्रर 
समाज (छोक) की स्थापना, देवहित के साथ भू-देव-पतित्रताएं सनन्‍्तमहात्मा का सुखी होना इत्यादि का 
संपन्न होंगे । अतः वरतेमान विघ्नकायें भविष्यत्‌ के उपयुक्त कार्यगगोरव का साधक वनेगा। इस दृष्टि: 
सररवती को अयोध्यागभन में हे हो रहा है'। 


ग्रहदशा में नान्‍तरीयकदुःखदायित्व 
प्रहन--अयोध्यावासियोंके दुःखके लिए सरस्वतीका आगमन तथा हृषेका वर्णन करना कहाँ तक सगत है' 
उत्तर--रविकुलमणि रामचन्द्र की स्थायिनी कीर्ति फो बनाने में अयोध्यावासियो का दुःख वलः 
दनिष्ट नहीं कहा जा सकता । यह दुःख अपनय अथवा नरकोत्पादक नहीं है'। भविष्यत्‌ में राज्यमहोत्स 
अयोध्यावासियों को इतना अधिक सुख देने वाला होगा कि दैहिक देविक और भौतिक दुःखों य 
समाप्त कर अनन्तसुख का दाता होगा। इसलिए अयोध्यावासियों का वर्तमान दुख नान्तरीयक है. 
जैसे माता साठृत्व सुख के आगे प्रसवपीड़ा नान्‍तरीयक मानती है' वेसा ही यह दु'ख छे'। इसलिए देव् 
के अ्रस्तावित दु'ख कार्य में ग्लानि का अनुभव फरना या अशास्त्रीय कार्य में देवों की पबृत्ति को समझन 
उचित नहा ठदृएा है! । अपितु विध्नवाधा का स्वागत करते हुए जो व्यक्ति ज्ञास्रीयनीतिकाये करता * 
वह पर्यन्तमें कीर्तिमान्‌ होता है'। इसी नीति को ध्यान में रखकर प्रभु अयोध्या वासियों के दुःख को घ्या 
में न लाकर नीतिका अनुसरण करते हुए विध्नकाये सें देव शक्ति का विरोध नहीं करेंगे । 
संगति--सरस्वती की सफल योजना का वर्णन आगे हो रहा है'। 


दोहा-नाम् मन्थरा मन्दमति चेरी कैकेयी केरि । 
अजस पेटारो ताहि करि गई गिरा मतिफेरि ॥१२॥ 


भावाथे--मन्यरा नाम की कैकेयी की दासी सूर्ख थी। सरस्वती ने सतिफेरका कार्य करके उ 
पिटारी बनाया। सन्थरारूपिणी पिटारी में कौन-कौन सा अपयशस्‌ भरा है ? उनको आगे 


मति की मन्दता 
शा. व्या --श्री सरस्वती ने सोच विचार कर भन्थरा दासीको अपना शिकार बनाया, क्योंकि वह सन्दर्मत् 
है. । हृठवादिता, जड़ता तथा तके में अकुशलूता ही ( भक्ति होने पर भी ) मतिमान्य है'। सन्दमतिमान 
को स्वतन्त्र सद्विचार या अपूर्बश्नतिभान नहीं होता ।_ सबेदा शंका करते रहना, विपरीत बिचारों का उद्र 
होना भी मन्द्सति का दूसरा चिन्ह है'। विपरीतार्थ की स्फूर्ति होना मन्द्सति का स्वभाव है'। अत 
मनोनीत काय के लिए सरस्वती ने उसी फो योग्यपात्रा समझा। क्योंकि कैकेयी फी सन्थरा विश्वरत 
सेविका होने से उसके द्वारा भया हुआ निरूपण कैकेयी के लिये विइवासोत्पादक होगा | 
श्रोराम के प्रति मन्थरा के दोषदर्शन का कारण 

ज्ञातव्य है' कि चो. ६ से ८ दोहा १ में कह्दे--नीतिमान श्रीराम के गुणप्रयुक्त आकषेण में मुग्धामन्थर। 
मन्दमति होते हुए भी श्रीराममें दोषदृष्टि न छा सकी। किन्तु यहाँ का दोषद्शनात्मककार्य सरस्वती की प्रेरणा 
से संपन्न हुआ है'। जिस को कविने गई गिरा मतिफेरिः कहा है'।* 


4. दो. १२ की व्याख्या में ध्रष्टन्य है। 


सको अपयशस्‌ क॑ 
कवि स्पष्ट करेंगे 


4 अयोध्याछाण्डम्‌ ध्य् 


अथपा यह भी फद्दा जा सफदा फैफि मसन्दमवि दोने से सथराः गुणवानपर भी दोपा फा अरोपण 
फरवी रदूमी दै। इस स्थाभाषिद्ठ फाय में उसफ़ो प्रोत्थाहित फरना सहजसाध्य है। अपयशास्‌ फी पिटारी फो 
मसन्यरा ने अपने घरिष्र म॑ सोडा ऐ। 

“गई पिरा! पर एक विचार 

धायी गिर से ऐसा अनुमान होता है! फि सरस्यती फा आता हरुपि हतर्य दशस्थपुर आई 
(चौ ८ दो १२) से जो दिखाया गया था, उसफा छौटफर जाना यहा विस्राया ऐै ज्लिसकी एफयाफ्यता घो० 
+ ६ में भरद्वाजमुनि फो उक्ति से स्पष्ट होगी। 

अथया सरस्वती फे मतिफेएफाय फ्री सय्रोदा भीराम फे पनगमनस्थीकार करनेतक ह। 
(वो ०१) उसका अन्तिम घरण फैफेया ने 'मुनिपटभूपण माजन आनी” आदि से (चौं १-७ दो 5 
पूरा फिया। इस पी फ्रेफेयी फा राजा फे प्रति फड़ुपचन, रोप फा भाव, फौसल्या पर आह्षेप जादि 
'मततिफरी! फे अन्तगेत माना जायगा। निस प्रफार मीमासान्याय फ्रे अलुसार यूपच्छेदनथिधि के अन्तगेत 
यूप फो छाने फे लिए जितने यूक्षों छता आदि फा छेदन आयदयफ होगा यह सब उक्तविधिसम्मत साना 
जाता ऐ। “मो प्रफार सरस्यतती फे मतिफेर फार्य फे अन्दगद फेफ्रेयीफी ऋृति हे मानी जायगी, 
ससा यप्िप्र॒त्ी फी वक्ति (अस पियारि फेद्दि दइअ दोसू ज्यरध फाहि पर फीजिअ रोसू-ची १ दो १७२) और 
भरदातजी फे पचन ( 'सात्त फैकदृद्दि दोसु नहि, गई गिए सति घत्ति' दो २८६) से स्पष्ट है'। 

मतिफरि का स्तरूप 

मतिफरीडा स्थरृप फुफेयी फी फुमपिप्रमुक्तया घितयरसे प्रफाशित यह हुआ फि आन से अधिक रासु 
प्रिय मोर' 'जेठ सशमि सेयफ छघु भाई” आदि फदुनेयाढी फैफ़ेयी यरिपरीवमतति धोने पर भरत को रास्य 
और भोराम फो पनपास दुना घादती है। 

मविम्रा घ फा फल 

सगति--एमा ही अपस्था मन्धरा फा भी है'। उसके हृदय मं अभी तझ 'रासों निर्दोप' छोफसस्मतः 
अज्ातष्ठाग्रु स्पामी आस्मर्सपदुगुणपस्वातू, एसा निणय स्थिर धा पद्द घदुछ गया फ्योंफि सर्फ-शक्ति फे 
अभाषब मे पूपनिणय मछिन होता है! अथया पृर्षेनिर्णाद साध्य देतु फी ध्याप्ति फाछ वृश्ठ से परिष्छिप्त 
दिखती हे उसफे याद पिपदीत अथ की धारणा यद॒ती हे | उसका यर्णन आगे फर रहे दे । 

चौ०--दोख मन्थरा नगरु बनावा | मंझुझ मगठ बाज बघावा ॥१॥ 
भायाय--मम्परा में भ्रपाप्पा घापरी ढी सजावट दृखा आर सुस्दर मंगछ याप उस्सय सुना । 
मंबराचरित्र की भूमिका 

दा व्या -कैफेयीफी उक्ति ('जैठ स्पामि सेषफ ठ्थुभाई) में 'सेथ्यं भीराम भति मरपस्य सेपरूभायो हिताबह! 
इस भाष में क़ैफेयी फो प्रामाण्यनिश्चय हे! जा उसकी वक्तियाँ ( 'सयह्ि रामु मिय जेद्यिधि मोदी । 
प्रान ते अधिक राम प्रिय मोरे? ) से सुस्पष्ट हें। मन्यरा ले अपनी उक्तियों ( रामदहि छाड़ि कुसछ फेहि 
आजू। पूछ पिदेस न सोघु तुम्दारे। छक्कद्ु न भूषफपट घतुराइ। ) से भरत फे साथ रानी फे सेपकत्य 
फो विख्ताझर उसके इृदय में अध्ितत्यबुद्धि फो उत्पन्न फराने फा उपक्रम फिया है । यही मतिफेरी या 
पिपरीवयुद्धि फरा देने का फाये है'। अयात्‌ करेफेयी के उक्त प्रासाण्य के स्थान पर क्षग्रामाण्यप्॑झा का 
उत्थान फरादेना | थी २ से दो १६ तफ में फही 'भक्ते फद्त हुल्ल रउरेदि छागए आदि उस्तियों से 
भन्‍्यरा अपनेमे हितायहस्मयुद्धि और भीराम फे सेषफत्प म अध्तिस्षयुद्धि उत्पन्न कराना चाही है। 
दो १६ में सथरा ऐसा करने में सफठा होगी। 


"८ भावाथ-शाखीयव्यास्यासमेतम 


फिर सौतियाभाव में होनेवाली ईष्यों फो उत्तेजित करने के लिए भूष कपट चतुराईइ” की यक्ति फो 
बदल कर राजा पर आरोपित किये दोप को घुमाते हुए सती कोसल्या में वह दोष आरोपित किया, 
राजा को सख्लीजित ठहदराया। इस प्रकार कैकेयी की पूर्वगृद्दीत सेवकत्वमे ह्ितावहत्वबुद्धि को उत्कटकतर 
क्ोटिकअप्रामाण्यप्रद्वास्कंदित वना दिया। अथीत्‌ कैकेयी के हृदय में श्रीराम फी सेवामें हित की भावना 
को अहित समझा कर अग्रमाण ठहरा दिया। 


अग्रामाण्यकल्पना में दोप 


शास्त्र और परीक्षाद्वारा निर्णीत, नीतिसम्मत, छोकमतोपयुक्त श्रीरामकी आत्मग्रुणसम्पत्ति में 
प्रासाण्यबुद्धिको त्यागनातथा दो १४ मे श्ास्त्रनिर्णीत, छुबड़ी के आहितावहृत्व से अग्रासण्यबुद्धि करना 
मीमांसा की दृष्टि में गौरव ह्वै । शीराम जैसे आत्मगुणसपत्तिमान्‌ की सेवा के हदितावह॒त्व बुद्धि भे 
प्रामाण्य को दृढ समझना ही छाघव है'। इस गौरव-छाघववादसिद्धान्त को कैऊेयी ध्यान भे नहीं 
ला रही है' यद्दी उसकी भूल है' जो कि रानी को सफला होने नही देगी । 


निर्दोषिव्याप्ति में सन्‍्थरा की अग्रामाण्यबुद्धि 


श्रीरास ने अपने चरित्र में समता आदर सातृप्रेम आदि सद्शुणों ( विनय, छोकसग्राइक गुणों 2 को 
प्रकट किया है'। मन्थरा यह भी जानती हे--राम' सुखसौविध्यस्य अजापरिजनेश्य प्रदाता धर्सेविज- 
यिनेनृत्थात्‌ , इस अनुमान मे हेतु ओर साध्यका सामानाधिकरण्यनियम देखती हुईं भी उक्त व्याप्ति को 
पूर्व काडीनसमय से परिच्छिन्न समझकर राजमप्रेरितमंगलवाद्यादिक्ृति को स्वार्थंअरिव समझ प्ह्दी ह्ठ। 
वैसे ही १३ दोहे में निर्दिष्ट, 'रामः निर्दोष: इत्यादि अजुमानोपवणितव्याप्ति को भी वह कालपरिच्छिन्न 
समझ रही है । 


चौ,--पछेसि लोगन्ह काह उछाहू | रामतिलकु सुनि भा एउर दाहू ॥२॥ 
करइ विचारु कुबुद्धि कुजाती | होइ अर्ाजु कबनि विधि राती ॥३॥ 
भावार्थ--छोगों से उसने पूछा कि कैसा उत्सव हो रहा है ? श्री राम का राज्यासिपेक है यह सुनते ही 


हृदय खौलने लगा अथवा उसके हृदय में सताप होने छग़ा | नीचजाति की मन्धरा कुत्सितबुद्धि 
को थी । वह सोचने लगी कि किस प्रकार आज रात ही में ऐसा विष्न द्वो कि श्रीराम का तिलक न हो | 


अकार्य में हेतु कुब॒द्धि कुजाति 

शा. व्या.--मन्थरा सोच रही है' कि महाराज के मनोरथ को कैसे निष्फल वनाया जाय ? 

पअहन--राज्य में नीतिमान्‌ राजा के रहते रामराज्य का विघात करना भन्थराने कैसे सोचा ? 

उप्तर--प्रश्न के समाधान में कविने उस दासी को कुबुद्धि एवं कुजाति कहा है'। यह ध्यान रखना 
चाहिये कि कुजाति से मन्‍्थरा को कुत्सितजातिवाली नहीं समझना है! यतः 'कु' शब्द फेवछ सकेतमात्र 
है। विश्व में जितनी भी जातियां हैं. वे सभी यदि अपनी परंपरागत शुद्धि को बनाये रखती हैं तो 
स्वाभाविक परंपराप्राप्त कमें को करते रहने से कुछोचितगशुर्णों का विकास करने मे उनको अवीणता 
छुलम होती है'। कार्यविभाजन में ऐसा जातिभेद्‌ समाज को पार्थक्येन अपनाना पड़ता है'। इसमें 
सांकर्य किया जाय तो रोग की अभिवृद्धि, कार्यसपादन में परिश्रम और प्रतिभा का कुठित होना आदि 
दोष उत्पन्न होते हैं। अत. भारतीयराजनीति ने संपूर्ण जाति की प्रथक्‌ सुरक्षा का विधान बताया है'। 
अपनी अपन्ती वंशशुद्धि को वनाये रखने मे सभी जातियां अ्रशंसाहा हैं। ताससकर्स के अन्नुरूप अनुष्ठान 
में जो जातियां कमेरत हैँ. उनको 'कु' विशेषण से व्यक्त किया जाता है'। सात्विक कार्य से जो जाति 


अयोष्याफाण्डम्‌ ण्ु 


्षपने गुणों फा अभ्युदय फरती हैं. उनको 'सु? पिशेषण से संयोधिव फिया जाता दै। अत' ु! और 
शब्द फो निमित्त मानफर फिसो फो ऊंप्या या निन्दितमाय से देखना उचति नहीं हे। पैसे ही शास्रफारों 
फ्रेटिए 'फु' और 'स्तु' फा प्रयोजन निषेध और घिधि फो समझा देना हे । सन्यरा तामस फाये में निपुणा 
होमे से फुजाति फद्दी गई दे'। तदनुरूप सात्यिफफार्यराश्याभिषेफ से घिघात फरने में उथवा होने से 
मंथरा फो कुनुछधि पुज्ञाति फद्टा है'। 
सरस्वती प म धरा म॑ पिचारवेपम्य की सस्तुतति 

प्रभ--रामरायाभिपेफ फा पिपात फरने में सरस्थदी और मन्थरा दोनों प्रस्तुवा हें. तो शिषजी उन 
दोनों फे विपय में पिचारों फे पेपम्य फो फ्या दशशाते हे. १ 

उत्तर--सरस्पती जगद्धित सोच फर नान्दरीयकदया ( अपेक्षितवया ) अत्यन्त आपद्यक द्वोने से पिप्न 
पहुँचाने म उधवा दै। ऐसा फरनेफे लिए देषताआ द्वारा पद आधिष्टा मो दे! तथा झपने फर्सब्यनिर्णेय को 
प्रमाणप्रय प्रसित ( समर्पित ) फरते हुए वेश फाछ फा औषित्य समझ रही है| 

सन्यरा इसफे विपराता है'। उसफो फिसीफे द्वारा विप्नयिघादफा आदेश प्राप्त नहीं है'। श्रपनी स्थतन्श्रदा 
से यह पिप्तफाय फर रही । जिसफे फलस्वरूप मनन्‍्थरा को अपयशात्यिनी सया दण्ड फ्री मागिती दोना 
पढ़ेगा। इस प्रफार उद्देशय और फार्यभेद फो देखते हुए शिपजी पेपम्य॑ फो दृर्पित करा रहे हैँ । 

जीप फा दण्ढभाच्व 

ऊपर फे रृष्टान्त से यह निष्फपे निफछता है' फि जीप जब स्पतन्प्र रूप मे॑ पिरुद आचरण फरता है तो 
पह दण्ड फा भागी ोता ऐै। सरस्यठी का तरह जो देखपरतन्ध होकर फार्य फरता ऐ यह प्रप्नंसा फा 
पाष्र माना जाता है। 

संगदि--अप्रिम चौपाई में स्पदन्यवाप्रयुक्त फुटिख्वा फा साधम्ये उपमान से समझा रह ए। 


घी -देखि छागि मघु छुठिछ फिरादी | जिमि गयें तकद लेठें फेद्दि भांति ॥ ४ ॥ 
भायाशथै--वैसे किराठिनी मघुभरे फ़चे को देख फर उसे फिस ठरद से छे छ इसफे छिप कुटिछता को भपनाती है। 
अभीएसिद्धि में मेद फू उपाय 

शा० ज्या८--पर म॑ रहने पाले फिसी सदस्य फो अभीष्टसिद्धि होते देखकर उसी घर फे किसी अन्यदम 
सदस्य फो फष्ट होता छे, तब यह घर फे क्रन्यान्य स्र्स्या में भेद छगाने फी चेष्टा फरता हे । 

भेद फे तीन प्रफार होते हं--(१) शंफाजनन, (२) परस्पर में संघपे फ्री स्थिति प्रो छे आना, और 
(३) झासन फा सय विस्राना। इन दीर्नों म॑ से प्रथमोपायास्मछ शंफा फे उत्थापन का प्रयोग स यरा ने लिया 
है। एंफा फा उत्थापन उन व्यक्तियों में फिया जाता छे जो तके में असमर्थ होने फे साथ भ्रद्धाछ भी दे । 
ऐसे ज्यक्तियों म॑ शंफा फो स्थिर फरना सरछ फाय ऐ | फेफेयी फे हृदय में अपने परिषार फे प्रति दुमोष 
नहीं था। यह अद्भा में पेठी थी। मन्धरा ने उसफे हृत्य म राजा फे प्रति शंका फो दृढ़ पनाने फा प्रयत्न 
फ़िया। झंफा म॑ प्रेम और राग पिछीन छो जाते हैं। यद्द आगे बताया जायगा फि रानी ( फेकेयी ) राजा 
फे अठि प्रेम और राग से हुट फर उदासीनवा फो फैसे प्राप्त हुई । शंफा फो जगाने वाछा यवि अमपात्र और 
पिश्नस्त दा दो चाहे झंफा युक्तिसंगठ हो जथपा न दो पद आपत्ति फो उठाकर अपना कार्य बनाता दे । 
मन्यरा ने यही कार्य फिया हैः। 

संगवि--एंफा उठाने फे पूर्व रानी फो अपने प्रदि जिक्लासुवा और विश्वास बनाने फे छिए मन्धरा ने 
कैसा उदासोनरूप पनाया यह स्लिपजी फद रहे ई। 








६० भावाथ-शास्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


चौ,--भरतमातु पहि गई बिलखानी । का अनमनि हसि कह हँसि रानी ॥ ४ ॥ 
भावारथ--छुटिकता को अपना कर मन्थरा भरत की माता कैकेयी के पास विलखती हुई आयी । रानी कैकेयी ने 
इंसकर उससे पूछा कि वह क्‍यों ऐसी मन में दु'खी या उदास हो रही है । 


मन्यरा के द्ितकारिता का परिचय 

शा० व्या०--सन्थरा भढी वन कर केकेयी के हृदय में भेद का बीज वोने के छिये कतिपय शकाएँ 
प्रस्तुत करेगी, जो स्वामिनी को शंकाक्रान्ता बनाने मे पयोप्त हैं । 

इसके पूर्चे अपनी हितकारिता की धाक जमाने के छिये मन्थरा ने तापात्मक सानुशय ( बिछुखते ) 
वचन व्यक्त करना आरंभ किया | ०५ 

संगति--कैकेयी ने मन्थरा के त्तापात्मक अजुभावों को देख कर उदासीनता का फारण पूछा । 

उतरु देश न लेह उसात्त | नारचरित कारि ढारइ आंख ॥ ६ ॥ 

भावार्थ--मन्धरा तिरिया चरित्र करती हुई उत्तर न देकर लंवी-लंबी सांस लेती हुई और भी रोने ऊगी । 


शंका के उत्थान का क्रम 

शा० व्या०--मन्थरा अपनी ओर अधिक विश्वास वनाने के लिए मौन हो गयी। श्वासप्रश्नास के द्वारा 
चिन्ता का रूप दिखाकर यह्‌ प्रकट करने रगी कि मानों केकेयी का भारी विनाश हो रहा हो । शारीरिक 
सात्विक भाव को दिखाये विना रानी का विश्वास अपने ऊपर नहीं होगा, ऐसा सोच कर उस दासी ने 
आखो से अश्रुप्रवाह भी निकालना आरंभ किया। यह भी एक खीचरित्र है'। वर्णीश्रमप्रधानसभाज में भी 
ह्लियों में कामना फी चरमसीमा ग्रकृतिग्राप्त होने से माया दंभ आदि भी सहज स्फुरित हो जाते हैं। ख्ार्थी 
छोग उसीके साध्यम से अयास करके सफल होते हैँ। उसका पूण समन्वय कामसूर्ति सञ्री में देखा जाता है'। 

संगति- भयोदा में रही ख्वियों मे छल्ला आदि का भाव अक्ृतिदत्त है'। पर मयोदाह्दीन नीचप्रकृतिकी 
स्री में दंभ आदि का प्रयोग कठिन नहीं है। भन्धरा ने दंस का सहारा छेकर ज्योंही सात्विक भाव 
(अभुप्रवाह) व्यक्त किया त्योंद्दी रानी उसकी पीड़ा से प्रभावित होने छगी और उसका कारण पूछने छगी। 


चो,--.हेँसि कह रानि गाछ बड़ तोरे | दीन्ह रूखन सिख अस मन मोरे ॥७॥ 
भावाथ--रानी कैकेयो ने कहा कि तुम बहुत बढ़-चढ़कर बोलती रहती हो इससे मुझे छग्रता है कि लक्ष्मण ने 
तुमको कुछ शिक्षा दी है अर्थात्‌ बहुत बोलने की सजा दी 'है। 
हर मन्थरा में दुनेय की शंका 
शा० व्या०-रानी केकेयी को विश्वास है कि उसके परिवार में कोई क्र नहीं है' जिसके | 
ह निमित्त से शंका 
की जाय। अतः निम्वय है कि भन्यराने ही डुनेय किया होगा । ऐसा सोचकर अश्रुनिभित्तक जिज्ञासामें 
रानी ने उद्गार अकट किया। हि 
रानी के हास का कारण 
साहित्यशास्त्रमे द्वस्य के आलंवन विदूषक तथा उनकी विकृृताकृति चेष्टाएं 
सन्थरा सें उक्त अजुभाव देखकर रान्नीको विनोद में हँसी आ रही है'। चेष्टा॑ ददीपन साने गये ही 
श हि मन्यरा को शिक्षा 
केफेयी को ऐसा छग रद्द हैं. कि सन्थरा को किसीने बहकाया है'। में 
, दास्य के विनोद में 
शिक्षा भी दी गयी हो। श्रीराम गंभीर स्वभाव के होने से थे निरथेक चेष्टा नहीं करेंगे। 2 
परप दे नहीं। पारिश्षेष्यात्‌ छक्ष्मणने ही इसको शिक्षा दी होगी। सन्‍्य प्‌ 
का है। इसलिए शिक्षाकी यह पात्रा भी है। 


।. भ्रयोध्याफाष्डम्‌ ६१ 


लक्ष्मण में औद्धस्य की शंका फा निल्‍ृन्तन ( निराफरण ) 


फैकेयी फे घघन से रष्त्मण में औद्धत्यकी जो शंका होती है, उसके संबन्न में फइना द कि 
आपादध' उनफे व्यपद्ार से औद्धत्य माद्म पड़ता है' पर जहाँ यह प्रकट होता दे पहाँ पद समयोधित है । 
थत' उनफा औद्त्य शीछ में परिणव दै | इसफो पुष्टि मुनि घसिप्ठ फे घचन चौ० ८ दो८-१७१ में है दवा 
भरत फे पचन वो १-४ दो० २०० में स्पष्ट है'। प्रस्तुत में फैफेयी फ्री रक्ति ( दीम्द छखन सिख कस 
सन सोरे? ) फा खण्दन सन्यरा स्थय॑ दी फरेगी ( चौ० १ वो-१४ )। 

संगति--आशंफा फे घिपय फी सचाई जानने फे माथ से फेफेयी पूछ रही हूँ. पर यह उत्तर नहीं देती । 

चौ -तवहुं न वोल चेरि वढ़ि पापिनि । छाड़र स्वास कारि जनु सांपिनि॥ ८ ॥ 
मापाथै--वह वासी यड्डी पापिमी पी इसफ़िपु इृठना कइने पर भी ले बोस कर पेसे स्वर से शबास छेते कमी 
सामो काछी ( विपमरी ) सांपिनी फुस्कार करती हो | 
मन्धरा में पापित्व 
क्षा० स्या८--मन्यरा फो पापिनी झहने फा अथे इतना दी है! फि यह अपने फो स्पसन्त्रा सानफर टेपके 
अधीन क्॑का फी फश्पना फे साम्राज्य में रामराम्यामिपेफ फे बारे में दुःश्वानुसप कर रही है । 

“कु निषास नीच करतूती। देखि न सकइ पराइ पघिसूती” यदद सरस्वती की फल्‍्पना भन्यरा के चरित्र 
में घटित दो रही ऐै। भीराम और राजा पशरय फे संघास में रहते हुए मो अभिपिक्त श्रीराम फे दारा 
भरवतादिपरियार फे रक्षण की फस्पना सन्‍्धरा फो नहीं हो रही दे राश्यासिपेक फो दुख समझ रही है'। 
प्रमु फे चरिष्र फा निरूपण फरने में उत्साह फे स्थान पर उसे द्वेप छा माय हो रहा है। सद्ृदयता का न 
होना तथा औदचित्य को न समझना पाप का द्योतफ है। 

प्रेय॑ को पापी कहने म औचित्य 

चालफाण्ड फे दोहा ५६ में रामसाया के द्वारा प्रेरिता सती फो श्री झिघस्ती ने परम पुनीत” कहा है, 
यथा “परम पुनीव न जाइ पज्िः। यहाँ सरस्वती द्वारा प्रेरिता सन्‍्यरा फो पापिनी फदा है । इस भेद के 
चारे में घिचार फरते पर यह क्लाठ होता हे. कि सती का स्वमभाघ पातिक्रत्य से पूर्ण है'। कार्थविक्षेप की 
रष्टि से यद्‌ प्रमुमाया से प्रेरिता हे--कवदः पविप्रास्सा है।। सन्‍्यरा स्थमावत' तम:प्रकृदि होने से सरस्पती- 
द्वारा प्रेरिता होने पर भी कुटिलकार्यों देश्य फे फारण उसकी तम-प्रकृति पापिनी दे। 

सगति--मन्यरा फी चेष्ठाओं फो देखफर फैफ़ेयी फे हृदय में एंकाएँ स्थिर होने छगी जैसा कि आागे 
फे बोह्दे में पर्णित ऐ। 

दो०--सभय रानि कह कहसि फ्िन, इसछ राम महिपाल । 
लखलु भरतु रिपुद्मलु सुनि, मा कपरी उर साहू ॥ १३॥ 
भायायैं--सस्पश के दुःख का अलुमाव देख कर कैकेयी रासी को कुछ मय या धंका हुड्टे ठथ बइ पूछने कगी कि 
श्रीराम, राधा, छश्मण, भरठ, पाजुप्त का फुप्छ तो बताओ । पह सुप कर कुबश्ीसाथरा के हृदय में 


चोट छभी । 
परिवार की कुछछता में अनिष्ट फ्री झा 
ज्ञा० ज्या“--/अनर्यसंसावना भयम्‌? उक्ति के अनुसार रानी को भीराम आदि घारों कुमार एवं 
पश्िसद्ितपरियार अत्यम्त प्रिय होने फे झारण उनके संयन्ध में शरनिष्ट फी श॑फा हो रही है जो स्पामा 
विफ है। रानी, राजा, कुमार आदि सभी झपने अपने महछ में अछग क्ग रहते हैँ। उनसे भेट इर 
समय होती नही। इसठिए उनकी फुछ्द्सा पूछना अस्वामाविक नहीं दे। 


हर भावार्थ-शास्यीयव्याख्यासमेतम्‌ 


कुशल की जिज्ञासा में नामक्रम का ओऔवचित्य 


कैकेयी की उक्ति “प्रान ते अधिक रामु प्रिय मोरे? ( चो. ८ दो. १५ ) की अभिव्यक्ति सर्वप्रथम श्रीराम 
का नाम लेने मे है'। है कप ६ 

रानी जानती है! कि श्रीराम के कुशछ मे सबकी कुशछ हें। इसलिए रानी ने प्रथमत' उनकी कुंशलता 
पूछी । तत्पश्चात्‌ सौभाग्यवती होने से राजा का कुद्ाल पूछा | महछ मे अन्य छुमारों मे से ढदमण 
उपस्थित हैं। इस लिए उपस्थितिकृत छाघव से उनका श्रम कीर्तन कर अन्य कुमारा का कुशल पूछा | 

संगति--स्वासी के अश्न करने पर उत्तर न देना सेवक फा अपराध माना गया दे ऐसा सोच कर 
सन्धरा ने यथाक्रम उत्तर देना प्रारंभ किया। साथ ही इ॒वांस की विशेषगति से हृदय की वेदना भी प्रकट 
करती जा रही है । 


चौ,-कत सिख देइ हमहि कोइ माई । गाल करव केहि कर बछु पाई ॥ ९ ॥ 
भावार्थ--मन्धरा बोछी हे मइजा ! हसको कोन शिक्षा देगा ) किसका बल पाकर में रुठ कर बोर सकती हूँ । 
'दीन्ह रूखन सिख का उत्तर 
ज्ञा० व्या०--चौ, ७ दो. १३ मे वर्णित कैकेयी के श्श्न दीन्द लखन सिख अस मन मोरे? के सदर्भ मे 
अपना दुर्नेय नहीं है, इसको सिद्ध करते हुए मन्थरा कहती है' कि हे मातः | शिक्षा अपराधी को दी जाती 
है।। में अपराधिनी नहीं हूँ. तो लक्ष्मण मुझे दृण्डित क्यों करेंगे ? इस श्रकार दासी ने अपराधाभावसश्रयुक्त- 
दुनेयाभाव समझाया । 
गाल बड़ तोरे! का समाधान 
पहले अश्न (गाल बड़ तोरे?) के समाधान में वह कहती हे कि राजमहल में रहने वाढी मन्धरा असवद्ध- 
प्रछाप कैसे कर सकती है! ? इस कथन से चपलत्वाभावग्रयुक्त दुनेयाभाव समझाया | 
किसी के प्ृष्ठचछ के आधार पर “गाछ वड़ तो रे! में दुनेय की शंका हो सकती है । उसका निरास 
फरते हुए 'गालु करव केह्टि कर वछ पाई? से पृष्ठचछाभावश्रयुक्त दुनेयाभाव सूचित किया। 
संगति--रानी को विश्वास है! कि अपने परिवार मे कोई ऋर नहीं है'। तव अपने और रानी मे दुर्नय 
का अभाव समश्नाते हुए मन्थरा ने राजपरिवार म स्वार्थसिद्धितत्परता दिखा कर उसमे ऋरता का 
आरोप करने का उपक्रम किया | 


चौ.-रामहि छाड़ि कुसछ केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू ॥ २४ 

भयठ कौ सिलिहि विधि अति दाहिन | देखत ग्रव रहत उर नाहिन ॥ ३॥ 

देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोमा ॥ ४ ॥ 

पूत विदेसन सोचु तुम्हारे | जानतिहहु बस नाहु हमार ॥ ५॥ 

नींद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भरूप कपठचतुराई ॥ ६॥ 
भावाथै--श्रीराम, जिसको राजा युवराजपद्‌ दे रहे है उसको छोड़ कर जाज किसका कुशल हो सकता है ? 
विधावा कौसल्या के रिए अस्यन्त जनुकूछ हुए हैं । उसको देखने से ऐसा रूग्रता है कि घम्रण्ड ( गर्व ) 
की मात्रा कौसल्‍या के हृदय में समादी नहीं । ज्कर स्वयं सव सजावट क्यो नहों देखतो ? जिसको 
देख कर मेरे मनमें क्षोभ हुआ। लड़का ( चिस्जीव ) परदेश में है उसका आपको कोई सोच नहीं है 


जाप समझती है कि पति हमारे वक्ष में हैं। प्रियदम ( राजा ) के साथ शैया पर सोते हुए बहुत नींद 
लेते सुख भोगा | पर राजा की कपट्सरी चालाकी तुमने नहीं समझी | 


क्षयोष्याफाण्डम्‌ ६१ 


शैकाओं फा प्रकार 


ह्ा० ब्या०--मन्यरा ने फैफेयी फे समक्ष उपयुक्त दौपाइसों में फह्दी घुंकाएँ निम्न प्रकार से उपस्थापित 
फी ई। (१) पिपमता में ओराम की कुषछसा और भरत फी अकुषारता, (२) फौसस्या में असूयाप्रयुक्त 
गे फा आरोप, तथा परसग्रद्धि फी असहिष्णुता और स्पसमद्धि मे न्‍्यूनता देखना (३) राजा फी प्रीति फा 
अमाध विखाना (४) राजा और रानी मे भेद्‌ लगाफर राजा में दँस सिद्ध फरना--इन शंफाओं में से एक- 
एफ यिपय पर पिचार फर्तैण्य है । जे! 

(१) सब भाईयों फा राम्याधिकार जमत समान है। अव एक ६ २०६७ धायाधिछारी माइयों फो दूर 
फरना धादेगा ही । तय राम्याधिफारी होने में समान गुणयात्‌ राम और भरव दोनों भाइयों में शत्रुता 
स्थामायिक हे । अर्थात्‌ थीरास राश्याभिपिक्त होंगे तो पिश्लेपकर भरत फी कुशल्सा संदिग्ध हो जायगी | 
इस पंश में समता फी घणा फी जाती है पर देखने में विपमता ही आठी हे! जो मरत को वूर फरफे 
औीरमफा राज्याभिषेफ फरने फे आयोजन से स्पष्ट ऐ। 

ज्ञाठब्य है फि फामुक दामिफ छ्यक्ति मनगदन्त दोपों फा फीतेन करफे बूसरों में दोप छगाते हैं.। 
पास्तप में वे सब दृषण दोपब्रष्टा म होते हूँ पर दिखाने फे लिए स्थर्य मध्यस्थ बनते हैँ। मनन्‍्यरा ऐसी 
ही है। सरस्पती फ्री माया से प्रेरितकुमति में फैफेदी श्रीराम और मरत फे उक्त कुप्तलत्व-अकुशहत्थ 
साथफ हेतु में एफाथौभिनिवेशित्यरूप उपाधि फो समझ न सफी। 

(२) असूया में फार्याफाये फे पियेफ फा अमाय होता जाता है! जो सन्यरा फे उदाहरण से स्पष्ट है। असूया 
माय म यह फौसल्या पर गर्षफा आरोप फरती हुई फद्दती है कि अपने पुत्र श्रीराम फो राश्याधिकार मिलने 
में फौप्नल्याफो परिधिफी अनुफूछता से जो भाग्य प्राप्त हुआ है उसमें उसका स्थामिमान वढ़ गया है. । 
इसकी ६8232) नप्रणाली यद्द होगी कि 'फौषास्या गर्ययती राम्याधि्ृतस्पस्येप्रपुश्ननिरूपितमाशृत्वसूचित 
सर्पेषिष का । इस अलुमान में यिद्धतूसंगत्यभाय-रूप उपाधि द्वे १ जिसको फेफेयी नहीं 
समझ रही ६" | 


(३) फोसल्ष्या फे उक्त घेमपरी फल्पना में असूयाप्रस्त मन्थरा को जो दुख है! उसके साथ राम 
राश्याभिषेफोत्सलफी सजाथट देखकर भी यह दुखी हो रही छ जिसके संधेघ में यद कदृता चाहती है' 
कि भीराम की छश्नछाया फे सज्ायद में उतायले सेयक बड़े संपन्न दिखायी पढ़ रहे हूं। उन्होंने जी जान 
से ऊगकर थोक़े ही समय मे नगर फो फेसे सुशोमित फर दिया दे ९ जिसमें मन्यरासश्विकेफेयी फी जरा 
भी पूछ नहीं है'। इसफी अत्लमान प्रणाली इस प्रफार होगी--“सेथका सर्य रामेण सह संबद्धा' श्रीरासस्य 
प्राप्यमानराम्याधिफारस्य हर्पण नगरशोसापिश्लेपफवेत्यात्‌र | परसग्द्धि की असहिष्णुता फे साय में 
मन्यरा फे फहने फा निप्फपे दे फि फौशल्यासद्धित श्रीराम सम्रदधिशाली दोने जा रहे देँ. तथा मरत-सहिस 
फैकेयी समृद्धि से यचितर द्ोती जा रदी है'। श्रीराम फे आरत्सर्सपदगुणप्रयुक्त भ्रीति में धोने बाछे 
जनाफर्षण फो न समझकर अर्थसंबंध फो जोढ़फर फैफेयो इस क्लंफा फो अपने में स्थान देगी बा 
उसकी फुमति है.। 

(१) कर्यज्षास्त्र म॑ खरी फो या में फरने का साध्यम प्रेम चताया ह'। उसके अलुसरण में 
राजाकी प्रीति आइयस्ता फैफेयी फो “नींद बहुद प्रिय सेज सुराई! फह्ठकर साथघाना फर रही है जो 
बहु न! से ज्यक्त दे। 'मूपफपट सुराई” से राजा की प्रीति में दंभ दिखा रही है । राजा फा दुंभ यह 
है. फि मपनी प्रीति फी आसक्ति पिखाफर रानी फैफेयी फो इतना घिश्वस्ता वन्ता दिया ह कि 

3 बिड्डस्संगरपसाबात्मक उपाधिका दिचार रामडद्मणर्सबाद में (बी $ दो २३१) दै। 

२ छीमृश्पान्‌ प्रमदाभाभ्याम्‌ (नीठिसार स ३) 


पे भावाथ-शास्त्ीयव्याख्यासमेतम्‌ 


उसको 'जालति इहु वस नाह हमारे? भाव दृढ हो गया है! । उस भावना में मस्त केकेयी राजा के 
शिश्टतापूर्ण कापद्यकों न समझकर विदेशस्थ पुत्र भरत के कल्याण की चिन्ता से शून्य हो रही हे 
५राजा स्वस्त्ीत्यमाववान्‌ शठत्वात्‌” ऐसा अनुमान कैकेयी फो कराना चाहती है! । राजाके इस कापट्य 
को आरे “पठए भरत मुप चनिअड रे” से स्पष्ट करेगी। 

इस प्रकार राजाकी प्रीति में शका को जगाकर मंथरा ने राजा रानी में भेद उत्पन्न करा दिया। 
शकाओं के जालमे फंसकर नीतिमान्‌ व्यक्ति भी किस प्रकार गिरता है' | यह कैफ़ेयी के आग्रिम चरित्र से 
स्पष्ट तो जायगा। जो रानी सपृू्ण परिवार को सुसबदित कर राज्य मे कीर्तिभागिनी वनी हुई थी वह 
कैकेयी कुमति में पड़कर कर्ूंकभागिनी हुई जैसा शिवजी ने चौ. ७ दो. २३ में 'राजु करत निज कुमति 
बिगोई? से व्यक्त किया है । 

कैकेयी की मतिपर आवरण 


उपयुक्त शंकितसाध्यक अलुमान मे शासत्तमयौदापालनकरदेत्वासाव रूप उपाधिको विमर बंद होते 
हुए भी न समझना सरस्वती के मति फेर! का म्रभ्ाव है' जिसने कैकेयो की सुमति को परिवर्तित कर 
दिया। चौ १ दोद ४२ मे कैकेयी से कद्दे श्रमु के वचन विधि मोहि सनमुख आजू' से केकेयी का 
करतव प्रभु के विधान के अलुकूल होने से फलतः वह सपूर्ण दोषों और कर्लंक से मुक्ता ही मानी जायगी 
और प्रभु की कपापात्रा" बनी रहेगी । 


संगति--सरस्वती के 'मतिफेरः के क्रम में कैकैयी की मति की दोछायमान अवस्था का प्रदशन किया 
जा रहा है. । एक ओर उसकी मति मे नीतिमयोदा का आदर है! दूसरी ओर स्वपुत्र भरत का राग जोर 
पकड़ रहा है। रानी पृ्णे सुमति के संस्कार में सन्थरा एवं उसकी शंंकाओं का दमन करने का प्रयास 
फर रही है । 
चौ.--सुनि प्रियवचन मलिनमनु जानी । झुक्की रानि अब रहू अरगानी ॥ ७ ॥ 
भावाथे--छुनने में मन्‍्थरा के वचन पहले तो प्रिय रूगे | बाद मे रानी मधधश को मनकी सोटी समझ कर उसकी 
ओर मुड़ी और गुस्से में उपटकर चुप रहने को कहा । 


मन का झुकाव कुबड़ी की ओर 


शा० व्या“--झुकी रानि! से ऐसा ध्वनित होता छे कि मन्थराकी शकाओं को सुनकर कुमतिका उदय 
की हो रहा है! और रानी का राग भीतर भीतर जोर पकड़ रहा हैं! जो आगे कुबड़ी के मत की ओर 
जायगा | 
संगति--राजनीतिशास्रोप दिष्टभेदनीति मे स्नेह एवं राग की कमी होना, संघर्ष को स्थान देना, और 
डरा धमका कर विश्लेषण ( भेद ) करा देना कैकेयी को याद हो रहा है', इसलिए मन्थरा के वचन ञ्से 
कट प्रतीत हुए । 
चो,--पुनि अस कबहुं कहसि घर फोरी | तब धरि जोभ कढावउं तोरी ॥ ८ ॥! 


भावार्थं--रानो ने कहा फिर ऐसा घर फोड़ने बालो बात कहोगी तो तुम्हारी जोभ बाहर निकछवा दूंगी। चौ ४ 


दो. ६४ बा. का. में सती के के बचन “काटिज तासु जीभ जो बसाई” के 
हक सु है? के अनुसार केकेयी की यह उक्ति 


4. पर परि कीन्द प्रबोधु बहोरी | कार कर्म विधि सिर घरि खोरी ॥ ( चौ. ८ दो. २४७४ ) 


९ अयोध्याफाण्डम्‌ ६५ 


भेदप्रयृत्ति पर दण्ड 


श्ञा+ ब्याब--पति-पन्नी, साता-पुथ, भाइ भाई, वथा सीत-सीद मं भेद छगाना महान दोप है। ऐसे राम 
फरने पाठी फी जिम्हा फा छेदन फरना दी दृष्द हे। 3 है! फि फैफेयी फो उत्काठीन राजदुण्ड 
ब्यपस्था फा पूर्ण शान था। जयोघ्यायासी सय फुदुंच में स्थित थे । तभी लोफमत में ऐसा दृण्द 
न्यापह्षरिफ था। 

संगवि--राजफ्रीयगुप्रम॑प्रमाओं फो प्रट फरने या भेद छााने में शास्रफारों ने भेदियों फा निरुपण 
ऊिया है, उन्हीं पिफर्त्पा फो फैफेयी पद रदी है। 


दा०-फाने सारे झपरे दुटिल उुचालो जानि। 
विय रिश्लेप्रि पुनि चेरि फदि भरतमातु एस॒झानि ॥ १४ ॥ 


भाषाय--मप्ष डी माठा ढफेपीन मुस्कुरात दुर फट्ठा कि फार्ने-देये-ठान पा फुपड़े फुरिझ शुए दोते शी 4 । दिस 
पर छी ठो दिशपरुप स हांठीं ईं। इपम॑ भा दासी ऐो भौर भी । 


पन्‍्त पुर मे चरकर्म 


हा न्‍्या --भन्तापुर मे अनापार फी स्थिति फी जानफारी फे छिऐ अमुन्दर, ढंगड़े, पदरे, फुबड़े जैसे 
म्पक्ति राजपरासाद फ भीवर नियुफ फिये जाते दँ। राजनीति इसके साथ यद्ध मी ववढाती है! फि 
अनिष्टफर घाइरी तप्पों से सापधान रइने दसु उक्त ब्यक्तियों ने अन्त'पुर म॑ प्रवेश नहीं फरना चाहिये 
दया स्नझो विश्यासाह नहों मानना घादिये। इस सिद्धान्त को पद्धते हुए भी 'फहि भरव मातु मुसकानि? 
से स्पष्ट दे कि फुपड़ा फे प्रति रानी फे सनझा प्लुझाप धोने से रसने सिर्ांन्त फी गंभरिता फो इसी में उड़ा 
दिया। इमसझा प्रभाय यह दुआ फि मथरा ने उसका अथ यद््‌ निफाडा कि भेदन फरने याले छंगड़े आदि 
म॑ मुप्त फो रानो अपयाद सम रही हे । पाल्यफाल से फैडेयी फी सेया म॑ छगी सन्यरा रानी फे द्वित में 
पूण पिद्॒पस्दा दे इसठिए उसझा ऐसा समझना सुफिसंगत फट्दा जा सफता है। 


श|ुकोदय का उप फ़ाल 


कैफेयी फा मुसफराहुट देसरुए मन्परा फो अपना श्ाफाटाप सुनाने फो अनुकूल्या प्राप्त होने फी आशा 
शोगयी। यह मुसफरणना शंका फा उपफाठ है। अथाप्‌ दूर से शंफा फो जगानेमे सन्यरा समझ गयी कि 
रानी धारान फे प्रति राग रखती (६ भी मर्द फे द्ितमं झुछ सोच रदी ऐ, यद् द्विद रान्याधिफारप्राप्ति ही 
होनी घाएिये। 

अवब' राजा और फौसल्या फे प्रति मेद उत्पन्न फराझर भी राम में रानी फे राग फो हटाने और मरत के 
छिए राग्यप्राप्तिपिपयफ उपाय बतान से फाम 'बछ जायगा। दुर्षेछप्राणी फो मोह में फसा देखकर धूर्ते 
यु्तियां द्वारा अपने मे पिश्वासप्यवा प्रो जमाफर उसको भेद्‌ फा शिफार बना छेता है ।* 

संगवि--पूषपाक्त पौ ७८ म॑ फट यचन फे अनुसार दो १४ फो सिद्धान्त फी अभिन्‍यक्ति में सन्‍्यरा 
पर फैफेयी फो रोप दोना घादिये, पर प्रसम्वा और पिद्पास ही प्रफट दो रदा छै-- 


३ हपाश्सापुपगस्दष्पों पपा पि्भमाप्तुपाद ॥ ६० ॥ 
दिप्रभ निष्यमुदूछो मिगृडाऊारपेडिता । 
प्रिपाश्यदा मिमापेद्त यत्‌ कार्प झापमेय तत्‌ ॥ २९ ॥ 
रिपंभप्त प्रियदासेदि पिसभाव्‌ कार्यमूप्छ दि । 
(मी सास «प्र १०) 


६६ भावाथे-शास््रीयव्याख्यासमेतम्‌ 
चौ,--ग्रियवादिनि ! सिख दीन्हिएं तोही । सपनेहुँ तो पर कोषु न मोही ॥१॥ 


भावा4--कैकेयी मनन्‍्थरा से कहती है “तुम तो सेरा प्रिय बोलने वाछी हो। इसकिए मैंने जो कहा है वह शिक्षा 
देने के लिए है। स्वप्न में भी सुझ्को तुम पर क्रोध नहीं है। 


मन्थरा को शिक्षा कप 
जश्ञा. व्या.--भक अन्ध कुंब्जा आदि ब्ग भेदन का कार्य स्वभावतः करते हैं. पर अपनी दासी ५8 बेसा 
कार्य न करने की शिक्षा दे रही है। रानी ने 'प्रियवादिनी? कहकर सत्कार किया दै। जिसमें क्रोधका 
अभाव प्रकट किया है | 
प्रीतिमें ग्रमाद 


ज्ञातव्य है' कि शा्ोने जिनको अविश्वास्थ कहा है उनको विश्यासाह नहीं समझाना 'चाहिये। 
स्वामी के प्रति भृत्यवर्ग का विश्वास जितने कार्य से हो जाय उतना ही स्नेह स्वामी ने सीमित रखना होता है'। 
तदनुसार राजा को अपने चरों द्वारा राजम्रासादमें रहने वाले कुष्जा आदियों पर ध्यान रखना पड़ता ह्ढे। 
राग में पड़कर इस सिद्धान्त के चिन्तन का क्रम बदल देने का परिणाम यह होता है कि दोष की संभावना 
से युक्त व्यक्तिओं में से अपने प्रिय व्यक्ति को अपवाद रूप में उसका स्वीकार करना है'। यही भूल इस 
समय केकेयी मन्थरा को प्रिय मानकर कर रही है'। 


अपने राग के कारण सन्थारा के उपयुक्त भेदनकारये की झलक मिलने पर भी उस पर केकेयी क्रोध नहीं 
फर रही है'। साहित्यशाल्र के अनुसार राग में उम्रता, जुग॒ुप्सा, एवं आल्स्य नहीं भाना जाता। रागने 
इस समय रानी की बुद्धि पर आवरण कर रखा है'। 

न्यायप्रणाली के अनुसार फहों जायगा “इयं मन्यरा दुष्टा दण्डया च स्व-स्वभाषानुरूपतया भेदजनक- 
शंकात्मकवचनोच्चारणकर्देत्वे सति इवासश्रइवासादिमत्त्वात” फिर भी कैकेयी उक्त हेतु को मस्थरा में 
६ नहीं समझ रही है'। किंवहुना शिक्षा देकर प्रीतिभाव में उसके प्रति तर्जेल का वर्जन करना 
चाहती है'। 


शंकोदय के पूर्च की अवस्था मे स्मरणीय है' कि इस समय कैकेयी के बक्ष्यमाण वचन सतीके वचन 
होने से प्रमाण हैँ जो भविष्यत्में सत्य सिद्ध दोंगे। 


चो०- सुदिन सुमंगलदायक्ू सोई । तोर कहा फुर जेहि दिन होई ॥ २ ॥ 


भावाथै--चौ० २ दो? १७ में मन्थरा की उक्ति के उत्तर में रानी कहती है कि सुमंगर देनेवाल्ा वही दिन है 
जिस दिन तुझारा कहा सरय होगा । 


मन्थरा की उठायी आपत्ति रानीको इशपत्ति है 


शा० व्या7--जिहि जनेसु देइ जुबराजू? से भन्थराने जो आपत्ति उठायी थी उसको कैकेयी ने इष्टापत्ति 
रूप में स्वीकार किया। 


भरत आदि की अकुशलता की शंका का समाधान 


हम रामहि छाड़ि कुसछ केहि आजूः में ध्वनित भरत की अकुशछता का समाधान केैकेयी 
फरर 


चौ०--जेठ स्वामि सेवक लघु भाई । यह दिनकरकुछ रोति सुद्दाई ॥ ३॥ 


भावाथे--चूर्यवंश को यह सुन्दर रीति सुशोभित चली आ रही है. कि बढ़ा भाई स्वामी और छोटा भाझे उसका 
सेवक दोवा द। 


अयोष्याफाण्ठम्‌ श्७ 
रामस्मामित्व का औचित्य 


श्ञा ब्या -भीराम फे राग्यारोहणमाश्त से औरा फा पुशछ क्या द्वोगा ? ऐसी आशंफा फरना ठीफ नहीं दे 
क्योंकि रामस्पामित्पप्रयोजिफा स्वच्छा न दोफर चुग्बुक णयुक्त ग्येछता है । यह मान्यता सूर्यर्यक्ष फी परंपरा में 
अजुस्यूत ऐै। श्रीराम फा रायाभिपेफ शासप्राप्त हे ता इस समय भरत फी उपस्थिति अन्ययासिद्ध हे, 
अथात्‌ पद यहाँ रएूँ अपया न रहें । 
शास्ररियाप्तम वर्फरधष्टि की अपेक्षा 
शाम्रमर्यादाम आल्विफभाष रसत हुए पस्रेपफ छघुभाइ' फहफर फैफेयी भरत फ्री सेपफाई फो इृष्ट 
फट पर अकुशछता फो निरस्त फरफे पिपमताफा समाघान फरदी ऐ। फिर भी तर्फेशक्ति के अभाष में 
झाम्निद्धित पिश्वास तप दोठ जाता छ जप अपने प्रियन्यक्ति आप्त यनफर अपने पूर्प्रह फो शंफाओं का 
पघ्िफार फरत हूँ । जैसे रानी नीविसम्मव वार्फिफ दृष्टि फे अभाष म॑ शांश्रसम्सतर्यप्षमर्योदा फो स्वीकार 
करते हुए भी 'पधुयिद्दाइ? फी स्थिति में आराम फ्रे राज्याभियेफफों अनुचित समझगी। (चौ० ७ दो० १०) 
घी०-रामविलड् जा सचिदु काला । दर्द मागु सन मादव आली ॥ ४॥ 
मसापाथ॑--कफेपा इपर्ख मस्परा स फइ रही है हू भोरामझा रायठिछफ सपमुष् कझू ही दे तो, दे सख्त्रि | तुम 
मनयाहा परतु माँत छा । मैं ईगा । । 
पुरस्कारघोषणा 
श्ा० स्या०--फैफेयी फो रामराजविठक सुनकर इतनी प्रीति हुई फि उसने मन्यराके दूपिव भाषफो उपेक्षित 
फर सेयफत्यफी इष्टापचि फो पुरस्यार बॉटन की घोषणा से प्रफठ फिया। 
संगवि--फीसल्पा फे टिये विधि फा आलुफूल्य ४! (चौ ३ दो १४) सन्परा फी इस उ्ति की 
प्रतिक्रिया मं कैफेया भीरास फे समदाभाष फो ज्यक्त फर रहा छे। 
चा०--फांसदयासम सप महतारों । रामद्दि सहज सुभाय पिआरी ॥ ४ ॥ 
भायाधै--प्रोशमसे स्पमाव से दा सप सावाएँ फौसक्ष्पा ८ समान प्याता हैं। । 


श्रीराम फो समा 


ज्ञा० ब्या८--भीराम फ्रे राज्य म॑ फौशल्याफा छोड़पर फैफेयीसदित अन्य सावाओं के लिए यिधि की 
प्रतिफूछवा होगी! पएसा पहने म॑ फोष्ट अथ नहों ऐ. फ्याफि आरास फा साठृता और पूम्यदाभाप हम 
पीनो रानियों में समान ऐे। श्रीराम फे इस समताधम मे सद्दत्न सुमाय” द्वारा उनका सन्त दोना भी 
परिठक्षिद ऐ। 


चौ०--मोपर फरद्दि मनेहु विसेपो । भ करि श्रीविपरीछा देखो ॥ ६ ॥ 
सायाय--मोे ऊपर दो भोरम दिशप स्नेद रफ़्त ईं थो डनड़ी भीति फी परीक्षा करके मैंने दुखा दे । 
प्रीवि फी परीक्षा 


झ्वा० स्या८--अ्रीविपरीक्षा फा स्परुप यहाँ प्रप्ट नहीं है। फिर भी ओरास फी पति फैफेयी में कैसी है १ 
इसफा स्परूप दो ४० 'सफ्डु व आयसु धरदु सिए फे उच्र में श्रीराम फे द्वारा पनगमन फी सहपे प्रतिज्ञा 
करने फे चाद भ्कट होगा। फैंफेयी माता फी इच्छापू्ि में श्रीराम फा पेसा ही घरिघ्र पूर्षमे भी दोदा रहा 
जिसफे संयप से कफेयी पी उक्ति म॒फरि परीवि परीछा दस” से समझाया है। प्रीति फी परीक्षा में 
राजनीविसिद्धान्द निम्नलिखित ऐ-- ५ हे 


+ 


६८ भावार-शाद्धीयव्यास्यासमेतम्‌ 


सदा5चुवत्या गुणकोतनेन निःदावहल्वेत च रन्त्रतुप्त्या । 
तदर्थशोचोयमसंफथामिः पश्चोडनुरागोति से वेदितव्य। ॥ 
नी: सार स० १६२९ 
इसके अलुसार श्रीराम की अपने ऊपर अ्रीति कितनी है? यह केकेयी जानती है'। साथ द्वी भरत के 
प्रति भी श्रीरामजी फी स्निग्पता सिद्ध है। 
शराम एवं सीता ने अपने गुणों से आकर्षित कर केकेयी को ऐसा अपनाया है! कि 'कीसल्यासम 
सब महतारी” के अलुसार सव माताओं में श्री रामका समभाव होने पर भी केकेयी को “अहमुत्कष्टा” का 
भाव हो रहा है'। इस प्रकार कौसल्या के प्रति मन्थरा की उक्ति' देखत गरव रहत उर नाहिन” का खण्डन 
किया है!। 
संगति--मन्थरा की असूयापूर्ण उक्ति ( भयउ कौसलाहि विधि अति दाहिन ) का उत्तर दे रही है 
चौ०--जौ विधि जनम देइ करि छोहू | होहुँ. राम प्ििय पूत पतोहू ॥७॥ 
ग्रान ते अधिक राष्ट्र प्रिय मोरे | तिन्ह के तिलक छोम्र कस तोरे  ॥<८॥ 
भावार्थ--यदि विधाता कृपा करके जन्म दे तो श्रीराम जैसा पुत्र और सीता जेसी पुत्रवधू हो । 
श्रीराम तो मुझे प्राण से भी अधिक श्रिय हैँ । उनके राजतिलक मे तुम्हें क्षोम केसा ? 
श्रीराम के अ्रति फैकेयी का ओरसभाव 
श्ा० व्या०--यद्यपि श्रीराम कोसल्यानन्दन दें तथापि 58 माताएँ उनको अपना औरस पुत्र तथा 
सीता को पतोहू रूप मे मानती हैं। उन्त दोनों के चरित्र ऐसे हैं जिनको देखकर सभी भाताएँ अपनेको 
भाग्यवाती समझती हैं। श्रीराम केकेयी को आण से भी अधिक भय हैं। उनके यश:कीतेन एवं दशन में 
सभी सुखिनी दो रही हें। ऐसी स्थिति में हपे के स्थान में विषमता अतीत द्ोने का या असूयाका कारण 
नहीं है। राजा का भी कोइ कपटकार्य समझ मे नही आता। इसको 'तिन्‍्ह के तिछ़क छोश्रु कस तोरे? से 
स्पष्ट किया है'। 'सनेहु विसेधी 'को? आन से अधिक ग्रिय' से पुष्ठ किया है'। 
भ्यउ कौसिलादिं विधि अति दाहिन! की अतिक्रिया मे केकेयी अपने छिए विधिकी अललुकूछता यहददी 
चाहती हे कि यदि दूसरा जन्म हो तो राम सिय दोनो पुत्र एव बधू के रूपमे आ्राप्त हों । कैकेयी की ऐसी 
हांदिक इच्छा 'मो पर कफरहि सनेहु विसेषो! के अनुभाव मे अकट है. । 
मन्थरा में अछया के कारण का अनुमान 


संगति--सन्धरा के आक्षेपों का समाधान करने के वाद भी केकेयी का सोच विचार इस ग्रकार 
चछ रहा है कि राज्य मे _ ऐसा कोई व्यक्ति न होगा जो रामराज्य सुनकर ढुःखानुभव करेगा। चौ० १ से 
दो० ३ में श्रीराम की सवेभ्रियता श्रकट है। उसमें मनन्‍्थरा अपवाद कैसे दो सकती है ? तथापि उसको 
झुभ अवसर पर क्षोभ और कोसल्या के श्रति विषमताभाव क्‍यों दो रहा है? इसका कारण रास- 
राज्याभिषेक न होकर दूसरा कुछ दो सकता हे। इस जिज्ञासा मे कैकेयी पूछ रही है'। 
दोह--भरतसपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ । 
दरपसमय विसमठ करसि कारन मोहि सुनाउ ॥ १५॥ 


भावाथै--भरत की तुमको कंसम दे । छल-छिपाव को छोड़कर सच-सच बताओ कि ऐसे हर के अवसर पर तुम 
क्यों दुःख कर रही द्वो ? उसका कारण मुझसे कहो । 


पयोध्याकाप्डम्‌ ३९ 


मरतश्पथ का फारण 


शा० ध्या०--चौ० २ दो० १३ मे 'रामतिढफ सुनि भा उरदाहू” से मन्‍्थरा फो श्रीराम और मर्द में 
पिपमताभाय हे ठीक नही सोचफर फैफेयी ने “भरत सपथ” फ्रा छशारण इसठिए किया कि मरत में राग 
होने से मन्धरा अधिक पिश्वस्ता दोफर अपने क्षोमफो प्रफट फरने में पुराष नहीं करेगी । 


चौ०---एक द्वि चार आत सब पूजी । अब कछु कदव जीम करि दूजी ॥ १॥ 


भायार्थ--मस्परा ने कइा -०क ही पार में सब ध्लाप्ठा प्री हो गयी। भ्रम तो तमी कइ सकती हूँ. जब दूसरी 
जीम छगाऊँ। (१) 


सेवफ़त्व म॑ सुख की आ्रान्ति का उपपादन 


ज्ञा० व्या८--मन्थरा फे फहने फा माय यह है छि जो फुछ फहना था दसने सुना विया। यवि उसके 
पिपरीत या दूसरा यह कुछ फहती है! लो मन्धरा मे द्विजिहत्थ दोप संसायित होगा। जतः राज्यासिषेक के 
चाद्‌ भरतसहित फैफेयी फे मायि सेघफत्थ फा उपन्यास करने में पद अपनी सफाई प्रस्तुत कर रदी दे। 

यदि राया साम्रास्य-धन फी सत्पात्नप्रतिपात्ति फरना चाहते हूँ तो सभी माइयों में समान रूप से 
होनी चाहिये फ््योकि इसम॑ छ्येप्तत्य अधिफारितायच्छेदक नहीं हे वल्कि घंशफी निर्मेकता है। नि्ेऊ पंश 
राइते मो राजा सरतफों सदाफे लिए सेवफ यना रहे एँ। इस दोप फ़ो स्थामिनी फरेकेयी राग मे नहीं 
समझती यह अवूमुद है 

संगवि--इतना फहफर भी जब फैफेयी भरत फे सेबकत्थ फो दोप सानने फे छिए तैयार नहीं हुई 
ठय भन्यराने अपना परसहितेपित्य प्रकट करने के देतु से स्थयं को अमागिती फट्टा । 

घौ०--फोरे जोगु कपाड़ अभागा | मलेउ कह दुःख रवरेद्दि ठागा ॥२॥ 
भाषारें--तुस्यारे दिवकी बाठ कहने में तुमको दुःख सास्स दो रहा दे टो इमारा दी भएप दे, में दी 
अमाणिनी हूँ । 
शुका का उस्नीवन 

क्षा० व्या--मरतफे सेयकत्य फो आपादक सानफर मयराने फैफेयी फ्री भकुप्छता को आापाथ 
खंठाया थया “यदि रामो राजा स्यात्त्‌ तहि भरतनिरूपित्साशंपिकस्थासित्यथाम्‌ स्पातू, भरतस्प 
स्पातन्मर्य घ॑ भग्ने स्यास्‌ (*) तथानिष्टम” इस तर्फफो रानीने 'सेयफर्त् इप्ट! कहकर निरस्त कर विया | 
पुन' सन्‍्यरा प्रस्तुत चौपाई में सेवफत्व फरो अनिष्ट मनघाने फा प्रयरन फरती द। 

दो० १५ मे फद्दं फैफेयी फे यान मे अपने प्रति रानी का झुकाब देखकर सन्यरा अपनी विश्वासपात्रता 
को जमाने फे प्रयत्न मे 'मछेउ! फहुती है। 

भरद के सेयफत्स मे अकुशख्या घवाकर स्थामिनी फैकेयी की दिपकारिता फ्लो ज्यक्त कर रही है, 
अर्थात्‌ भरत को मालिक दनाना चाहती है और फ्रेकेयी फो परतन्त्रता की वेडी से मुक्त करना चाइती 
है। 'दुःसस रछरेहि छागा' फा साय है फि दासी की हितकारिता फो र्पेश्चिद करफे राती उसकी विश्वास्पता 
मे सपेद्द फरती है। अर्थात्‌ मरस फो सदा फे छिए सेषफ वनाकर अपने को परतठन्श्रतामे रस्तनादसको 
_शप्ट झगता दे सेबकत्य से दूर रहने में क्षपना हित है. एंसा समझने मे उसको वुःसत माछुस होता दे। 

१ औ« & दो० १७ से 'पुमि कस कबढु कइ्सि घर फोरी । तंब घरि बीस कइवर्द ऐोरी, के संदर्भ सें सल्थरा 

पेसा कइ रही है। 
२ शाइस्ब बश्पता सिश्यभे पु्व॑ प्रडाजुसम्पेण प्रथिवी च बशणा मबेत्‌ ॥ राजतीतिपकाश & 


७०१ भावारथ-शास्त्रीयव्याख्यासमेतम््‌ 


दास द्वित को बात कहे रानी उत्तकी बातों न सुते तो दासों क्या करे ? उसे रानी का दोप बताने फा 
अधिकार नही है'। इतना ही वताने के अतिरिक्त वह और क्या कर सकती है' ? इसी वेबशी को मन्थरा 
प्रकट करती हुई अपने आपको दोपवती चदाती हें | 


हितकारिता में सोपाधिकत्व 


मन्थरा की हिंतकारितापर आधारित विश्वास्यता यद्यपि आजवक के उतिद्दास में बाघ या स्वरूपसिद्धि- 
से दुष्ट नहीं है. तथापि सन्थरा की द्वितकारिता जो कि उसकी विश्वास्यता की साधक देतु दे! उसे 
उपाधिरहित न होने से विश्वास्यतात्मक साध्य का सावक जानना भूछ है!। ऐसा ही केफ्रेयी को मान्य 
होना चाहिये । असूया अनृजुत्व असयतत्व एवं विद्वत्संगति का आभाव उक्त देतु मे उपाधि 5३ । जिसके 
उक्त हेतु में सोपाधिकत्व नहीं है! वेसे ही स्थार्नां मे द्वितकारिता विश्वास्यवा की साविका हो सकती है' । 
वह यहां नही है' तथा जहा विद्वत्संगति नही दें वहा अन्धत्व होने से मतिभाव भी नहीं दे'। उस अवस्था 
मे शिष्यद्धिताधानार्थद्शन भी संभव नहीं द्ोता। इसका विस्दृत विवरण श्रीराम-लक्ष्मणसंवाद में आगे 
किया गया है'। वात्पये है! कि मन्धरा विद्वत्‌ सगति मे न होने से सदा के ढिये विश्वास्या नद्दी कद्दी जा 
सकती । कैकेयी ऐसा नहीं समझ रही है इसका कारण रानी मे उक्त उपाधि के निर्णय का अभाव है । 

संगति--परद्वोहनिविष्टचुद्धिपर विश्वास करना माछिकों का स्वभाव होता है'। फिर भी मन्थराने 
सोचा कि अपने मे छोभाभावात्मक उपाधि के अभाव की कल्पना कैकेयी को हो रही द'। अत- वह 
मुझमें विश्वास्यता का अनुमान नही कर रही रे । उसके ग्रत्युत्तर में सोचती है! कि “कैकेयी का विचार 
गछत है, मैने छोभ नहीं किया है जो कि मुझमे विश्वास्यता का अनुमान कराने मे कैकेयी फो सद्दायक 
होगा”। ऐसा सोचकर मन्थरा छोभाभावात्मक उपायिका साहित्य अपने मे समझा रही हे! । 


चौं० कहृहिं झूठि फुरि बात बनाई । ते प्रिय तुम्हद्दि करई मे माई ॥ ३ ॥ 
भावाथे--जो बाते बना वनाकर झूठ की सच वनाकर कहते € वे तुमको प्रिय है तो में भी द्वे मइया! अब 
वह्दी करूँगी । 
विश्वास्यता के दाढये में पुर्वग्रह्द का त्याग 


शा० व्या८--वात वनाइ” का भाव यह है' कि वह औरों की तरह कुछ कहना कुछ छिपाना अथवा 
प्रशंसा करना अथवा असन्न करने के लिए झूठी वात को सच करके कहना उत्तम नहीं मानती वल्कि 
यथार्थ बात फो चाहे उसमे विपत्ति हो अथवा सपदा सभावित हो उसी को स्पष्ट सकेत से द्दितमाव से 
सुनाती है । ऐसा सुनाकर मन्‍्थरा अपने श्रति विश्वास्यता का भाव दृढ कराने में अवछ अलुसान कैकेयी 
को कराना चाहती छू । यथा--“/अहं हितेषिणी स्वाथथशन्यत्वे सति ( छोभासावे सति ) द्यावत्त्वात्‌” | 
लोक मे ऐसे अमुमानके अ्रयोजनका फल यह होता है! कि उक्त श्रवकृतर अनुमान ( देतु ) से द्ितकारिता 
को, समझाने के अनन्तर अनुमाता प्रेमी के वचनों को अमाण समानता है' फलत: एक दूसरे का अनुगामी 
होता है'। उसके बाद वह ग्रेमी के शब्द्श्रमाण की अचलता पर अधिक बल देता है' कि उसके बचनों को 
सुनकर दूसरा ओेमी अपने पूर्वैसतूग्रह को अम्रमाण ठहराता है.। केकेयी की यही स्थित्ति है'। 


व्याप्तिनिणयार्थ हेतु मे उपाध्यभावचिन्तन 


१५ ९ 
। 'खाध्य का यथार्थतया अज्ुभान करते समय द्वेतु में उपाधिका विचार किया जाता है' 
जाता है तो बुद्धिमान्‌ 
छोग मोह या अविवेक से वच सकते हैं । है; “हो ३ 


प्रस्तुत असंग में कहना हैं कि सन्धरा को आज तक के अपने जीवन मे भेदनीति का सफल प्रयोग 
करने के लिए राजपरिवार में उपयुक्त अवसर भिला नहीं, ताबन्मात्रेण मन्‍्थरा का हितैषित्व माना नहीं 


अयोधष्याकाण्डम्‌ ७१ 


जा सकता घादे यद अपने फो कितना मी दिवैपिणी कद्दे । साथ ही यह्‌ भी कहा जायगा कि ऐसा अवसर 
नहीं आया जिसमे सनन्‍्यरा फा दिवैपिणीस्य परीक्षिव किया खा सके। रानी ने दिवैपित्व के प्रयोसक पर 
ध्यान नहीं विया। उसफे द्वारा उपस्थापित घाणीमाप्र से मन्यरा फ्रो हिसैपिणी समझने से पइ मोहजाछ- 
में फैंस गयी ) ऐसे अबसरों पर शाज्ों फा सहारा लेने से घुजनों को संगठ्ति मे रहते हुए मी प्रमु की 
द्यापाश्रता फे फारण साध्य और देसु फे मध्य मे उपाधि या तदमाष प्रफाशित होते हैं। अन्यथा मोह फा 
छिफार होने से बचना समय नहीं हे'। 
स्मरणीय दे कि पहले दासपरनों फे सहारे फैफेयी ने सम्यरा फो छुष्टा कद्दां था (दो १४ ) स्सफे 
घिपरीद जद फुछीनता बिद्वत्संगति ऋजुता आदि गुण परीक्षित हैं, (घौ ६३ो १४) पहां रानी ने 
हिपैपित्य के प्रयोजफ़ पिद्वत्संगति और असूया फा अमाब आादि फो न समझना शात्नप्रामाण्य फे क्रनावर 
फा ग्योतफ है।। फछत मन्यरा फे जाल म फैंसकर स्पवंत्रदा के ताम पर कैझैयी द्वित की श्रान्ति में 
भरत को अद्दित फी ओर छगाना चाहती हैः अर्थात्‌ मरत सेषक यनते ह तो उन पर राज्य फा बोझ 
नहीं आता, यदि राजा यनते दूँ दो संपूर्ण प्रजाफे पान छा यो उनफो बहन करना पड़ेगा जेसा सिन्रफूट 
में श्रीसमने भरत से फह्ा हैः “घाटी बिपति मे सवहि मोहि भाई । तुम्ददि अवधि भरि यढड़ि फठिनाई? ॥ 
(चौ ६ दो ३०६) 
संगति-राजनीविश्ाय्र फे उपाययिकल्प प्रफरण मे कहा हे' कि दिसैपित्थ की यात न मानने पाझों 
को उपेक्षित फर देना चादिये। रानी फा झुकाव भीराम के तरफ वेखकर अपने द्वितेपित्व की उपेक्षा किये 
जाने पर मन्थरा उपेक्षात्मक दुण्ड फा उपक्रम फर रही हे ! 


चो -हमहु कददप अब ठकुर सोह्यठी । नाहि तो मौन रहव दिलु राती ॥४॥ 
भापार्थ--मैं भी अ्रप ठकुर सोहाती ऋष।द्‌ जो अच्छा फगे पही कहँगी । नईं ठो दिन रात झुप रहूँगी । तुम यदि 
यही चाहत दो कि भरद्धित या द्वित का विचार छोड़ कर माछकिन को श्रो भरछ्ठा करेगा दह्दी कहा 
जाय तो यैसा दी कदने फे अछारएा में कर कुछ भी म गांखंगी ! 
अकुश्चठता फा सन्देद 
श्वा० स्या८--मैं दासी हूं, माहिफ फो प्रसप्नता देख फर ही घोछना है! इसछिए मैं बैसा ही वोदगी | 
खब आपको मुझ पर घिद्धास नहीं है तो घोछता ज्यर्य हे। 
सन्थरा फे फहने करा तास्पय यह है' फि जब प्रतारक छोग लाकर पुत्र फ़ो सदा फे लिए अपने अघीन 
चनापेंगे ठव समझ में आयेगा कि फौन दिसेपी हे १ 
सू्यपंक्त फी रीति पही हे छि यह स्थर्गसुख़ फी बराबरी रखने थात्म राजसुस्त भोग सके | शासन 
छरने में राज्य का आनन्द भरत के मास्य में नहीं हैः दो देय फी इच्छा । 
संमध्ति--फिर भी यह दासी संकट में सी दास्य घ्से का पालन फरती रहेगी। 
पौ -करि कुरूप विधि परचस की हा । बवा सो छनिअ लय जो दीन्हा ॥ ५॥ 
माया्ध--दो १४ में कुरूपा के यारे में फैकेपी के वचन का उत्तर देती हुईं मण्परा कदइती दे कि बिधाता ने 
मुझे कुसपा पण्ताया। उस पर भी पराधीना दास्सी कर दिया। जो बोषा वही तो काटता पड़ेगा। 
जर्थाद्‌ बडी दी मिफेणा । 
दितिपित्य का विय्वाक्रम 
झा० व्या>--माछिक फे हद में अपने प्रति आप्तवानुद्धि षनाने देतु अनुजीपिशसप्रकरण फे 
अनुसार मृत्य का फर्तेस्य यहदी डे कि फेसा भी कष्ट हो उसको घह सहन फरे, साकिझ का साथ कमी-न 


ड्र्‌ भावा्-घास्तीयव्याख्यासमेतम 


छोड़े । अपना कहना न सानने पर दासी मन्थरा दूर छट जाती पर बैसा उससे नदी सोचा और न किया। 
अपितु दैव के नाम पर वह ढुःख सहन कर भी कैकेयी की सेवा करते रन 208 0008 पा है! 

“्यवा सो छुनिअः का भाव यह है! कि अपने कगोनुसार देव ने जो कुछुपता देकर दासीत्यप्रयुक्त 
परवशञता का योग दिया हैं उसको वहन करना द्वी होगा। उसमे सन्यरा का कोई वह नह हे। 

'छहिआ जो दीन्हा? का भाव है. कि देव के अनुसार स्पा मिनी को सेन्कत्य का संकद आने वाला रे 
( चौ. ८ दो. १५ ) तो उसके साथ वह भी संकट सहेगी। दस प्रकार अपने में मालिक का विश्वास जमाने 
का उपाय कर रही है े 

देव पर उपालंभ 

चौ. ७ दो. १४ में कैकेयी के कहें. 'घर फोरी' के आरोप के मत्युत्तर मे अपने पिद्युनत्वदीप को 

छिपाने के छिए भाग्य को उपालंभ देकर संथरा अपने निर्देपिता की वाक़ जग्माना चाहती है । दितावह 


लक ॥- 5 हि 


विषय फहने पर भी कैकेयी के समझ में मन्थरा की बातें नहीं समझमे आ रही ८ उसका काएण मन्यरा की 
टृष्टि में देव ही है!। संकट या परतन्त्रता भोगना हें: तो वह होकर रहेगा। ऐसी कब्पना देकर मन्धरा 


अपना हिवैषित्व समझाना चाहती हे । 


मन्धरा में आपृत्यसन्देह का निराम 
जब मनन्‍्थरा ने इतना कहा तव कैकेयी के हृठय में उसके आप्तत्व का संन्देह जेस जैसे निरस्त हुआ 
वैसे बैसे केकेयी को भरत का सेवकत्व दु'खद प्रतीत हुआ । इस आशय की समझकर मसनन्‍्थरा अपनी 
उपेक्षा एवंउदासीनता में दृढ़ता कर रही है'। 
संगति--अपने को रागद्रेषविद्दीना दिखा कर दासी अपना विचार ताटर्थ्यरूप में व्यक्त कर रदी है.। 


चौ०--कोउ नृप होठ हमहि का हानी | चेरि आड़ि अब द्वोव कि रानी ? ॥ ६ ॥ 
भावारथ--चौ० ३-४ दो० १७ मे श्रीराम के राजतिलक के समर्थन में कहे बचन का उत्तर देती हुई सनो कहती हे 
कि कोइ भी राजा हो उसे क्‍या हानि है ? दासीपन छोड़कर रानी ठो होना नहीं हैँ। श्रीराम या भरत 
किसी के राजा होने पर भी उसकी दासीयूत्ति ठो यथावत्‌ बनी रहेगी । 


संगति--अब प्रइन हो सकता है. कि जब सन्धरा को दासी रहना है' तो वह स्वामिनी के कारये में 
हस्तक्षेप क्‍यों कर रही है! ? इसके समाधान मे आगे कद्दती है'। 


चौ०--जोरे जोगु सुभाउ हमारा | अनभलछ देखि न जाई तुम्हारा ॥ ७॥ 
ताते कछुक बात अलुसारी | छमिअ देवि वडि चूक हमारी ॥ ८ ॥ 


भावाथे--हमारा स्वभाव तो जछादेने योग्य है। फिर भी तुम्हारा जकुशल होना मुझसे नही देखा जाता 
अतः इस स्वभाव के अनुसार कुछ कह दिया है जो हमारा बड़ा अपराध है | देवि ! क्षमा करो । 


अक्ुुशल्तानिरूपण कर्तव्य, 


शा० व्या०--आपकी मै दासी हूं। मेरा कर्तेव्य है! कि सेवा के ऋण से मुक्त हो जाऊँ। भविष्यत्‌ की 
विपत्त को देखकर यदि मैंने मालकिन को नहीं समझाया तो नीतिशासत्र के अलुसार मैं वाच्या 


( निनन्‍्या ) हो जाडेंगी। आपकी दुर्गेति को सोचकर ही मैंने उक्त विषय का प्रकाशन कर अपने को 


वाच्य॒त्य ( निन्‍यत्व ) से बचाया है। हितैषी तो मे हक 
के घरेल व्यवह्यारों में दासी ने बीच हित की वात कहता ही है'। में जानती हू कि सवा 


मेरा स्वभाव है। यदि बह आपको & 2 अपराध द्वो सकता हैं। स्वामिनीको ठुःख से हा 
अच्छा नहीं लग हे 
-क्षमाप्राथिनी हू । रद्दा है अथवा अनिष्ट अतीत द्वो रहा है 


१० अयोष्याकाण्डम छ्ड्‌ 


बारे जोगु सुमाछ” फा यद भी भाय है! फि मालिक फा हिस पेखना दासी का स्थभाध है! षिघाता 
द्वारा निर्मित है, बह वो जलने पर ( सत्यु दोने पर ) ही सिट सकता है । 
संगठि--झियजी फट रहे दें कि एफ तरफ से मन्यरा दुःख की फर्पना सुनाती है, दूसरी तरफ से 
अपना कापश्य छिपाही हुई फैफेयी फे तरफ देख रही है । 
दोदा--गूढ़ कपद प्रिययचन सुनि तीय अघरयुधि रानि। 
सुरमायाधम बैरिनिद्दि सुदृद जानि पतिआनि ॥१६॥ 
मावार्थ--स्वभाव से ही स्पी अस्पिर पुद्धिषाफ्ी दोतो है । इस समय रासी ठेके पी भी स्थरो-पुदिबसी हो शयी। 
उसने सस्यरा के प्रियय्र्यों में छिपि कपट को णे समझकर उसी को अपन्तों शितकारिणी सामा । 
शिवजी कइते हैं. छि यह देवमाया दे जिसके बहा में रामीने सप्रु को मित्र समझा । 
घर्म या आप्तत्व फा सवपरण 
शा० स्या«--मन्यराने अयहित्या ( फपट फो छिपाना ) से अपना फपट छिपाफर स्पके आप्तस्थफों प्रकट 
फरने फा दाँव ठगाया है.। यददो घर्म या आप्तत्य का संपरण है'। मनन्‍्यरा का यह फाये छोक्रयात्राषित्‌ 
कृदस्पति फे मत फा पौषफ है! । ( * ) 
सुरमाया 
चालफाण्ड फे सतीप्रसंग में “निजमाया? ( चौ० ६ वो ५३) और “राममाया? ( चौं० ५ दो० ५६ ) 
में जो मगप माया की छे उसकी अनुगामसिनी 'सुरमाया? है'। उसी फो फोसल्या ने 'बिधि! या 'यिधावा? 
फह्ा हे ( ची ७ दो० १०५ ) 'सुरमाया? से फ्िवजी संफेत फर रहे दे कि देयवाओं फी मेरणा से सरस्वती 
फा यह फाये दे । निष्फर्ष यह फि भगयदिष्छा ही साया है'। उसका बोघफ-एास्द मर का आपेष्टा है, 
उसके यश में देय ई । उनके द्वारा सरस्वती प्रेरिता प्रयोग्यकरश्ी है । इस प्रकार उक्त में स्वतन्त्रता 
प्सी फो नहीं दे । 
मन्यरा दासी ने स्थासिनी फे भ्घीना होना चाहिये पर पेसा न द्योफर बिधाता फे अनुसार स्पय॑ 
स्यामिनी दासी फे अप्रीना हो गयी । फछत' मरत का सेयफत्थ रानी फो फष्टप्द्‌ मालूम होने छगा। 
संगवि--भ्रीराम, फौसल्या एप राजा से भरत करा प्रेम शटूट दे । उसको उठ्टा फर भरत को भीरास 
के सेवफमाय स फंसे छुड्ाया जास, यह प्रश्न फेफेयी फे सासने हे । 
च|०--सादर पुनि पुनि ६छति आंद्ा । सबरांगान सगो जज्ु मोहो ॥ १॥ 
तसि मति फिरों अहृद जसि मारी । रहसा चे|र घात जन फाघो ॥ २ ॥ 
सावाय॑--कैडेपी प्रेसमात में बारंबार पूछ रदी दे । मिझजी के गाम॑ की भावाज से दरिनी भराहटा दो जाती दे 
पैसे दा दासी के वचव से रामी मोहिता इने छगी। डैसी होनद्वार है बेसी कैकेपी की शुद्धि छिर 
रावी ( “गपी गिरा मठिफेरि! रा परिणाम ई )। अपलो पाठ यन रही है पेसा जानकर गद बासी 
संघ दी मन प्रसप्ना हुई । 
कैफेयों का म्ति में विपरीतार्थद्कषेन 
क्वा० प्या०--'धप्ति सप्ति? फा भाव यह द फि घौ ७ दो (४ से दो १५ तर फह़ी पक्तियाँ में फेफेयाफा 
जो मतिभाष व्यक्त था उसमें रानीफो विपरीतार्य दिखने छगा। स्ति से यह स्पष्ट किया कि फैकेयी बुद्धि सती 


3 संबरणम्रान्न हि प्रपी छोकृपाभाविर) | ( क्रप श्वा० 3॥) ) 


७्छ भावार्थ-शास्तीयव्याख्यासमेतम्‌ 


पूर्वग्रह में व उदित होने छगा । भावी!” का 
है! तब भी फाल ( ठैव ) के प्रभाव से रानी को अपने पूर्वश्रह में शकाभाव उद्त होने दा 
भाव यह है' कि प्रभुसंकल्प के ( चौ. ९ दो १० ) अनुरूप घटनाक्रम ( दोनहार 2, के अनुसार ही कैकेयी 
की बुद्धि में उछटफेर हुआ । इससे यह भी स्पष्ट होता दै' कि केकेयी मलत' निदुष्टा हैं | 
शरणागति न होने का फल 


ज्ञातव्य है' कि कैकेयी यदि शञास्वल के मरोसे प्रभु की गोद मे बच्चे की तरह अपने को समपंण करने 
में अम्यस्ता रहती तो प्रभु ने उसको विपरीतप्रकाशन से बचा छिया होता | शरणागतभाव के न रहने से 
शंकोदयमात्र में वह क्षुद्रा दासी की गोद में बेठने जा रही है'। इसलिए प्रभु की उपेक्षा का फछ रानी को 
भोगना पड़ेगा | लेकिन पूर्वोपासित धर्मप्रेम केकेयी को पुन" विशुद्ध स्थिति में पहुंचा देगा । 
प्रचन पूछने में आदरभाव 
मन्थरा स्वहितैषित्व में रानी को प्रासाण्यवद्धि करा रही है'। संथरा में हितावहत्व की बुद्धि हो जाने 
पर अनादर का भाव (चौ ५-८ दो १४) हटा कर कैकेयी उसके प्रति अपना आदर दिखाने लगी। 
धपुनि पुनि पूछति? का भाव यह कि मन्थरा के कहे 'राम हि छाडि कुमल फेहि आज? | जेहि जनेसु देइ 
जुबराजू? से श्रीरास के स्वामित्व मे' रहते भरत के सेवकत्व में केसा अहित है, यह विशेषरूप से 
कैकेयी जानना चाहती है'। यह “पुनि पुनि? से स्पष्ट है'। उसका उद्देश्य सन्धरा के प्रति आदर है'। जो 
चौ, १ दो. १९ में प्रकट होगा | 
संगति--रानी की जिज्ञासा को ध्यान में रख कर उसके प्रश्न का उत्तर देने की प्रस्तावना में 
सन्थरा बोलती है'। 
चो,--तम्ह पूछहु में कहत डेराऊं | धरेह मोर घरफोरी नाऊ ॥३॥ 
भावाथें--मन्धरा कहती है कि उत्तर तो मेरे पास है, पर मैं कैसे समझाऊँ ? आपने तो मुझे घरका भेदिया 
कद्द कर दोषवती कहा है तो में जागे कहने से डरती हूँ ( क्योकि आपको मेरे यारे से आप्तत्व का 
निश्चय नहीं है ) । 
शा० व्या०--सादर पुनि पुनि पँछति” से केकेयी मे मन्‍्थरा के बचन से होने वाछा मोह दिखाया। 
यहाँ पूँछहु? से रानी के चित्त में शंका की वृद्धि दिखायी | 
संगति--घर फोरी? के आरोप को (वी ८ ढो १७) रानी के हृदय से मन्थरा ने केसे निरस्त किया ? 
तथा चतुराई से शंकात्मकभेद में केसे दढ़ता छायी यह शिवजी सुना रहे हैं। 


चौ.-सजि ग्रतीति बहुबिधि गठि छोली । अवघ साहसाती तब बोलो ॥४॥ 
भावाथे--बहुत प्रकार से अपनी बात को अच्छी तरह गढकर मन्धरा ने अपनी विश्वास्यता को बनाया । सब अवध 
के लिये साढेसाती की तरह दु खदायिनी ढासी घोली । 
आप्रल में दोषदर्शनाभाव 
शा० व्या०--यद्यपि चौ ७ दो. १४ से चौ ? हो १७ तक की उक्तियोँ में कैफेयी के मनस्‌ मे भाव 
बना रहा कि सन्‍्धरा की तरह कुलक्षण छोग भेढ छगाने वाले दष्ट होते हैं. पर अपने प्रति सन्थरा वैसी 


दोषवती नहीं है'। स्वासिनी की इस सूक्ष्म आप्रत्ववद्धि को दासी ने रखकर रानी फो भेद का शिकार 
वनाने की युक्ति सोची । ; हि मा मम 


सजि प्रतीति! का भाव है कि रात्नी का विश्वास ग्राप्त करते हुए मन्थरा ने 'मतिफेरी' भे 
(अहुविधि गठि छोली? के अन्तगेत आत्मानं सततंरक्षेत! के अनुसार कैकेयी को सोचने "मे विवश 


अयोष्याकण्दम्‌ आप 


फिया फि राजा, फौसल्या और भोरास सभी एफसत शोफर उसका और उसके पुत्र भरत का पिनाझ्ष 
फरना चाहते ई। 
४ भेद को उपादेयता 

नीतिसिद्ान्त मे यहाँ तफ फद्दा दे फि राजनीति में आन के याद पिता भी पिश्वास्य नहीं रइता। 
“पितर्यपि न पिश्वसेत! (नी सा ज॑ (३४ ) औरों को याद ही कया ९ ऐसी स्थिति में भेदनीसि छा 
प्रयोग आरप्तां फी दृष्टि म उपादय द्वोवा दे । इस दृष्टि से सन्‍्धरा फा फाये दुष्ट नहीं है। 

इतनी मद्दवी अमेश् राजशक्ति फो भेदप्रयोग से उल्टाने में उशता मन्यरा कैकेयी फो पश्ञ फरने में 
सफला होने जा रही दे इसका फारण दासी फे प्रति फैफेयी फी काप्तत्वयुद्धि दे! । 

विपरोतार्यदर्शन म॑ युक्ति 

शातज्य है फि रानी काउ्पटना से राजा फो अर्थप्रघान समझ रही है! फ्योंकि फुमार भरत फी 
अनुपस्थिति में मद्वाराज अपनी संपत्ति फा स्थानान्तरण फरने में शीघ्रता कर रहे हैँ, जिससे कौसल्ष्या के 
मनोरध फी पृवि द्ोगी । इसी फो प्रमु ने 'वघू बिहाइ बड़े हि अभिषेयृ” सोचकर अनुतित समझाया। 

राजा में अर्थप्रघानता फा अमाव 

यस्तुस्थिति यह है फि राजा और भीराम निरन्तर धर्मे में स्थित हं। इस भरे पर फ्रैफेयी विचार 
नहीं फर रद्दी है । भरव फ्री अनुपस्यिति में राज्योत्सथ फा फारण फिरीट फे टेड्रेपन से सूचित आसम्रमरण 
है। इस वध्य से फैफेयी अवगवा नह पे! इसब्ए यद्‌ राजा की मनोग्रत्ति को अथेभघान समझ कर 
भेदनीति की ओर भपरपृत्त हुई । । 

। .. प्रेमविराधिकार्य म साधक-बाघक पिचार 

प्रभ--राजा एवं भीराम से यिपरीत ोकर फाये फरने में रानी दोपयती दोगी या नहीं ? 

उत्तर--कहना यह हे' कि नीतिसिदान्त म प्रेमफी शृत्या करने घाठा सझान्‌ अपराधी माना गया है । 
यही सोच फर रानी मधिष्यत्‌ में घोप गुण फे साधक-वाघफ फे चार में बिचार फरना चाहती है। और 
उस संबध में दासो फा मद जानना घाहसी है। उसफे उत्तर में सम्नि प्रदोति यहुयिधि गढ़ि छो्मे! 
से ब्यक्त घोनेयाठा दासो फा फयन दे । 

संगवि--मन्धरा पारस्परिफप्रीति फो स्पीफार फरते हुए प्रधमत* श्रीतिबिपरीत फार्य फरने मे दोप 
समझठी द्दे। 

चौ -प्रिय सियराय्ु कद्दा तुम्द रानी !। रामदि तुम्द प्रिय सो फुरि बानो ॥५॥ 

भाषाधं--हे पारी ! तुमने कद्दा कि सीठाराम इसको स्पारे हैँ भौर भीराम को भी मैं प्यारी हूं, यह बात सच है। 


प्रीति के पेपरीस्य में दोष 
झा स्या -श्रीति फे पिपरीत फाये नदीं ऋएना चाहिये। नीतिशास्न में यिना षिचार फिये सिश्र फो त्यागना 
सद्दान्‌ अपराध साना गया दे ।" अत" नीति फी दृष्टि से सन्‍यरा स्वीफार छरती है फि फेफेयी माता भौर 
पुत्र भी राम में परस्पर मैप्री हे। 
संगति--मैज्नी के संघ मे नीविसिद्धान्व फा पिशेष विघार आगे स्पष्ट फर रही हे। 
चे०-रह्दा प्रथम अब ते दिन बीते | समउ फिरे रिपु होई पिरीते ॥ ६ ॥ 
भाषाभ--पहछ जो पात रद्दी बह भय पहीं हैं। क्पोंडि समप यद॒छ थाने पर प्रिय भी शजु दो जाता दे । 
पिन न कि 8 2 2 80 ३: 2.0 


७६ भावा4-शास्तीयव्याख्यासमेतम्‌ 


मित्रता का अस्थायित्व 


श्ञा० व्या०--नीतिशाखकार कहते हू कि भिन्नता या श॒न्नुता वस्तुगतज़ाति या उपाधि के समान धर्मा मे 
स्थिर नहीं रहती। भिन्नता या शत्रुता का कारण राग एवं अपराग न दोकर पकारिता और अपकारिता 
है'। (१) निष्कर्ष यह कि आज का शत्रु कछ मित्र चन सकता ६ अथवा आज का मित्र कल शात्र हो 
सकता है'। इतिहास मे विश्वासघात करने वाले मित्रों के अनेका उदाहरण मिलते ढँ। मन्धरा का यह 
सकेत प्रथम” और अब” शब्दों के प्रयोग से स्पष्ट दं। जिसका अर्थ यद्दी दे कि वे पहले मित्र थे, 
अब नही हैं । अर्थात्‌ पहिले प्रेम रखते थे, अब प्रेम नही रखते। अतः वे उपफारी न होने से विश्वास 
की स्थिति में नहीं हैं। समय आने पर सच्चा ग्रेम प्रकट द्वो जाता है'। वर्तेमान समय की घटना बसी ही 
है जो कि मित्रता के अभाव को राजादि भें सूचित फर रही है' । 

प्रइन--कैकेयी यद्यपि सब माताओं में श्रीराम का प्रेम समान मानती है अपने प्रति तो श्रीराम 
का विशेषश्रेम स्वीकार करती दे'। ऐसी स्थिति मे श्रीरास केकेयी के प्रतिकूल केसे दो सकते 6 ९ 

उत्तर--श्री रास अभी खवतन्त्र नहीं है, राजा के अधीन होने से उनके अभिभावकत्व मे रहकर वे 
जैसी शिक्षा पावेंगे वैसा बर्ताव करने के लिए बाध्य होगे। फेकेयी के प्रति स्नेह कम होने से राजा सौत 
कौसल्या के वहकावे से पड़कर श्री राम को केकेयी के विपरीत आचरण करने मे प्रदत्त कर सकते है । 

सेगति--कौसल्या की छिपि हुईं उम्रता तथा राजा एवं श्री राम के अपकारकसाव को सन्थरा 
समझा रही है'। 

चौ०--भालु कमलकुर पोष निहारा । विनु जल जारि करइ सोड़ छारा ॥७॥ 


भावार्थ--जैसे कमर के फ़ूछ को खिलाने वाछा सूर्य ६, पर जऊू को सुखाकर वही सूर्य विना जल के कमठ को 
जराकर राख कर देवा है। 


प्रीत्यभाव का दृष्टान्त 


शा० व्या०--कौसल्या ने श्रीरास जैसे गुणवान्‌ पुत्र फो पाफर समस्त आप्तजनों को सुखी वनाया है, 
विवाहान्त संस्कार होनेतक भरत आदि पुत्रा के साथ एकसा व्यवहार कर सूर्येकुल को सुशोमभित किया है. । 
फिर भी प्रीतिरूप जल के अभाव मे अभी चह भरतरूप कमल के शोपण में छगी है!। इसीलिए भेद फा 
अवसर भ्राप्त है। स्नेह मे संबध जुटता है, शोपण में टूटता है'। 
संगति--कौसल्यापर दोषका आरोप कर सन्थरा उसके मनोनीत कार्यके प्रतीकारमें प्रेरणा दे रही है। 
चो०--णरि तुह्ारि चह सबत उखारी। रूंधहु करि उपाउ बर बारी ॥८॥ 
भावार्थ--सौत ( कौसक्या ) तुम्हारी जड़ काटना चाहती &। उसको जछ से अच्छी तरह सोचकर जड़को जमाने 
का उपाय करो । । 
४ े 
काल और काय का योग 
शा० व्यट--मन्थरा कह रही हैं. कि अभी कुछ विगड़ा नहों है'। आप इस अवसर को न चूकें। भरत के 
संभावितशोषण कारये का अबरोध करें | 5 
राजनीतिसिद्धान्तालुसार काछ और कायें के योग को नहीं चूकना चाहिये। मन्थरा ऐसे अवसर का 
संकेत कर रही है। इस अवसर का छाभ उठाकर यदि केकेयी तत्काछ प्यत्न करती है. तो रानी की कुशलता 
स्थापित हो सकती है'। 


3. कारणेनेव जायन्ते मिन्राणि रिपवरुदया (नी. 4७२?) अनुरक्त विरक्त॑ पव वन्मिश्नमुपकारि यत्‌। (नी.८।७७। 


अयोध्यफ्ाण्दम्‌ न] 


मंगति-मन्यरा फा फदना द फि फैफेयी फा अपफार करने में राजा और पीरास की संभाषिद 
कुचाछ फा मूठ फौसस्या हे। 
दो०--हम्ददि न सोचु सोड्ागबठ नित्रबस जानठ राठ । 
सन मलोन झुद्द मीठ नुपु राउर सररझ सुमाठ ॥ १७॥ 
सावार्थ--अपने सुदार के यछ पर तुम राजा को अपने था समझकर घिलश्निस्ठा दो । राजा सीठा बोकने वाझा मसबसू्‌ 
का कपरी है, तुम सीध सरझ स्थमाव बए्छी शो, इसछिए्‌ राजा का विश्दास करती दो । 


क्ैकेयी के अ्माद का फल 


श्ा० स्या८--पठि की प्रसन्नवा से छाभान्यित हो जघ सौमाग्यघती स्थ्रियां राग फे क्घीना होती हं तब 
उनका राश अन्यान्य पिचार्रों फो प्रतिमध्य फरता हुआ प्रमाद को जन्म दृता हे। प्रमावयुक्त सौभाग्य के 
बट पर ख्रिया पति फ़ो अपने पश्च में समझने छाती हैँ | इसी फो मन्यरा ने कहद्दा कि गहदी केफेयी का 
मोछापन है, जिसका ढाम लेफर फौसल्याने अपने पुभ्रक्ो राज्याधिफ्त फरनेफी सफछ योजना चनायी है । 


संत का भय एवं अमिप्राय 


मन्यरा ाय फहेगी कि फौसल्याफ्यो अपने ईप्सित फाये में फैफेदी का मय था । इसीलिए उसने भपने 
फार्यक्रम से ध्यात इटाने फे लिए दी राजा फो फैफेयी फे प्र विख्ाघटी भेम विखाने में उत्सुक किमा 
राजा सीटी-सीटी घार्ते बनाकर घनायटी प्रेम दिखाने फे टिए अन्त'पुर में आते रहते हैं। इसफा पद्देप॒ष 
यही फि सन में फपट रखनेयाछा राजा सरछस्थमायधाढी फैफेयी फो भुछाषा देना भाहता है। ( चौ० 
५-६ दो० १४ ) फैफेयी फो जो रागप्रयुक्रममाद और सुद्दाग का आस्ट्राय दे उसमें फैसी रानी कौसस्या 
फे आन्वरिक शपिप्राय फो नहीं समझ सफी हे'। राजा फी प्रीि में फ्रेफदी फो झघा बनाकर सौठ अपने 
मनोरध को पूर्ण फरन जा रही हे । 

ऊैफेयो फे राजानुराग मे सरलतादोप 

५निजमस जानहु राए! के समर्थन मे फैफेयी के प्रति वास्तपिक थरुर्राक्त फा कारण झ्ापण्य है) 
पातिप्रत्प फे साथ फफेयी उत्तमफो्टिी पन्नी छे। राष्ट्र फे अन्दगेत आम्यन्तर गृहम्ययस्था में उसका 
सहफ्त्यपूर्ण स्थान दे जिसफो घौं० ७ दो० २३ म 'राजु फरव से संफेतित फिया गया है। उसफे स्वभाष औौर 
गुणफा कादर फरने में राजनीतिक फ्री दृष्टि से यह त्ाम था फि अस्त में सेदनीति फो अपकाए 
मिदना कठिन था। अतः राजा कैंफेयी फो अपने से दूर फमो नहीं रखना चाइते थे। फ्रेफेयी का सत्कार 
फरने म॑ राजा पी भी स्यक्त थी । सर मुभाउ? फा भाप दे फि सेवाफाये फे अतिरिक्त अन्य स्थिदि के 
बारे में फंफयी फो रच न रद्दी। अपने पाविप्रत्यप्रयुक्त प्रीति कौर गुर्णो स फैफेयी ने राज को जीव छिया 
था। अन्दुम्रति सन्‍्यरा क्रेफेयी फे इस स्पभाषक़ी सरझ्ता को छोप सताकर नि्दुष्ठा फौसण््या में सौदपन 
फ्य दोष छगाठी हे। 

फासदया फ निर्दोपता छी मोमासा 


यहाँ पिचारणीय पिपय यद्द हे फि भरत की मापिनी ढीर्ति के योगने दी उनको सासा के पर खाने स्ये 
भेरणा दी। उनका घरित्र शुचिप्तीखस्नेइ से ओोद्प्रोत दे, भावी यप्तसूफ़ा धआाकर्षर दे को चित्रकूट की 
समा में हुए निणय में प्रकट दोनेषाड़ा दे। 

इस भसंग में यदू भी स्मरणीय दे कि म्रमुछा जिससे एकथार सम्बंध स्थिर हो जादा दे छसको उचित 
छार्य फरने में दी प्रयृत्ति होती हे। यदि रदाचित्‌ देवयोगसे सेमरफे दा्योंसे अमुच्चिद या अकीर्दिकर काये 
हो जाता ह हो स्पयंप्रेरित न होने से यह फार्य पेय को दोप का भागी नहीं बनाबेगा। भ्रस्युद घैंसे छसे को 


७८ भावाये-शासीयव्यास्यासमेतम्‌ 


अभुप्रेरितघटना समझनी चाहिये। तत्काछ में वह काये दोपपृण दिखायी पड़ने पर भी परिणाम में 
यशस्कर होता है.। केकेयी, श्रीराम, श्रीसीता, नारद, सती, आदि के चरित्र इसमे उदाहरण कद्दू जा सकते 
हैं। अत' सिद्ध हुआ कि भरतको ननिद्दा् भेजनेमे कौसल्याका सवध न होने से, उसपर, आरोपित युक्ति 
भरत के अकुशछता की साधिका कददना आरोपमात्र है।। कैकयी इस सूदमतर्त्त पर ध्यान नदी दे रही है | 
किन्तु मन्थरा के वचन को प्रमाण मानकर 'कोसल्या दुष्ठा' एसानणय कर रहां ६ | 

सगति--कौसल्या के पूर्वतिह्ास मे केक़ेयी को ऊपठ की कल्पना करनेके छिए कोइ तक नहीं था | इस- 
लिए कौसल्या के चरिज्रविशेष में दोषविशेष दिखाकर उमके सम्बन्ध में कंकेयी की जिज्ञासा जागृत करन 
हेतु कौसलया में दुश्वारित्य का निरूपण कर रही हे । 

चौ०--चतुर गंभीर राममहतारी । वोचु पाई निज बात संबारी ॥ १ ॥ 

भावार्थ--भीरामकी माता कोसएया गभोरा है । सुपकी साधकर अवसर देख बड़ी चतुराई से वह अपनी बात 

को यनाती है। 
चतुरता एवं गांभीये 

श्ञा० व्या८--आन्तरमावों का पता न ठगने देना गांभीये है। चतुरता का अथ दे परातिसन्वान- 
कुशलता | कौसल्याने चतुरता यह्‌ दिखायी कि राजा को आपके तरफ छूगा दिया जब कि राजा आपके 
बश्ष में नहीं हैं 

पनजवात सवारी” का भाव यह है! कि अपने पुत्र श्रीराम को राज्यश्राप्ति कराने भे कौसल्या यत्न- 
शीला है। उसकी “गंभीरता” यही है. कि किसीको उसकेसनोभाव का पता न ढुग सका। “चतुरता? यद्दी कि 
इसी बीच में कॉसल्याने 'मन भलीन मुहमीठ” से राजा को केफेयी की ओर आक्ृष्ट कराकर उसके झुठावे 
मे रखने की चाल चली है । 

संगति--राजकीय राभराज्योत्सवमे भरद वाधक हो सकते थे इसलिए “निज वात सवारी? के अन्तर्गत 
वाधक भरत को दूर करने में चतुरा कोसल्या की क्या चाल है ? सन्धरा बता रही है'। 


चौ०--पठए भरत भ्रूप ननिअउरे। राममातु सत जानब रउरे | २॥ 


भावार्थ--राजा ने भरत को ननिहाछ सेज दिया हैं। इसमे श्रोराममाता की मंत्रणा हैं। इसको तुम अच्छी वरह 
समझ लो । 
ह राजा मे ग्रीत्यभाव का अनुमान 
शा० व्या०--भरत को ननिद्याल में भेजना और उनके अभाव में रामराज्याभिषेक की तैयारी करना--ये 
दो्‌ द्देत केकेयी के प्रति राजा की प्रीति न होने के अनुमापक हैं। यथा-द्शरथः त्वयि प्रीत्यमाववान्‌ 
भातुगहदे भरतकर्मकर्रेपणकर्टेत्वे सति भरतानुपस्थितों रामराज्यामिपेककरृत्वात्‌ू , इस अनुमासग्रणाडी के 
अन्तर्गत साध्य ( ओीत्यभाव ) के अज्ठमान मे यह तर्क हैः कि यदि क़ौसल्या को भरत से भ्रेम द्ोता तो 
इस उत्सव सें वह भरत को बुलाने पर वल देती । इस ग्रकार त्कयुक्त अनुमान कराकर मंथरा रानी को 
राजा से विश्हिष्ट ( दूर ) करने का यत्न कर रही है, उसको राज्योत्सव के आनन्द से घिलग करना 
चाहती ढे। । 
... ज्ातव्य दे कि चौ० २ दो० १६ को व्याख्या में अतः प्रस्तुत अनुमान मे दोप दर 
हे लि प दशन केकेयी को नहीं 
ही रहा हे । जो उपाधि कहदी गयी है उससे केकेयी अनभिज्ञा है.। 


,- सेंगति--सन्थरा कौसल्या के कपटकाये को स्पष्ट कर रही है.। 


अयोध्याकाण्दम्‌ ९, 


चौ०---सेवद्दि सकल सबति मोहिनी के । गरपित मरतमातु बल पीके ॥ ३॥ 
भाषाथ--सय सौर मेरो सेषा भप्छी वराइ करती हैं पेसा सोचकर पढिके यू पर बह फूछ रही है। क्मवा पढि 
की पिशेष भमुरक्ति के यछ पर भरत फी माता फैडेयी को गर्ध दे कि सय सौ उसकी सेया में छगी 
रहती हैँ । 


फीसरया का झरय 


झ्ा० जया -फैफेयी फो' नीया दिखाना फौसल्या फा उश्दय है!। सभी रानिया सेपा फे साध्यम से 
तय के प्री्तिपात्राएं दो रही हैं। एक्रमात्र कैझेयो उसकी सेघा में नहीं पहुँच रही है'। यही फौसल्या 

शाप है। 

अभिमानी स्यक्ति फा स्पमाव होता है! फि यह अपनी उत्फूष्टता फे अपगाहन में औरों फो दास घनाने 
फ्री चेष्ठा फरता है'। फीसल्या फा यही मनोरथ था जो पूण् नहीं हो रहा था। राजा फो कैफ्रेयी के पक्ष में 
देखकर अछूया भी उसे दो रही थी। पह अभी प्रफट हो रही पै' ! 

ज्ञाठब्य है' फि इस यौपाईफे पिपरीतार्थमें फौसल्याफा फैफेयीफे प्रति सवृभाव आगे ( थौ १-२ दो ५६) 


फपि स्पष्ट फरेंगे। 
पिशुनज्यक्ति फे वचन में विरोध 


घुगससोर व्यक्ति उत़्टी सीधी चार फो फहने में पाचालता फो ऐोप नहीं समझता कि पहले कया 
फहद्ा था, अथ क्‍या फहा जा रहा है'। दो १४ में 'नितरवस सानह राठ' की भायनाफो 'भूपफपट' घतुराइ! 
तथा 'सनमढीन सुर्दें मीठ रुप! से भ्रम घताने फे घाद सन्‍्धरा अभी कइ्टती है फि 'तुम्दद्दि न सोचु सोहाग 
चछगरपित भरतमास्‌ वछ पीफे! तथा “राजहि सुम्दपर प्रेमबिसेपी! आदि । सनन्‍्यरा की इन उस्तियों में 
पूर्षोपरपिरोध स्पष्ट है । 
प्रमाों फे आधार पर यस्‍्नुत्तत्त्य फा निरूपण फरने में पचनों में पिसंघादिता नहीं होती इसछिए 
जझाम्मफारोंने थाचासता फो दोप माना है। इपर मंयरा का ध्यान नहीं है । 
संगध्ति-दतने दिनों से फौसल्या फे सहयास में रहती हई भी उसका दोप फेफ्रेयी के समप्त में नहीं 
आया, पैसा आशजये मन्धरा ठपफ्त फर रही ऐ। 
चौ०---सालु तग्दार शौमिलदि माई | फपट घतर नहिं होह जनाई ॥ ४ ॥ 
भाषार्थ-फ्ैदैयो के प्रति कौसस्पा के ददप में छोप वेद हे । उसको कौसक्या ने कपर भाव से बड़ी चालाक़ी णे 
प्रकर बह्ों होने दिया। 
#म में घर्म को उपासना 
श्वा9 ब्या -फौसस्या ने सघ्ननता फा अपने मेँ संवरण फिया है' जिसकी आह में समी दोप छिपे 
है। धर्म को सेवा दंभार्थ भी फी जाती है' ऐसा फपियों ने कहा ऐ'। इस दृष्टि से मन्थरा का कहना 
है. कि फीसल्या फेपल बस से फैकेयी फे प्रसि प्रीतिभाय प्रकट करती है' अत' वह अधिशास्या हे । 
अपने मोलेपन फे फारण ही केफेयी इस रहस्य फो नहीं समझ रही है। > ८ 
द॑सार्थ घर्मे छी उपासना फमी नहीं फछती। अहिंसा, सत्य आदि सामास्यघमे दंस में हो नहीं सफते। 
इस द्त्य फो फैफेयी भर रही दे । 
संगपि-ांमिों में शसूथा रहती है'। सनन्‍्धरा अपने नाम फे अनुरूप फ्रैफैयी फे मनस्‌ फो मम्थरगति 
से ्यया सन्थन फरफे डाँघा डोल फराती, कौसल्या में असूथाभाय फा दर्शन फरा रही है'। 
चो -राजद्दि तुम्त पर प्रेम विसेपी | सवति सुभाउ सकई नहिं देखी ॥५॥ 


८० भावार्थ-शास्त्रीयव्याग्ल्यासमेतम 


अबया का प्रकटीकरण 
भावार्थ--राजा का तुम्दारे ऊपर अधिक प्रेम दे जिसको सौतिया ठाह के स्वभाव में वह सद्षन नहीं कर सकती 
ऐसा कहकर कौसदया के असूया को प्रकट कर रही दे । 
संगति-कैकेयी को अपना कार्य साधने के लिए अब जगना चाहिये। अन्यथा शत्रु की मनोरथपूर्ति 
होगी । इस वात को दासी समझा रही है' । 
चौ०-रचि ग्रपंच भूपहि अपनाई | रामतिलक द्वित ठगन घराई ॥4॥ 
भाषाधे--कौसद्या ने प्रपय रचकर राजा को अपनो ओर मिला लिया अब तो श्रीराम के राजतिछक के लिए मुहृर् 
निश्चित करा लिया है । 
शा० व्या०--उक्त चौपाइयों मे निर्दिष्ट तके से कवि ने भेदनीति का सफछ प्रयोग दिखाया है. 
राजनीति में तीन भेदोपाय बताये गये है * । 
भेद की पद्धति 
(१) प्रतिपक्ष के विरोध में भे्य ओर रव मे समठृष्णा को प्रकट कर भेद्य को सांचना | 
- (२) असत्य भी क्यों न हो उसी को प्रकट कर उम्रभय का उपस्थापन करना । 
(३) दान-मान के प्रोभन में एक पक्ष से दूसरे पक्ष को विशिष्ट करना । 

* भेद का सरल स्वरूप यह है' कि पूर्वोनुस्यूत राग एवं स्नेह को हटाकर दो स्नेद्दियों को बीच मे शका 
उत्पन्न कराकर अपनी आप्तता को दोहाई देते हुए उसी शका को हृढ़ करते-करते प्रेमियों मे अविश्वास को 
दृढ करा देना तथा पारस्परिक राग में बाधा पहुँचाना। शस्तुत में भेदके अनुरूप योजना को कल्पित 
करके मन्थरा ने केकेयी के हृदय में उसीके विनाश का भय दिखाते हुए राजा के प्रति शंका को दृढ़ 
बना दिया तथा प्रति पत्नी एवं सवत के पारस्परिकराग मे खाई डाल दी। उसके पश्चात्‌ पुनः भेदप्रयोग 
के अन्तर्गत उम्रभय की संभावना व्यक्त करने की चेष्टा कर रही है' | 


संगति--यदि भय हृदय मे समा जाय तो भेद-कार्य पूर्ण समझना चाहिये। इस समय सन्‍्थरा 

राजा के रामराज्याभिषेककाये का ओचित्य बताते हुए भी, उसके परिणाम में संभावित भय को 

हृढमूल फरती है' । 
चो,-यह कुछ उचित राम कहुँ टीका | सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका ॥७॥ 

भावाथैं--सूर्यकुछ की सयौदा को देखते हुये ज्येष्ठ पुत्र को राजतिलक देना उचित है, ऐसा होना दी चाहिये । 
यह सबको ओर मुझको ( मन्थरा को ) भी इृष्ट है । 

' संगति--फिर भी असूया भाव में मन्धरा बोल रही है' कि यद्‌ रानी का तादाति 

स्वासिनी का पूर्ण विनाश है, यही उसे दुःख है.। ४ 

चो,-आगिल बात सम्मझ्नि डरु मोही । देउ देउ फिरि सो फलु ओही ॥!८॥ 


भावाथें--मन्यरा कहती है कि आगे होने वाली बातों से डर, है। देष जो' देगा, याद में उसको वेसा ही 
भोगना पढ़ेगा । ह॒ 


१. समहतृष्णानुसन्धानं_ तथोग्रभयदर्शनम्‌ । 
प्रधान दाने सान॑ च भेढ़ोपायाः प्रकीर्तिता: । ( नातिसार ॥१८॥ ) 


११ अयोध्याफाण्डम्‌ <१ 


मन्यरा फो दुष्ता 

यथपि मथरा फड़ती े जि यद असूयाभाय से श्रोरस फे ऊपर दोपारोपण नहीं फर रही हे, पिए भी 
जफी भेदयोजना मे भारी भूछ ऐे। पातन्य दे फि स्पतन्ध्रता फे पिचार मं ने याछा ्ष्छृद्धछता से 
फौदुयिर संस्‍्वाका अस्तित्य छम होने से मौछ संप फरभी नदीं घन सफता । पेसी स्थिति होने पर संफटफाछ 
मे अबन फा भरोसा रयना फरठिन होगा सधरा फा परत हे फि भीराम फ स्पामित्य में उसफे अधीन दोरूर 
फेस्यी ऐ्रे पण्यार फी परतन्थवा म॑ सदा तुस्म भोगना पह़्गा। सेब्यगुणसम्पन्न स्पामीडों उपछब्धि 
पर सेयर्फ मे सेपाम दाप न दुयझर जपना सौभाग्य समचना दै। उत्तमप्रकृसि सेज्यफी सेया फभी 
दु्प्रद नो ऐती। फदना होगा फि भरत प. अउशब्य्ता फे अनुमान म औीरास में सेब्यगुण फे अभाव 
फो हतु भावना सन्‍्परा फा अप्रामाणिझ पक्ष है । (५) 

पुलइबित! रास फर्ट टीझ़ा, पहने प॑ याद भा भागिलि चात समुझि दरू से सन्धरा अपने पथ फे 
अल समयनम फहना घाएती है! फि प्रत्वेष राजयंश अधिफारी यदि राज्यप्रतिर्पत्तिफे अजन फे लिए 
समप ई तो उ्यप्नप्रयुफ का अधिफारी समप्कर उसफ़ो वी राम्याभिषेफयोग्य नहीं फह्ा जा सकता | 
अन्‍्परा फो बरत फे रा याधिफाए से सदा यंचित होने फा दुःस है. । 

संगवि-स्पार्थी छाग भेदुनीदि म॑ फैस निषुण दांत दे फपि संभेष में घंता रहे हैं.। 

दा०--रपि पत्ि झ्ाठिझ मुटिलपन फीहसि फ्पठ प्रयोधु । 
फद्दिठ्ठि फथा सत सबति के जेद्दि गिघि बाद पिरोधु ॥१८॥ 
नापापै--४६ प्रछार को फुट्छिएा छी पोर्ते इगाफर मश्थशा ले छपने फुटिझतापुण ८छनों रे कपर का प्रबोध करा 
दिपा। इसझ प्रथादु साहा डी स्लेऊड़ पाएं इस प्रकार सुनाया कि फैऊेपा फे हृदय म॑ कौसज्पाक 
प्रवि पिरोध बढ जाप | 
शा£ ध्या“-पादिनां मन्‍्धरान सौत फी दुष्टता-फारि फो सिद्ध करने मं अनर्का फधाए सुनाकर अपने पक्ष की 
पुष्टि फी है। पुटिझिवा फा फारण दा ६५ म दिया है। जसतूसाध्य और उपाधियुर धंतु में दृतु-देतुमदूमाव 
फा अपगत फरान के लिए अपनफा सत्ययादा घतारर जर्द्धा जहाँ सीत फी फघाएं प्रचारिद थी पउनपफ्ये 
मुनाना भरारम्भ फिया अथाम्‌ जयधाय फा प्रफाशम और यथाय॑ फा अंधरमं रखनेफे उद्देश्य से रानी फो 
पिश्पास दिछाने फ छिप सपतियों फी फथाएँ सुनाफर मरठ फे सेपफत्प फो दोपपूण्त समझाने छगी । 

'फद्दधिस फपा! फे संघंध म इदना पछज्य आपदयफ ए कि सश्नन पुराण फी फधार्ओा फा उपयोग 
तपम्‌, स्‍्याग, दान आदि में फरत दें, दुज़न स्थाथ साथने फे लिए रसफा दुरुपयोग फरते हैँ, ऐसा घर्मे 
विजय नाटफ म दृगसत फा मिख्ता दे । 

सतमयति हा अर्थ 

यहाँ 'सत सपर्ति? पे तात्पय म॑ सत से पिश्देप यक्तत्य सत्य पालन फरने याछे महापुरुषों की फथा से 
ई जा फैफया आग (पी ५दो ३०) राजा से फ्टगी। सौत फी फथा फट्रुषिनवा फरो फथा फे सदृ्ष है 
जो दा० १५ म॑ मथरा न मुनायी है । 

झऊकयी के मतिफेर मे फपिपय स्मरणीय घिपय 

घौ ७से दा० १०, १ तफ फ्रैफेयो फी शासखराधीन नीतिसम्मत समति फा यणन फरने फे 
बाद सतिफरफ क्रम फा पणन छे (दो (१६ स रश३ेतफ )। सन्थरा फी उक्तियों से पातिमत्यसंस्कार 
के आपरण म॑ फैडयी फा झुमति मे अभिनिवष्दा दोता जायगा, जिसका परिणाम राजा फे भ्रवियनी 


(५) ल्‍औ <दा ३८ में पिणेप वक्तब्य देसे । 


८२ भावार्थ-शास्त्रीयग्याख्यासमेत म्‌ 


की कटुक्तियों में द्रष्टव्य है: (दो० २७ से दो० ३५ तक)। चौ० १ ढो० ७५ से सो सुनि तमकि उठी केकेयी' 
से उसके रागयुक्त चरित्र का आरंभ है'। उसका स्पष्टीकरण भरत के सासने चौ५ न से चौो८ ४ 
दो० १६१ तक 'अस अलुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज़ पुर करहू, से हुआ €। भरत क 
बचन जो हसि सो दसि सुँद मसि छाई । आँखि ओट उठि बेठहि जाई। (चौ: ८ दो: १६०) से समाप्त दें। 
भरत का सच्चा सेवकत्व इसी से प्रकट होता है! कि उनके वचन से कैकेयी की बुद्धि का आवरण दूर होकर 
रानी का सतिपरिवर्तन दोष चछा गया। वह मौना एवं शान्ता हो गयी। माता की आन्तरिक शुद्धि को 
छखकर भरत जी ने उसे चित्रकूटयात्रामे साथ लिया है' और मरद्वाज ऋषि द्वारा उसकी निर्दोषता या भावना 
को प्रकट कराकर प्रभु के सम्मुख कर आदरकी पान्नी वनाया हैः प्रन्थकार की (वालफराड में दो5 १८८ मे) 
कही रक्ति 'कौंसल्यादि नारिप्रिय सब आचरन पुनीत? | पति अनुकूल प्रेम दढ हरिपद्कमछ विनीत? से 
कैकेयी की पुनीतता भी प्रकट है। उसमे अज्ञान या माया म्रढत' नहीं है!। फिर भी कुलक्रमागतरबभाव 
के अलुरूप उसमें मानिनीत्वरूप स्वल्प दोष के सूक्ष्म सस्कार को देखकर सरस्वती उसके मतिफेर मे 
सक्षभा हुईं। कारण यह कि मह्दात्मा सन्त, भक्त, पतित्रता आदि अभ्ु के सेवकों को प्रभु के कार्य मे 
सहायक ह्वोना पड़ता है'। प्रभु की इच्छा से रानीके बुद्धि पर अज्ञान फा आवरण आया हे जो 
धीरास फो वनवासकाये मे ग्रवृत्त कराने के लिए है'। स्मतंज्य है' उपरोक्त अन्नीति का कारये होने पर 
भी विद्वानों की दृष्टि में रानी सरकभ्गिनी नहीं है' । दो: १७ में केकेयी के 'सरलसुभाउ' के विवेचन भे 
इसपर अकाश डाला गया है 
सौतों की कथा सुनकर कैकेयी मन्थरा से निगमनवाक्य सुनना चाहती है'। यहीं “गिरा सति फेरी? 
प्रकट हो रही है'। 
चौ०--भावी बस अतीति उर आईं। ऐछ रानि पुनि सपथ देवाई ॥ १ ॥ 
भावायें--जैसी द्दोनहार है वैसा ही विश्वास कैकेयी के हृदय से स्थिर हो गया। किर रानी ने सच्ची बात को 
अपनी प्रापथ दिलाकर पूछा | 


शपथ की प्रतिष्ठा 


श्ञा० व्या०--शपथ की प्रतिष्ठा परछोकविश्वास पर आधारित हे, ऐसी न्ीतिशास्र मे मान्यता है । 
राजा दशरथ के समय में यह विश्वास अजा में पृवोनुस्यूत था। शपथ लेने से भिथ्या भाषण नहीं होगा, 
यह सोचकर रानी ने यथार्थ वात को समझने के किये शपथ देकर पूछा जिससे सन्थरा सच्ची वात 
सुनाने में सिध्याभाषण न करे। कैकेयी के बचनों से स्पष्ट हैः कि मन्धरा उसको अत्यन्त प्रिया मानती 
है' इसलिए रानी ने अपनी शपथ दिलाई होगी । 


जिज्ञासा में शिष्यत्वस्थीकृति एवं निगमन की ग्राथेना 


. अभीतक सन्‍्थरा एवं केकेयी का वाद पूर्वोत्तर पक्ष के रूप में हो रहा था! मन्थरा की कोटि पर कैकेयी 
को ग्रतिवाद के रूप में उत्तर समझ में नही आया। जब भसनन्‍्थरा के वचन की आप्तवाक्यता प्रकट ह्दो 
गयी तब वह एक प्रकार से सन्थरा का शिष्यत्व स्वीकार करके अब प्रतिज्ञात अर्थ का निगमन्‌ सुनने के 
लिए मन्थरा से शपथपूबेक पूछ रही है'। मन्धरा ने अपनी धूतेता से अपने गुरुत्व का ऐसा रंग जमाया 
कि सानिनी रानी का रोष ठंढा पड़ गया। कैकेयी जानती है! कि वाल्यकाल से ही दासीभावना मे 
सेवा करने बाछी सन्थरा का ज्यादा प्रेस उस पर तथा स्वामिनी के संबंध से पुत्र भरत पर भी है'। यह 
दो १५ से दो २२ की वक्तियों में ( जबते कुमत सुना मै स्वामिनि। भूख न वासर नींद न जामिनि ) 
से स्पष्ट है.। अतः दो. १५ मे भरत की सपथ देने के चाद यहाँ 'सपथ देवाई” से अपनी ( रानी की ) 
शापथ समझना होगा । 


अयोध्यफाण्डम्‌ ८३ 


आझपथ का प्रयोजन 


झ्ापथ देफर पूँछने फा प्रयोजन यह है! फि मन्धरा द्वारा राजा, फौसल्या और आराम फे संवन्ध में 
फट्दी घातों पर फैफेयी फो यिश्वास नहीं हो रहा है', इसलिए फेफेयी उन घातों फी सस्यता फो समझना 
घाद्दती है'। क्षपथ के उपरान्त मन्यरा फे पक्तन्य से फैफेयी फो यह निर्णय होगा फि राजा एयं फौसल्या 
फी कृति से श्रीराम फे अर्जित राजत्य फी परवन्त्रता में दिवायदृत्थ फी घुद्धिमें अप्रामाण्य कौर मन्धरा के 
यघनार्थ फी ययाध॑ताबुद्धि म॑ प्रामाण्य है । 

संगति--शाहन्य है फि फैफेयी फो उसके पूर्यप्रद में अप्रामाण्य घांका उत्पन्न फराफर सन्धरा ने 'राजा 
दुष्ट” पेसी प्रतीति फपायी। उतने से संतुष्ट न दाफर सेयफस्थरूप हिलायहत्य में व्रिफराठायापितत्या 
भाषात्मफ उिपयगत अप्रासाण्य फ्रो समझाने के उपक्रम में दासी रानी को मूर्ख घना रही हे । 

ची०--का पूछई दुग्द अपदु न जाना । निज द्वित अनदित पस्ु पदिचाना ॥ २॥ 

मापाध--मम्परा से कहा कि तुम बया पूछछी हो | अभी भी सुमको गईं समझा अपना भछ्ता बुरा तो पश्चु भी 


सममते हूँ । 
अद्वित फा विचार 
झ्वा० न्‍््या--छिव “अनदित” से मरत फे सेवफस्य म॑ फ्या अह्दित है! ) यह मन्यरा बताना घाहती है 
अथात्‌ फि सपफा ठो सेयफ ही रहना ऐ पर भरतफो राज्यस्यासी दोना है. (यैसा आगे घौ ९ दो २५ में 
सप्रमाण पुप्ट करगी )। मएस फो स्पामिस्य से दहटफर सदा फे छिए सेपफ घनाना ही उसफा अहित है'। 
विध्वानमयफोश्न पर विजय 

मन्धरा ने पिज़्ानमय फोश् फा सहारा लेफर अद्धा सत्य एवं ऋत ये तीनो तस्पों का आभास अपने 
उपबृष्त में फ़रैफैयी फो फरा दिया, जिसफा फल यही हुआ फि उसने फ़रेफेयी फे घिन्नानमय फोक्ष फो 
स्थाधान फर स्थ्या । 

रानी फी ठण्या थे दासी फा गुरुस्त 

पश्चु भी अपना हित जानते हैँ, तुम नहीं जानती यह आइचये है, ऐसा सुनाफर कंफेयी फो 
अप्ठधाप्रयुक्त उम्पा में दासी ढाल दृदो है'। 'अयद्भु न जाना निम्र दितः कद कर भसन्धरा अपना गुरुत्व 
प्रदर्ठिद फरवी ऐ | 

पशु और मानव में अन्दर 

सन्परा फी दितादितचचा में प्ाठव्य है! फि पश्नु स्थाथेयरपर रहते हैं, मानपता पराथंसाध्य होने से 
सुशोभित होती है । तो भी फ्रेफेदी लेसी पराधपरायणा नीपिकुशछा भी स्पार्थपरा दो गयी, गद्दी 
मम्परा फी परासिसंघान फुशल्ता ह' जा रानी फा भयिष्यत्‌ संफट बता रही हे । 

संगवि--राजा और रानी फे फापदय फी सिद्धि में साधक देत्थन्तरफो दासी स्फुट फर रही है। 

घी ०--भयउ पाख दिन सजद समाजू । तम्द पाई छुषि मोहि सन आजू ॥ ३ ॥ 

भापषाये--राजदिछक की सजायट होते पुक पणपादा ( पश्थइ ) दिल शो गया, उसको खबर झापने आज 


झुप्तस सुमा दे। 
९५ दिन के निर्देश्व का फल 
पमज्ञात्र फे पिघान फे अनुसार ऋतुमदी भागों से संगम न करने से पति 'तुमंग के दोप फा 
भागी होता दे। फामशाम्रमें स्वोफा शतुकाऊ १६ दिन फा माना गया हे। रानी फेकेयी का अपुकाछ 
चीतने म॑ एफ दिन घाफी होगा हुस जात फो लेफर सन्धरा ने पाद्ष दिन काइा होगा । झिसका भाशय 


८४ भावाये-शास्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


यह है कि १५ दिनों से राजा कैकेयी के पास नही आये, १६ वें दिन तो ऋतुभंग दोष से बचने के लिए 
वे अवश्य आविंगे क्योंकि वृद्धा मन्धरा सखरीप्रकृति की पृणे जानकार है। मन्थरा फी ,डक्तियों से “छखहि 
न भूपकपट चतुराई। मन मछीन मुहं मीठ जपु” आदि से यद्यपि रानी सोच सकती हक कि रामराज्योत्सव 
फरके ही राजा के आनेकी आज्ञा हैं। फिर भी राजा फी धर्मम्रति को समझते हुए केकेयी का विश्वास 
हो रहा हैँ कि धमालृष्ठान में दृढ़ राजा ऋतुभगदोप के भय स आज १९६ वे दिन आवेंगे ही | 
“प्षयड पाख दिन सजतसमाजू” में मिथ्या भाषण के अतिरिक्त उक्त विषय से सम्बन्धित एक दूसरा 
अभिप्राय भी चिन्तनीय है, वह यही कि इसी विषय को दृष्टिमें रखकर केकेयी को मनाने मे राजा दशरथ 
के कामकौतुक का वर्णन सगत मालूम होगा । 
धूर्तों का बल-असत्य 
दो० १८ में कविने दासी की कुटिलताका वर्णन किया था, उसका यहाँ पर स्मरण हो रहा है । कोसल्या 
फो दुष्टा वताने के पश्चात्‌ अपना विश्वास जमाने के हेतु अब कुछ सत्य कुछ मिथ्या मापण कर रही है, 
यह उसका चातुये है'। अतएबव राजा और कौंसल्या की अह्वितकारिता मे हेतुवाक्य, “भयउ पाख दिन 
सजत समाजू” है'। कैकेयी को अपना अहित न समझने से भूखे वनाकर असत्य को सत्य बनाने में 
क्ञापथ देने पर भी मन्थरा को सकोच नहीं हे'। यही उसकी ग्रतारणा है। 
धूर्तों के छिये अपने जीविनार्थ चतुरतापुर्ण मिथ्याभाषण ही व माना गया है ( शाव्दकल्पद्ुम के 
अनुसार ) मन्थरा धूते होने से असत्य-वछ को अपनाती है तो आश्चर्य नहीं । 
कैकेयी को पहले से सचेत न करने का यह कारण है' कि मन्थरा प्रत्येक की प्रकृति का पन्द्रह दिनों से 
अध्ययन कर रही थी जसा “सुधि पाई मोहि सन आजू” से व्यक्त किया है'। 
सत्य का विजय 
मन्धरा अपने असत्यचरित द्वारा भरत जैसे सत्यरत महात्मा के सुख में साधक वनना चाहती है' जो 
उसका श्रम द'। सत्यपक्ष का विजय शाझ्लञ द्वारा निर्णीत हैं। इसलिए सन्तमहात्मा अपने सुख के लिए 
सत्य से विचित नहीं होते जैसा कि भरत, राजा, कोसल्या आदि के चरित से स्फुट है'। आगे चलकर 
सन्थरा पक्ष फी असत्यता भी स्पष्ट होगी। 
चौ०-खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारे । सत्य कहें नहि दोषु हमारे। ४ ॥ 
भावाथे--तुम्दारे' राज्य से खातो पहनती हूँ, सत्य कहने में मुझे क्या दोष है ? 
असत्य से सत्य की ओर जाना इृष्ट है 
शा० या०-- “सत्य कहें नहि दोष हमारे” का भाव है कि राजा एवं अजाने कपट करके रामराज्योत्सव की 
सूचना नहीं दी पर “भयउ पाख दिन सजत समाजू” से सच्ची वातकी सूचना स्वाभिनीको देना कतेव्य है', 
क्योंकि उसने स्वामिनीका नमक खाया है। इस प्रकार मन्धरा अपने ग्रति उद्त रानीकी श्रद्धामें अप्राभाण्य 
फा निरास करना चाहती दै। झूठी चात को सत्य वनाना और अपने को निर्दोष सिद्ध करना धूतों की 
चतुराई है'। दो० १० तक निरूपित अकरण से स्पष्ट है' कि आज ही रामराज्यामिषेक का नि३चय हुआ है, 
उसको वद॒छ कर १५ दिन से सजावट होनेकी बात फहना झूठ है| उसका प्रयोजन यह है कि नीतिदृष्टि से 
“असत्य वत्मेनि स्थित्वा तत्त: सत्यं विनिरदिशेत” अथोत्‌ हित को पुष्ट कराना उद्दे ह्य हो तो असत्य बोलना 
दोप नद्दी माना जाता | हक हर 
संगति--दो ०१९ चो० १ मे केकेयी के शपथग्नयोग से सिद्ध होता है' कि रा 
देववादिनी है, अन्‍्थरा भी देव की दोहाई देकर विश्वास उत्पन्न कराती हा 22222 
« चोौ०--जो असत्य छुछ कहव बनाई । तो विधि देइहि हमहि सजाई ॥ ५॥ 
भावाथ---यदि में कुछ वनाकर झठ कह्दती हुँ तो विधाता मुझको उसकी सजा देगा। 


अयोध्याफाण्डम्‌ <ं५ 


घू्तों के मत में धर्म फो उपयोगिता 


ज्ञा० म्या०-धूरे भी धम फे संघरण में अपना छाये साधते हैँ। राजा भी अ्ज़ा में परछोकपिश्वास की 
स्थिति फा पोषण फिये बिना अपने प्रति श्रद्देयवा एय निर्यिफारिताका साय उत्पन्न नहीं फर पाते। इस 
बाद फो लेफर आधायाँ ने फद्दा फि जय दस भे भी भ्रढा उस्पन्त छोती हे! तथ सन्तजन धर्म और ऐयपाद 
फो सचाइ से अपनाते दँ दो उनफे प्रदि भ्रद्धेयता होगी ही । 


धूर्त एवं सन्तों फ आचरण में अन्तर 
सन्द सरल स्पभाष में धमानुप्तान फरते हुए शान्ति फा अनुभव फरते हूँ, धूतें दंभ में यथायंता फा 
संघरण फरफे श्रम फा अनुभघ फरते हूँ । उसफे परिणास में भ्रमनिमित्तफ दोप के प्रकोप फा भागी होकर 
दांभिफ स्याधि फा शिफार होते हूँ। फिंयहुना उनफे भ्नस्‌ में संदाप एवं निष्फछता शी हाथ छाती दे 
सन्धरा फे चरित्र से स्पष्ट ऐै' फि अन्त स पह घाधुष्न द्वारा दंडिता होगी। 
संगति--रैपयाद फो स्फुटफर अ्रद्धा एपं विश्वास से संमायित अम्रामाणिफत्य फो दूर करने के अनन्तर 
मसन्यरा फैफेयी फ प्रइन फा समाधान आगे दे रही हे'। 


चं।०--रामद्दि दिठक्र फालि जौ भयऊ | तम्द कह्-ँ पिपतिपीजु विधि घयछझ ॥ ६॥ 
भायार्प--पत्रि फफ प्लोराम फा राजतिझछक हो जाप शा दो समझो कि घिधि मे छूकट का बोल थो दिपा। 
झ्वा० ज्या०--मन्थरा फे फहने फा आएय यह हैः फि छुछ फर्तेब्य हे! दो उसके छिए फेघछ एक विन का 
समय अथात्‌ आज फी रात अर्पाशिष्ट '३। फछ रामराज्योत्सप सम्पन्न होने पर ापफे ऊपर विपत्ति 
आएर रहेगी जो सदा फे लिए परतन्व्रास्मफ होगी। 
ची०--रेख खचाई कहें बल भाषी | भामिनि महू दूध फई माखो ॥ ७॥ 
भागाई--दुस पाठ फ्ो मैं टेसा प्रीचिकर भण।ठ्‌ निएचपपूर्वंक, पछ के साथ फइती हूँ कि तुम दूध की मपख्ती के 
समान दो जाधझोगी । 
सफ्खी फे उदाहरण से समझ म॑ आता है कि जैसे मक्षिफा दूध फे किनारे पर घेठकर सटस्थ हो 
पूछ पीसी है, पर स्थाद फे 'घक्फर म॑ खह यदि दूध पर ही आक्रमण फरदी दे तो स्वये डूबती हे औौर फ्दी 
हक भोक्ताफे पेटर्म गई तो यमन भी फराती है!'। इसलिए युद्धिमान्‌ छोग सक्षिफा फो हटठाते रहते हैं। 
दी तुम और पुप्र मफ्खी फे समान हुटाए जाओगे | 


राजकीय घनाधिकारको विश्षेपता 

स्यायाहारिफ धनाधिफार फी अपेक्षया राजफीय पनाघिफार में अन्तर द', जेसे शासक इस बाद फी 
छपेक्षा रखता ऐ फि शासन निद्नन्द् रो छौर सम्पूर्ण सुझमाश्र फा भागी एक ही हो, इसमें जो 
फण्टफ हूँ. उन्ों राजा पूर फरता दे। परियार में फेफेयी फप्टफूप में जब फौसल्यादि को प्रतीव 
होगी दब उसफो दूर फिये दिना यद्द नहीं रहेगी। स्मरण रखना चाहिये फि रामराम्य में ऐसा 
होने फ्री संमापना नहीं है, फिर भी सरस्पती द्वारा प्रेरिता शोने से सन्‍्थरा फे दचन “सत्य कहे 
नहि दोपु हमारे, फे अनुसार इसके यचन चौ० ५ से ८ तक प्रफारान्तर से सत्य होकर रहेंगे। 
उदाहरणार्थ--“दी विधि दृइदि दम सजाई”--शश्रुघ्न द्वारा सन्‍्यरा फा दृण्डिस होना, हि. हु 
पिपति बीजुविधि चयऋझ--राम राज्य फी कस्पना से दोनेषाली घिपच्ि फो फ्ैकेयी ने मोगना, उसमें राजा 
दशरथ फे 'दोर फछंफ', ( चौ० ५दोहा ३६ ) प्रजा फी आवाज, भरत फी भस्सेना और इसी प्रकार 
“दिपतियीजु विधि घयऊ? को श्रीरामने सी चित्रकूटर्में समरद फे सामने (चौ० ६दो० ३०६में) अपने वचन से 
स्पष्ट फिया ह सवा 'भामिनि मइहु दूध कई माखी'--समाच फे सासने केफेयी को उपेक्षित दोझूर रदना । 


८६ भावार्थ-शास््रीयव्याख्यासमेतम 


"जी सुत सद्दित करहु सेवकाई!-भरतने “समसेवकाई” स्वीकार फिया तथा 'ती घर रहडु न आन उपाई?- 
फैकेयी को घर में रहना पड़ा । 
सगति--विपत्तिबीज के फल के अन्तर्गत एकराज्य में त्याज्य परिवार के जीवन का उपाय दासी 
समझाती है । ; ह 
चौ०--जी सुतसदह्ित करहु सेत्काई | तो घर रहह ने आन उपाई ॥ ८ ॥ 
भावार्थ--वंदी हो जन्मभर लड़फे के साथ ( भरत के साथ ) आप श्रीराम का सेयकरव करती रद्दोगी तो राजगृद में 
रहना सम्भव होगा । 
ज्ञा० व्याप--सेवकत्व मे होने वाढठी परतन्त्रता मे जीवननिर्बाह केसा होगा ? इसके उत्तर में यही कहा 
कि दासी बनकर घरमें रहने के अतिरिक्त ओर कोड उपाय नहीं दे'। 
संगति--सौत की ईष्यां से कैसा दुःख होता है' ? उसका उदाहरण कथाओं से कह रही है। 
दोह्य--+& विनतहि दीन्द्र दुखु तुम्ददि कोसिला देव । 
भरतु वन्दिगृह सेदहदि लखनु राम के नेव ॥ १९ ॥ 


भावार्थ--जन्मभर कह्ू ने विनता को दुस दिया बसे ही तुमको सौत कोसक्या ठेगी। भरत तो कारागार मे 
रहेंगे, लक्ष्मण श्रीराम के सहायक द्वोगे । 
तकहीन बुद्धि का स्वभाव 

शा० व्या०--शाखकारों ने वुद्धोको तककुशछ चनाने पर जोर दिया है!। यतः तऊ से साधक वावऊ तत्वों 
को न समझना तकहीन बुद्धि का स्वभाव है । जो विषय उसके सामने अकाशित होता है' उसी मे तकेद्दीन 
बुद्धि सीमित हो जाती है'। इस समय केकेयी की बुद्धि मन्थरा के शिक्षण में आवद्ध द्वो उत्थापित शकाओं 
का निरास करने में असमर्थ है' | स्थूलप्राहिणी बुद्धि विपरीत शरद से आवृत द्ोने पर बलद्वीन हो जाती है'। 
मन्धरा के शंकात्मक विपरीतग्रहने केकेयी के पूर्वश्रह का आवरण करके राजा, कीौमल्या एवं श्रीराम 
के प्रति रानीको शकाछ वना दिया। केकेयी की तकहीन बुद्धि मे 'यत्रन्यत्र सेवकत्व” तत्र-तन्र दुख! का 
निर्णय यथावत्‌ हो गया । इस व्याप्रिनिणय मे कद विनता का इृष्टान्त सहायक है'। पर यह दृष्टान्त व्याप्ति 
का साधक नही हो सकता क्योंकि यह सेवकत्व-देतु आत्मगुणसम्पत्ति के भावात्मक उपाधि से अस्त दे । 
उपाधि को न समझकर केकेयी अपनी स्वतन्त्रता के हनन की कल्पना मे अनिष्ट की शा से दुखी हो 
रही है! और भरत के वन्दियृद्व की शंका तो और भी रोमांचकारिणी है' । 


कद विनता के इतिहास से शंक्राविपकी व्याप्ति 
सन्‍्यरा के कदने का आशय है कि जिस प्रकार कद्रू ने विनता को सताया था उसी प्रकार कौसल्या 


केकेयी को दुःख देगी । उसका परिणाम यह हुआ कि रानीको सर्प का स्मरण आते ही सशयात्मक सर्प का 
विष व्याप्त दोने छगा जिसका अभाव केकेयी को मूछों की अवस्था तक ले जा सकता है। 


स्मरणमात्र से विभाषों का संक्रमण 
पतित्रत-धर्म में परभनिषुणा फोसल्या के द्वारा भविष्यत्‌ में दुःख द्ोना संभव नहीं है तथापि विभ्ञाव 
यदि स्टत या ध्यात द्वों जाय तो भी वे अपना अभाव दिखाते है'। यही स्थिति अभी कैकेयी की दो रही 
ह्वे । हे कौसल्या के प्रति कद समान सौत की कहल्पनामात्न मे भाविदु.ख का विचार करके रानी 
कॉप गयी । 
संगति--रानी ने मन्थरा द्वारा प्रस्तावित विषय को सत्‌ समझा और राजनिप्ठा के अद्ुष्टत्व विषय को 
असत्‌ समझा दे । अत' वह सहम गई जिसका परिणाम रानी के शरीर पर होने छगा । 


अयोध्याकाण्ठम्‌ ८७ 


चौ०-कैफेयसुता सुनत फंड घानो | फदि न सकई फछ सहमि सुखानी ॥१॥ 
तन पसेठ कदली जिमि कॉपी । छुषपी दमन जीम तथ घाँपी ॥२॥ 
भायाये--सम्परा के रट्ठदापूरे बचत सुनत ही क्ैफेपी कुछ न बोछ पायी । उसकी आाइृति सु गयी, घरोर में 
पस्तीषा एूटा । हय मस्परा ने छीस दाों से दुबायों अपोत्‌ पह समझ रापी कि अपना भनोश्य 
घिद दो गया। 
मन्यरा की जिद्ला का अबरोध 
ज्ञा० ब्या --रानी फे फंप और भय को पेखरूर मन्यरा फो प्रतीत हुआ फि उसका शाॉंफायिपरूप औपध 
रानीफों पृणया प्रभायिद फर रहा है, इससे अधिफ होने पर संभष है फि पह मूर्छित दो साय ! अतत' मन्‍्यरा 
ने जिएा फो अपरुद फिया। 
चौ०-कदि कदि फोटिक कपट कहानी । घोरजु घरहु प्रशेषिसि रानी ॥३॥ 
भाषार्थ--फिर अपने सं की पोपफ कपड कद्दानी कहफर राणी को धंये घरम के क्लिप समझाने छगी । 
'कोटि कृपट फद्दानी' से प्रयोध 
ञ्ञा ज्याप-मन्यरा द्वारा पूथ निरूपषित (राजा दुष्ट ) फपट' कहानी सुनाने में उद्वृद्य यही है फि 
मूर्प्छा से रानी फो षचाते हुए भ्रवोध फराफर उसफो भायी फर्॑ज्य फे बारे में उत्साहित किया जाय, 
जिससे रानी फे दृदय में विश्वास हो फि मरत फो राग्याधिछंत फरने फे प्रयत्न में ठगना चाहिये अम्यया 
जीधित नहीं रद्द सफती । 
संगधि--रामराजोत्सय म॑ बाधा पहुँचाना निर्णात हो जाने पर इतिफ्रतेठ्यता का योध दोना कर्बाश्ट 
है। जो छितेपी ऐ यही इपिकर्तब्यता को सी सम्नझाये, ऐसा सोचछर प्रभोत्थापन फरने के पूर्य सम्वरा फ्री 
उपक्ृति का भारी प्रशंसा फर रही हे । 
सौ०-फिरा करमु प्रिय ठागि कुघाली | पकफ्रिह सराहर मानि मराढी ॥४) 
भाया्थ--#ैकैपो का प्वक्रमपाप्त ( राम और राजा क॑ प्रति ) स्नेइ बदुफ राया, हुए आफ चछने बाछ्की दासी 
प्रिपा छशने छगो । यह सब्यरा का पेसा भावर फरमे छगी मानो फोड बगुछी फो इंसिनी समझकर 
प्रशंसा करता दो । 
श्ञा० ध्या>--सरस्यती फे म्तिपरियतेन में मनन्‍्यरा फी उक्ति फैफेयीफो फट झगी ठव सरस्पतीने फैफेयी के 
पिय्या-फुछ-जाति प्रयुक्त स॑ल्‍्कारों फो श्रायूत फरा दिया जिसके परिणाम में कुचाडी मन्यरा राजी को 
प्रिय लग रही है!। फैफेयी फा आपरण भरत फी भत्सना से पूर होगा ! 
फिरा करयु का भाव 
#फिरा फरमु” फा भाप यह द छि घौ ७-८ दो १५ के अन्त्गेद केफेयी की दक्ति में जो पुनीतत्य 
भाष फे कारण रामरान्योत्सप फो देखने फा उत्साद्द था पह प्रभुफे षिशेप घिघान से वदुछ गया, इसमें 
सरस्वतीमेरित सनन्‍्धरा फी याणी निम्मित्तमात्र है। अयवा मन्यरा की उक्ति के बशीमूत दोकर कैकेयी ने 
सम्पू्णे अयोध्यायासियों फे फर्म फो फेर दिया है । 
संगवि--बिना पुष्टि फे मन्यरा फे दचलनों की ययाशेसा छेसे मान छठी गयी? इसफे समाधान में 
फेकेयी अपने दु'स्पप्त एवं अपक्षफुन फे संफेत फ़ो बल दे रही हा 
सौ०-पमुनु मंथरा बात फुरि तोरी | दहिति आँखि नित फर्क मोरी ॥५॥ 
दिन प्रति देखेउँ राति कृसपने ! कहते न तोदि मोइ घस अपने । ६॥ 
आपार्य--अर वासि | तेरी घात सल्प है! मेरी दाहिमी आंख बराबर फड़कती रही है, में रात में दुःस्बम पुंछती 
रहती हूं पर कपने सोह के कारण तुमसे तहों कई रही थी । 


८८ भावार्थ-शाश्लीयव्यास्यासमेतम 


दुःस्वप्नफलनिणय में माह । 
शा० व्या“--अपने दक्षिण नेन्न का स्फुरण एव ढु'स्वप्न-दर्शन भाविवेधव्य का सूचक हो रद्दा था, किन्तु 
कैकेयीने शालाजुमोदित सकेतके आधार पर राजाकी भाविरुत्युके तरफ ध्यान न देकर अपन संवकलढपी 
दुःख का सूचक रामराज्य है, ऐसा समझा | श्रीराम के सेबकत्व को अमंगढ समझना यदा माद ८। राजा 
की रुत्यु के बारे मे कल्पना न करना दूसरा मोद छै। अपशकुनके ठु.खको छिपाकर रखना तीसरा मोद ६ । 
कर्तव्य का निणेय न करना सर्वेसाधारण मोह है। 'गुछ्च गहति गुणान्‌ प्रकटीकरोति? उक्ति का मित्राभासा 
मन्थराकी उक्ति मे चरितार्थ कर अमंगलरुसमाप्ति का कारण समझना फैकेयी का चौथा मोह ४। 
अपशकुनस्तचित अमंगल के ग्रतीकार में भ्रम 
ज्ञातव्य है! कि अमगल का अतीकार होना इष्ट है! तो वसिप्ठ आदि गुरुजनों से पूछकर अनिष्ट की 
शान्ति का उपाय किया जा सकता था। अथवा एकमाम्न उपाय श्रीराम का घर में रदना था, किन्तु बिधि का 
प्रावल्य था कि श्रीराम को घर से दूर भेजेने मे मन्यरा ने रानी को दित समझाया । 
संगति--कैकेयी सोच रही है: कि उसका पृर्वमह् सीधे स्वभाव से पूर्ण था। उसने कभी भी किसी के 
झ्ुण-दोष का विचार नहीं किया, जिसका फल आज उसके सामने आया। 
चौ०--काह करों सखि | सर सुभाझ । दादिन वाम न जान काऊ ॥ ७ ॥ 
भावषार्थे--द्टे सखि ! क्‍या करूँ ? मेरा स्वभाव सीधा है, उठूटा सीधा रच्ठा उुरा ऊुछ नहीं जानती । 
कैकेयी का विपरोतारथे दर्शन 
कझ्षा० व्या०--दुजनसंसगे से केकेयी मोहब॒श अपने को गुणिनी समझ रही दे, राजा आदि छोगों पर 
दोषारोपण करती है'। उसकी दृष्टि मे गुणसपन्न श्रीराम के राज्याधिकार में दीप की भावना दोने से 
श्रीराम के स्वामित्व को स्वातन्ज्यवाघक समझ रही है'। यह केकेयी का विपरीताथेद्शन है. । अमगल का 
प्रसग याद्‌ कर कवि इस दोहे को ७ चों० मे समाप्त कर रहे है'। 
सगति--खेद है! कि सवत्र मंगलमयी स्थिति का शुभ अबसर प्राप्त हुआ था पर उसमे केकेयी 
भाविसेवकत्व को ठुःख मान रही है । 
दो० अपने चढलत न आजु छंगि अनभक्त काहुक कीन्द । 
केहि अध एकहि बार मोहि देओं दुसह दुखु दीन्ह ॥२०॥ 
भावाश--मैंने अपनो जानकारी मे आजतक किसी का घुरा नहीं किया | पता नह्ठी क्यो देव मेरे पाप के कारण एक 
बार मे ही महत्‌ दु.ख देना चाहता है? कहने का भाव यद्द दे कि श्रीरामके आगे सदा नतमस्वक 
होकर रहना, अपना और भरत का सेवकत्व, कौसल्या का चातुर्य, राजा का कपट, भरत का ननिद्दाक्ष में 
रद्दना इत्यादि सभी दुख एकत्रित हो गये। 
विपयतृष्णा में दुःख 
शा० व्या०--विषर्यों फी उपस्थिति होने पर भी आभिमानिक व मानोरथिक कत्पना में जिस प्रफार सुख 
होता है उसी प्रकार मन्थरा के द्वारा उपस्थापित दुःख की कल्पना कैकेयी को वेदना पहुँचा रही है' । 
अभी तक वद्द शाखानुमोदित विषय मे डूबी होने से सुखिनी थी, दुःख की कल्पना कैकेयी को नहीं हो 
रद्दी थी जिसको कबिने चौ० ९ दो० २३ मे “राजु करत निज कुमति विगोई” से स्पष्ट किया है'। परन्तु 
ज्ञातव्य हैः कि शास्रविरुद्ध अर्थल्प्सा /मे की हुई मन्त्रणा दुःखदायिनी होती है' | वर्तमान मे 
विषय्राप्ति होने पर भी उसके विनाश की कल्पना शोकदायिनी हो रही है'। इसी प्रकार विषयवासना मे 
रत विश्व वेषयिक भन्त्रणा में लगा हुआ कभी भी ढुःखसागर से पार नहीं होता । यही देखकर गौतमसूत्र 
फे दोकाकार जगव्‌ को दुःख पंकनिमग्न कहते हैँ. । कैकेयी मो उप्क्ा शिकार होने जा रहो हैः । 


श्र । अआअयोष्याकाण्दम्‌ ॥ ८९ 


। तकिया को उपयुक्तता 


 विपयदष्णाजन्य दुख से श्राण पाने फे छिए' महंपि गौतम ने त़ेपिया रा 'आाभय छेने फो का 
(। सारंक्ष यद फि तफंषिया फे अभाव में सत्यशुणददीन व्यक्ति घूर्तो फे फेर में पड़ जहा हे | हे ! । | 
« यद्यपि फैफेयी सत्यगुणसम्पन्ता मधिमती है जैसा दोहा १४ से १५ तक निरूपित है, तथापि उसकी सदि 
| बिकार प्रभु फे “अनुचित एकू” संकल्प से परिथिता सरस्वती फे मतिफेरकाये,का परिज़ास दे। 
संगति-पूवेप्रदद में प्रामाण्य दया सन्यराद्वारा भरतुव प्रह में प्रामाण्य का झन्ुभष फरनेषाड़ी फेकेयी 


पपना निणेय घना रदी दे, “यद तसि सति फिरी अहइ जस भाषी” फा फछ दै। 
हे 2३ ० पल गन से दी 55 
फैफेयी फे दुखरों में मु&्य दुः्स सौत फा सेपफा्य दूँ. जो आगे “दि्रत न करषि सदति सेवकाई” 
। फैफेयी ने प्ररूट फिया है।। इस दुःख का पोपफ भरत फी सेषकाई ऐश जो भरत की श्रतुपस्थांति से 
स्थाधित है'। उसीकोी मन्यरा ने 'पढ़ए भरत म्रूप ननिशभ्रयरे!/से दोपारोपण फरफे राजा ौर कौसत्या 
) चाल घदायी हे। ॥ 2५ हि बल 2) 
चौ०- नेदर जनझु ,स़रव परु जाइ। जिअत/ न करपि सपति सेपकाई ॥१॥ ,*, 
सा अरिदस देऊ बिआवत जाई। मरलु नीक तेदि जीवन वाही ॥२॥  + 
भायाये--भदे इस॑ नैहर में छस्म बिदाना पड़े, मैं प्रति जो छीत का सेवकत्व सही करंगी। 'पैव द्रिसको कषन्र 
के बा में शोकर जीवित रसे उसके, छिप जीने की इस्फ़ा रखने से सरदा ही भ्रप्का दे. 
शा स्याप्--घौ० ! दो० २० में कहा 'सहभि? का प्रकार यहाँ, निरूपित क्ष्या्‌ जा रहा दे । 'नैहर भनसु 
मरव बरुजाई! फी उक्ति से स्पष्ट संफेत दे फि पियाद्‌ फे घाद फन्या फा पिठा के परम, संगाव रखना दीक 
नहीं, तथापि सौत फी अघीनया फे यु'खसे मादगह फा निषासू कम दुश्खुदायी है, ऐसा समझफर हाँ रहना 
रानी पसन्द फरती हे। दूसरा दृष्टिफोण यह भी है फि शत्र॒ुफे पक्ष जीषन विदाना दैवाघीन भी हो तो भी 
व्रत्पु म॑ होने घाढा तेभिमिततिफ सफत तु'स कसे ऐ! इसकिए इसको इ्ट फदधी है! अर्थात सादगूह में 
नियास झरना सहन मद्दी, हो भरना ही इष्ट ह्दै घ हज जो की पडा ६-७ है: । हा केरेड! 
संगवि--आफी कल के सदीफार में फफ़ेयी ने झएजी धफ़दा में पक निर्णेण नाश है यो ड्रेफेशी के 
दीनवा का प्रकाशक है। इसफे उत्तर म॑ सन्‍्यरा ने ओ कद्दा पद शिवजी सुनाते हैं । 
5 ड रा चौ०-दीनवचन फह पहुविधि रानी. सुनि कुपरो वियमाया ठानीं ॥३॥ 7 
भाषा्थ--रानी फ्केपी अप्तदायावस्पामे बहुठ प्रकार से दीस इचम कहने छ्णी जिसको घुसकर फुषड़ी मे श्लौसाया 
का सेछ दिक्लापा। कि अल | अल प का कि 
,  संख्ग्रुणसमाप्ति में संदमिनिवेश ढा हरम, | , , ,, ,,,, ॥, 
-। सस्पगुण से रहिद सतिमें. युक्रायुक्त रानीफे समप्तमें नहीं भा रहा है | विपरोत अमिनिवेश में केक्रैयी 
भीराम एवं कौसल्या में सस्मि, को समझकर क्षपनी असहाय स्थित्ति मानती है इस अ्निवेस बिक को 
देखफर सन्यरा/फों अपना स्री-धरिश्न (सख्री माया१) दिखाने,में च॒द॒ठा हुई जैसा आगे व्यक्त है 
है मत हे झपड़ी के घरित्र में स्तीमाया का ,सकेत| ५ ॥,,  , ५८ 
। बंघना के भारस्स में सम्परा रात्ती फो अपने पाम्जाछ में फंसाकर मूतघर्रित्र का वेयाप्पें और पंसके 
घाथ भाषिसेयरत्व में संकट की संभाषना दिखाकर फेकेयी फो दुछ्चिनी म्सशया।बना घुद्ी,हैं। , से ब-तुख- 
३ साइस झदृद अपछता माया। मप #पिदेक सौच अदाया ४ दि के होरा बंचणा काप हो रहा हैं। धही 
दियसाया समझ चाहिपे। ! कक 


) । 57; 


2 


९० भावारथ-शास्तीयव्याख्यासमेतम्‌ 


प्रतीकार में अपनी क्षमता फी स्थिति दिखाकर सुख के कल्पनाजाल में अकतेव्य की ओर भेरणा दे रही 
है, इसको शिव जी ने ख्रीमाया फट्टा है। वंचना फा एक अंग मधुरता भी है। प्रकृति ने स्लियों में 
स्वाभाविक मधुरता दी है!। उनकी सोहकता जन्म सिद्ध है' जो रानी फा आलंवन है'। अतः वंचना करना 
स्त्रियों के लिए सुसाध्य है'। यदि वह अनुशासित होकर योग्य स्थल में प्रयुक्त होती है. तो शोभनीय है । 
पर यहाँ पूरे जनपद के साथ अधःपतन की ओर जानबूझकर ले जाने फा उपक्रम किया जा रहा है। 
इसमें तियमायात्सक निमृष्ट स्वरूप प्रकाशित है 

संगति-अपने दुःख का प्रतीकार कैकेयी को समझ मे नहीं आ रहा है, यह देखकर मन्धरा उसको थैये 
देकर उपाय बताने जा रही है'। 


सौ०-अस कस कहहु मानि मन ऊना । सुखु सोहागु तुम्द कहूँ दिन दूना ॥ ४ ॥ 
भावाथे--मनस्‌ सें दुःखी होकर ऐसा क्‍यों कहदतो हो ? तुमको तो सुख-सुद्दाग रोज-रोज़ बढ़ने वाका है । 
वँचना में मन्थरा का सुझाव 


सौत कौसल्या का सेवकत्ब, पतिप्रीति का अभाव और मरने की वात इन तीनों वारतों फो लेकर 
कैकेयी ने अपनी दीन स्थिति दिखायी है'। उसके उत्तर मे तीनों वार्तों का निराकरण करती हुइ मन्धरा 
का कहना हैं. कि रानीको सेविका नहीं होना पड़ेगा, राजा को भी वश मे कर सकती है. । असी कुछ विगड़ा 
नहीं है!। जिसने रानीको नीचा दिखाना सोचा है'। उसे स्वय नीचा देद्घना पड़ेगा । 


ह दिन दूना का तात्पय॑ 
उपनिषद्‌ के निर्णेयानुसार सानवजीवन फा पूर्णेसुख राजा बनने से है। वह रानी उपलब्ध कर सकती 


है यहो दिन दूना का तात्पये हैं। 
संगति--दोहा १७ में (राउर सरल स्वभाउ) एवं दो०२० मे कैकेयी फी उक्ति के संदर्भ मे सन्थरा फहती है' । 


चो०-जेदि राउर अति अनभल ताका । सोई पाइहि यह फलछु परिषाका ॥ ४ ॥ 
भावाथे--जिन्दों ने तुम्हारा घोर अनिष्ट चाहा है! वे उसका फल पाएँगे | 
फलुपरिपाका का भाष 


जश्ञा० व्याख्या--हतने समय से सोत का दुर्व्यवहार जानती हुई भी उसने नहीं कह्दा इस आशय से कि 
सोत का पाप संचित होने दो तो उसके परिपक्र होने पर उसका फल शीघ्र द्वी सामने आ जायेगा। 
फहने का भाव यह है. कि सौत ( फौसल्या ) के लिए उसके पाप का फल सिलने का समय आ गया हैं, 
दैवकी फलीभूत होने के लिए केवल निमित्त बनना है दासी की अब तक की हुईं उपेक्षा सौत के लिए दंड 
साबित होगी। वलवद्निष्टानुबन्धित्व फो यहां “अति अनभल” से व्यक्त किया है | 


ज्ञातव्य है कि 'जेहि राउर अति अनभल ताका?, से सन्थरा साम्ान्यसिद्धान्त का निरूपण करती हुई 
कौसल्या पर विशेष आ्षिप कर रही है। निष्पाप शुचि व्यक्ति का अहित चिन्तन करने वाले को अपने पापका 
फल भोगना पड़ता है उसी प्रकार सरल स्वभाववाली निष्कपटा केकेयी का अध्वित करने वाले को उसका 
दुष्परिणाम भोगना पढ़ेगा। भीसांसकों ने अथेबाद का उपयोग बताते हुए कद्दा है कि विधेय में अधिक से 
अधिक रुचि उत्पन्न करने के लिए उसके अनुपात के अनुसार अधिक से अधिक सुख फी कहपना देना है 
उसी प्रकार-निबृत्ति के लिए उसी अनुपात से निषिद्ध में अरुचि उत्पन्न करने के "लिए अति तीज अनिष्ट की 
, कल्पना देनी होती हैं, उसी को यहां 'सुखु सोद्दाग़ु दिन दूना', और “अति अनभल?, कहा है । 
संगति--भयउ पाखु दिन सजत समाज! की उक्ति के पृष्टीकरण सें सनन्‍्धरा विचार सुना रही है। 


अयोध्यादास्टम ९ 


चौ०-बद ते इमत सुना मैं स्वामिनि | । भूख न बासर नींद न ज्ामिनि ॥६.॥ 
बाधे--बब से मैंने इस बद्बस्त्र के बारे में सुघा है दब से मुपको दिन में भोजम लरछा गई कगदा छोर व 
दाद में धींद हीं भावी है । ॥ 


राब्योत्सशानिधादोपायचित्ता लि 


० स्या०--राम्यासिषेफ फे बारे में जब से ( “भयठ पास दिन! ) सन्‍्यरा ने कब 

पाद के पिदारमें म६ इदली ज्यस्ता थी कि अज्षना पिपासा भी छसे प्रतीत कम डक थे पलक 
वी हे। इसमें मन्‍्थरा अपनी चिन्ता फा अनुभाषदर्णन फर रही दे। सादिस्फ्क सिद्धान्तमें मार्पोको प्रकट 
ना पमन फे ४:44 २65 गया हैं ! २] न 

संगधि-राम्पामिषेक फे प्रतिद घक कारे फ्री अपनाने में बिना देव को समझे क्या सफ़कदा, 

प्रश्न का समाधान किये दिला फैकेयी फो इष्टकार्य में; धृत्तिमाव नहीं हा शत गत, 
 ( घौपाई ३ दो० २० से “धीरज घरहु” ) घृतिमाव को,ृृढ़ करने के किए सम्बरा लव ऐश रे 
मति का पदेश्व कर रही दे । ड़ 


ची०-पूछेें गुनिन्द रेख विन्द खादी | भरत मुबारु होहि यह सांची ॥ ७ ||. ' 
बारधें--उपोदिवियों से मैंमे पड़ा ऐो उम्दोंने सयना करे बढाया कि मर राजा होंगे, पह नि्ित है। 
) 


प्रविभार की दर म दैवक्ष की सहायता शा 
० स्था८--राजप्रासाए में प्रत्पेफ पिपय फे पण्डित आश्रित, होते शी हं। प्न्यरा ने देपज्ों पा 'रिल 
ह्‌ छापी” गणना द्वारा निर्ेय सुना दिया कि मरत राजा शोकर रहेंगे। इस प्रफार भाषिदाये की 
द्धि फे आश्वासन से केफेयी फो धोरा बनाया । ; ॥ ॥ + 
संगठि--दैबक्ष फे पिषारों फो मुन फर राजा फे ढाये ( पस्योत्सब ) फे प्रतिकार में जैसे-सैसे राजी! 
राहिता ने च्गी पैसे-पैसे उसकी पिजिगीपा भी बढ़ने श्म्गी । इसफी / विभिगीपावस्था कोः देखकर! 
प्रा ने* जयोपाय घुनाना प्रारंभ छिया। 
चौ०-मामिनि | ऋरदु त कई उपाऊ। है तुर्दरी सेशबस राऊह ढक 
प्रार्थ--पदि ३ करो दो पक शपाय बढाऊं, पद कि तुम्शारी स्ेदा से राजा तुम्दारे रूघीत हैं ही भर्पाद, कदम 
सागते दे । ! 


॥ 


यथाब्वाठकारिता में फरपिद्धि ध ; 
० ज्या०--ज्यध में उपाय बदाना ठीफ नहीं ऐसा सोचफर सन्परा उपाय छो काये में परिणद करने की 
ज्षा रानी से फरपा रही है। फेफेदी छी 'ेष्टात्मफ स्पीफृति को समझते हुए मस्यरा ने कार्यसिद्धि कया 
य बताया कि जब राजा पष्ठ में हे. दो यथाड़ाउकारिता में जो राली कट्देगी बद रासा करेंगे द्दी। 
 स्थिदि में यदि पद हुई फरेगी दो भरत फे राजा दोने छी घोषणा राजा को फरली ही पढ़ेगी। 


॥ | ५$+ 
एक घोषणा के विपरीत दूसरी घोषणा राजनीति फरे बिदुद “पं म 

हाउब्य दे कि सकृघूजस्पन्ति राजान? इस इक्ति फे अनुसार एकबार रामराज्य की घोषणा दो जाने 
पश्मात्‌ उसका परिष्देन मी धोना बाहिये, इस' नीति फे पिरुद्ध भीरास जी से ऋद्धा को इटाकर 
पैधी भेरणा देना कप ह। पर एसी प्रेण्णा देना मन्‍्परा फे छिए भास्मर्य नहीं हैः क्योंकि घूर्षों के 
बे भकाये कुछ नहीं है ।* कह गे हे # 

) प्ाहित्य झा भें दिल्ठा प्रेम भादि स्पभिदारिमाव को शरम्दपः प्रकर कण दोद मात्रा गया है।' 

३ पराईंकारखलगइल लया; ३ दिमकादे कश्नोध्यम्‌ ! न्‍ 9९५ ४ 


९४० भांवाये-शास्रीयव्यास्यासमेतम्‌ 


संग़ति-+फार्यसिद्धि की साधनता अत्यक्षातुमान से सिद्ध समझकर कैकेयी अतिज्ञाचद्धा दो रही है'। 
. (5, , ,दी०--परउं कूप तुरअं बचन पर सकएठं पूतपति त्यागि। 
. कहसि मोर दुःखु देखि बड़ कस न करव हित छागि ॥२१॥ 
भावाथ---रानी ने कह्दा-तुक्षारे कहने पर में कुएँ में गिर सकती हूँ अर्थात्‌ अपना प्राण दे सकती हूँ। पविन्न पदि 
.. / को भी छोड़ सकती हूँ | तुम सेरे महत्‌ दु.ख को देसकर उसको दूर करने मे जो कहती हो उसको 
हि हा <ः <भपनी भलाई के लिए क्यो न करूँगो ? अथवा 'पूत' से निरपराध पुत्र श्रीराम भी विवक्षित हुं 


3 “कक कर्तव्य के निर्णय में प्राच्यपाथात्य नीति में अन्तर 
जश्ञा० व्या०--कर्तंव्यनिणेय मे भारतीय राजनीति और पाश्चात्य राजनीति का अन्तर मननीय है. । 
पाश्चात्यं नीति में अत्यक्षाचुमानसिद्ध अथे को अपनाया जाता है' | लेकिन वह नीति सर्वत्र सफल होगी ऐसा 
विश्वास भारतीय मनीषी नहीं करते । इसलिए वे शब्दप्रमाण की इद्‌ंश्रथमतया अपेक्षा रखते हैं। अभी 
कैकेयी ने आप्तशब्द की उपेक्षा करके अत्यक्षानुमानसिद्ध अथे को अपनाने का संकल्प किया है'। किन्तु 
शाब्द-असाणके विरोध में असफलता सिद्ध होगी। इससे निष्कर्प निकलता है' कि छौकिक नीति को शब्द- 
प्रामाण्य की उपेक्षा या विरोध में मान्यता नहीं देनी चाहिये। ु 

यद्यपि केकेयी के विचारग्रणाढी में जो जो अनुमान ( द्वेतु ) दशशाये हैं. उन-उन्त देतुओंको सोपाधिकत्व 
से दुष्ट ठहराया गया हैं, फिर भी सोपाधिकत्व अथवा निरुपाधिकत्व का निर्णय शाख्राधीन है! । अत' 
शब्दनिरपेक्ष अनुसान का कर्तेब्यनिणेयमें प्रामाण्य भारतीयनीतिमत में सन्दिग्ध समझने की परपरा है । 


पर '.' स्वार्थवादी सिद्धान्त मे निरंकुशता 


की ' ह 

कैकेयी ने साध्य के साधन प॒व॑ चाधक का बिचार किया हैः। ढुःख से बचने एवं अपने स्वार्थ की 

सिद्धि में जो.वाधक होता है! उसका त्याग शरीरात्मवादी करते हैं। इस सिद्धान्त मे “आत्मनः कामाय 
पुत्र: भियो भवति” आत्मानं सतत रक्षेत्‌” इत्यादि वचन स्मरणीय हैं! 

१९ वें दोद्दे में कह का दृष्टान्व देकर मन्थरा ने केकेयी को असह्य वेदना की कल्पना करायी है! ।, उस 
वेदना को याद करके केकेयी कह्द रही है कि मन्‍्थरा जैसी हितेषिणी जो ढुःखग्रतीकार का उपाय बताती है. 
उसको अपनाना हीं चाहिए | अंक! 

' “अर्तुत में सौत को ढुःख असह्य द्वोने से कैकेयी पति का भी त्याग करने को तैयार है। लड़के को 
राज्य दिछाकर अपना स्वामित्व स्थिर करना ही उसका लक्ष्य है'। ४ 

डुष्टविचारशील मा के सान्नाज्यवाद मे निरंकुशता स्वयसिद्ध है'। ज्ञातव्य है' कि परोप- 

कृति या सेवकत्व के अभाव में स्वार्थी व्यक्ति के द्वारा देश का द्विव द्वोना असंभव है, इसलिए भारतीय 
राजनीति में ईशभक्त, त्यागी, आत्मनिष्ठ एवं शास्त्रानुरागी को द्वी राज्य के रहिए अधिकृत माना 
गया दे,” इसका उदाहरण भरत हैं। यदि कैकेयी के कहने पर भरत राज्य लेते हैं तो दुश्चरित्रा के 
वचन के विश्वास पर राज्य का' विनाश होना आवश्यम्भावी है' जो भरत के बचन से स्पष्ट होगा। 
स्वार्थथश अधिकार के ढोश में साता छड़के को सार सकती है. जैसे माता द्वारा अपने पुत्र विजितगुप्त 
को, मारने का इतिहास है ।' अत राजशास्त्र ने ऐसे व्यक्ति पर विश्वास न करने को कहा है. । के 

हक इससे यद्द भी निष्कृषे निकलता है कि कैकेयी और भन्‍्धरा का पारस्परिक सम्बन्ध विश्वासाई नहीं 
2 0200 3:28 जो हे निर्दोष हे का त्याग कर सकती है बह एक दासी का त्याग करने में 
क्या देर अतः भारतीय न्त्में 
आन गया है। राजनीतिसिद्धान्त में स्वार्थियों का चरित्न देश के लिए दवितावह नहीं 


स्‍ल्जज््ज््ैा्््््ततजन- |] हे 
१. वि जिवगुप्तर्यापि मगधराजस्य मातापि अमिचरत्ति सम | नी० ज० स० ७ 
4 का 4 4 


पअंयोध्यास्ण्डमू. । ९३ 
कप उक्त पक्ति फो स्यात म॑ छाफर छ्वियजी अश्यम्त पीड़ा में उसकी मूक्र्तो पर घरस 
दा | ॥ की। 
चो०--इपरी ,, करि कबुढ़ी कैफेई।कपट छुरी ठर; पाहन टेई ॥१॥॥- 
उुख न रानि निकट दुख कैसे । चरइ इृरिवतिन बढिपतु, जैसे ॥२॥ . ,,, 
छुनत घात सृदु अंत कठोरी | देति मनहूँ मधु माइर घोरी ॥३॥ 
भाषार्थ--ऊुबड़ी थे ऊैयी को पूरी रह से हुप्फ़ पछ्िपश्ु पाषा कपररूपी, छूरे को अपने द्रदय झपी पत्यर, 


पर सेज झाल फगी अबात्‌ परपर दी तरइ कंठोरइदइंप पाछी मम्यरा कपट का उम्र प्रद्धार करने में 
उचता हुई । 


+ 


त है 

झुन्दजाल का वृल 
जा८ ब्या०--परस्पर पिरूद्ध मातों फे जाल म॑ पिरोध फो छ्िपाती हुई सत्यठा फ्ो ्रारोपित फर मन्यरा ने 
शजर्पए्ठ मे भेदृस्थिति छाया । रानीसमेत सुंपूंे राजप॑श्ठ फा ,अफल््याण संपन्न फरने में यह सफल्या 
समप्त रही है। या मन्धरा फा फापटय पंचना फी गहराई है । तफ़ फे अ्रसाय में उपाधि फो न समझकर 
राजी उपजप्टप्रशत भेद ठगाने पाढा भाय न समभझ्न सफी, फेपछ सानिनीत्य फे झोफ में मानोरथिफ 
बुच्ध फ्रें स्पपद्ारिफ यु स्तर मान रही हे। यास्‍्तपिफ ज्यायदारिफ दुःख फी स्थिति फो न समझफर सन्धरा के 
यागूजारू में. पँसफ॒र अपना घछिदान फरने फो प्रस्थुवा है। स्पार्ये फी फल्पना में पति पर्व पृप्न फो 
स्याग देने पर इवारू दे। तफ्युफ सत्य फे अभाष में दासी फा घान्दुजार इसफों मनोर॑जफ सादूस 
दो णद्दादे। | 

ब्यंघना का प्रहार 


यह फद्दा वा सदिया है. फि दासी ने सादित्यिफ साथारणोकरण न्यापार से शास्रमयोदाकी घुद्धि पर भारी 
प्रहार फिया दूँ मनन्‍्यरा फे पक एफ छाब्द पिपसइफ दोते दूर भी स्पठन्त्रतारूप सघु प्ही कस्पना से सौद 
फे दुः्ख का जहर फटा फर फैफेयी फे अन्च'फरण फो राया से प्रथफ, फराने में सफख्न दो रदे हैँ। सस्यवा 
का पिरोधी पश्च व्यंजनाब्यापार फा सद्दारा छेफर धन्य द्वो रहा दे! जिसका परिणास 'पियेश्ना है। 
स्यंजनाम्यापार मनस्‌ फे छिए इतना सोदफ दोता है फि यह सामान्य थुद्धि पाऊों फे किए पिचारशक्ति- 
झा अ्दिद पफ हो फर एसाभास फी ओर भी छे जाता दे। अन्त में #फेयी भेद फा शिकार शो दी गयी। 
संगदि--उत्तर काल, मे | प्रविश्ञानियदण मे ।मेंद्ी फैफेयी फो पेखफऋर सन्मरा' सश्जुकृतिसाध्यकर्मे को 
समझाने के लिए राजा एप कैफेयी फा पेविश्यासिस्ध प्रसंग सुनाती हे । + ) ४ ।। 
जौ०-कहर येरि छुषि अदइ कि नाहीं | स्वापिनि ! कहेहु कथा मोदि पादी ॥४॥ 
दुइ बरदान भूप) सन थाती | मागहु 'आज जुड़ापह छावी ॥५॥ 
भाषाधे-दासी %कइएी दे कि ए रपामिनि! तुम को थाद दे कि पईी। तुमने सुससे पुक् कथा कदी थी 
ढि गाजा से दी पर सुछ्ते मिछ हैं जो धरोहर के रूप सेहू। रमको भाज मांगकर अपना इदप शो 
पह्दी छ्लीवफ्ध कर खेती हे | हे ; 
उपाय निरूपण 
शा० प्या०--सम्यरा झैफेयी फ्यो प्रयोष फरावी हुई सुनावी हैं कि भापिसंफ्रट को याव फरके अपने हृदय- 
को पिपाद में आप बिदीणे न फरें, अपितु प्राचीनयरयाचना फे इतिहास फा स्मरण कर पैये घरें। 7 
4४ ह रू एक्त पौपादयों पी एफशाफ्यवा भौ० ३ दो० ३० में फटे प्रधोधिसि! डे अन्वगेत भी 
पप्नश्नना ई। गा | ४ ४ +:+ 7४ 


९४ ' भांवार्थ-शासीयव्याल्यासमैतम्‌ 


संगति-दोनों बरों का रहस्य आगे पीस दोहे के छन्द मे भकट दोगा। अभी घर का स्वरूप 
प्रकट फर रही है | 
चौ०-सुतदि राज रामहि वनवास | देंहु लेहु सब सबति हुलास ॥ ६ ॥ 


भावा--शपने पुत्र भरत को राज्य और श्रीराम को वनवास देकर सब सौतो का सुख छीनो । 
दुःखप्रतीकार की साधना परद्यसे 


०-- के लिए राज्य दूसरा वर श्रीराम को वनवास--ये द्वी दुखनिवारण में इति- 
कर्तव्य है । इनसे सह नष्ट हो जायगा। यह संकेत ची० ८ दोहा २१ में कहां उपाऊ! में छिपा 
था, यहां व्यक्त हुआ | 

भन्‍्थरा के फदने का आशय है' फि वरहययाचनाकाये कैकेयी के लिए असाध्य नहीं है' और राजा के 
लिए भी ये दो वर अदेय नहीं है | 
तामसम्रकृति का कार्य 


यहां चिन्तनीय है' कि मन्थरा बता तो रही है' दु'खप्रतीकार फी योजना पर जुटा रही है' दुख का 
साधन, इससे साध्य दुःख ही होगा, न कि प्रतीकार। तामसप्रकृति वालों के कार्यक्रम फी रूपरेखा ऐसी 
ही होती है । सात्विक विचार की स्थिति में सरवगुणसंपन्न पिठृभक्त नीतिमान्‌ (श्रीराम ) फी छत्नछाया में 
रहने की योजना बनायी जाय तो सेवक को सौभाग्यप्राप्ति सुलभ दोगी। विषय की लालसा में कैकेयी इतना 
सूक्ष्म विचार नहीं कर रही है! कि ऐसा फाये संपूर्ण गृहस्थजीवन फो सुखसे वंचित करने वाला है । 


सालिकनेद॒त् में सुखमय जीवन 


संसार में सत्वप्रधान व्यक्ति दुलेभ है'। उसकी निर्मिति पर ध्यान देने की आवद्यकता है'। उदाहरणाये 
शिवजी सत्वप्रधान विष्णु के प्रतिभूत्व मे नरेोक्यव्यवस्था सौंप कर आनन्द से काशीनिवास में निमग्न 
रहते हैं। केकेयीप्रश्तति फो वेसा ही योग देना राजा ने सोचा था। किन्तु सात्विकता के अभाव में 
वह उस सुख से वंचिता हो रही है. । 
: संगति--असतूपराभरो सें फंसी कैकेयी को यह प्रश्न उठ सकता हैः कि पूर्वदत्त वरदय फी याचना- 
मात्र से महाराज से बर की स्वीकृति केसे करायी जाय ९ 


।... चौ०-भ्रूपति राम सपथ जब करई । तथ मांगेहु जेद्दि चचन न ठटरई ॥ ७ ॥ 


भावाथे--इतना ध्यान अवश्य रखना कि राजा दुद्गवर्थ श्रीराम की सौगन्ध लेक तब परद्ुय मांगो जिससे शाजा 
अपनी घाद से टलर न सर्के । 


वरस्वीकृति में शपथ का उपयोग 


शा० उ्या०--रानी के उपयुक्त प्रश्न के समाधान में मनन्‍धरा समझा रही है' कि राजा सत्यसन्ध हैं. इसलिए 
प्रतिज्ञा करने के.बाद उससे वे परावृत्त नहीं होंगे। अतः युक्ति से काम छेना होगा कि जब रानीके प्रेमके 
अधीन द्वो राजा केकेयी को असन्न करने के लिए अगत्या रामशपथ छेंगे तब अपना प्रस्ताव उनके सामने 
रखा जाय तो फायेसिद्धि ( बरहय स्वीकृति ) अवदय होगी। 


सत्यसंघ को विषश करने का अस्त्र धर्म है 
धामिक़ों फो घ्म के नास पर फेंसाना धूर्तोीं फा हथकंडा है। भन्थरा खूब समझती है फि वह और 


कैक्ेयी दोनों इस समय अपने स्वाथेसाघन के लिए दोषबहुढ़ कार्य कर रहे हैं। यदि राजा को 
प्रणयसानिनी न समझ्न कर फद्दी उसको दोषवती समझेंगे तो “दुषंटं दृण्डेन” विधानके अनुसार (2528 


अयगोष्यादाण्दम ! +९५ 


को इंडित फिये दिना नहीं रहेगों। उससे बचने फे छिए पर्म की आड़ छेना ही पक सात्र सह्दायक होगा 
ऐसा समझकर सम्यरा धर्म फी जोट में आयग्व उपाय निहूपण फर रहो दे ॥॒ 


संगदि--अपना इष्ट साधने फे छिप फाउपिट्स्प पिनाप्छारी शोगा । ं 
चौ०-शेइ अकाजु आजु नि्ति बोतें । बचन मोर प्रिय मानेहु घीतें ॥ ८ ॥ ४ 


भादार्प--बरदि भाज के रांद बीठ जापशी यो कोइ काम व बनंगा | इसछ्षिप जो काम झगा कर मेरी बाद को 
प्रिए मानो और कार्पास्दित करो । 


कालाठिफ्रमण में दोष 


शा० स्या०--यदि आज रे राद बीठ जाठी हे दो कैफेयी का स्पार्थ कमी सिद्ध नही होगा क्योंकि कुछ ही 
रामठिटक हो जायेगा। इसलिए रामराम्यपिपात अश्लुभ फमे होते हुए मी उसको टाठने का समय नहीं 
है। अवः मन्यरा प्राथना फएती है फि रानी उसफे पच्रतत को आण से भी अधिफ प्रिय माने । राय्रा के 
पह् से क्या 'अफाज! हो सफता है. यद् चौ० ३ दो० १९ व्याख्या में द्रष्टन्य है । न 
अकाज म॑ शुभ-मावना 00 धुल 


श्ा० ब्या८--रामराम्यपिपात में दूसरा पक्ष यह भी हे! कि इस फाये को अशुभ नहों समझना चाहिए 
क्योंकि राज्याभिपेकोत्सय फे प्रतिघात म॑ फैफेयी मोहपण् अपना हित समझ रही है। “सानेहु श्रीते? 
का भाष है कि जी जान छगाफर मात फ्रो मानता जैसा फैफेयी न वोहा ३३ में राजा से “मोर' मरनु? 
कद कर अपने पछ्ठ फो एसा या। +१ 

पोइ अकाजु भाजु निस्तिबोदें! से मादम दोता दे फ्रि सन्‍्यरा जानती है फि क्रमी तक राजा ले ही 
राम्यामिपेदाय उंफरूपफाये किया दै। भ्रीराम फा संकल्प पूसरे दिन हो आयगा तो रानी का भ्रमिर॒पिद 
कार्य पूरा न हंगा। इस संफ्प में राजनीतिभकाए में एल्छिझित राज्याभिपेकनिमित्तिफ सकरु।का 
फछ ड्राठम्प है, जिसफ अनुसार सम्पूण प्रकृति पश्या दो जायगी। आज़ु निसि! दहने फा पश्भ्िप्राय 
सौ० ६ दो० १९ की स्यास्या में निविष्ट यिपय से भी मन्तम्प दे। 

छंगवि--भन्यरा क। यह पिपाद-फार्य धर्मे-स्यापना म॑ संगढ्दायर सिद्ध होगा, ऐसा सोचते हुए 
झिबजी मन्यरा के निगसन फो न्‍्यया फे साथ सुना रहे हैं. । 

दोहा--इड़ कुपातु फरि पातक्िनि फ्द्ेसि क्षोपग्ुईं जाहु॥ ' 
फाजु सँवारेह् सजग सयु सहसा जनि पत़िआहु॥२२॥ , 
भआावार्थ--पापिमी मस्पदा न भादी दोप छगाकर कड्ा रूष कोपमबन में चछ्टी जाधों | बहुत सावधान रहकर कास 
सम्माझमसा ) उठाषक्षी मे ( पृकाएक ) राजा का विश्वास मत करना ।! हा 
विधि के भेद से पुनदक्ति का परिहार ४ 26 

झ्वा० ्वा--अमभीतक उत्पत्तिषिधि और कषिफारपिधि फी दर्यो हो चुफी हे। 'यया--प्वतवहि राच' रामहि 
बनवा से प्धिकारधिधि; रामराम्यधिपात से उत्पश्िधिधि समझना चाहिए। रामराश्यविषात को 
सेवकत्ब में विनियुक्त फरना पिनियोग विधि दे जो इस दोहे में झतायी गयी हैं। इस पिधि में; पेश, 
काठ, रूम भी समझाया गया है। जैसे आज की सात्रि से छाछ का विशात, कोपभवन से द्रेदा का 
ठया कोप भबन में जाना, पति फो बश फरना, शपथ केने के बाद मर की माधुमा करन आदि प्रयोग 
धान के अन्तर्तेद है । इस प्रकार सन्यरा फे पवन में निगमन है, पुनरक्ति नहीं, दे ।, 


[ ईः 


९६ भावाथ-शास्तत्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


मन्थरा को पातकिनी कहने में हेतु 


इस अवसर पर शिवजी मन्थरा को पातकिनी कह रहे हैं. जिसमें हेतुवाक्य है--सहसा जनि पति- 
आह? अर्थोत्‌ श्रेममूर्ति अति विश्वस्त राजा में विश्वास न करने को कह रह्दी है'। राजनीति शास्त्र से 
राजद्रोह फो महान पातक बताया गया है'। * उसको शिवजी ने यहाँ पातकिनी कहकर अनुवाद रूप में 
सुनाया है ।* है 
मन्थरा की निर्दोषता में पापित्व 


ज्ञातव्य है' कि अस्तुत विघटनकाये-सम्पत्ति में मनन्‍्थरा के विचार सरस्वती द्वारा श्रेरित मानने होंगे, 
न कि उसके अपने विचार। पभु के परिवार मे नीतिमान्‌ श्रीराम के सम्पर्क में वह आ चुकी दै। अतः 
शुद्धा है'' उसको मोह नहीं है, इसलिए वस्तुगत्या पाप के निम्ित्त से वह नरकगामिनी नहीं मानी 
जायगी क्योंकि इसमें नियामक मानसनिर्दिष्ट सरस्वती का विचार है'। अधिकृतवाणी प्रमाण के 
अभाव मे सर्वेसाधारण जीवों की कार्यप्रणाली के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि प्रश्ु- 
प्रेरणा उनमे नियामक नहीं है'। अतः उनको पापभागी द्दोकर नरकभागी होना पड़ेगा । ऐसा होते हुए 
भी सन्‍्थरा फो दण्ड मिलना नीतिशास्त्ष की मयादा के अन्तर्गत है। अतः सन्धरा फो पापिन्ती कह कर 
शिवजी यह समझा रहे हैं कि राज्यविश्वासघाती को पापी कह्दा जाता है 'काज़ सेवा रेहु” से शिवजी 
भविष्यत्‌ मे रामबनगमन से होने वाले मंगढकाये फा स्मरण कर रहे हैं । 

संगति--अपने द्वित की अवश्यंभाविता और कार्यसफलता को ध्यान में छाकर कैकेयी मन्धरा की 
भूरि भूरि प्रशंसा कर रही है'। ' 

चो०-कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी । बार वार वड़ि बुद्धि बखाती ॥ १॥ 


तोदि सम हद्वित न मोर संसारा । बहें जात कई भदसि अधारा ॥ २॥ 
भावाथे--रानी ने मन्थरा को प्राण के समान प्रिय समझा । बारंवार उसकी बुद्धिमत्ता की बड़ी प्रशंसा करते हुए 
कद्दा कि तुर्हारे समान मेरी हितकारिणी रूंसार मे कोई नही है। तुमने हमको ऐसा सद्दारा दिया जैसे 
बहते हुए को कोई आधार मिल जाय । अर्थात्‌ राजा व को सल्‍या की कपट-धघार में मे दूब रही थी, तुमने 
सावधान करके बचा लिया । ' 
“बड़े बुद्धि! का वात्पये 
सन्थरा की चचो में बुद्धिमत्ताप्नरचुर विद्या को अथस स्थान दिया गया है'।* जिसको वड़ि बुद्धि 
बखानी? से यहां दृ्शाया जा रद्दा है'। थोड़ी सी चूक में मह॒त्‌ संकट आने वाला था जिससे यथासमय 
बचा लिया ऐसा सोचकर कैकेयी दासी की प्रशंसा कर रही है'। 


'. ' भविष्यत में प्रश्ञ के यशस्‌ में सहयोग 

यद्यपि आन्ति में केकेयी अपना हित कुछ और ही समझ रही हैं' पर सती कैकेयी की वाणी सफल 
होकर वास्तव में भविष्यतकाल में श्रीराम एवं भरत को महद्‌ यशस्‌ का भागी होने का सौभाग्य प्राप्त 
करायेगी जिसमें मन्थरा भी सह्दायिका है। इस दृष्टिकोण से कैकेयी की उक्ति 'तोहि सम हित न मोर संसारा? 
उचित द्वी है. क्‍योंकि श्रान ते अधिक राम प्रिय मोरे” की स्थिति में सरस्वती द्वारा प्रेरित कर्तव्य को 
साधने का आधार दूसरा, नहीं था।.* | 

4. बह्मदुद्दान्च ये लोका गुरुपुन्नद्ुुहाब्ध ये। 

'पविद्वुहान्च ये सञन्नीणां ते समस्ता नृपठ्ठुदाम्‌ ॥ जज 
२. उपयुक्त विचार चौ० ३ दोद' १३' में ग्याज्यात विचारों से सम्बद्द समझना चाहिए । 


बढ 





१३ अयोष्याफाण्डम्‌ ९७ 


मंगति--फेपलपाद्याश्र से दी प्रीति पह्ी दिखाती, फिन्तु फायिफण्यापार से सी फैफ्ेयी दासी को पुरस्कार 
बैने फी प्रतिएा फर रदी है । 
चौ०-जो विधि दुख मनोरध फाली करो तोदि चसख पूतरि आली ॥| ३ ॥ 
भाषाये--परदि विधादा सेरा मनोरप पूरा करेगा छा में हुमड़ो आंख को पुरक्षी के छम्ताम भादर और रफ्षण की 
पापा पना बृंगी, या भशान को इट कर प्रकास यमे बछ गुद के समान सम्मानिता कर बूंगी । 


मनोरध फी सगति 


झा न्‍्या“--यहां घ्यान देने फी घात है फि फैफेयी हित न कह कर 'मनोरय फद्द रही है” इस सनोरम को 
पह आंग यरयापनामें 'पुरयह नाथ मनोरथ मोरी” से प्रूट फरेगा। यद्यपि इस समय दासी आँख फी 
पुदठी दो गयो पर जनोतिफा परिणाम उसफो भोगना ही पड़ेगा । 

संगति-मन्‍्परा फे निर्देश फे फायान्ययनाथे फैफेयी फोपभयन में गयी ! 


घौ०--पहुबिधि चेरिद्ि आदरु देई | फोपमपन जबनी फैफेह ॥ ४ ॥ 
भाषाध--दाप्तो को बहुए प्रकार से सम्मान दुकर #कैपी कोएसयन में चरछी गगी । 
शूढ समय पर सहायक नहीं दोत 
शा* स्या८-- पारस्परिफ जना में भेद त्याफर उपजप्ता (भेदिया) अपने आप्रस्य फी छाप छगा फर घछा 
जाता है! । पर मपिष्यत्‌ म॑ आनेषाठी पिप्ति फे समय स्पार्थी शठ सह्ायफ नहीं होता अत नीपिमानों 
को उनसे सदा सायधान रहना घादिये ! 
संगवि--उफक्त सापधानवा फो शियज्जी आग फी चौपाइया म॑ फट्ट रहे है । 
घौ०--पिपति पीजु परपाश्नतु येरि | धरई भई छुमति कैकेयी केरी ॥५। 
पाए फपदु जठु अंदर जामा | वर दोठ दल दुख फल परिनामा ॥६॥ 


भाभाध--पि्पात्ति बीज द | दासी यपौ है । उस बीज को बोले की भूमि कैफेपी की फुमति है। मस्मशा रूृपिशी 
बंप के फरट रूप घछ को पाफर उक्त पोज में भंकुर जमा । उस भकुर में दो घर झूप कोपछ मिकलेगे । 
डनका दुःप रूप रू दिग्गयी एडेगा । 


जशासचक्षुप्मान्‌ का अ घत्त, 


ज्ञा० न्‍्या“-पिपच्चि एप उसफे सहफारी फरापट्य आदि तथा दु््योपलब्धिरुपछछ की मविष्यत्‌ में 
संपन्नवा अरशाणर फे सिद्धान्त फे अनुसार दी ऐ। अर्धज्ञास में अशास्रपक्लुष्सान्‌ को भधा कहा 
ह * माय यद फि शास्रचक्तुप नीतिमान फो उपलब्ध ऐ तो यह आँख फा अघा नहीं कद्दा जाता । मिध्या 
शान में आनन्द फी अनुभूति रखने याठा प्राणी तफे एयें शासन फी अफुशल्ता में आस बाद धोने पर 
भी जन्धा ही है। कु ! 

मिश्याश्ानी के मतिमें मैसिफ फस फा अफाझ दिखाई पड़ जाता है फिर भी शाखकार उसको 
22 ह। फ्योंफि पैसा प्रफाए स्थिर नहीं होता । मिध्याप्ञानी व्यक्ति विषयकोछुपता 


हक, की, 


3१ भशाश्र अधुसृपतिसस्थ दृध्यमिधीयसे ॥ (ब सर्स ) । 


९८ भावाय॑-शाख्रीयव्यास्यासमेतम 


अशास्त्रीय अन्य विषय को अपनाने का प्रयत्न करता है'। एसी अव्ृत्ति से बचना आय शात्र की प्रेरणा 
का उपयोग है। अत एव मीमांसकोने छोकत* प्रवृत्ति के पूर्व शात्रो फ्री प्रश्नत्ति को सान्यता दी है'। यह 
शास्रीयमति सुमति है'। शास््रविरुद् भति मे जो प्रकाश होता है' वह वपयिक और स्वाथंभावना मे 
निह्वित होने से कुमति शब्द से व्यवद्वत है' जिस का भावी परिणाम दु सर है'। ज्ेसा सुन्दरकाण्ड मे कहा 
गया “जहां कुमति तह विपति निदाना? ॥ 

सुमति एवं कुमति 


चौ० १ दो० १९ की व्याख्या मे केकेयी के मतिफेरि का जो निर्दश किया गया है' वह मति “कोप- 
समाजु साजि” से पूर्ण हो रह्दा है'। उसका परिणाम आगे प्रकट होगा | 

रुद्रभाष्य मे सुमति की व्याख्या है--दुर्घट राजशासनफार्य को सपत्न ऋरानेवाली बुद्धि अर्थात्‌ ऐसा 
सफलकतेत्व जिस मति मे हैः वह सुमृति है'। कैकेयी की ऐसी दी सुमति पसिद्ध है 88 मपश्ञि की 
पूर्णता का अनुभव था | इसी अज्ञभव मे कैक्ेयी वरयाचना से निरपेक्षा रही । कुमति में कैकेयी का बह 
राज्यसुख नष्ट होने वाला है' जैसा अग्रिम चौ० ७ में राजु करत बिगोई? की व्याख्या भें रफुट है'। 


विपतिकाजु की व्याख्या 


यहां शिवजी ने कुमति फो भूमि कहा । उसमे व्यसन ( विपत्ति ) नियमत- अग्रकाशरूप मे वीज के 
समान रहता है, आज नहीं तो कल वह अकट होगा ही। जमीन मे छिपकर अन्त. रहने से दी वोज अद्धरित 
मे सक्षम होता है, उसी प्रकार ऊँमति रूप भूमि मे विपत्ति का बीज अन्तद्ठित हैः । 


कुमति-भूमि होने पर भी व्यक्ति यदि उत्तमप्रकृति वाले व्यक्ति की सहायता और उसके निर्देश पर 
कार्य करता है' तो प्रजा के हित मे सहायक होकर कुमति के दोषों को हटा सकता है। जिसको वैसा 
सहायक नहीं मिल सका उसके द्वारा अनथ होने मे देर नहीं है'। कुब्चा की कुमन्त्रणा से क्षैकेयी 
अनर्थकारिणी स्थिति भे जा रही है'। 

ऊसन्त्रणा देने वाली दासी को वर्षाऋतु कहा गया है' क्‍योंकि केकेयी की ऊँमति से विपत्ति का 
आपव्य अस्तुत किया गया है, अत कपट ही जल है। उसके सेचन से अभिमानाव्मक स्वातन्त्य का अंकुर 
उत्पन्न हुआ। केकेयी की कुमति भे >त्पन्न इस अकछुर मे दो बर द्विढल के रूप मे संकट हुए जिनकी 
फलोत्पत्ति मे ( परिणाम में ) संपूर्ण अजा रामवनवास को सुनकर दु.खिनी होगी । 

धर्म रूप खाद मे वे दो दल इतने पद्धभूछ है कि अपना कार संपन्न किये बिना नहीं रह सकते 
अ्थात्‌ भरत को राज्यपालन करना ह्वी होगा, श्रीराम को वन मे जाना ही होगा। द्विदलो से हुईं 
फलोस्पत्ति कैकेयी के मनोरथ से घुल-मिल कर दुखपरपरा के रूप मे परिणत दोगी, यह्‌ अश्ञाश्चचक्षुष्मान्‌ 
की दुर्मतिरूप जमीन को शास््रविपरीत बनाने का परिपाक है। 

संगति--असंगत* कुमति के वारे भे सैद्धान्तिक भत सुनाकर शिवजी पूव॑ग्न्थ से सगति जोड़ते हुए 
अग्रिम इतिहास सुना रहे हैं। 
..__ - चो०--कोपसमाजु साज्ि सु सोई । राजु करत निज कुमति बिगोई ॥७॥ 

शी कोप की सब 


भावाथे--कैकेय पामओ सजा कर सो गयी। जहां रानी राज्य कर रही यो वहा उसने अपनी कुमति 
से वेभव को बिगाड़ दिया | 


भयोप्याकाण्दम हि 


चरग्यपर्था का अभाव, पर्मश्ासप्रापान्य 


झा म्याप-राजधीससर्ंश्व राजा संपूण राज्यसंब्राउन मे अ्रतिभू हे । राजनीविश्ात्र में उसझ़ो 
प्रतिक्षण घारभसुष्माद्‌ दोफर दूसत रहन फा पिघान दे ।' अन्व'पुर सी व्यवस्था में राजा पृशरण म्माद 
में माछुम पढ़ते हूं। यदि अन्तपुर म॑ वरज्यपस्पा रइती पो सज़ा की वहां छी पटना की सूचना तुरन्त 
डग जाती । पैसा नहीं हुआ । 

यस्वुव' सथ्टस्पिति फे अद्वसार अन्व पुर म॑ राजमिरोधिनी चचा की छेझर गड़बड़ी संभाषित नहीं है, 
एसा निश्चय राजा फो हद हे। एिंयहुना 'राजु छरत फे एलेस्र से स्पष्ट हे' फि राजा राजफायो में फेकेयी 
छो भी साथ म॑ रखते थ। संपूण रानियों का फरैफेया ने मीति सूत्र में बाँघफर रखा होगा । 

राजा फे अधिछत सेना में धर्मशासन फा आ्राधान्य अत्यधिफ था इसछिए खग्त'पुर में घरोंकी 
नियुक्ति की उनका अपेक्षा नहीं थी । पमेशासन म॑ ग्रवा अनुष्छदा मानी आदी है'। अब राजा अमादी 
नही ईपी पटना दी उक्त गढ़यढ़ी में फारण है, जैसा फि घो० १ दो० १८ डी अधांल ( भागी बस मीसि 
उर आई! ) से सुट है। 

दंगों पटना फा प्राजल्‍्य रायसृत्य के सिन्‍्दों से मझ़ट हैं। इसो कारण कुमति में अपना ममाम 
दिख्लाया | जिससे प्रावा फेयछ भ्रो राम एपं भरव हैं! 

वत्फाऊ म॑ राजनीतिएी पघरमन्यपस्था फ्रे अभाव या दैय को प्रवटुसा में पिपरीय शाचरण का फछ 
हुआ ढि फैफेयी फ्री फ्रोपसमाज सवाने म॑ छिसा अछार फा मय नहों रदा । ] 

सेंगवि--पर फी न्यपस्था में राजा फ्री निश्निन्तवा फे संबंध म॑ शिवजी सुना रहे हैं । 


ची०--राउर नगर फोठाइछ दोई | यह इचालि कछु जान ने कोई ॥ ८ ॥ 


भापा्धथ--शज के नगर में रागम्पोष्सपका हो इस्छा भर रहा मां। इघर डिसी को इस कुचाकढो कोड 
खबर महों पी ) 


घरन्यवस्था फ्री उपादेयता 


झ्ाश स्या०--राजा यदि राजनीति फे अनुसार * राजनाति के ब्यापार में घरॉ-दूवों के तरफ ध्यान 

नहीं दूवा वो पिनष्ट हो जादा दहे। राजाओं फे नप्र द्वी घर माने गये हैँ !* धर्मझ्नासन में मी प्रजा की 

मनीमृत्ति फा अध्ययन फरने झा निदश राजशाल््र में उपढाघ है, इसडिप फि मजाकी मनोयूत्ति सदा 

एकसमान नहीं रइदी ।* उसी फ्ा फठ दे कि थोड़ी सी चूछ में संपूण ग्रजा फो वुःख भोगना पढ़ा। 
कुचालि का वात्यये 


चौ ७।८ वो २३ म॑ फदे फैफेयी फे पयन कुचादि फे धोदझ हैँ अर्योत्‌ निरपराघ श्रीराम और 
छौसल्पा पर क्रोप ररना कुचाल दे जिससझया परिणाम भरत की पंक्ति में 'पापिनि सबदि मादि कुछ- 
नासा? ( थी ६ दो १६१ ) म॑ स्पष्ट हागा। 
१ स्रएश्रपिद्ि रागरति परार्रप्ुमेइपरिः (बो सारख ३३) 
हे आछोचयह दिमुणोपपत्नेः धरैधवूतअ पसपचास्म । एरर्वियुद्धों भर्वाठ ख्षिठाण्तं चरेरनेतेध छसानधणण 
मी स १३) 
३ छा! पश्यस्ति रायागः । 
४ प्रायुमबस्तभर्भंसम॑ पस्मादित/ध्ममुक्षणम्‌ । 
ठस्माधोणीप ध्ठत भावबेध्‌ छुसमादितः ! (नी सा श्र ५) 


१०० भांवार्थ-शासत्रीयव्यांख्यासमैतम्‌ 


संगति--ओीराम-राज्यारोहण सुनकर आशभ्यन्तर और वाद्य दोनों अकार का समाज ग्ियश्रवणजन्य 
आवेग में अपना-अपना कार्य संपन्न करने में व्यस्त हैँ । उनको विपयान्तर की ओर ध्यान मा अब- 
काश नहीं है'। सभी राज्यारोहणोत्सव देखने के लिए उत्सुक हैं, नगर की सजावट में तत्पर ईं। उस 
स्थिति का वर्णेन शिवजी कर रहे हे | ु 
दो०--प्रशुदित पुरनरनारि सब सजहिं. सुमंगल चार। 


एक अविसदि एक निर्गमहि भीर भूपष दरवार ॥२३॥ 
भावार्थ--भअयोध्यापुरी के सब नर नारी हर्ष मे भरे मगलछाचार करते हुए सजावट कर रहे थे । राजा के दरवार मे 
भीड़ एकन्नित हो गयी थी । कोइ जा रहा था, कोई जा रहा था | 
प्रियद्शेनश्रवणजन्य हर्ष 

शा० व्या०--सभी अपने अपने शरीर को भूषित कर रहे ढे। प्रियद्शनजसुख अमोद सभी को दो 
रहा है'। एक ओर कैकेयी भाविदु'ख की कल्पना में ऑसू वहा रही है । दूसरी ओर लोग रामराज्योप्सव 
की कल्पना में मानोरथिक सुख से ओतग्रोत है । सभी श्रजा वर्ग को इष्ट का योग दिखाई पड़ रहा है, 
यही उनका प्रमोद है। 

संगति--उत्सव के पूर्व कतिपय सखाओ को श्रीमान्‌ श्रीराम की परीक्षा छेने का विचार हुआ उसकी 
उपपत्ति आगे द्रष्टन्य है । 

चौ०--वालसखा सुनि हिय हरपाही । मिलि दस पांच रामपढ़िं जाहीं || १ ॥ 

भावार्थं--भीराम के बारूसखा हृदय से बडे प्रसन्न थे, दूस-दस पांच-पाच की ठोली बनाकर श्रीराम के पास जा रदे थे । 


श्रीराम के शील औदाय की परीक्षा 


शा० व्या८-श्रीराम के शीछ औदाये गुण की वास्तविकता को समझना वाल्सखाओं के परीक्षणका उद्देश्य है! 

राजशाल्र में कहा है! कि राजकुमार के वास्तविक गृढ़तत्व को सह्दाध्यायी सहपांसुक्रीड़त समझते 
हैं। वे दी राजकुमार के मर्म का उद्घाटन-कस्से रहते हू | इसके अभाव में रामचरित्र के आदर्श को सम- 
झने में राजनीति के अनुसार न्यूनता रहती । कहा जा सकता दे कि राजसभा में उपस्थित होकर प्रजा ने 
श्रीरामचरित्र के गुणों का वर्णन किया द्वी हैं: तथापि उतने से चरित्र (गुण ) की वास्तविकता समझना 
पयीप्त नहीं है क्योंकि इसमें राजा की चड़ाई एवं राजप्रसाद भी कारण हो सकता है'। 

बालसखाओं के परीक्षण का दूसरा यद्द भी कारण है कि चौ० ५ दो० १७ से लेकर चौ० ५ दो८ १८ 
तक कह्टे कुब्जा के वचनों की अयथार्थता को तटस्थ व्यक्तियों के द्वारा समझाना कवि का उद्देश्य है' | अतः 
राजकुसार का सहचारिवर्ग कुब्जा के समान आलोचक रहता तो भन्धरा के वचन और उसकी कुम॒ति 
अयथार्था नहीं ठहरायी जा सकती । इसलिए तटस्थवृत्ति की निस्सन्दिग्धता के लिए यह परीक्षणक्रम 
सुनाया जा रद्द है। यह कुब्जासवादानन्तरमन्थ की संगति है'। 

मित्रों की दसपांच संख्या का प्रयोजन 

ज्ञातव्य है कि मित्रों के वर्णनम्रसंग में कामसूत्रकार मित्र सहायविसझ्ञ में उनके तीन प्रकार चताते 
हैं--१) स्नेहत:' २) गुणतः* ३) जातितःः । स्नेहत. नो प्रकार के, गुणतः चारह गकार के, तथा 

4. सहपांसुक्रोडितं उपकारसंबर्द समानशीलब्यसन सद्ाध्यायिन यश्वास्य मर्माणि रहस्यविध्व विद्यात्‌ यस्य चाय॑ 

विद्याद्दा धाध्यपत्य सहसंबद्ध मित्रम । 
२. रजकनापितमाछाकारगन्धिकसौ रिकमिक्षुकगोपारूकवावूछिकसोवर्णिकपी ठमर्दंविटविदूषकादयो मित्राणि । 
३. वितृपैतामहसबिसवादकं अच्धटवेकृत॑ वइय॑ घुवमछोभशीलमपरिदार्यममन्त्रविसावमिति मित्रसपत्‌ । (कामसूत्र) 


अयोष्याफाण्दम्‌ १० 


कि आठ प्रफार फे ईं। इड्डी म॑ से फ्तिपय मिप्रों को ध्यान म॑ रखकर दस पाँच से संफेवित 
 दे। 
_संगठि--राजयुमार फे छिद्र फो प्रद फरन से सध्षम माडसखा ममेश्न द्वोठे ऐैँ। राज्यारोहण फे निमिष्त 
से राजकुमार में मद तथा मान फे आने फो संभाषना हो सफती दे। जिससे घाठसश्लारश फी घपेक्षा हो 
सम्दी है । इस परीक्षा फे देतु से जैसे ही पन्‍्दोंने राससन्दिर में प्रवेश फिया स्पें ही प्रभु पी दरफ से 
भी इनफे प्रति आदर और प्रेम फा भाष औचित्य फे साथ श्ष्टिगोबर हुआ ।* 

सौ०- प्रभु आदरद्दि प्रेम पदिचानी | पुर कुसल खेम सृदु बानी ॥ २ ॥ 


भाषायै--पल्तार्भा क हादिक प्रेम को समप्कर भ्ीराम इसका स्पागठ करते मोठा पायी से सणा्भा के कुपरक 
झूम को पूउन के । 
नादर मे प्रेम तथा मानमदाभाय 

शाप ब्याप--प्रभु न सखाओं फे सामने अपने फ्रो एसे प्रस्तुत छिया है जेसे सेयफ स्पासी फे सामने 
सड़ा ऐोदा दे। फपि इस ज॑गागिमाय फो आादरफुस्द मे ख्यक्त फर रहे दें। यदि ऐसा अंगागिमाय फा 
स्पयद्दार ध्ीराम ो ओर से प्रट न हे दो घाठसखाओं फ्ो इनफा प्रेमभाव मुखछर प्रतीत न 
दावा | नीविशट्ि से भीरामन माटसलख्ाओं फे साथ ऐसा ल्यपद्वार फिया जिसको दृसख्फर याठसक्षाओं 
फो 'अये रास में एित साधयिप्यवि” (सापयह्वि घा) फा हढ़ मिह्रचय छ जिसफ्ो पयायमापार्मे 
अप्रामाण्यपक्षानानास्फन्दिवनादायनिश्यय मे पुप्ट पइ्ठा जायगा | यही प्रेम फा पारिप्फारिफ रहस्य ऐ। 

आजतक फे जीपन मे पाठ्ससाओं ने जेसाप्रेम फ्िया था, उस प्रेम फी पहचान प्रभु अभी भी 
ग़म्पारोइणा समय के उपस्तर पर प्रकट फर रहे ऐं। इस नेयत्य फ्रो समझान फे लिए फपि ने आदर! 
झब्द से आदर फा एसु वथा 'पहिचानी' शब्द से प्रेम दरों साध्य फे रूप में निरूपित फिया दे झिसमें 
मान मद का अमाय भी अनु्ित दे। 

धषेमकृूशल प्रश्न 

प्रन्थफार फहते हैं कि भार॑भ में प्रभु शेम फुशछ पूछ रहे ऐें। उसका निप्फपे दे--'फर्मणि दुझलए। 
यह फर्म राजनीतिफ फर्स पा दयोतझ है | उपनिषदों फे अन्दर त “झ्षेम इसि पाथि! इस यचन फे स्यासत्यान 
में "पुमोनामीपानपरिरक्षणमम” फह्ठा ऐ दस आधार पर धीराम फ्ाक्षेम फु्छ पूछना राजनीति से 
संब-ध रछावा है, यद राजनीति फ्ा फाय सुरक्षा फरना ऐ। 

अपिष्यत्‌ में प्रन्ु मप सम्पदि फे स्वामी फटे लायेंग । व आरभ म॑ ही अपने रक्षफप्प फो व्यक्त फर 
रद्द हैं । डिसफा यह अप दुआ छि उसे ऊुदनि अमीतफ सपफी कुषाछता का ध्यान रखा पेसे ही स्थासी 
होने पर भा दनफ अगुष्ठासन में वुष्ठल्वा का घाघ नही होगा। 

राजत्य की अध्षुष्णता 


आराम के सप्रेम मिउन से आइयस्ठ दो पाउसल्लाओं ने भ्रजा फो भी पृणे आइयस्त फिया है यह 
जानफर फि झपना माहिफ पूर्षफधिव मिश्रेसि योग छ्षेम पृछठा हैः थो वह उनफे भी योगक्षेमफों साधने में 
जागरूफ है। यस्तुत'याठ्सम्रार्जा फा योग-छेम सिद था फिर भी कुछ छ्लेम पूछने से भीराम फे राजस्व 
मे अप्ुण्णदा उनफे मानमदाभाय से सिद्ध दो रदी हे। 
$ सम्रीनीप प्रीत्ियुदोइलुजी णिन। समाममनाम्‌ सुदतृध बत्थुमि। | स सम्दत॑ दुर्शयते गतस्मपः रृताधिपरघासिन 
साधु बस्थुनाम | ( झकिशद ) 


१०२ भावाथ-शाखीयव्याख्यांसमैतम्‌ 


संगति--श्रीराम की उपयुक्त उक्ति के समय अनुरक्ति के लक्षण हैं,' चेहरे पर मदसान की विश्वतिथां 
भी नहीं है । उसका प्रकाशन बालकों की अशसा से आगे व्यक्त है। 


चौ०-फिरहि भवन प्रिय आयसु पाई | करत परसपर राम बड़ाई ॥ ३॥ 
सावा्--प्रेमपूर्वक श्रीराम की आज्ञा पाकर वे छौटे आपस में श्रीराम के वड़प्पन की श्रशसा करते थे । 
गुणों की वास्तचिकता का अनुमान 
श्ञा व्या५- सामने की गयी चचो से वास्तविकता का परिचय नहीं होता | बालुमित्रों * ने प्रभु के 
समक्ष कुछ भी नहीं कहा, चाहर आकर आपस मे चचो चलायी। ऐतिहासिक दृष्टि से विद्वानों के लिए 
यह श्रीराम के शुणो की वास्तविकता का परिचायक है' तथा सन्थरा के वचनों की अयथाथ्थतवा का 


अनुमापक है । _ 
इस विवेचन के फलरवरूप जनपद में राजा के प्रति कृत्य व अकृत्य पक्ष का पता चलता है । 


एकमत से क्ृत्यपक्ष का अनस्तित्व 


प्रासाद से वाहर आकर चाछूसखा राजकुमार की गुणचर्चो करने छगे तो विशेषता यह हुई कि 
कुमार के विरोध मे प्तिवादीपक्ष नगर की ओर से उपस्थित ही नहीं हुआ अथातू अभ्ु की छत्रछाया में 
रदने मे सभी का स्वसत (एकसत) सिद्ध हुआ । इससे कत्यपक्ष का अभाव सिद्ध होता है । इसका अपवाद 
अन्त ८२ में एकमात्र कैकेयी है जेसा आगे चौ० ७ मे फह्दा जायगा । 

संगति--अब सखा श्रीराम के प्रशंसनीय स्वरूप को उपस्थापित कर रहे हैं । 


चौ०-को रघुवीरसरिस संसारा । सीलु सनेहु निवाह निहारा ॥ ४ ॥ 


भावाथ--शील स्नेद्द को निभाने वाला श्रोराम के समान दूसरा ससार से कोन है ? 
श्रीराम का शील और श्रेम 


शा० व्या०--शीलवान्‌ बद्दी हैं जिसके गुण भद्दात्माओं के द्वारा अशसित हों । १ ऐसा कोई व्यक्ति 
नहीं था जो प्रभु श्रीराम की अशंसा मे आनन्दित न होता हो। स्नेह में मसताभाव रहने से अपने 
प्रेमी के श्रति सन्‍तों के चित्त का द्रवीभाव द्वोता है उस अवस्था मे वह ग्रेम स्थिर है । इसी प्रकार 
अधमम्रकृति से प्रेम गत्वर ( विनाशी ) होता रहता है वेसे ही शील भी संसारियों में प्राय: दंभ में 
परिणत होता रहता है। श्रीराम मे शीछ ओर स्नेह दोनो ही स्थायी हैं: । 
स्वर को पिकृति 


इस प्रसंगसे ज्ञातव्य यह है! कि यहां मित्रोंका अ्शसनीय विषय श्रीरामका स्वरविशेष है'। वे बचपन से ही 
बोर उत्तम प्रकृति हैँ अतः मित्रोके साथ की हुई वातोम उनका स्वर “सा? किंवा रे? में ही स्प॑दित होता रहता है, 
६ उऊध्यभ्रसारितर्वं नेमंत्य उल्फुल्लता चेति दृष्टेविचेष्टिनानि, पुलूकिता विकासश्रेति वकत्रस्य ते राग छक्षयेत्‌ 
विपरीतैरपरागम्‌ ) ( का० ज० स० १३ ) 
२. एवं स्वविषये कृत्यानकृत्याश्व विचक्षण, । 
परोपजापात्‌ सरक्षेत्‌ प्रधानान्‌ क्षुद्रकानपि ॥ अ० १॥३४ 
३. सद्चि.सभावनीयवाद्देतुगुंण शीलम्‌। 
9 मनसोयत्‌ अ्षवाद्व॑स्व विषयेयु समत्वतः । 
भयशंकावसानात्मा स एवं स्नेह उच्यते ४ ( भाष प्रकाशन कल, ७ ) 


अयोध्याफाण्डम्‌ १०३ 


कर्पात पे पदूज या ऋषम प्पर म॑ दी वे घालते थ । पह्दी स्व राज्यारोहण फे समय भी सुनाइ दे रहा है । 
इससे स्पष्ट होता है फि रास्यारोहण फे प्रछम मे भी सदसानामाय होन से श्रीराम फे पीरघोघ स्पर में 


परियदेन नहीं है । 
राजनोति के अनुप्ठात फा फ--कांचनसंघिका योग 
जिस प्रफार देयमूर्ति शैगार की अभिदापा नहीं रखती पर पूजफ अपनी इच्छा से धूया फर उसका 
आनन्द छेठा दे। उसो प्रकार राग्यारोइण फी सुस्तानुमूति भीराम में नहीं ह फिन्सु प्रजा राज्यारोहण का 
सुस लूटना चाहता छे इसी स भोराम मे स्नेद एपं शी परिठक्षित हैं जा कि उनर्म पयानुस्यूत थ । 
राम्यारोइमनीवि फे अनुष्ठानास्मफराजधम फा यास्‍्तथिफ यही फछ हैं. फि जनपव्‌ में छाजीपन छीछ 
एप स्नेह फो आत्मसात्‌ फरन पाले महास्मा से साध फा अयसर उपछम्ध होने पर सहाचार एरं नीति 
का म्त्य सिद्ध हुआ समसना भाहिये। इसी फो शास्प्रकार्र ने फाचनसाथि अथपघा संगतर्साघ फट्ा है। 
अर्थ एपं फ्म फा प्रधानवा रइतों दे तो फाचनर्साघ दुल्म दा जादी है। अर्यप्रयुक्त स्थिति फे रहने पर 
स्पपद्दार मे संगतर्साध नहीं फ पराषर हा जाती ह। प्रमु न अपदीर्ण द्ोकर फॉचनसन्धि फी स्थापना 
फरफे राउनीपि फ्री पविप्ठा सिद्चायी है। 
“रघुवीर! का भाव 
शीछ एपं रनद्द फे अत्तिस्प में फरुणा ( दया ) फा भाव भी चना रहता दे। मिश्रा एवं सौद्ृदूमाष 
दया में ही परिलक्षिव ध्वोत ऐैँ। फरुणापृणम्यक्ति स्प एप परफ म॑रक्षणार्थ अपने और अनुयायियों स॑ 
घमं॑संप'ध फो सुरद बनाये रखने फा प्रयध्न फरता रहता ऐ। पेदिक सिद्धान्स फ़ो तमयतासे अपनाये 
पिना शी, सम, फरुणा, सौड़द, फापनसाधि, पिद्पास्‍्यता, परछोफपिदषास, शुषित्ता, स्याग भ्रावि्‌ 
गुण इरुय म॑ समुदिठ नहीं दो सफते। उक्त गुर्णा फो स्पायत्त फरने थाले महापुस्प य॑शा/भ्रेप्ठ” फ नाम से 
रूपाति प्राप्त होते दँ। फयि ने इसी आदर्श फा 'रघुवीर! से स्यक्त फिया हे। 
संगवि--नीतिमान्‌ फे राज्य म नियास फरन पर दृ'स्लपरतन्प्रता या विनाश की संभावना नहीों रहती 
अवब' मिद्रगण रघुपति की छप्ठाया म॑ निपास प्राप्त दान फी प्राथना फर रद हैं । 
घी० जेद्वि पेदि जोनि करमकस भ्रमद्दी | तईं तह इस दे यद्द दम्दी ॥५ । 
छेवक हम स्वामी पियनाहू। शेठ नाह यइ ओर निवाहू ॥६॥ 
भआापाधथ--कम गर्ति के दघ इस छाग जिस भिस योनि म॑ भ्रमण करें, वहां मद्ां हेअर इसको पहदी सुयोग दे कि 
इस सबक रह आर इमारे स्पामी सीतापति शहटें। स्व!मिसेदक का पह माठा इमारी झ्ोर से 
सत्र बना रद । 
पशुयोनि म सेवा-पात्रता 
झा० ब्या -धर्म फे अनुसार प्राणिमाय्रों फो भिन्न मिन्न योनियों में जाना अपरिदाय दे । मलुष्य को 
छोडुफर अन्य योनि में पियारपूर्षफ स्थयं परन फी स्पतन्श्रदा सुलभ नहीं है। दयापि प्रभु फे विशेष 
अलुप्रदसे पश्चुयोनि में मी प्चित्‌ भकिसेया की पात्रवा दिखायी देती है जैसे फाफमुशुण्दी, जटायु आदि । 
अछः मिप्रगण प्रमु और अपने थीच स्थामि सेपफ संबंध सादर नना रहे दा योन्यन्तरमें भी वही संबध स्थिर 
रहने थी प्रार्थना फरते एँ। इसी भायफो 'दोठ नात यह नियाहू' फहफर राजनीस्युक्त कापननसन्धि को 
द्षाते हुए स्थामिसेयफ भाष मंब्रध फे अन्वर्गत सेम्य की आत्म शुण संपत्ति और सेषफ फी उपघापुदि 
पूरक चुबिता फो भी प्यनित किया है । * यद्दो मारतीय राजनीतिका उद्देश्य है। 


॥ क्र्ष छौछूपरो लिएपे शुजैरेमिःसमस्थिषा । भूठये भूविसंपस्न साधु बिश्नासयेस्मूपम्‌ || (नो सा छ ७१९) 
प्रग्पप्रकृतिदोशोपि खेब्पः सेग्यगुणास्वित:। (छी सा स ५।) ग 


१०४ भावाथं-शास्रीयव्याख्यासमेत म 


रू के 6 
बालसखाओं की ग्राथना से शिक्षा 

उक्त सेव्यसेवकभाव में यह विशेषता है! कि यधासति यवार्शाफ्त सेवा करनेवाले सब्र की काय- 
प्रणाली पर सेवक की ओर से न्यूनता का भाव दृष्टिगोचर नहीं होता फिंबहुना स्वामीफा नतिक धम्र 
यही है! कि सेवक की न्यूनता को हटाकर उसके कार्यक्रम को पृर्ण बना देना। 

यद्यपि यह प्राथता चालसखाओ ने की हे! पर वद्द सभी व्यक्तियों के लिए यह अतुकरणीय है अर्थात्‌ 
प्रभु रास की सेवा मे मनोयोग देनेसे अकल्याण या परतन्त्रता का दुःख कभी नहां होगा। 

सेब्यसेवकर्माव में जाति प्रतित्रन्धक नहीं 
यह भी चिन्तनोय विषय है! कि किसी भी जातिमे जन्म लेना सेव्यसंवकभावमें श्रतिवन्‍्च॒क नहीं माना 
जाता। किंवहुना अपनी जाति की मर्यादा मे रहने हेतु शास्त्रेमि जो-जो कतव्य बताये द्‌ उनमे सयादित 
किक ३ 5 ए्‌ ५ जा आज ] 

रहते भगवत सेवाभाव से कार्य करने से सेवकभाव पूर्ण मानना भक्तिसंग्रदार € जैसे केवट, शावरी, 
भरद्वाज, विभीषण, सुग्रीग, हनुमान, आदि । * 

संगति--बालसखाओ के समान ही नगरवासी सभी एक्रमत हो अभुु की सेवा करना चाहते हे 
अपवाद के लिये कैकेयी एकमात्र ऋृत्यपक्ष है' | 

चौ०--अस अभिलापु नगर सब काह । करैरयसुता हृदय अति दाहू ॥ ७ ॥ 

भावाथै--स्वामी सेवक की आकांक्षा अयोध्या मे सबको है । पर कैकेयी के हृदय में तो प्रछाप ६ । 


कैफेयी केवल क्त्यपक्ष है 
श्ञा० व्याप--बालूसखाओं के उपयुक्त नि्णेय से तटस्थ व्यक्तिया को विश्वास हुआ कि अयोध्या में 
राजा या राजकुमार के लिए कोई कृत्यपक्ष ( ऋुद छुब्ध-मति अपमानित ) नहीं है । 
खेद है! कि वाल्सखाओ जैसो सेव्यसेवकभाव संबन्ध्यभिल्लापा सब नगरबासियों की होने पर 
भी उस अभिलाषा को त्यागने वाली एकमात्र केकेयी ऋृत्यपक्ष मे स्थिता दिखाई देती है जिसमे दासी 
सन्थरा सहायिका है' । 
सगति--शारदा ने देव सन्‍्तो एवं घसम के हिंत के लिए जो पदक्रम उठाया था उस विपय का अध्याय 
समाप्त हुआ उसकी पूर्णता मे शिवजी व्याप्ति के साध्यम से सिद्धान्त समझते हैं । 
चो०-को न कुसंगति पाइ नसाई । रहहु न नीचमते चतुराई ॥ ८ ॥ 
भाव।थै--कऊप्त॑णत्त में पडकर कौन विनष्ट नहीं होता । नीचो की राय में चलने वालो की बुद्धि की चतुरता समाप्त 
हो जाती है । 
कुमति की उत्पादिका नीच संगति 
शा? व्या०--नीचों की संगति का लक्षण कुमति है' जिसका अन्तिम फल नाश है'। या यो कहद्दा जाय 
कि नाशजनक कुम्नति की उत्पादिका सगति ही कुसंगति या नीचसंगति हैं । 


दो८-“कौसल्यादि नारि प्रिय सव आचरन पुनीत । पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पढ कमल विनीत ॥? * 
के अनुसार स्मरण रखना चाहिये कि केकेयी पुनीत आचरण वाली पति-अनुकूछा है' और प्रभुपद मे 


4. विशेष विचार अरण्यकाण्ड में व्ृश्य्य 'है।. २ ( बा० का० दो० १८२ )। 


४ अयोध्याकाप्डस श्ण्ष 


प्रीति रखनेयासी है। उसफी बृद्धिमस्ता ओर योग्यता राजु करत” से स्पष्ट है ।' जेसे राजकाज में पह राजा 
दशरथ की सहायता करती थी बेसे हो श्रीराम के घन॒वास में उसका योगदान है। बिमछ बंद यह अनुचित 
एक । वंधु विहाइ बड़ेदि अभिपेरू में प्रमु के संकल्प का संकेत पाकर सरस्वती ने अपनी माया से उसको मति 
में फेर कराकर रामवनवास का कार्यान्वित कराया | प्रभु को इस्छा के अनुकूछ होने से उसका काय॑ प्रभु को 
प्रसन्न करनेवाला है इसलिए प्रमु की दृष्टि में केफेमी निर्दोपा ओर पुनीता है। प्रमु की हच्छा द्वारा प्रेरित 
जो दोप या दुगुण संवक में दिख्वायो देते हैँ वे सेवकघम के अन्सर्गेत मक्तिशास्त्र के मत में पाप मा दण्ड के 
योग्य नहीं माने जासे जैसा चित्रकूट में प्रभु के वचन से स्पष्ट है-- 

म्शाघ्त्र के उपयुक्त सिद्धान्त फे अन्तगस सही और नारद का चरित्र समझते हुए केकेयी का धरित्र 
विवेचनीय है। केकेयी की निर्दोपता गुर वसिष्ठ के वचन अस बिचारि केहि देदुअ दोपू। व्यरथ काहि पर 
कोजिल रोपू' से भरतजी के सामने घध्वनित होगी जिसकी पुष्टि मशद्वाज ऋषि द्वारा दो० २०६ म॑ स्पष्ठ होगी। 

संगति--झुवड़ी को कुमन्त्रणा के वर्णन के घाद अन्त'पुर की घटनाओं का चित्रण किया जा रहा है। 


दो०--पाँप्त समय सातन्द तूप गयउ केकई गेहूं। 
गवनु निदुरता निफठ फिय जनु धरि बेहु सनेहेँ ॥ २४ ॥ 


भाषाप--सम्ध्याकाछ में राजा प्रधनन्ममुद्दा में रानी छेकेयी फे सहूछ्त में गये मानो स्नेहू शरोरघारो 
हो कठोरता के पास जा रहा हो । 


क्षम्त पुर में राजा के प्रवेश फो व्यवस्था 

शा» स्था० -राजा दप्षरथ को रामराज्यारोहणोस्सवप्रयुक्तमम दिन में अधिक हुआ है। उसके 
परिहाराय कामप्चास््र के निर्देशानुतार राजा को अन्तपुर में जाना है। अन्य रानियों के महछ में न जाकर 
कछ्ैकेयी फे महुछ में जाने का कारण मानिनी रानी को रामराग्यामिपेकोत्सव की हपंप्रद सूचना स्वर्य देने 
का ओत्सुक्य है। दूसरो घात यह भी है कि केफेयी राजकारये में सहायिका मो है। धमंनिष्ठ राजा नित्यक्मं 
( साम॑कारीन संध्या-वन्दनादि ) को संपन्‍्तकर सायंकाऊ में रनिवास में गये-- ऐसा कहना ही संगस है मर्पोर्कि 
रामराश्याभिपेकनिमिक्तक कायें की प्रघानता में अप॑ध्ास्थोक्त नियम “तुतोये तुर्यघोषेण संविष्टः चतुषपण्ण्वमो 
दायीत! का गौण रखकर अभिपेक-का्य को यथावत्‌ संप्नता में केकेयी की सम्मति के हेतु से क्रेकई गेह' में 
सायंक्राछत म हो राजा का जाना नीतिसम्मत कहा जायगा। 

ज्ञातव्य है कि राजनीतिक सिद्धान्तानुसार अन्त'पुर का ध्योषन-कार्य राजा के प्रवेश्ष के पूर्व होता 
चाहिये |? वेसा मे होने का परिणाम है कि राजा को अन्स'पुर का सामयिक परिचय नहीं प्राप्त हुआ बर्योकि 
पहू अन्तपुर की व्यवस्था से निश्चिन्त थे । 


३ राजु करत भिज कुसति घिगोई--चोौ० ७ दो० २३१ 

राजु करत यह ेमें दिबोई--चो> हे रोहा ५१। 
२ प्रथम राम मेंठो केढ़ेई | सरल सुपरायें मपति सति भेई ॥ 

पंप परि कौम्हू प्रयोप बहोरी । काकछ्त फरम विधि छिर घरि छोरौ ॥ चौ० ७-८ दो० २४४ 
३ कारयेद्मबनपोपमसादों सातुर्स्तिरूसदि प्रबिबिय्ु ( सी० ७३७ ) । 

म च॒ रेबीगृह पत्फेशश्सीयातु सब्जिवेक्षनात्‌ । 

असत्प्त बहल्लमोअस्मीदि जिश्वर्नहद्रोपु ले वद्ेेत्‌ ॥ ( सी० ७५० ) 


१०६ भावायं-शास्जीयव्यास्यासमे नस 


सगति--अन्त पुर में रानी को यथास्थान वे पाकर राजाने उगे बारे में पुछा टीगा जैसा आगे बहा 
जा रहा है। 
चौ०-कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ। भवबस अग्रटुड्े परद् न पाऊ ॥ १॥ 
भावार्थ -कैफेयी फोपभवन से हे, यहू सुनकर राजा रकुचा गये | दाकायुल मन में तय होने से 
उनका अगला कदम बढ़ने से दक गया । 


अन्त;पुर की कोपोत्पत्ति में राभा के भय का फरारण 

शा० व्या०--अन्त पुर में कोपोत्पत्ति के मठ कारण की ठाने बाब करत में सश्नवम राजा वी 350 
सुरक्षा-व्यवस्था पर ध्यान देना है। यदि सुग्क्षा मे प्रमाद रोना 2 ती अन्व तुर के छू थे दर नदी लगती । 
स्त्री-तत्व को प्रकृति ने स्वभावत पुरुषा के छिए आऊपंण वा विधध वचाबा 2।॥ राजा है आदर मे 
सुन्दरियों का जमघट शास्त्र से प्राप्त है। जन्‍्त पुर का विपरीस टीना राजवानिक दृष्टि मे जय का हारस बल 
सकता है, जिसमे राजा के प्रति प्रीति के जगाव की आद्का नी निटित दे । 

शास्त्रकारो ने पति के लिए पत्नी को प्रीति के द्वारा रवावीना रुसने की कहा है! इस छिए सती के 
हृदय में ऐसा विद्वास करा देना चाहिए फि बहू “अब पनि मम सवधिस सामय्लि/” समझती रह । एसा 
विश्वास न होने पर स्त्री पति-विमुसा होफ़र अपने मनस्‌ का अन्यत बिद्वाम हर सनी है ढक रियो $ 
प्रति आकपंण होने से उन पर पुरुषों की दृष्टि का निद्वाष होता रहता है। शितियां रखतन्स रूग से अपनो 
जीविका साधना चाहे तो उतके लिए जीविका का सावन प्रकृति ने उनके भरीर मे टो बना रखा हू । अत. 
पुरुष का पत्नी के प्रति अरसिक होकर स्वस्व-निश्चिस्त येठना शार्सद्प्टिसे -प्दापत्ति नदी सासा जा 
सकता | 

साकयंदोप की असक्ति 

पत्ति के ससर्ग में रहते भी यदि स्त्री के मनसूवा अन्यन रिक्षप हो जाता है तो उसका आन्तरिक्ष 
भाव विगडने से साकयं-दोप होना अपरिहाय है। फलत ऐसे चिन्तन से टोसे वाला साठयंचोय भायी बद्ा- 
परम्परा की शुचिता मे वाबक सिद्ध होगा। अत पति का कत्ंव्य 2 कि पत्ती की इन्छा ( विशेषता 
कामेच्छा ) का बथासभव अनुसरण करता रहे । 


अन्त;पुर के कोप को उपेक्षा में झत्र-प्रवेश सभव 
रानियो के कोप मे यदि राजा मौन रह जाता है तो उनके असन्तोप को निम्तित्त बनाहर शयु फो 
अन्त छिद्र खोज़कर विभेद की नीब डालने का अवकाश मिलता हे। अत अन्त पुर उत्यदूप से राज्य के 
विनाश का वोज हो सकता है। 


स्‍्नी-संसगंकी आकांक्षा, उसमें श्रमपरिहार तथा राग में परतन्त्रता 
देनिक कार्य में लगा पुरुष परिश्रम का अनुभव करने के वाद विश्वाम के हेतु से अन्त पुर की ओर 
उन्मुख होता है क्योकि विपयानन्द की अनुभूति स्व्री-ससर्ग में है। आनन्द की अनुभूति भें ईश्वर भी 
प्रकृति के ससर्ग मे जगतु-निर्माण का कार्य करता है । इसी परम्परा में 'इय सुससाधन' का विश्वास स्त्री के 
१ ल्मिय॑ प्रेम्णा' ( का० नो० ज० ३स) 
२ दाराणा चारुक्षवृत्तित्वात्‌ ( नो० टीका १४२१॥५ )। 


अंयोष्याकाण्डस्‌ १०७ 


प्रति पुत्प कर बठा है। परिणाम यह होता है कि स्त्रां को आसक्ति में पुरुष उम्रतता-जुगुप्सा-आलस्य का भाव 
नहीं रखता । राग में विवेक नहीं रहुता। अपने प्रिया के प्रति राग में उसको सदा उज्वजुमुखी देखने में 
उन्छसित पुरुष उसको कभी विकृतमुखो देखने में रुचि नहीं रछता। प्रिया के कोप का पुरुष पर ऐसा 
विल्नक्षण प्रमाव होता है. कि अपनी स्वतन्त्रता को खोकर घह परतन्त्र हो जाठा है। इसछिए रागी पुरुष 
अपनी मनोस्पपूर्ति के लिए प्रिया के क्रोध को हटने का पुरा प्रयस्त करता है। 

उपयुक्त विवेघन फो दृष्टि में रते कहना है कि विवेकी राजा दश्धस्थ करामप्रयुक्त स्त्री-ससग को 
आकांक्षा से अन्त पुर म नहीं जा रहें हैं । उनके जाने का उद्देश्य औश्विक रुप में श्रम-परिहार एवं मुस्यख्प 
से राज्योत्सव के प्रवघ में फेफेयो की राय छेता है। रानी के कोप से राजा के मय का राषतीतिक कारण 
है जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है अर्थात्‌ कोपजनित एछाका ही मय का कारण है। 

संगति राजा दश्रष फा यह मय #र्सध्य के प्रति प्रेरक होते से स्थामाविक नहीं है वल्कि साहित्य 
सिद्धान्तानुसार 'कुसक' मय है। दसरी पुष्टि म राजा के बरू को बताते हुए समप्ना रहे हैं | 


चौ० सुरपति बसइ बाँहवचल जाके । तरपति सकर रहूहि रख ताके ॥ २॥ 
भावार्य राजा दशरप फे भुचयछ से श्राशित हो इम्त्र मी अपमे को सुर्ो मानते हैं एवं सपुण 
राजवग उनका दुप्त रेकते रहते हैं । 

शा० ध्या० इन्द्र फो असुरों की पीड़ा से बचाने में राजा के क्षत्रियोधित निर्मेयठा का स्वभाव 

प्रसिद्ध है । 
इन्त्र सुरक्षित कंसे ? 
सुस्पति बसइ वाँहुबलछ जाक्े' फे अनुझार वतंमान में रावण के रहते इन्द्र केसे सुरक्षित कहा 

जायगा ? हसके उत्तर मे तिम्नछिखित वक्तब्य है-- 


शुष्ि स्थल में राक्षसों का प्रवेदा महों 
यहू सिद्धान्त है कि धर्म-सुरक्षित सीमा में घर्मंतत्व की हढुता रहती है तो असुरों को उस पविन्न 
स्पर में प्रवेश करने म अभिरुचि नहीं होती । कदायितु हो भी जाय तो उनके घरीर में दाह भादि 
विकार उत्पन्न हो जाते हैं भय” ये वहाँ से दूर हट जाते हैं । इसलिए अयोध्या मिपिल्‍्ता आदि पवित्र नगरी 
में राक्षसों का प्रमाव नहीं था | 


देव-सानव का सघटन 

छात्कासिक राज्यों म जो देश प्रणाद मे लिप्त हो गये थे सब राक्षणों से आफ़ान्त ही गये | वर 
रप्त याक्षसों फो वहाँ से हटाना भी संभव नहीं था। वहाँ रहनेवाछले पविनात्माओं को ऐसे अशृधि स्प्षों 
को छोडफर अमोध्या मिथिछा आदि पवित्र स्थानों में शरण छेला पडा । शुतिकाय॑ में त्तमय रहने से 
धर्म का चक बढ़ता है। श्रुतिपाहक महद्दात्माओं के अयोध्या, मिषिछा आदि पवित्र पुरियों में एकत्रित 
होने से उनके आश्रय में निर्मय स्थान समझकर देवों ने भी वहाँ रण छिया जेसा श्रुति में देवातां पूर 
योध्या' से अयोध्या फो देवों को निवासस्थरी कहा है। देबों के साथ सुर्पति इन्द्र मी घर्मास्मा राजा 
दष्धरथ की पुरी में भ्पने को सुरक्षित मानते हैं । 

देवों बौर भानवों फा उपयुक्त संघटन राजा दक्षरय के वक ओर राजनीतिश्ञत्ता को प्रकट करता 
है। इस संघटना फा फर् है कि असुरों से वचने के उपाय में सचचेष्ट वर्षा की अनुकूछसा पहँ बेठे महास्मायों 


१०८ भावाय॑-शास्त्रीयत्यास्यासमेत्तम्‌ 


के प्रत्युपकाराथ राजचीत्युक्त चीवव-आसार' आदि पहुँचाने में प्राप्त हे। राजा झारब 5 पुरुणाथ॑पृरण हि 3 
नीति व के प्रभाव से अन्य राजा उनकी अनुकलछता के इच्छुक बने हैं। देवी का अयोध्या में नियास दाव 
में राजाका देवो के प्रति आदरसेवाभाव नियामक माना जायगा, ने कि रावण वा तरह दवा को वश मं 
करके उनके प्रति अनादर-भाव | 

सगति राजा दशरथ के अग्निम चरित्र मे ऊबि काम-प्रताप का चितण करेगे। 


चौ० ; सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई । देखहु कामप्रताप बड़ाई ॥ ३ ॥ 
सल कुलिस असि अँंगवनिहारे | ते रतिनाथ सुमन सर मारे ॥ ४ ॥ 


भावार्थ : ऐसे बली राजा स्त्री के कोप को सुनकर मुरक्षा गये। काम के प्रताप को महिमा देरने 
योग्य हे । जो शूछ, वज्त्रया तलवार की चोद से अग्रो को वबेदता होते हुए भी बिच- 
लित नहीं होते वे भी कामदेव के पुष्पच्राणो से आहत हो जाते है अर्थात्‌ कामवश 
हो जाते हैं । 
विषय-सेवन 
शा० व्या० कामतत्व में विपयसेवन के छिए सावधान करते हुए श्ास्नढारों ने विपयमेवन 
का अनुमोदन वही तक किया है जहाँ तक विपयो में अगत्व या तत्परता न द्वाने पाये ।! चो० ३ दोहा 
१९ में पाखु दिन' की व्याख्या के अन्तगंत कही कामशास्त्र की व्यवस्था से सवलित कामदेव का कार्य 
राजा दशरथ को कामयमान बना रहा है जिसको 'कामप्रताप बडाई' कह रहें है 


कामप्रताप के बड़ाई का विचार 

कामक्षेत्र में स्त्री यजमानस्थानीया है। जब वह पुदंप को वरण करती है तब पुरुष को पत्नी का 
अनुकरण करना पड़ता है। कामातिश्क्तिविपय में स्त्री परतन्त्रा है, उसकी पुदप का अनुमरण करना है। 
कामतन्त्र मे स्त्री अग्री है, पुरुष को अग माना गया है। प्रस्तुत प्रसग में काम-प्रताप दिगाकर स्त्री की 
स्वतन्त्रता का दिग्दर्शन कराया गया है। 

राज्याभिपेकनिमित्तिक कर्म का सकल्प करने के वाद राजा दशरव ब्रतस्थ है। ब्रतस्विति मे 
अपनी प्रिया के पास जाते देखकर कामदेव को विध्न कार्य के अनुकूल अवस्तर मिला । 'विघन मनार्वाह देव 
कुचाली' से स्पष्ट है कि देवता रामराज्याभिपेक मे विघ्त करने को योजना बना रहे ये। कामप्रताप 
बडाई' यही है कि प्रस्तुत मे ब्नत-स्थिति मे होने पर भी राजा तटस्थ न रह सकें और रानी सी क्रोप- 
लीला को कामिनी छीला रूप मे देखने लगें | काम-अताप का विशद्‌ वर्णन वा० का> चौ० ५ दोहा ८४ से 
सोरठा ८५ तक मे द्रष्टव्य है। 


कामशास्त्र के अनुसार पुरुष को, ब्रतस्थदशा में भी, स्त्री को कामयमाना देखकर, कामचेष्टा में 
रत होने का विधान है | उदाहरणार्थ कह्यप मह॒पि अग्निहोत्र का अवसर होते हुए भी दिति की कामवासना 
की पूर्ति करने को वाध्य हुए। दिति और केकेयी की स्थिति में यह अन्तर है फ्रि दिति ने अपनी सेवा 
के माध्यम से कश्यप को काम-परतन्त्र किया, कैकेयी अपने कोप के माध्यम से राजा को कामोन्मुख 


१. निका्स सक्तमनसा कान्‍्तामुश्षविलोकने । 
गलन्ति गलिताभूणा योवनेन सह प्रियः ॥ ( नो० स० १ ) 


अयोध्याकाण्डस १०६९ 


बना रही है जसा छन्द २५ मे स्पष्ट है। यहाँ काम क प्रताप की बढ़ाई यह है कि केकेयी के कोप को 
प्रभयकोप समझकर राजा उसको कामयमाना समझने के भ्रम में आगे बढ़ गये जिसको कथि 'कामकोतुक 
छद्चइ! से स्पष्ट करेंगे। काम के प्रताप से कैकेयो का कोप प्रणय-कोप के रूप में राजा के छिए 'सुमन 
सर मारे' सिद्ध हो रहा है। 


फाम के प्रभाव में चार्चाक-मत की उपादेयता 
घास्प्रकारों के मत से विपय-छाससा की अधीनता में कार्य करना नोतिसम्मत नहीं है। मगवदुपासना 
में रुसे अपेक्षानुसार विपरयों को प्ास्प्रमर्यादितरूप में स्वीकार किया जाय सो सृध्णा का प्रायर्य नहीं 
रहेगा । इस प्रकार ग्रद्माज्न विवेकी राजाओं की दिनचर्या में चार्वाक-मत को भी स्थान है। झुताथंसा की' 
स्थिति में इस समय राजा दक्षरथ उस मत का अनुगमन करते हुए रानी को मनाने जा रहे हें । 


राजा की कामवदाता का हेतु 
राजा दष्यस्थ के आराष्यदेव कामारि शिवजी हैं। अपने अनस्य उपासक को काम-सवधी मोह से 
शिवजो ने कर्यो नहीं वचाया ? 
इसके समाघान म कहना है कि बा० का० सोरठा ८५ मे कहे जे रासे रघुदोर त उबरे तेहि काल 
महुँ" क॑ अनुसार राजा के अव्यभिचरित मृत्युसूचक देव को प्रवरुता के कारम प्रमु की हल्छा समझकर 
दिवजी ने राजा को उक्त माह से नही वचाया। 


प्ौ०--सभय नरेसु प्रिया पहि गयऊ । वेक्षि दसा युस्ु दादन भयऊ ॥५॥ 
भावार्ष - भपभोत होते राजा अपनी प्रिया केकेयो के पास गये । रानी को पश्षा को देसकर राजा 
को घोर वु'स्त हुआ । 
शा ० व्या०--पूर्वोक्त चौ० १ सम मयबस को व्याख्या में कही आशंकार्मों का मय केफेयो के पास 
जाते हुए राजा को उदिस हो रहा है। दान दुल्ध मयक' से स्पष्ट किया गया है कि राजा ने आबतक 
बोकेयी की ऐसी दशा नहीं देखो थी अर्थात्‌ रानी न॑ ऐसा कोपप्रयुक्त व्यवहार पहले कमी नहीं किया था | 
सगति - पूर्वोक्त घोपाई में देल्लि दसा' फा स्वरुस वर्णन किया जा रहा है। 


भूमि सपन पटु सोट पुराना । दिए डारि तन भूषन नाना ॥ ६ ॥ 
भाषाय--रानी जसोन पर पड़ी है। पुराना मोटा वस्त्र पहनो है। अपने थरामूषणों को क्षरीर से 
उतार कर फेंक दिया है। 
श्युगाररस में पुस्णष का नमम 

हा० ब्या०--काप फ॑ समस्त साधन मूमि क्षयन, पुराने वस्त्र ब्राभूषर्णों का फेक़ा जाना, मादि जय 
राजा फी हछ म आये तव राजा ने अपने फर्त्तव्य का विचार किया। खझ्यगार रस में स्त्री जब पतिविमुसी 
हो क्ोप की अयस्पा में है तो उसको मनाने के द्वेतु यदि प्रणाम की अपेक्षा पड़े तो यह भी कसंव्य माना 

गया है। म्इंगार मे नमतादि उपाय परिगृद्वीत हैं। 
३ बिसोत पृष का होसा, राम्यरक्षज से इक्त होगा रहस्य को मिष्कटक स्थिति को बनाये रखना आदि राष्ता 


की छुतार्पता है । । 
२ प्लांक्य पोषो लोकायतं देस्‍्पारदोबिकी ( भ्र्पश्लास्‍्त बेदिक छिद्धासत सं रक्षिषी सपबेदबिधालुप रासघाट काशी ) । 


११० भावार्व-शास्त्रीयव्यास्पारामितम 

भत्त पुर को उेक्षित करने से कुमन्त्रणा व्याप्त होने की संभासता रहती ८, घर मरी विघटन की 
स्थिति पैदा हो सकतो है जैसा पूर्व में ची० १ दो २५ की व्यास्या गे स्पष्ट किया दू। ऐसी दशा में अन्त पुर 
की स्वतन्त्रता महदह्वनिकरी हो सकती हे । दूसरी ओर राजा की आइनर्य भी ही स्टा 4 कि रानी को सील 
ऐसा नही है जो भभी दृष्टिगोचर हो रहा हे । | 

सगति राजा के व्यया की कल्पना में शिवजी पाव॑ती को आगे सुना रहू ट | 

चौ० ; कुमतिहि कस कुवेपता फाबी । अब अहिवातु सच जनु भावी ॥ ७ ॥ 

भावार्थ : कोप की अवस्था में कुबुद्धि केफेयी का विकृत वेष कमा फिछ रहा दे, मानो भावी 

वेधव्य को सूचित कर रहा हो । 


देव के साथ पुरुषार्थ की उपादेयता 

शा० व्या०--इस अवसर पर आगे होने वाली घटना में शिवत्रीं देव टी की ऊारण ठढ़ग रहे हूँ 

नीति के सचालन में देव एवं पुरुषां को' सम्मिलित आवबार माना गया है। इनमें से एफ भो 
क्षीण या दुष्ट हो जाय तो नीति का विनाश हो जाता है। इन दोनों में देव की स्थिति का पता छगाना 
मानव के लिए सभव नहीं हे। इसलिए शास्त्रकारों ने देव को गे सोचकर पुरुषावं की पूर्णता पर ध्यान देसे 
के लिये कहा है। यदि पुरुपाथ॑ में न्‍्यूनता होती है तो तन्तिमिनक बेफश्य में सीतिमानों की सल्ताप का 
अनुभव करना पडता है। पुरुषाय॑ पूर्ण होते हुए भी कार्य को विफलता होती हे तो उसमें दंव कारण माना 
जाता है। इनमें हृष्ट अपराध न होने से नीतिमान्‌ सन्तप्त नहीं होते ) 

; अन्तःपुर में चरनियोजन की व्यवस्थाभाव में राजा निर्दोष 

राजां दशरव के राज्य में पूर्ण धर्मश्रद्धा जनमानस में जागटक होने से अन्त पुर में चरनियोजन 
की आवश्यकता नही थी। इस व्यवस्था में राजा के पुस्पाव॑ में (अन्त पुर रद्षा ) न्यूनता नही थी। 
अन्त पुर में पूर्ण सोहादं-भाव था। सेवापरायणा के यी के महल में कुमत्रणा वा स्वतत्रता डी सभावना 
नहीं थी। प्रत्येक रानियों के स्वभाव को समझकर राजा ने अन्त पुर झा सभो दोपों से बचाने की व्यवस्था 
कर रखी थी, तो भी राजा के सामने यह दु ख प्रसंग आ पहुँचा तो कहना हागा कि इसमें हतु केवल देव 
( भावी ) है अर्थात्‌ सौत की आशका से रनिवास में कलह, अन्याव, हठ, स्वतन्त्रा, स्वेच्छाचारिता आदि 
दोषो का उदय होने में देव ही मुख्य ( हेतु ) है । 

संगति “ कैकेयी को मनाने के लिए राजा का उपक्रम आगे सुनाया जा रहा हे । 

चो० ; जाइ निकट नृपु कह मृढु बानी । प्रानश्रिया केहि हेतु रिसानी ॥ ८ ॥ 

भावार्थ * रानो के पास मे जाकर राजा मधुरवाणी में वोले “हे प्राणत्रिये ! फिन्न कारण से 

कुपित हो ? 
रानी को मनाने में राजा का कारकान्तरत्व 
शा० व्या० क्रोध को शात्त करने के लिए मृदु वाणी का प्रयोग उचित ही है १ राजा की दृष्टि मे 


१ देव मानुष च फर्म लोक पालयति | ( का० ज० स० १ )। 
२ आअत्पुग्न स्तुति्िः 
३. देवस्पाचिन्टयत्वान्मानुपमेच नयश्नोर्यादिक्रमास्याय स्पसण्डले त्रिय चिल्तयेत्‌ । ( नो० ज० भ्० १ ) 


अपोध्याकाण्एम्‌ १११ 


बनी कामतन्र अन्तगंत स्वत॑प्र॒तारमक कूंत्व यानो में है। राजा स्वयं गारकान्तर है, उसको कामसन्त्र में 
प्रेरित कराना रनों करे अघोन हे। दस काय मे राजा अपने में प्रमुस्य (याजमाय रूप स्वातंत्र्य ) 
ने समझकर पपने कारभबान्तरत्वानुरप घोमा को वनान के लिए राती में मृदुतता छाने का प्रयत्त फर रह हैं । 


स्व॒रवेचि9त्य में मुद्ुता 
भासप्य है कि प्रकृत्या घोर फा स्वर पडज ही होगा। कुसक भय दोते से यह स्वर नीचे के रुप्तक में 
उच्यरित हागा जी मृदु हागा जिसका मुदु बाना वद्धा है। 
संगति बागे राजा पैझयों स कप का कारण पूछ रहे हैं। शिवज्ञों के सवाद को घ्यान में लाकर 
ब॒यि भवितम्यता या दगत हुए तालालिक चरित्र का लिप्रग मर रहे हैँ । 


छन्द फेहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई । 
मानहु सरोप बुजगभामिनि विषम भांत्ति निहारई ॥ 
दोउ वासना रसना-द5न-वर--मरम ठाहु वेक्षई । 
तुलसो नृपति नवित्तव्यत--बस फामफोतुक लेखई ॥ १॥ 


भागा फपि रानो फे फोतुझ फा पर्णन छर रहे हैं “हे रामी ! किस्त कारण से गुस्सा हो गयो' ? 
रानो के अर्गो पर हाय फर रहे हैं तो यह उनरा हाय छटफ रहो है, मानो नाणिन 
क्रोप म झरवृष्टि से टेद होरूर देपती हो सर्प॑ काटते समय जीम छगाकर दाँतों को 
मर्मस््यान पर गड़ा दता है, डसी प्रकार केफेपी दो बर फी खासना सकर याचना 
को घोट राजा पर फरने के छिए मोषा दूढ़ रहो है। तुझुतोदास थो कहते हैँ कि 
होनहार फ॑ व हो राजा भो इस समय फेकेयो फो उक्त डियाओं को फास-कोतुक 


सम्रप्त रहे हैं । 
फामक्रीड़ा फी भ्रान्ति 


शा० ध्या० मनाने पो फ्रिया म॑ राजा ने प्रथमत स्पर्श किया रानो ने उसे दुकरा दिया। जिसको 
राजा नविह्वब्यतावशात्‌ रानी पी वामफ्रीडा समझ रहे हैं। इस प्रसंग म प्लास्पकारों का अभिमत ज्षातब्य है। 


स््री-स्थात्त ध्य में शास्त्रसम्भति 

धर्म एपं पुस्पायसिद्धि म स्त्री म यजमानसहृश कतृत्वकूप स्वतन्श्रता नहीं है, पर कामकेकि भ 
स्त्री फो उच् स्वतन्पठा दो गयी है। पदि फामकर्छि म स्त्री रुझ्हो है सो उसको अनुकूछा बनाने म अपनो 
स्‍्वतप्रत्ता उपेक्षित फर दना धास्प्रसम्मत मारूम हांता हे। स्त्री में काम फा प्राषान्य प्राकृतिक है । 
जमत स्त्री कामकलि म निपुणा है। बरामघान्सि के पिना स्त्री सुरक्षिता नहीं रह सकती। इस सिद्धान्त 
फ्रै अनुसार करामफेलि म॑ स्त्री पी स्वतश्ता बतृंता ( यजसानसहशों ) मानी गयी है । इस फेलिक्ृत्य म 
पुण्य को स्वतज्॒ता नहीं है वन्कि यह कारतान्तर, स्त्री प्रय॑ है। कामफेक्ति में स्त्री की स्वततन्ध्ता धम 
शास्त्र फे विधान से सालख्य है--ग्रह्मचयं॑पाहन म स्थित ग्रतरुप पृति का काम पीछ़िता स्त्री प्ररित करे सो 
ऋत्वमिगमन फरन मे पुण्य दापाहईं नहीं माना जाता। एस प्रयाग मे स्त्री फो झामशान्ति होता प्षास्त्र को 
इषप्ट है। इसका उदाहरण घो० ३ दा० २५ म कहे दिति-रृष्यप के इतिहास से स्पप्ड है। 


११२ भावाथ॑-शास्त्रीयव्या त्यासमितम्‌ 


कामकौतुक में प्रणयमान का भ्रम 
'काम कौतुक लेखई” से स्पष्ट होता है कि अथंसिद्धि का अभाव ही कीप का प्रवोजक था। इस 
बात्तको राजा न जातकर भ्रम में रानी के कोप को प्रणय-फोप समझ रहे हैं । 


भवितव्यता का तात्परये 
वस्तुगत्या राजा उपरिवुद्धि भगवदुपासक हैँ। उननो विपरीताथंदर्णन नदी होना चाहिए | वे राज- 
नीति का विध्वस नहीं करने वाले हैं, नीति भी उनका विध्वस नहीं करती। किन्तु कवि कहते है कि 
भवितव्यता इतनी प्रबल है कि वह ऐसे राजा को विपरोताय॑ंदर्शन करा रही है। निष्फर्पं यह कि प्रभु 
की इच्छा से यह सब हो रहा है। 
सगति . काम-क्रीडा की भ्रान्ति में रानी को रिझाने और प्रसन्‍्त करने की कल्पना में राजा का 
प्रयोग चल रहा है। 
सो० बार-बार कह राउ सुमुखि | सुलोचनि ! पिकवचनि ! । 
कारन मोहि सुनाउ गजगासिनि ! निज कोपकर ॥ २५ ॥ 
भावार्थ : राजा बार-बार पूछ रहे हैं "हे सुन्दर मुखवाली ! सुन्दर नेत्रवाली ! मधुर भापिणि ! 
हॉथी की चालवाली ! रानी ! मुझे अपने रोष ऊझा कारण बताओ । 
सगति : के केयी के प्रसन्‍ततार्थ उसके कोप के कारणविकल्प को पूछने का क्रम आगे स्फुट कर रहें हैं। 
चो० ; अनहित तोर प्रिया केईं कीन्‍्हा । केहि 4३ सिर केहि जमु चह लोन्हा ॥ १ ॥। 
कहु केहि रंकहि करों नरेस्‌ ? । कहु केहि नृपहि निकासों देसू ? ॥ २॥ 
सकठउ तोर अरि अमरउ मारी । काह कीट बपुरे नर नारी ॥ ३॥ 


भावार्थ : हे प्रिये ! तुम्हारा अनिष्ठ किसने किया हे ? किसके दो सिर हैँ ? किसको यमराज के 
यहाँ जाना हे ? अर्थात्‌ तुम्हारा अनिष्ठ करमे बाला मरा हो समझो। कहो, क्रिस गरीब 
को राजा कर दें ? किस राजा को देश-निकासा कर दें ? तुम्हारे बेरी देवता अपर भो 
हो तो उसको मार सकता हूँ। फिर पृथ्वी पर रहने वाले बेचारे तर-नारी तो कीड़े- 
मकोड़े के समान हैं, उनकी क्या गिनती ? 


राती के क्रोध का कारणविकल्प 

शा० व्या : रानी के विगडने में विशेषतया तीन कारण मालूम होते है। एक तो राजा के द्वारा 
रानी की इष्टसिद्धि (हित) न होना । दूसरा यह कि कोई वलवान्‌ अनिष्ट का प्रतीकार व होता । अथवा 
उक्त दोनो क्रिया के बारे मे राजा की उपेक्षा करना। प्रथम कारण में राजा ने 'कहु केहि रकहि करो नरेस्‌' 
कहकर अपने द्वारा इष्ट्सिद्धि समझायी। दूसरे मे 'अनहित तोर केहि कीन्हा' कहकर सामान्यतया अहित 
करने वालो के प्रतीकारा्थ उनके नामो की जिज्ञासा दिखायी | इसमे दो प्रकार के अहितिकारी हो सकते हैं । 
बलवान्‌ और दुबंल ।' 'केहि ढुई सिर” कहकर वलूवान्‌ को निरस्त किया। अहितकारी दुबंछो के लिए 
दण्डत्तीति मे तीन प्रकार के विधान बताये हैं मृत्यु, अर्थदरण और परिक्‍्लेश | इन तीनो प्रकार के दण्डो 
की मर्यादा एवं उनके अधिकारी तीन हैं | उ्तके दण्डक्रम के अनुसार 'केहि जमु चह लीन्हा' से मृत्युदण्ड का 
पात्र, केहि नृपहि निकासों देसू” से अर्थग्रहण का पात्र तथा 'सकउ त्तोर भरि अमरउ भारी' से परिक्‍लेश 


च् 


श्ष्‌ अयोध्याकाण्डम्‌ ह्श्३ 


का पान्त कहा है। अयधिष्ट अपराधियों में स्ते मर नारी” जिनको प्रत्यन्त दुनंछ होने के कारण त्रिविध 
उछ दण्ड की मापा को दृष्टि से 'काह कोट बपुरे नर नारो” कह कर केमुतिकन्पायेन दुबछ सिद्ध किया है। 
केबेयो का इसना ठोंघा सम्मान दने में राजा का तात्पर्य इतना ही है कि घहू आभिमानिक सुश्ध मं 
प्रसन्‍्ता हो जाय | 


राजा फे दष्डविधान में नेंतिकता 
प्रइन धमविजयी राजा फे एिए रानी को इस प्रकार उच्च पद देकर अनैसिक थार्से करना गया 
घोमतनोय कहा जायगा ? 
उत्तर इसके उत्तर म यद्दी झद्मा जा सब्सा है कि अपने राज्य की निरपराघ स्पिति को बताते हुए 
राजा जा एुछ पद रहें हैं, यह अवैततिक न हांकर राज्य म उन वारठों की अस॑मावना फो ही प्रकट करता 
हैं। इसका पिस्तृत विवेचन नीचे किया जा रहा है। 


अयोध्या में अपराधभाव फो स्पिति 

महाराजा दघस्थ के राज्य में अयोध्या करे स्पिति इस प्रकार है। राज्य म देधों से छेकर समी 
स्यक्ति राजधासन मो महृत्ता फो समझझर प्रीतिपूर्यक कार्यरत हैं। पवित्रात्मा होने के कारण स्वयं राजा 
भरी विप्रकोणशक्ति-समूद्‌ के केन्द्र हैं। राज्य में काई ब्यक्ति ऐसा नहीं है दि बलों राज्रोह करने में तत्पर 
हा । राजा क॑ प्रभाव से समी के हृदय म धर्म का प्लासन थ्याप्त है। इस बात को राजा अच्छी तरह जानते 
हैं कि मनीति सपा अशुचिता म रहने से देवता एवं विद्याएँ वहाँ से लुप्त हो जाती हैं। णुचिता में रहने घाछे 
के समीप में देवता एवं विद्याएँ दुगें को माँठि यहाँ निवास करती हैं। नीतिमान्‌ व्यक्ति हर प्रकार से मिर्मय 
रहता है। अत' राजा निर्मम होकर कहते हैं कि उनके राज्य में ऐसा कोई व्यक्ति नहों है जो अपराधी दो या 
राजशासन के द्वाह मे खड़ा हो सफे ऐसा काई माण्डक्षिक राजवर्ग भी नहीं है जो परिवार से विरोष रखता 
हो। निप्कर्प यह है कि उनका राज्य ऐसा आदष्या राज्य है जिसमें उपर्युक्त दण्ड का पात्र कोई व्यक्ति नहीं है 
कृषियों ने हुस प्रकार झे उदाहरण अम्यन्न भी दिये हैं । मानसकार से 'दुद सिए कहकर यही अये प्रकट 
छिया है। सारांश यही है कि देख म॑ं अह्टित फरने वाला व्यक्ति नहीं है जो मृत्युदम्द फु भ्रधिकारी दरिद्र, 
द्राह्दो या देव प्रतिकूल हो । 

सन्‍्तों को घाणोको ययायता 

प्लाउव्य है कि पविष्रास्मा मनीपियों की घाणो को प्वास्प्बधनानुप्ार सफल होता हो है नो 
“ऋषपोर्णा पुनराद्यातां घाचमर्पोनुघायति' से स्पष्ट है। अतः राजा के यागयों को स्पष्ट रूप से न कहकर 
पराक्षझुस से सुनाना मवित्तग्पता से प्रेरित है । वस्तुगत्या राजव्नन की सत्यता राजा के धर में हो होनेवाल्ती 
है। णैसे 'भनद्वित तोर प्रिया केह्दि कीन्हा-मन्परा ही अदित कारिणी है। केह्टि दुईसिए-क्रेकेमी को ही 
दो सिर या मुख है। एक मुख से पहले कह चुकी है-कोसज््यासम संद मद॒तारी। सुदिन सुमंगछ सोई 
जेठस्थामि सेवक कपुभाई | मोपर फर्राहें सनेह्र विसेपी, आदि। दुसरे मुख से कहेगो-- तापस देपविसेधि 
उदासी । 'चोदह बरिस रामु यतवासी' आदि । 


१ मस्प छोजिएते' परार्पपरपा छद्ओो कृताः सल्य्या । 
प्रश्माचचु रपेस्पमास दपिरसाम्या' किस्ताकितंया ( 
गीमन्ते स्वर्मष्डमंझूछपयता धाततेव घबन्प्पोदशातु ॥ 
सुढीनां प्रकरेज कूर्भरमचीदुः्पोरपे रोबधस्ति | ( पे ) 


११४ भावायथं-शास्त्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


'केहि जमु चह लीन्हा'--राजा को ही यमराज के यहाँ से बुलावा आाया है। 'कहु केहि रकहु करो 
नरेसू!-आजीवन सेवकत्व मानकर भरत को रक मान रही है, उसको राजा बचना है। 

'कहु केहि नृपहिं निकासौ देसूः-राज्यारोहण की धोपणा के बाद मनोनीत राजा 2 को देश- 
निकासा अर्थात्‌ वनगमन होनेवाछा है। 'सकठं तोर अरि अमरउ मारी'-देवताओ से प्रेरिता सरस्वती का 
कार्य ककेयी का अहित करनेवाला है भर्थाव्‌ वेधव्य होनेवाला है। पर सरस्वती के काय मे भरत को 
राजतिलुक नही होगा यद्यपि वह राजसचालन करेंगे। 


राजा की ग्र्वोत्ति 

प्रइन : रानी की परतन्त्रता मे राजा की गर्वोक्ति अमरउ मारी' क्या शोभनीय है ? 

उत्तर ; उत्तर मे कहना है कि अधीनस्थ प्राणी मित्र को उत्साहित करने के लिए सब कुछ कहता 
है। कामतल्त्र मे स्त्री स्वतन्त्रा है, पुरुष परत्त्र है। प्रेयंने मालिक (प्रेरक) के अनुशासन को सपन्न करने की 
हृष्टि से जो भी कहा या किया वह दासता का अनुभाव है। उदाहरणाथ॑ परशुरामजी घमं-प्रधान होने से 
पिता की अधीनता मे मातुबध के लिए प्रवृत्त हुए, द्रोण भादि गुरुवगं भी दुर्वोधन के आदेश का पालन 
करने को विवद्य हुए, उसी प्रकार दशरथ ने भी काम की अधीनता मे प्रिया के अनुसरण में ऐसा कहा तो 
आश्चयं नही | अवशिष्ट विचार अग्निम चौ० मे देखें । 

संगति : कामप्रयुक्त मोहकता को समझने के लिए महाराज कैकेयी को सवोधन कर रहे हैं। 


सौ० ; जानसि मोर सुभाउ बरोरू !। मनु तब आनन चुद चकोरू ॥ ४ ॥ 


भावायं * हे सुन्दर जाँघवाली ! मेरा स्वभाव तुम नहीं जानती हो कि मेरा मनोरूपी चकोर 
तुम्हारे मुख को चर्द्रमा के सम्तान खिला हुआ देखना चाहता है। 


कामतन्त्र में पुरुष का विदवास 

प्रदनन : छन्‍्द २५ की व्याख्या के अनुसार कामतन्त्र के अधीनस्थ पुरुष अपने में कतूंता नही रखता तो 
प्रेरिका स्त्री जो भी कहें वह सब बिता विचार किये करना क्या ठीक होगा ? 

उत्तर * उचितानुचित का विचार करना प्रत्येक का कर्तव्य है। परतन्त्र होने पर वह उचित कतंव्य 
की नहीं सोचता तो वह दोष पुरुष मे स्त्री के प्रति मोहकता के कारण उत्पन्न होता है | अर्थात्‌ रागान्धता में 
राजा दशरथ केकेयी के मोहकताप्रयुक्त राग्र में उपयुक्त वचन सुना रहे हैं। राजा के उपर्यक्त वचन में कारण 
राजा का विश्वास है कि प्रिया कैकेयी पतिन्नता है, वह धर्मविरुद्ध कार्य में कदापि प्रेरिका नही होगी ! 

जहाँ धमंविरोध सिद्ध है वहाँ कारकान्तर को उचितानुचित का विचार करना चाहिए। कारकान्तर 
मू्ख यजमान को त्यागने मे कारणावशात्‌ या देववज्यात्‌ असमर्थ हुआ तो अनुचित कार्यक्रम के परिणाम 
स्वरूप यजमान और कारकान्तर का विनादय अवध्यभावी है जैसा छनन्‍्द २५ की व्याख्या में द्रष्टव्य है। 


संगति + कामतन्त्र का समय होने से राजा अपना कार्यान्वयि-प्रेयंत्व प्रकट कर रहे हैं। 


चो० ; प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरे । परिजन प्रजा सकल बस तोरे ॥ ५॥ 


भावार्थ : हे प्रिये ! हमारा स्वस्थ, प्राण के समा प्रिययुत्र, परिजन, कुदुस्बी, प्रजा आदि सब 
तुम्हारे वच् में हैं । ४ 


अपोष्याकाप्डस ११६ 


श्ा० ध्या० वुद्धिमान्‌ होते हुए मो प्रजासहित अपने को कैफेयी के अधीनस्थ करने में कारण यह 
है दि राजा फामथास्त्र के जाता हूँ राधि के फत्तिपम प्रहर वीत घुके हूँ एकान्स स्पछ है। 


सगति प्रजासुत आदि राजी के वश में हु--शस प्रतिशाताये की यपार्थता समझाने के लिए राजा 
बोछ रहे हें। 


घोौ० , जो फछु फह्दों फपट फरि तोहो । भामिनि | रामसपथ सत भोही ॥ ६ ॥ 


भायाप॑ यदि में कपट झरफे फहुता हूँ छो हे भामिनि | मुझे एक घार नहीं, छो वार भोराम रे 
सोगप है । 
फ़पटाय परिष्झार घ रामशपण फा प्रयोजन 

शा० ध्या० यहाँ राजा को कपट प्रयोग का अप॑ होता है कि प्रतिज्ञातायं को देशकाल एवं परि 
स्पिति फे बद्ाने से विसंदाद ( विपरीत ) करना। ऐसा घिसंवादी कार्य राजा से नहीं होगा। इसका 
मिष्वास दिलाने फे क्िए श्रीराम को शपप राजा मे को है। राजा के इध निर्णय से कि उनके राज्य में 
फोई अपराधी नहीं है, न सो फेकेयी हो दुष्टा है, प्रतिज्ञाताभंबिपरोस कारये को संभावना बे नहीं था 
सकतो आर्थात्‌ प्रत्तिशातायें सत्य है, जो 'सपप सत से व्यक्त है) 

ड्पय फो प्रप्तिष्ठा 

जशात्तय्य है कि जिसका वैदिक सिद्धान्त एवं तदुछ पारछोकिफ फर्ों पर पूर्ण विष्वास है पड़ी व्यक्ति 
धपप के अनुसार प्रतिज्ञाता्थ का आजीवन निर्यदूण कर सकता है। ऐसे सत्यवादी राजा के बारे में 
मराष्वस्ता प्रजा भी अपने स्वामी के साथ जीवन मरण के छिए तत्पया रूसी है। अत्' राजनीति में सत्यत्व 
के पर अयधास्प्रक्नर ने भारी बल दिया है ।* राजनीति म यह भी कहा गया है कि यदि राजा निष्य॑ंसनी 
सत्यपाएक, त्यागी एवं छूर है ठो यह राष्ट्र म प्रिय होता है। ऐसे राजा के दिरोघ में लेता छोग सामाजिक 
संघटन बनाने में भफल होते रहते हैँ। राजा का वर्तमान एवं मविष्यत्‌ दोनों एकमात्र सत्य और एपष 
पर भाषारित है। उनको सत्पसंघता कमी टछछों नहीं। हसछिये करेक्रेयी जो भी मागेगी वहू दिया 
जायगा। सत्रो का कोप राजा नो दृष्ट नहीं है। वह उसको प्रसन्‍्ना देखना चाहते हैं। 

प्गति रानी की प्रसन्नता के छिए उसका इृप्सित फछ को उपछव्धि कारण है, उसी को पूर्ण करने 
मे सजा रानी को स्वतन्यत्ा या छूट दे रहे हैं | 


' थो० बिह॒स्ति सागु सनभावति बाता । भूपन समहि सनोहर गाता ॥ ७ ७ 


भायार्ष राजा प्रसलतता से हसते हुए घोले कि सन घाहो बार को माँग छो। हमारे सनस्‌ को 
हरने घाछे अपने सुन्दर मंगों पर गहने छज्ा छो। अ्र्यात्‌ृ पात्रता के घनुकूक स्थिति में 
हो जाओ 
संगति भगरूमय अवसर पर क्रेकेयी के आरृस्मिबः रोप को स्थिति से छिसी अनहोनी घटना 
के प्रति राजा आदाकित हा रहे दें। अतः ययाद्यीद्र उसका निरास करना घाहते हैं। 


१ ध्ाम्तिषा म्रप्ररुत्त मा> १२ ( उॉपदेरदियाहप, रामघप्ड, बारत्वस्ो, ) 


११६ भावाथ॑-शास्त्रीयव्यास्यासमेतम 


चौ० : धरो कुबरो समुझि जिये द्वेखू । बेगि प्रिया परिहरहि कुबेष्‌ ॥ ८ ॥ 
भावार्थ : सौका बेसौका को समझकर सनस्‌ में विचार करो। हे प्रिये ! अशुभ असुन्दर वेष को 
जीध्रतया बदक़ो । 'ब्रेगि' से राजा समय का संकोच प्रकट कर रहे हैं । 


शपथपर केकेयी को विद्ववाप 

शा० व्यां० * राजा का तात्यय॑ यह है कि कैकेयी के मनोरथ की सिद्धि यथाशीत्र सम्पत्त कराकर 
प्रस्तुत मगलूमय राज्याभिषेक को सुनाया जाय । 

पुव॑ँ मे चौ० १ से ३ मे राजा अपराधी के बारे में पूछ आये हैं। कंकेयी सोच रही हैं कि जनपद 
या पुर मे कोई अपराधी नही है । अपने परिवार मे अपराधी का विषय चिन्तत्तीय है। राम सपथः सुनकर 
रानी को विश्वास हो गया है कि वह जो भी कहेगी उसको राजा पूर्ण करेंगे ही क्योंकि उनको सत्यसधता 
से वह परिचिता है अर्थात्‌ प्रतिज्ञा करके राजा उससे च्युत नही होते । अत. रानी ने यह निष्कर्प निकाछा 
कि 'मम मानोरथिक कर्म सफल कतंव्यतया सत्यसधेन शपथपूर्व॑क प्रत्तिज्ञातत्वात्‌ ।” 


सगति ; “चन्द चकोर' की उक्ति से राजा के मोहकत्व को अनुकूल समझती हुई ककेयी वरदानप्राप्ति 
में आश्वस्ता हो रही हैं। 


दो० ; यह सुनि सत गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिसंद । 
भूष्न सजति बिलोकि सुगु भनहें किरातिति फंद ॥ २६ ४ 


भावार्थ मलिन बुद्धिवाली केकेयी राजा की उपर्यक्त बातें सुनकर, इतने बड़े राम-सपथ का 
मूल्य अच्छी तरह विचार कर उठी। गहनो को शरोर पर सजाने लगी, मातो भिलनी 
हिरण को देखकर जाल को सेंभालती हो 


मानोरथिक सुत्र में केकेयी का मतिसान्थय 


शा० व्या राजा की प्रतिज्ञा सुतकर केकेयी आनन्द की सीमा से इतनी बाहर हो गयी कि उसका 
म्रानोरथिक सुख भी प्रकट होने लगा जो उसके हास से परिलक्षित हो रहा है । 


एक ओर वेदसिद्धान्ताभिमत परलोकविश्वासमूलक प्रतिज्ञाताथं निबंहण से राजा को विश्वासाह 
मानना, दूसरी ओर वेदसिद्धान्त के विरोध मे प्रवृत्ता शास्त्रगहिता कुबडी को भी विश्वासाहं मानना रानी 
के बुद्धिमान्य का द्योतक है। इसीलिए कवि उसको मतिमद कह रहे हैं। 


संगति , अपने इप्सित अर्थ की सिद्धि मे मानोरथिक सुख की अनुभूति कर केके यी आभूषण पहन रही 
है। चो० ४ द्रो० २६ मे कहो उक्ति से राजा को अपने अधीन जानकर रात्ती इष्टसिद्धि के लिए अपनी 
चेष्टाओ से राजा के भुलावा भी दे रही है । इसलिए 'घरी-कुघरी के बारे मे राजा फिर कह रहे हैं । 


: चौ० :' पुनि कह राउ सुहृद जिय जानी । प्रेमपुलकि मुदु मंजुल बानी ॥ १ ७ 


दे | 
भावाथ॑ : सी अपने मन से रानी को मित्र हो समझकर प्रेस से भरकर कोसल व सुन्दर वाणीं 
बोले । 


धयोध्याकाप्डम्‌ ११७ 


फेफेयो में सुद्दृत्य को भ्रान्ति 

हा» ध्या पूर्षानुस्पूत मुद्ृदभाव हास्प द्वारा प्रकट होता देख कर राजा ने झ्ैकेसी को प्रसन्‍ता नाना 
पर समझना कि दोवोपपात का उपशमन हो गया। क्षास्त्रकारों भे सुद्ृद्‌ को ध्यास्या हस प्रकार की है। 
/तन्मित्र॑ सत्‌ सुहृत्व व हुदय॑ यत्र धामतम्‌' इस उक्ति को कवि ने 'सुल्दृद' शाम्द से व्यक्त किया है। गोकेसी 
के पूर्व चरित्र का स्मरण करके उसका तद्भापित्व रूप सुहृद गुण भी राणा को ध्यान में आ रहा है, गयोंकि 
कैकेयो ने युद्ध जैसे मद्दात॒ सकट में अनुपेक्षणीय मित्रता दिखायी। युद्दुत्त्व में विष्वास्पता का सामानाधि 
फरण्प है। उसी के भ्राघार पर राजा केडेयी के प्रति पूर्ण आश्वस्त हूँ। मनसू को चंचछ वृत्तियों में 
उसकी तत्कालीन कापट्य की सृक्षमता को वे नहीं समप्त सके । राय के कारण राजा का उपरिपृद्धित्त 
काम महीं कर रहा है। यावदुपकरोति तावमत्र मवत्ति,। 'उपकारछक्षण हि मित्र के अनुसार सुद्ृत्त्त पहुे 
था, अतएवं आज मी होना चाहिए, ऐसा राजनीति को मान्य नहीं है। राजनीति द्वारा बताये हुए मवन 
छोघुत कौर घरकार्य के अमाव मे रनियास की धर्तमान घटना में वास्सविक तथ्यों से राजा अनमिन्न 
रह गये । 


संग्ति राजा अपराधों को दण्ड देना आदि विपय छोड़कर अपने मनोरष के थायेग में राज्या 
भिपेक के बारे म सुना रहे हैं । 
क्ौ० भाभिनि ! भयउ तोर भतभावा । घर-घर नगर अनद बधावा ॥ २॥ 


भाषार्ष हे भामिनि ! तुम्हारे मनस्‌ को हो यात हुई है। धर घर से आ्आानग्द उत्सव सताथा 
जा रहाहे। 


स्‍टने में क्षनोचित्य 
राजा कैकेयो से कह रहे हैं कि हे “मामिनि” | तुम्हारा इष्ट करने में जा रहा हूँ । ऐसे इष्टसिदि 
के अवसर पर रुठना मया उचित है ? 
सगति इश्टसद्धि के बारे में राजा शुरू से हैं। 


सो० रामहि देउें फासि जुबरानू | सजहि सुलोचनि | मंगल साजू ॥ हे ॥ 
दक्षक्कि उठेउ सुनि हृवय फ़ठोरू । जनु छुद गयठ पाक बरतोदछ ॥ ४ ॥ 


भावा् भो रास को कछ भ्रुपरास पद ऐूँगा। इसछिए हे सुन्दर मुसबासो | “ तुप्त मंगछूसूचक 
साथ सम्राओो ।” यह सुनकर उसका कठोर घुद्य सोक्त उठा मानों पके बलसोड़ 
( फोड़े ) घाव को छू दिया हो । 


राज्योत्सव में क्ेकेयो फो पीडा मल 
धा० ब्या रामराज्माभिपेक सुनते दी रानी को हप की जगह व्यपा हो गयी | पूर्व॑ निर्दिष्ट भा 
दुख ( मरस का सेवकत्व भोर सौत की सेवक़ाई की ) की कश्पना में उसझे हृदय में णो पीड़ा हो रही थी 
वह राज्योस्सब की बात सुनते ही तीत्र हो उठझी। जेंसे पके घाव को स्पर्श करने पर घिलक उठती हो। 
इससे स्पष्ट होता है कि रानी के दुःख का अनुमाब प्रकट हो रहा था, पर उसने छिपा छिया। 


११८ भावार्थ-शास्त्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


हास्य में अवहित्था 

संगति : अपनी मनोरथसिद्धि मे सहायक समझकर दु ख को तत्काल प्रकट न करना उसका कपट है। 

राजा को विना धर्मंबन्धन मे बाँधे काम नहीं चलेगा ऐसा सोचकर प्रसन्‍्तता की अवहित्था कर रही है। 
और हास्य की मुद्रा से राजा को मोह मे डाल रही है। 


चौ० : ऐसेउ पीर बिहस तेहि गोई । चोर नारि जिमि प्रगठ न रोई ॥ ५॥ 


भावार्थ : रानी ने हँंसकर अपनो पीड़ा को ऐसे छिपा लिया जैसे चोर की रुत्नी खुलकर सबके 
सामने नहीं रोती । 
दंभ में श्रम 

शा० व्या० कौकेयी बडे परिश्रम से अपनी पीडा दवा पा रही है। दभ में परिश्रम होता ही है 
क्योकि परस्पर विरोधी कार्य होने का भय वना रहता है। केकेयी अपने भार्यधिर्म को छोड़कर अव- 
हित्था कर रही है। धमंविपरीत होकर कार्य करने में प्रतिक्षण सचेतस्क रहना पडता है। ऊपर की 
चौपाइयो में शिवजी ने ककेयी की मन स्थिति का वर्णव 'पराक बरतोरू' से तथा “चोर नारि जिमि प्रकट 
न रोई” से उस पीडा को प्रकट न करने मे केकैयी का दभ एवं अवहित्या प्रकट की है । 

संगति : दभ और अवहित्या के भावों को समझना राजा के लिए असम्भव नही था पर वे नहीं 
समझ पा रहे हैं, ऐसा शिवजी सुना रहे हैं । 


चौ० ; लखहि न भूप कपट चतुराई । कोटिकुटिलमनि गुरू पढ़ाई ॥ ६ ॥ 


भावार्थ : राजा ने उसके कपट और चालाकी को नहीं समझा क्योंकि खोदे कर्म में दक्ष गुरु मन्यरा 
ने उसको शिक्षा दी थी । 


कापदय में दक्ष ता 

दा० व्या० : कुटिल का पर्यायवाची शब्द “शठ” है--/शादय चित्तकौटिल्य” | दो प्रेमियो के मध्य 

मे शका उत्पन्न कराकर भेद लगाने वाले को “राजश्ञास्त्र” में शठ कहा है ।” मन्धरा ने कैकेयी, कोसल्या, 

दशरथ, श्रीराम एव भरतजी, भादि सभी मे भेद का प्रयोग करने मे कुशलता दिखायी है । अतः वह छठा है। 

राज्य मे शठ यत्र-तत्र मिलते ही हैं। परन्तु प्रकृत भेद को छुगाने की परम्परा को देखने के वाद शिवजी 

कह रहे हैं कि मन्थरा “कोटिकुटिलमनि” है क्योकि दशरथ जेसे नीतिनिपुण राजा भी चकमे में भा 

गये ओर रहस्य को नहीं समझ सके। बुद्धिमती कैकेयी सब कुछ कहने पर भी 'करौ चख्र पृतरि आली' से 

उस दासी की शिष्या हो गयी। दासी के गुरुत्व को समझाने के लिए 'कुटिल्मनि गुरू” शब्द का प्रयोग 
किया गया है। 

इस अवसर पर कवि कह रहें हैं कि केकयी के कपट को राजा ने नहीं समझा। साहित्य शास्त्र में 

“कपट' शब्द की व्याख्या इस प्रकार है-/कपटस्य स्वरूप तु म्रमो मोहात्मक' स्मृत्त ” | केकयी ने क्रोघ मे 

अपने क्रूर सत्व का प्रदर्शंत किया जिससे राजा मोह में भा गये यह वस्तु-स्वभाव कपट है। 'भामिनी भयउ 


१ हाठ) पक्षों चालयति द्वाबप्ययोपिछब्धये ॥ मी० सा० स० १८।॥ 


अयोध्याक्ाप्यस्‌ ११९ 


तोर मन भावा' का अनुवाद 'रामहि देखें झाछ्ति जुदराजू', कहकर सुताया गया । प्रस्तुत प्रसंग में रवि 
कपद शब्द का प्रयोग कर कपट का दूसरा भाव-'ठछार्य का अपलाप” बतछा रहे हैं। “घतुराई' का अरे 
है 'पराति-संधान” | राजा क्ेकयी को अपने पक्ष में न मिलता सके, पर कौरमी ने राजा को अपने पक्ष 
में मिल्ता छने पर बाध्य कर दिया , यही कपट चतुराई का माघ है 

संगति शिवजी कह रहे हैं कि भवितव्यता हो थी कि नीतिज्न राजा क्ेफयी के चातुर्य मे फस गये | 

चौ० जद्यपि नोतिनिपुत तरनाहू । मारि चरित जलनिधि अबगाहु ॥ ७ ॥ 

भाषार्थ यद्यपि राजा नोतिमिपुण, नीति को बझ्ानने में घतुर हैं पर स्त्रोचरित्र तो अगाघ 

समुद्र है। 
स्त्री चरित्र फो दुर्सेपता 

इत० स्या० 'नितिनिपुण/ फहने का भाव है कि राजा तक॑-शास्त्र में कुधछ होने से प्रत्यक्ष 
अनुमान एवं आगम--न तीनो प्रमाणों के द्वारा अर्निर्णय करते हैं, भाष-विमभावादि सर््योंको भी 
समझते हैं, साध्य-हेतु को ध्याप्ति के मूठ तर्क एवं कार्य-कारण भाव की सूद्मता को मी जानते हैं। उनका 
राजस्व मो हसी कारण से निर्बाध है। प्रभु को सेवा मे तत्पर रहने से बुद्धि की शुद्धता मी असंदिग्ध है 
तपा बृद्धि में विपच्रैठार्थ भान नहीं होता, राज्य क॑ अमात्म बादि सम्पूर्ण प्रकृतियों पर अपना अधिकार 
हृढ़ बनाये हुए हैं। प्रायः उनके कार्य मे निष्फता नहीं रहती। फिर भी स्त्रीचरित्र को न समझने का 
कारण राग है । थपापन काना राग का स्वभाव है। रागान्धता में स्त्री-चरित्र रुमी समुद्र की पाहू नछग 
उके तो भाएघय॑ नहीं | 


राजा दशरयफो रागान्धता फा कारण देव हे 
प्रधन होता है कि इतनी नोतिनियुणता होते हुए भी राजा दशरय क्यों नहीं समझ पाये ? उत्तर 
में कहना है कि प्रमु की इन्छा और सरस्वतो फी माया इसमे कारण है जेसा छन्द २५ में “मबितव्यता' 
घोर चो० ७ दो० १२ में सरस्वत्ती का 'आगिल फाणु घिचारि' से स्पष्ट है | मपितव्यता से राणा की वृद्धि 
में विषयावयाहुन न होने का कारण बताया गया है। 
इन दोनों कारणों का नास्घिरित्र की अवग्राहुता से समन्वय करते हुए कहना है कि मविष्ठष्यता 
या अहष्टविशेष किया प्रभु-इस्छा को कारण मानसे हुए भी विवेचकों की युद्धि जहाँ तक जा सकती है 
उसके अन्तिम विन्दु को स्पर्ण करना भी कर्तव्य होता है । अनुकूछ विन्दु “नय' है, प्रतिकूछसा में अपनया 
है। इस प्रकार शिवजी विवेध्रकों का विवेचनीय मंतिम विन्चु॒ नारि चरित्त जछनिधि अबगाहडू' से समझा 
रहे हैं। इसका उद्देष्य यह है कि सर्वे साधारम जन अहृष्ठ को हेतु मानकर हृष्ट नय-अपनय के विवेशल 
से विमुद्ध न रहें । 
। प्तीतिसानु दशरथ फो अपनीति से हानि नहों 
ज्ञातव्य है कि प्रस्तुत प्रसंग म॑ मद्दाराज दक्षरय एवं कैकेयी दोनों बनीति में फंसकर मनोरभ की 
सत्काछ सिंद न कर सके छपापि अनीति के परिणाम स्वरूप राजा का छास नहीं हुआ | किबहुना उतका 
चरित्र प्रभु के चरित्र में पियो गया । अतएय प्रभुचरित्र से सवंधित होने से दक्षरण और फ्रेकेमी का चरित्र 
निरदुष्ट माना घायगा गर्योकि प्रस्तुत प्रसंग को छोड़कर बन्यत्र वे अनीति में नहीं पड़े । मद्दी उनकी महत्ता 
है। रामचरित्र में गुँे जाने का सौमाग्य क्या साधारण जनों को सुम है ? 


१२० भावायं-शास्त्रीयव्याख्यासमेतमस्‌ 


स्‍त्री-चरित्र से नय-अपनय को शिक्षा 

वक्तव्य है कि अहृष्ट की दोहाई देकर अपनय के चक्कर में पडने पर साधारण प्राणियों को 
निष्फलता भोगनी ही पडेगी क्योकि उनके कार्य का श्रीराम से सम्बन्ध न होने से वे दशरथ केकयी जैसे 
पवित्रात्मा की स्थिति मे न होगे। अत. साधारण जनो को हृष्टविधया 'अपनय' समझाने के लिए 
रागान्धता रूपी दोष के निरूपणाथ नारी-चर्रित्रकी अगाधता का वर्णन किया गया है। इस विषय को 
पुन' स्पष्ट करते हुए कहना है कि भगवत्कृपापांत्र होते हुए भी दशरथ जेसे नीतिज्ञ महात्मा स्त्री के हाव 
भाव से मोह में फँसकर मनोरथ सिद्धि मे असफल रहें तो साधारण मनुष्य ईश्वर को ठुकराकर रागान्धता 
में पडकर कहाँ गिरेगे, इसके मारज॑द के लिए त्य-अपनय की शिक्षा अपेक्षित है । 

इस निरुपण से क्या नारी-चरित्र पर छाछन माना जायगा ? इसका उत्तर अरण्यकाड मे चौ० ८ 
दो० ३८ के विवेचन में देखना चाहिए | 


बेद सिद्धनतकों न मानना ही अविश्वास का मल 
केकयी के पूर्वापर चरित्र से यह भछी प्रकार सिद्ध होता है कि जब तक व्यक्ति वेद-सिद्धान्त की 
मान्यता में स्थिर है तब तक वह स्वधर्मं से विचलित न होकर विश्वासाहं है। जिस क्षण वह वेद-सिद्धान्त 
से विचलित होकर किसी दूसरे को गुरु मानने लगता है उस समय केकयी की तरह उसकी विश्वास्यता 
भी समाप्त हो जाती है । 


संगति : रागान्धता मे कैकेयी की किस चेष्टा पर ध्यान न देनेसे नीति-निपुण राजा को विफल 
मनोरथ होना पडा, वह आगे कहा जायगा। 
चौ० : कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी । बोली बिहसि नयन सुहु मोरो ॥ ८ 0 
भावार्थ : कैकेयी झूठा प्रेम दिखाते हुए आँख और मह बना करके कटाक्ष फेकती हुई बोली । 


प्रेम के अनुभाव में दम्भ 

शा० व्या० : नारि चरित के अन्तगंत हास्य दिखाना, मुँह घुमाकर कटाक्ष आदि मे रतिंकला का 
प्रदर्शन पुरप को आकर्षित करने का कार्य है। कपट चतुराई मे मुंह फेरने से रानी स्नेह का दभ कर 
रही है। 

बिहसि की पुनरुक्ति का प्रयोजन 

शा० व्या० : शिवजी ने रानी के अभिनय मे तीन बार “बिहसि' शब्द का प्रयोग किया है'। दो० 
२६ में विहसि' का प्रयोजन राजा को मू्ख समझना है। पूर्व मे चौ० ५ में 'बिह॒सि' व्यगात्मक' भाव का 
द्योतक है। यहाँ “विहसि' से रतिभाव दिखाकर 'कपट सनेह' मे राजा को भुलावा देना हैं| 

संगति + कैकैयी राजा को 'कपट सनेहु' मे भुलाकर प्रतिज्ञा कराने का. उपक्रम कर रही है। 

दोहा : मागु मागु पे कहहु प्रिय कबहुँ न देहु न लेहु । 
देन कहेहु वरदान दुइ तेउ पावत संदेहु ॥ २८ ॥ 


भावार्थ है'प्रिये | सांगो सागो” तुम कहते तो हो, पर कभी भो देते लेते नही १ तुसने दो वर देने 
को कहा था किन्तु वह भी मिलने मे सन्देह है । ' ह 


१६ भ्रयोध्याफापडस्‌ ध्याफापड्स्‌ १२३ 


सत्यसघता फे अभाव का आरोप 

शा० ब्या० इस दोहे में कबहु नदेहु' सुदाकर राजा को छण्जित कर देना चाहुही है। भाव 
यह है कि राजा केव्त प्रेम का ढोंग करते हैं, पर यस्तुगस्‍्या प्रेम नहों है जिसमें प्रिया को 'अय मम 
द्वित साधयिष्यति का निश्चय हो | तेठ पायत सन्देह' कहकर राजा को सस्यसम्धता की उपयोगिता 
अपने पक्ष फे छिए करते हुए राजा पर सध्यसघसा के अभाव का जाक्षेप कर रही है। 

संगति सत्पसन्धता के आरोप पर राजा सधेत न्त होफर रानी के वचन को प्रणयमान समझे 
रहे हैं प्रश्युत्तर में उसके मान को प्रर्शसा कर रहे हैं। 

चौ० जानेउ मरमु राउ हस्ति फहुई । तुम्हहि फोहाब परम प्रिय अहुई ॥ १ ॥ 

भाषा राजा हंसझर योले कि रहस्य को थात सम गये कि तुमको रुठमा बहुत अ+छा छगता है। 


राम में विपरोता्ेदर्शन 

धा।० भ्या० रागादि के वशोभूत होने पर प्रेमो को विपरोत्ता्थदर्शन केसे होता है, उस को यहाँ 
दिख्वाया जा रहा है। प्रणय-्मान को प्रकट फरक्ष पूर्व में दिये गये दो घरों को मांगता मानिनीस्वभाव 
क॑ अनुरूप राजा समझते हैं। सग म होने से राजा यास्तपिक स्थिति का परिचय नहीं कर पा रहे हैं, 
गद्दी विपरोतार्थदर्णत है | 

संग्रति 'कवहु न देहु न सेहु/ कहूकर रानी ने जो आक्षेप किया था उसका समाधान राणा कर 
रहे हैं। 

चोौ० थातो राषि म्‌ मागिहु फाऊ । बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ ॥ २॥ 


भावार्ष दोनों यरों को परोहर रखकर तुमने कभी मांगा सहीं। भोछे स्वभाव के कारण सें सी 


भूछ गया 
भूल सुधारने में निग्रह क्यों 
श्ा० ध्या० दो घर मांगे धुत दिन हो गम्रे तो भूल जानता स्वाभाषिक है। छुम भी फेसो हो 
कि आजतक उन वरा को नहीं मागा छो उसमें मेरा क्‍या दोप ? अब धरोहर को घापस छेकर मेरी भूछ 
सुधार रही हो यह अच्छा है) डिन्तु मुप्ते निगृह्दोत बयों कर रही हो ? 
संगति भूलजाने फे दण्ड में दो के वदछे चार घर देने का प्रस्ताव राजा रक्ष रहे हैं। 
चो० झूठेहूँ हरमाहि दोष जनि वेहू । बुहके चारि मांगि मकु छेहु ॥ ३े ॥ 
भावापें राजा कहते हैँ छि तुम्हारों माघना को में दुकराउंगा स्व मन दोषों होद्नेगा। अरे दो क्या, 
में घार थर देने की प्रतिज्ञा कर रहा हैं। 
“दुइ्के चारि' फा भाद 
छा० थ्या जाउव्य हे कि इस समय राजा काम-सन्त्र की अघीनता में पूर्व दो बर के अतिरिक्त और 
दो वर देने की प्रतिज्ञा कर रहे हैं। पर बोकेयो ने कामहत की अवस्था सें पूर्व प्रतिश्ञास दो घर के अतिरिक्त 
प्रस्तुत में कहे दो वर्रों पर ध्यान नह्ों दिया बर्मोकि यह दान धमेता आबद्ध नहीं है। इसलिए केकेमी 
की हृष्टि में एसत्कादीन धरदान का स्थायी मृष््म नहीं है । 


१२२ भावाथं-शास्त्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


प्रदन * यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि कदाचित्‌ केकेयी अतिरिक्त दो वर मागने में उद्युक्ता होती तो 

क्या परिस्थिति होती ? 
उत्तर * कहना होगा कि उन वरो की मान्यता के लिए श्रीराम वाध्य न होते क्योकि पहले के दो 

बर धरमंमूलक हैं। अतिरिक्त दो वर काममूलक हैं। तब बया राजा की सत्यमन्वता पर आँच आती ? 
उत्तर मे कहना है कि कैकेयी की वरयाचना मे प्रभु-इच्छा सम है। भर्थात्‌ पूर्व प्रतिज्ञात दो वर देने मे 
राजा की सत्यसन्धताकी रक्षा एवं अतिरिक्त दो वर मागने में कैकेयी की रुचि न होना प्रभु को इच्छा या 
विधान की समथंता है। राजा के पक्ष से उक्त कथित वरो की उपपत्ति चौ० ८ दोहा ३४ की व्याख्या में 
द्रष्टव्य है । 

संगति : ककेयी के मनोनुरूप पूव॑प्रतिश्ञात अर्थ को ( दोनो बरो को ) देने में राजा कुलीनता के 
स्वभाव से बाध्य हैं । 

चौ० ; रघुकुलरीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ वर चचनु न जाई ॥ ४ ॥ 

भावार्थ : रघुकुल मे सदा से ही यह रीति चली आयी हे कि चाहे प्राण चला जाय पर वचन 

त जाय अर्थात्‌ वचन को रखने के लिए प्राण दे देते हं। 


कुलीनता का महत्त्व 
श्ञा० व्या० : कुलीनता का नाम लेकर राजा ने भारतीय राजनीति-सिद्धान्त की पुष्टि की है अपने 
प्रतिज्ञात्त अर्थ से च्युत न होना ही कुलीनता का लक्षण है। कुलीनो का स्वभाव कीर्ति को बनाने के तरफ 
अत्यधिक रहता है। साहित्यश्ञास्त्र में कीत्ति एव यशस्‌ में अन्तर बतलाया है । जगतुऊल्याणकारिणी 
पुवंपरम्पराप्राप्त कृति को ही कीति सज्ञा दी गयी है। उसी प्रकार जगत॒कल्याणकारिणी कृति को वश्च 
मे कोई व्यक्ति इदप्रथमतया नवीनरूप से अपनाता है तो वही यशस्‌ कहा जाता है ।*१ 


प्रस्तुत प्रसग में अपने वचन का पालन सवादी के रूप में करना कुल-क्रमागत कार्य है। उसी पर 
राजा हंढ हैं, ऐसा कहकर कीति को समझाया | 


वचन-परिपालन में दुढ़ता 
अपने वचन का परिपालन करने से वहों व्यक्ति विचल्ति होता है जिसको परछोकविश्वास नहीं 
है। यह दोष परलोकविद्वासो वेदिकसिद्धान्तानुयायी कुछीनों में नहीं रहता। यदि ऐसा कुलीनत्व का 
अभिमान न होता तो जनमत के नाम पर राजा वर देने से डोल सकते थे। 


संग्रति : इस तथ्य को समझाने के लिए परलोकविव्वास्यता आगे सुनायी जा रही है। 
चौ० ; नाह असत्यसम पातकपुंजा। गिरिसम होहि कि कोटिकर्गंजा ॥ ५ ॥ 
भावार्थ : सब पापो का समूह भी असत्यरूप पाप के बरावर नहीं हो सकता। जैसे करोड़ो घंघची 
इकट्ठा होकर भी पहाड़ के बराबर नहीं हो सकतीं । ० 


१ कुलोनत्वान्न व्यनिचरति | ( नोतिसार जयमगला स० ३ ) 
२ फुतिरयाँ रम्रयत्येव विश्व सा फोतिरुच्यते । 
३ स्वापदानप्रसुता चेच्दाः इत्यभिधीयने | ( भाव-अ० ३ ) 


धयौध्याकाण्यस्‌ रे 


असत्यभाषण से घर्वाघिक निवृत्ति 
शा० ध्या० असत्य भाषण में “पाठकपुना” कहकर परछोक-मीति को दर्शाया गया है षो 
ऐकान्तिक अवसर पर भी सन्जनों को अपमं से निवृत्त कयतों है। महू परछोक-विश्वास भी अपोस्येम 
वेद-सिद्धान्त फो बिना अपनाये स्थिर नहीं होता ऐसा मारतोयों का मत है। 
संगति छिद्धान्त को “वेद पुराण विदित मनु गाये” से अपनी सहमति प्रकट करते हुए राणा रानी 
को समप्ना रहे हैं। 


चो० सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। घेद-पुरानविदिस मनु गाए ॥ ६॥ 
भाव।र्थ जिसने सत्‌ कर्म ( पुष्प ) हैं उनसे मछ में सत्य रहता है, तभी वे प्लोमायमान होते हैं। 
ऐस्ता धेद पुराण से प्रसिद्ध है। मनु मे सी यही गाया है। 


अथ में धम्र सम्बंध को सहसा 

शा० व्या० यह विधारणीय है कि राजा के लिए बर्य के साथ सत्य की मदत्ता का सम्यस्थ किस 
प्रकार अपकित है ? घास्त्र का कहना है कि यदि देशवासियों को स्व॒राष्ट्र की एकसा, उसका थोगक्षेम और 
बजित सम्पत्ति का उपभोग उपलब्ध है सो वह देश समृद्ध माना जाता है। उसकी समृद्धिहेतु मात्स्यन्याय 
से देश को बचाने के लिए राजा की अपेक्षा होती है। यह कार्य तमी सफर होगा जब राजा मनोयोग से 
त्याग, सत्य, एवं थोय॑ के अपरूम्बन पर स्थिर रहे ।* सत्य से ब्युत होता राज्यविनात्ष का कारण माता 
गया है। अतः सत्य मे अविष्वास होने से पारस्परिषप्रेमसम्बन्ध दूट जाता है, आत्मीयया मी विलुप्त हो 
जातो है, झृत्पपक्ष का यन्न-तत्र उदप होने छगता है, मेद की जड़ हढ़ होसे रूगती है। ऐसे राज्य को 
प्रन्पकारा ने दोमक एगे पेढ़ से उपमा दो है अर्थात्‌ वह राज्य सोख्नछा हो जाता है। पूर्ष में बो० ५ में 
राजा ने कझ्ा है कि अप्तत्य से बढ़कर काई पाप नहीं है। ्सक विपरीत सत्य का आधार छ्षेने पर सुकृत 
सुद्दाए” से सुकुद का उदम कहा है। 

संगति राजा दशरथ उत्तमप्रकृति के हैं। वह शपथ के मृक्ष्य को समझते हैं। णयपण के सत्थ को 
ध्यान में रखकर अपने कर्तंब्य को निष्ठा मे कैकेयी को विश्वास विछाने के छिए शीराम को श्षपष हे रहे हैं। 


चौ० तेहि पर रामसपम करि आई। सुकृत-सनेहुअवधि रघुराई ॥ ७॥ 
भावार्भ इतना होने पर भी रघुराई शीषम पुष्प ध्लोर प्रेम को सोमा हैं। उनकी छापप मैं 
कर चुरा हूँ । 
दापय फी दिख्यता में भो भीराम पर आँच नहीं 

घा० ध्या० यदि सुकृत में कहों मी असत्यता आा जायगी तो श्रीराम का जीवन खतरे में हो जायगा 
थो राजा को सट्ा नहीं है! राजा घपप के रूप मे अत्यन्त परमप्रिय वस्तु श्रोराम के जीवन को दाँघ पर 
सगा रहें हैं। ऐसा करने म राजा रो प्रमादी नहों समझना चाहिए क्योंकि उनको विष्बास है किस 
तो बसत्यता होगी ओर न श्रीराम का जीवन खपरे में पड़ेगा | इस दिव्य धपण को सुनकर केकेयी के हृदय 
में उठी शका ऐोसा दो० २७ में घणित है निरस्त हो गयी और वर को प्राप्त करने में आएपस्ता हो गयी । 


१ सायम्‌ क्ोदल्ोकोभ्यं घोशिदस्तव मायया । भ्रहुंमेत्यतदप्ाइ जाम्यदे कमबर्त्ससू ( सा० १० ) ४ 


१२४ भावार्थ-शास्त्रीयव्याख्यासमेतस् 
संगति : इस प्रकार स्वार्थ-साधना मे आव्वस्ता हो बोलनेवाली कैकेयी को शिवजी कुमति कह रहे हैं। 
चौ० : बात दृढ़ाई कुमति हेसि बोली । कुमत कुविहग कुलह जनु खोली ॥ ८ ॥ 
दो० ; भूषमनोरथ सुभगन्‍बनु सुख सुबिहंगसमाजु । 
भिल्लिनि जिसि छाड़न चहति वचन भयंकरु बाजु ॥ २८ ॥ 


भावाय : अपनी बात पक्की कराकर कुमति रूपी रानी हँसकर बोली मातों अपनी कुमत रूप 
बाज पक्षी के ढककन को [ शिकार मारने के लिए ] खोला हो । 


धर्म के आड़ में कार्य-सिद्धि 
शा० व्या० : हढाई! का भाव है प्रस्तुत कार्य मे वर मॉगने की बात को शपथ द्वारा पक्की करना | 
उपयुक्त अवसर सोचकर केकेयी देश काल की अनुकूलता देखते हुए वरदानात्मक घर्मं के माध्यम से 
अपना कुमत सिद्ध करने जा रही है, इसलिए रानी को कुमतति कहा है। जिस मति के आधार पर रानी 
अपना आश्यय प्रकट करेगी उससे दु ख एवं विपत्ति होना अपरिहाय॑ं है, इसलिए कुमति कहा है। 


राजा के मनोरथ पर आघात 

खेद के साय कहना पडता है कि दशरथ के मन्तोरथरूपी बन में जो सुख रूपी पक्षी विचरण 
कर रहें हैं उनको रानी का व वचनरूपी बाज एक झटके में समाप्त करने में उतारू है। शिवजी का 
यह वचन उत्तरकाल में निरूपणीय अथ॑ं का बोधक प्रतिज्ञा-वाक्य है। ग्रन्थकार की दृष्टि मे राजा का 
कौन सा सुख है ? ' विनीत आत्मसम्पन्न सैनापत्ये योवराज्ये वा स्थापयेत्‌” इस नीतिविधान को साथैक 
करने का मनोरथ ही राजा का सुख है। नीतिसार में विनयाधान का उपक्रम इस प्रकार है *--“भआत्मान 
प्रथम राजा विनयेन्ोपपरादयेत्‌ | ततोश्मात्यान्‌ ततो भृत्यानु तत पृत्रान्‌ ततः प्रजा ” इसके अनुसार 
प्रजा की दृष्टि मे राजा दशरथ पूर्ण विश्वास के पात्र हो चुके हैँ। श्रीराम को राज्य देकर अपने मस्तक 
से राज्य-भार दुर करने के लिए भविष्यत्‌ मे पूर्ण सुख की कामना कर रहे थे। स्वराष्ट्र मण्डल मे 
अपना कतंव्य पूर्ण हुआ समझकर वह मानोरथिकसुखनिमित्तक आनन्द ले रहे हैं। तभी केकेयी की 


कुमति ने उत्तको समाप्त करना चाहा है। “भयकरु! का भाव है कि ऐसा भयकारी वचन जिसकी 
कल्पना राजा को नही थी। 


संगति : अग्नमिम तीन चोपाइयो मे कहे कैकेयी के वर-याचनात्मक वचन बाज की चोट के समान 
भयकर सिद्ध होगे। 


चो०सुनहु प्रानप्रिय ! भावत जो का। देहु एक वर भरतहि टीका ॥ १ ॥ 


भावार्थ : केकेयो कहती है कि हे प्राणप्रिय ! [ कपटोक्ति है ] मेरे मनस्‌ में उठनेवालो भावना में 
एक बर--भरत को राजतिलक हो, यह आप दें। 


प्राणप्रिय का स्पष्टीकरण 


पे शा० व्या० : इस सभ्य केंकेयी कपटभाव में है, इसलिए राजा को भुलावे मे रखने के लिए प्रान- 
प्रय कह रही है। राजा की दृष्टि मे '्रानप्रिय' योगार्थक है भर्थात्‌ प्राण से भी बढकर प्रिय | परन्तु रानी 
को हृष्टि मे केवल पतिवाचक शब्द रूढ है। अथवा 'प्रानप्रिय' को सम्बोधन मानकर यह भी अर्थ निकलता 


अयीध्याकाप्डम्‌ श्श्५ 


है कि कुमति म क्ैकेयी अपने ही को राजा का प्राणप्रिय मानकर विश्वास कर रही है कि भरतजो को राज्य 


ह ४ के छिए एक छोटो सो वात है. जिसको देने म प्राणप्रिया की भावना का आदर राजा अवध्य 
करगे। 


चो० मागउ दूसर घर फर जोरी । पुरवहु नाथ मनोरध मोरो ॥ २ ४ 
भावार्थ हाथ जोड़कर पूरा बर मौँगतो हूं! मेरे सनोरथ को आप पूरा करें । 


बर साँगने में फैफेपो का फतृत्थासिमान 
शा० व्यास्या पहुछा वर माँगने म॒देहु” कहकर रानो ने जो निरशंकसा दिखायी है, वह दुसरे 
याचना में नहीं है। वर का यद्यपि केकेयी जानती है कि श्रोयम को वन मेजता अफ्तम काम नहीं है 
पर्षात्‌ अनुचित है ता भो बहू अपना रागप्रयु्ध हठ नहीं छाड्ठो। मही जीव का कतृत्वाभिमान है। 
हसलिए शिवजो राती को मधिमन्द कह खुक हैं । स्मरण रखना खादहिए कि मत्थरा एवं मेकेयी अपनी 
जन्तरास्मा झो प्रतीति के घिदद्ध आचरण फरने फ्रे छिए हुठ पर उठारू हैं इसलछिए मतिमन्द हैं। 


द्वितीयवर में 'नाय' सम्वोधन का फारण 
द्वितोयवर की यावना में रानी का असूयामाव राजा, कोसस्‍्या एव श्रीराम सीनों को दडित करने में 
प्रकट है इसक्तिए केकेयो हाथ जाइकर अर्थात्‌ विधप विनय भाव का झमिनम करते हुए ' ताथ सम्बोधन 
कर रहो है जिसका अथ है पालन-पोपण करने वाछा | इसका ततात्पयं है कि द्वितोय वर को पूर्ति से राजा 
उसका पापण कर सकते हैं । 


जीव फो वु क्भागी होने का योग 

अपनो अन्तराश्मा छी प्रतिति के विरुद्ध, द्वितोयवर के अनोचित्य को समझाने पर भी केकैयी अपना 
दृठ नहीं छोड़गी। एसा हृठ जब जोव करता है छव वह धराया एुःख का भागी होता है नेता श्रीमद्मागवत 
में कहा है।' 

राज्यासिपेक-विधि का बाघ 

दोहा ११ के निर्देशानुसार यहाँ इतना ही ध्यातम्प है कि केक्ेयी की मनोरय-पूति के विज्षेष उल्लेख 
से थो सम के धनवास का विधान राष्ट्रपरागे स्‍्नायात्‌! विधि के समान नैमित्तिक विधि मारूम होता है। 
अत* धीराम को पन में भेजना फैफयी की मनोरथ पूर्ति फे संपादत में अवष्य अनुष्ठेय है। फछस्वस्प 
इस नेमित्तिक विधि ने रामराज्याभिपंक-विधि को तत्काल में बाधित कर चोदह वर्ष कं वाद उस विधि 
को अवराध दिया । 


पहले घर से लास ( भरत टोका ) 
दाह्य ११ में देवताओं ने राम-राज्यामिपेक में विष्द करके ओराम का सुर काज के छिए वन 
मे भेजने की प्रार्यना सरस्वती से की है। उसमें सरस्वती का यह गोरव है कि देवताओं को “ ऊँच 
निवास नोच करतूती” के आक्षेप से वचात हुए देवताओं छ्ले हिल राम के छाप अयोध्या फे र्षण 
का भी ध्यान रखकर ' देहु एक वर भरतहिं टीका! की याघना में कैकेयो को मति का प्रेरित करके 
१ कबियों की उर््ति से संस्कारोदबुद संघ का उल्सेश सि्रता है 
रम्यानि बोष्प प्रपुरा्न मिक्षम्प प्रष्रान्‌ फ्यू ध्युको घर्बात यतु सुछितोपि सस्तु 


१२६ भावाथ॑-शास्त्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


अयोध्या का हित किया है। भरतजी ही एक मात्र ऐसे हिंतकारी हैं जो श्रीराम की अंनुपस्थिति में अयोध्या 
की क्षतिपूर्ति कर सकते हैं | चौदह वर्ष की अवधि में अयोध्या का राज्य सचालून भरतजी द्वारा नही होता 


तो सरस्वती के विष्नकाय॑ में दोष माना जाता। 


“देह” ओर 'भावत जी का” सम्बन्ध 

बैंकेयी द्वारा याचित दो वरदान के कथन में 'देहु! और 'माँगउ' शब्दों पर कुछ विचार व्यक्त करता 
है। 'भावतजी का' की उक्ति में पृव॑प्राप्त भावनाका सबंध है। ऐसी भावताओ का उल्लेख कवियों की 
उक्ति में मिलता है कैकेयी के हृदय में भी ऐसा ही भाव स्फुरित हो रहा है | यह स्फुरण केकेयी के किसी 
पुव॑ प्रबल सस्कार के उदबोघका परिणाम हो सकता है, यद्यपि अपने पुत्र भरतजी को राजा बनाने की 
वासना उसकी पहले कभी नही रही जैसा मन्‍्थरा को डॉटते हुए केकेयी की उक्तिमे “जेठ स्वामि सेवक लघु 
भाई । यह दिनकर कुल रीति सुहाई'' आदि से स्पष्ट है । 

राम-वनवास के लिए 'माँगउ' कहने से पहले वर की याचना में 'देहु'! की तरह दूसरे वर में विनय- 
का विशेष अभिनय करते हुए सरस्वती द्वारा प्रेरित मति होने पर भी राजा के तेजस्‌ के सामने उसको 
वर देहु' कहने का साहस नही हो रहा है। जिस प्रकार श्रीराम वनवास का वर माँगने मे रानी को हिचक है 
उसी प्रकार उक्त वरदान मे राजा को भी असमजस है । एवं 'देहु'” यह ककेयी के स्वातन्त्रय का द्योतक 
है। 'माँगउ' राजा एवं श्रीराम के निर्णयाधीन है। इसमे श्रीराम की वाध्यता और भरत की स्वतन्त्रता 
समझना है। कैकेयी की 'देन कहेउ वरदान दुई। तेउ पावत सन्‍्देहु' इस उक्ति के उत्तर मे 'थाची राखि न 
मागिहु काऊ। दुइ के चारि मागि मकु लेहु ै।/--राजा के इत दोनो वचनो की दुह्ााई देते हुए कंकेयी ते 
पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी' कहा है। अतः राजा के वचन की प्रामाणिकता रखने के लिए श्रीराम ने केकेयी 
का वनवासात्मक मनोरथ स्वीकार किया। इसी प्रकार राजा के “चहत न भरत भूपतिहि भोरे' वचन के 
सन्दर्भ को देखते हुए “भरतहिं टीका” की स्वीकृति भरत के ऊपर निभर करती है। निष्कर्ष यह है कि 
'भावतजी का' से पुव॑ वासना का उद्रेक, उसके तथा मनोरथ से सरस्वती द्वारा प्रेरित मनोभाव का प्राकट्य 
है। 'कर जोरी', नाथ” सबोधन आदि अनुभावो से स्पष्ट होता है कि कैकेयी दूसरे वर की पूर्ति पर भधिक 
महत्त्व दे रही है क्योकि इसमे देवबल भी है । 


विधिपालन की स्वतन्त्रता एवं परतंत्रता में मीमांसा 
उपर्युक्त विषय मे प्राचीन एवं अर्वाचीन आाचार्यों के विचार की परम्परा मनन्तीय है। प्राचीन 
आचाय॑ सत्यसन्ध सन्त महात्माओ ने निरवकाशहेतृपन्यासरहित वचनो को अपने तप -प्रभाव से यदि प्रकट 
किया है तो उन वचनो को पालछून करने मे तवीत आचाय॑ अपना गौरव मानते हैं, उनमे तक॑ करना इष्ट 
नही समझते हैँ। जिन वचनो के पालन मे प्राचीनों ने सत्परामर्श करने का अवसर दिया है उनकी 
मीमासा, न्याय आदि द्वारा निर्णीत करके कार्यान्वयन की स्वीकृति मे नवीन आचाय॑ स्वतस्त्र हैं। पहली 
परम्परा मे श्रीराम हैं, दूसरी मे भरत हैं । 


चो० तापसवेषविसेषि उदासी । चौदह बरिस राम बनबास। ॥ ३ 0 


भावाथ ; मेरा सनोरथ यह है कि तापसवेषविशेष को धारण करते हुए भीराम चोदह वर्षों के 
लिए वनवास करें। 





१. तच्चेतसा स्मरति नूमसवोधपुर्व भावस्थिराणि जनतान्तरसोहुदानि ॥ 


हे 


प्राय पड 


अयोध्याकाप्थस श्र 


तापसब्रेषविशेष का प्रयोजन 
शा० स्या० वेप विशेष से तास्पयं वानप्रस्प की व्यायृत्ति करना है अर्थात्‌ तापस बनकर नहीं, 
बच्कि ठापसयेप घारण करके श्रोराम को यन जाना है। अतएव क्षत्रियोधित आयुष ( घनुपब्राण ) से 
सुधाभित 8 दी वेषविशेष है। राजनैतिकरृष्टि से राजवेप होने से विरोधी तस्‍्वों के संघटन की 
सम्भावना है। 


माता पिता फो आज्ञापालन फी विशेषता 
माता-पिता को आज्ञा का पाछन ही तपोविष्तेप है। उसो को कवि ने सापस धस्द से उल्लिद्धित किया 
है। मासा-पिता फे घघत को यपार्प फरना हो पुत्र के लिए सर्वतोउपरि धर्म है। उस वचन के पाछन में 
शीराम कटिवद होंगे। थ्रो घारदा की अ्रप्रस्तिम महत्ता है कि प्रेकेपी के उदगार उसके सतीत्व के अनुरूप 
छिद होकर 'तापस येपविसेपि! को यथा॑ करने के लिए प्रयागराज में स्वय तपसू ही मूर्तिमान्‌ हो श्रीराम 
जो के घरणा में 98% अंक कावेगा | यही कारण है फ़ि श्रो कोसल्‍््याजी दन में जासे के छिए माता केकेगी 
के बचन का प्रवततेक भानेगी हि 


उदासीनत्व और उसफा समन्वय 

पनवासावधि में होनेबाली छपस्सिद्धि म॑ इतिकर्तंब्यठया अपेक्षित उदासीनत्व फो यहाँ समझाया 
गया है। उदाप्तो का अपे है स्वराम्य के बारे में कामना का स्व॑पा परित्याग | 

प्रइन १४ ये पर्यन्‍्त धीराम उदासीन तो नहीं थे व माता-पिता के वजन का पालन केसे 
सम्पन्न हुआ ? 

उत्तर द्वादघ धर्षाविधि मे मासा-पिता का आज्ञापाछनास्मक तपसू सफछ या पूर्ण होगा सत्पए्चात्‌ 
ग्रतांगमूत उदासोनत्व का स्थाग प्रमु करेंगे। फिर भी पिसा को जाक्ला का अतिक्रमण मीमांसा की सम्मति 
में नहीं मामा जायगा | उदाहरणारें “अधीस्प स्नायात्‌' के अनुसार ग्रह्मचयं में रहकर मधु-मांसादि से 
नियूत्त हवा वेटाघ्ययन करना ग्रह्मचारी के सिए भरतंथ्य है। वेदाध्ययत-समाप्ति मे अमन्तर गृहस्पाश्म में 
प्रगेध का अधिकारी द्वोने पर बेदा्य का बिना समझे गृहस्याश्रम म प्रवेश नहीं कर सकसा, अपितु गुरुकूछ 
में रुरूर मोमासा आदि पढ़ने होंगे। उस समय ब्रह्मचारी होते भी वेदाष्यमनाजु मधुवजनादि के 
निपम ग्ोीमे होते हैं। उठी प्रकार उपर्यूछ तपोवेषविशेष में उदासोनत्व की पूर्ति होने पर राम जी फे छिए 
उदाप्वोनत्व निरस्त हाना अधम्पें नहीं है। यदि वे इसका त्याग नहीं करते सो कानन राजु' का निर्षाह 
एवं राक्षों का विनाषण आदि काये नहीं कर पासे। क्षत्रिय का यही मुष्य धर्म है, उसफो बाधित करता 
धास्प्र को इष्ट नहीं है। 

तापसधिशेष से इतर-ध्यावृत्ति 

एवं थे घापसबेप क्सिषि! का मह अप होगा कि प्रयाग में जाते समय छपस ही स्वयं रामजी के 
दरीर में प्रवेश कर घपने को धीराम का वेपविशेष बना छेगा । 

तापसवेपदिश्ञेप से युधिछ्ठिर भादि के बतयास की व्याधृत्ति होती है। जिस प्रकार परमामु का 
विषेप स्वतःव्यावुस्त माना जाता है उसी प्रकार प्रभु श्रीयम का मह बतबास स्थृत'ः ब्यावृत्त है--यह विशेष 
की विष्ेपयूजना हैँ। पिशेष को ध्यास्या दो० ११५ में दष्टम्प है। 


१ जोफितु भातु . ; ओफियु मातु कल पस शात्ा | तो कातस सह भ्रदण समानता ॥ ( घो०र२ बो० ५६ ) 





१२८ भावाथ शास्त्रीयव्यास्यासमेतम्‌ 


उदासोनत्व की उपपत्ति 

प्रइन : जब श्रीराम को चौदह वर्ष “उदासी” होकर वन में रहता है तो वन में राक्षसों से यद्ध या 
लका पर चढाई और मुनियों को अभय करने में क्या श्रीराम की उदासीनता सिद्ध होगी? 

उत्तर : श्री राम ने चौदह वपं का वनवास माता पिता के आाज्ञापालनात्मक धर्म के ढुप में स्वीकार 
किया है। जिसमे 'कानन राजू भी कर्तव्य है। उस धमंपालन में विध्न उपस्थित होने पर राद्षमों से युद्ध 
करना अथवा वध आदि काय॑ उदासीनत्व का प्रतिघात नहीं कहा जायगा बंयोफि 'तापसवेंपत्रिशेष 
उदासी” के आदर के रक्षाथें पालनात्मक कार्य प्रभु ने किया है। उदाहरणायं शूपनेसा श्रीयम के मुनिम्नतत 
भग मे उद्यता थी और रावण श्रीराम के वध के लिए योजना बना रहा था। कही उद्देष्य छाय के अवसर 
पर ब्रत के अगो की न्यूनता अपनानी होती है, कही कही निपिद्धों को भी उद्देश्य के वास्तविक रक्षार्व विशेष 
अवस्था में तत्काल के लिए अपनाना पडता है, यह मीमासा न्यायसम्मत्त है। यदि उदासोनत्य को अपनाते 
हुए स्वस्थ रहते, तो तीनो मूर्तियों में से किमी का या सबका विनाश होता ता राजा के बचन का प्रामाण्य 
नही कहा जाता | इस उहूँ इय से उदासीनत्व का त्याग उदासीनत्व का असावक नहीं कहा जायगा । 

स्मरणीय है कि श्री राम कौसल्या के सामने 'काननराजू कहकर “चो० ६ दों० ५३" राजघर्म वी 
पूर्वानुस्यूत स्थिति को दुहरावेंगे | इसके अविरोध में केकेयी के सामने 'वनब्राम' स्वीकार करेंगे [ चो० २ 
दो० ४२] तदनुसार गुह के साथ हुए सवाद मे मुनिव्रत को अगीकार करेंगे [ दा> ८८ ]। अत राज्य के 
प्रति उदासीन रहना ही उदासीनता हैं | अरण्पकाण्ड में स्थान-स्थान पर कही मुनिन्नतोक्ति सप्रयाजन है| 
अथवा मत्तिफेरि' द्वारा सरस्वती केकेयी के मुख से “विशेषि' कहलछाकर घरंप्रलन स्थिर करवातो है | अर्थात्‌ 
क्षत्रियजाति मे अबतीर्ण राजा श्रीराम का विशेष काय॑ क्षत्रियोचित प्रजापालन है, उमी को श्रीराम ने माता 
कौसल्या से कहे 'काननराजू में 'राजू! से व्यक्त किया जिसका चित्त बनुर्वारण को तापसबेप में भी बनाये 
रखा । इसलिए सरस्वतो द्वारा प्रेरित कैकैयी के वचन में उदासी का भाव उद्घासित मानना योग्य ठहरता है, 
न कि उदासीनत्व अथवा स्वामी श्रीराम के उदासीनत्व की विभेपता यह होगी कि सेवक भरत भक्ति-- 
सिद्धान्त के आदर्श को अगीकार करके नन्दिगाम में उदासोन भाव को प्रकट करेंगे। अथवा देवताओं 
के वचन 'विसमय हरप रहित रघुराऊ' से श्री राम को उदासीनता स्पष्ट है । 

अथवा उदासी का अर्थ है उपकार या अपकार से अपने को अलग रसना ।" उदासीन व्यक्ति को 
प्रपच से पृथक्‌ रहकर अपने ही अधिकृत मण्डल में उद्युक्त रहना पडता है। उक्त उदासीनता का परिणाम 
होगा कि श्रीराम द्वारा अयोध्या पर भ्रत्याक्रमण की तेयारी नही हो सकेगी। इस प्रकार भर्थशास्त्र में कहे 
राजपुत्ररक्षण-परकरण के अनुसार आटविक वल को सन्नद्ध करके अयोच्या में रहने वाले राजकुमार भरत 
को मारने की तैयारी न हो सकेगी। उदासी अवस्था में अन्यायी राजा भी सहायक न होगे क्योंकि उदासीन 
को सन्धि या विग्नह नही करना है। ऐसी स्थिति में वनवासी श्रीराम को सबल होने का कारण नही होगा । 
यदि वनवास के बाद राज्य में सत्ताधिकार का प्रइन उठाया गया तो उसमें सफलता नही होगी वयोकि 
बारह वर्ष पयंन्त उदासीन रहने के कारण श्रीराम का स्वामित्व स्वय उपेक्षित ठहराया जायगा। 


उदासोीनत्वका मानवता से संबंध 
देवसापेक्षता के बिना केवल शास्त्रानुगमस से मानव अजेय शक्ति प्राप्त कर सकता है--इस 
धारणाको जगाने का कार्य श्रीराम ने किया है। इसका निष्कर्प यह है कि शास्त्र के अनुगमन से देवो की 


१, यो तापकरोत्युपकरोति वा स उदासीनः । 


१७ अपोध्याकाप्डम्‌ श्र 


मनुकूछता होना निश्चित है, इसको मीति फे अनुष्ठान में अ्रयोग करके श्रीराम ने अपने खरित्र से दिखाया 
है जो सपूर्ण राजनीति के लिए आदर्श रूप में अनुकरणीय है | 

सम्पूण भारतोम राजनीति का मूछ भाघार सत्व गुण है जो हप-विपावशून्यता में स्थिर द्वोता है! 
अतः उदासीन द्वाकर श्रीयम ने मानवता को प्रकट किया है-इस हृष्टि से उदासी-विशेषण साथ॑क माक्तूम 
होठा है। दो० ९५ के अन्तर्गत सुमत्र के माध्यम से श्रीराम की उदासीनता में हप-विपाद-झ्ून्मता मछी 
प्रकार समझकर राजा दघ्वरष को सन्तोप होगा। वनबासी' हया उदासी! का मन्‍्तव्य छन्द ७५ में 
सुमिचरा ने छषमण को बताया है| 


घनघास में चोदह घए फा समन्वय 

प्रइव वनपास में चोदह वर्ष की अवधि का प्रयोजन बया है ? 

उत्तर इसमें केझ्षेयो की हुष्टि अलग है ओर सरस्वती की दृष्टि अकग है। केकयी की दृष्टि से 
बपने पुत्र का राज्य स्थिर करने में 'बोदह वप छगेगा। राजनीतिक पक्ष से विघार फरने पर द्वादशविष 
राजमण्डछ प्रेम में हो अपने अधीन किया जा सकता है। प्रीत्ति के वाद उन मण्डछों में अपने प्रति अनुग्या 
बस्या उत्पन्न करने में मी समय छगेगा | इस स्थिति में राज-मण्डल जब तर प्रीति में नहीं पहुँचता है दय 
तक राज्य निर्वाष रूप से भोग्य नहीं हो सकेगा। योगसिद्धि में कायसिद्धि की अवधि योगसूत्र के 
घनुतार १२ वर्ष बठायी गयी है। अतः फेकपी ने सोचा कि राज्य को हहुमू बनाने में श्रीराम के प्रति 
राजमण्दक्त का अनुराग भो कम हांता जायगा। बारह वर्ष के बाद राजमण्डस के' प्रेमस्पिसि को समझाने 
के लिए कुछ ओर समय भी छग सकता है तो दो वर्ष अधिक रख छिया जिसमें राजमण्डलछ पे भय समाप्त 
हो जाय। चोदह थे के अनन्चर मदि श्रीराम जाते हैँ तो राजमण्डछ एवं बतपद उनको नहीं 
चाहँंगे। ऐसो स्थिति में राज्यारोहण श्रीराम के छिए सभष नहीं होगा फ्र्योक्ति एकसन्त्र-राज्य में मी राणा 
होना अनुरागाधीव माना गया है । इस प्रकार कुछराज्य को एकराज्य ( भरतराज्य ) में परिणत् करने 
में खोदहु दपे की अवधि सलेकपी को ठीक पेंची । 

सरस्वती की दृष्टि में प्रधम १२ वर्ष मुनिदम्रत द्ोना है, कार्यसिेद्धि के छिए एक घप॑ पथवटी की 
छीछा में अन्तिम एक वर्ष रूकाकाण्ड-रावण-वध आदि में छगेगा। हस प्रकार सरस्वती ने १४ वर्ष 
के लिए घनवास-पाघनता की प्रेरणा दो है । अथवा राचण-यघ में डोदह वर्प॑ अभी बाकी होगा) 

सगति भरपत-राज्य और राम-बनवास मे दो वरों का परिणाम होगा कि भरत राजगायं में 
ग्यस्त हो अन्यत्र नहीं जा सकसे शोर श्रीराम भो 'तापस वेष उपासी' में धन छोड़कर नहीं आ सकते | 
ड्वितोय यर को सुनने के बाद राजा का ब्याकुछ होना स्वाभाविक है। ! 


चो० सुनि मृवु घघन भूष हियें सोफू । ससिकर छुमत विकल सिसि कोकू ॥ दे ॥ 
भायापष॑ मघुर स्वर में केकेयी का पचन सुन कर राजा हुदय में झोकास्वित हुए। जिस प्रकार 
अनामा की क्षीतत क्षिरों के स्पर्भ से चकवा ब्याकुछ होता है। 


१ बरितिमं क्रेमिम॑मिमसिशसतः पर्र तथाम्र्िमित्रमिर्ज च! पर्गप्मए्दुस्दत! पश्चात्‌ पशकम्स्तमातरं 
बासारावनपोष्चेति । 


२ शमोप्मुबुद्ोशिष्छिक्रोम्तुराम इरितः) ) |] 


१३० भावायं-शास्त्रीयव्याख्यासमेतम्‌ 


राजा दशरथ के लिए श्रीराम का वियोग 

शा० व्या० श्रीराम का वियोग होना सुनकर हो महाराजा का हृदय शोकाक्रान्त हो गया । शोफ 
का अथ॑ नीचे टिप्पणी मे द्रष्टव्य है। पहले भी एक वार श्रीराम का वियोग मह॒पि विश्वामिश्न की याचना के 
अवसर पर हो चुका है। उस समय मुनि वसिष्ठ के द्वारा दी गयी भावी महान मंगल की कल्पना 
मे राजा के चित्त मे शान्ति का अनुभव हो गया था। इस समव ( अपना जन्तकाल समस कर ) मात्री 
आशा की किरणें सवंथा लुप्त हैं, अत' राजा विकल हैँ। १४ वर्ष के बाद प्रभु का आगमन होगा--इस 
आद्या को लेकर राजा दशरथ इस वार क्यो सुखी न हो सके ? इसका उत्तर दो० १५५ की व्याख्या में 
आगे दिया गया है। 


सृदु वचन का भाव 

'मुदु वचन” का भाव यहाँ यह है कि कैकेयी के कोपभरे वचनों के सुनने के बाद प्रानप्रिय/ 
नाथ! आदि के सम्बोधन से उसकी कुछ मुदुता का भाव राजा को प्रतीत हो रहा है। दुसरा भाव 
'मुदु वचन” का यह भी है कि श्रीराम की आत्मीयता का ऐसा प्रभाव है कि 'चौदह बरिस रामु वनवासी' 
कहने में कोप-भावयुक्ता केकेयी भी बोलने में मृदु हो गयी। इस तात्कालिक मृदुता के प्रभाव में राजा 
को कुछ आशा भी हो रही है कि अल्पकालान्तर में शायद केकेयी अपना दूसरा वर वापस ले ले जिसको 
कवि चकवा चकवी के रात्रिकालीन वियोग से सकेतित कर रहें हैं | भर्यात्‌ चकवा की जैसे आशा रहती है 
कि रात्रि बीतने पर फिर प्रिय से सयोग हो जायगा वेसे राजा को भी अपना अभीष्ट ( राम को वन ने 
मेजना ) पूर्ण होने की आश्या वनी है। 


फल्पनातीत विचार 
सगति : चो० १, २, ३ दो० २६ मे कहे गये प्रसग मे राजा का निर्णय है कि रानी का महित करने 
वाला कोई नही है। अतः वह सोच रहे हैं कि पूव॑निर्णय में मिथ्यात्व कैसे आया ? तथा रानी के पूर्वापर 
वचनो में असगति केसे हुई ? ऐसी चिन्ता करते राजा विपाद में डूब गये, कुछ भी न बोल सके | राजा 
दशरथ को दशा को दो० २८ मे कहे वचनरझूप भयकर बाज के झपट से नस्त पक्षियों के झुण्ड के समान 
व्यक्त किया है । 


चों० ; गयउ सहमसि नहि कछु आवा । जनु सचान बन झपटेउ लावा ॥ ५४ 


भावार्थ * राजा ऐसे विह्नल हो गये कि कुछ बोल न सके। मानो बटेरो के झुण्ड पर बाज ने 
क्षपटा मारा हो । 


राजा का जाड़य 
शा० व्या० : विधाद मे डूबकर राजा प्रतिभाहीन हो गये। उस भवस्था में वह न तो रानी के 
प्रस्ताव का समर्थन कर सके न अहित्त के वारे में पूछ सके अर्थात्‌ अप्रतिभारूढ जाडुय के कारण मौत हो 


गये । यह जडता ऐसी ही है जेसे वाज के झटके से पक्षियों का झुण्ड निइचेष्ट हो जाता है। 
संगति : राजा की उस दशा को देखकर कवि ने सात्विकभाव का निरूपण करना प्रारम्भ किया । 


१, प्रतियोगिनि धीत्या तस्नाशेअ्सहिष्णुत्वलक्षणों द्वेष: प्रयमः, द्वितोयस्तु दुःलसाधन--विपदुपनिपातगोचरः । 
( काठय प्रकाश विवरण ४-३८ इलोक ) 


अयीध्याकाण्डसय छि 
चौ० ; विवरन भयउ निपट नरपाल्‍्ू। दामिनि हुनेठ मनहुं सर साल ॥ ६ ॥ 


भावाये राजा एद्धदम दिवर्ण अर्थात्‌ ते्ोहोन हो गये, सानो धा्षपुक्ष को बिजछो मार 
गयी हो | 
राजा का पैधर्ण्य 
ज्ञा० ध्या० सात्विकमभाव में वैयर्ण्य परिगणित है। उसी की प्रधघानता को समझाने के छिए. कवि 
उसका पृथक निरूपण कर रहे हैं। 
संगति इसके बाद वियोगदुःछ का आंगिक अनुमाव समप्नाया जा रहा है। 


चोौ० $ माये हाथ म्‌दि दोठ छोचन । तनु घरि सोचु छाग जनु सोचन ॥ ७॥ 


शोफ का अनुभाव 
भावार्थ शिरस को हाप से पोटना, दोसों नेन्न मूँद छता क्ादि शोर के क्षण हैं जो अंगों में 
स्पाभाषिए स्फुरित होते हैं । ऐसो सोच-दशा में राजा सोचने छगे मानो साक्षात्‌ धरीर 
पारी शोक फी मूर्ति ही हो । 
शा० ख्या० जय याज छिकार के क्िए पक्षियों पर झपट्टा मारता है ठो वे भय के मारे भाँख बन्द 
करके अपनो गद॑न को दोनों पंखों के वीच में छुपा छते हैँ, एंसो पक्षियों की स्वामाविक क्रिया होती है। 
सगति थोक म राजा गया कह रहे हैं ? यह आगे कहा जा रहा है। 


शो० मोर मतोरयु सुरतद फूला । फरत फरिप्ति जिसि हतेव समज्ा ॥ ८ ॥ 


भावाय राजा सोचने छगे झि मेरा सनोरप ( रामराज्य तिसतक ) रुप कस्पवृक्ष में फूछ उप गया 
था। फर कगने के सस्तय केकेपी रूप हृपिनों ने उपको सड़सहित उद्ाड़ फेक है । 


अयोध्या के भविष्यत्‌ पर बिचार 

द्वा० ध्या० गुरु वसिष्ठ के सामने यह एक छाछूसा मत माही से राजा ते रामराज्याभिषेक का 
मनोरघरूप कक््पवुक्ष छगाया। “बढ़त योड जनु छद्दी सुसाघ्वा” से मन्त्रियों के समर्थन होने के बाद उस 
वृक्ष का घढ़ना और धोखा फूटना कहा गया। राज्याभिपेक के निमित्ति से सामग्रियों का छाता, संगर की 
सजावट, बाज-वधावा ादि उस बृक्ष का फूलता है। राज्याभिपेक सम्पन्त होना ही उसमें फक्त छगना 
है। ऐसे फठ छगने के समय मे हो उसको फ्रेफेयो रूपी हृथिनी मे उद्ाड़ फेंका है। उपरोक्त सोच में राजा 
अयोध्या के भविष्यत्‌ को प्रतिभासित कर रह हैं अर्पात्‌ भोराम का घचवास राजासहित सम्पूर्ण भ्रयोध्या को 
दुखप्रद होगा | 

पगति थोयम को पन में मेजकर मरतदी के राज्यारोहण फो प्रजा कमी भी स्वीकार पहीं करेगी 
अयोध्या नगरी छृन्या हो जायेगी | 


चोौ० ; सबंध उजारि कीन्ह फेकेयो । दोन्हीसि कचर विपतति के नेई ॥॥ ९ ॥ 
भाषार्प केकेपी अदय को उजाड़ कर दिपत्ति की नींव सुहद़ कर रही है। 


१३२ भावाथ॑-थास्त्रीयव्याल्यासमेतम्‌ 


राजनीति में प्रमाद से देश का नाश 

शा० व्या० राजनैतिक सिद्धान्त है कि राजा की भूल सम्पूर्ण राष्ट्र को दुखी बनाने में कारण 
होती है। इसलिए राजनीति मे प्रमाद या भूल महान्‌ अपराध माना गया है। रानी की तत्काल गतिविधि 
को समझने मे राजा दशरथ की जो भूल हुई उससे अवघपुरी शोकग्रस्त हो गयी। राजा कह रहे हैँ कि 
श्रीराम के वियोग मे आनेवाली मृत्युरूप विपत्ति का योग मेरे लिए जैसे अचल हो रहा है वेसे ही द्वितीय 
वर की याचना से श्रीराम के विरह में राजा की मृत्यु से होने वाला वेघव्य कंकेयी के छिए अचल विपत्ति 
बनेगी । विलाप मे समय का भान नही रहता भत" उक्ति स्वाभाविक दीघं हो जाती है, इसलिए यह दोहा 
भी ९ चो० मे समाप्त हो रहा है। 

सगति : अति दु ख से राजा किकतंव्यमूढ हो रहे हैं । 

दो० ; कवने अवसर का भयउ गयउ ! नारि विश्वास । 

जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्यानास ॥ २९ ॥ 


भावार्थ ; रामराज्याभिषेक का भवसर है। इस अवसर पर क्या हो गया ? स्त्री का विश्वाप्त 
चला गया। जेंसे योग की सिद्धि मिलने के अवसर पर अविद्या ( अज्ञान या साया ) 
योगी का विनाश कर देती हे । 


अआन्ति में अप्रतिभा होने पर राजा फो खेद 

शा० व्या० : राज्याभिषेकोत्सव का उपक्रम, रानी के सामने उक्त सस्कृत सकलप, रानी की वर- 
थाचना आदि को सोचते हुए राजा अपनी अप्रतिभा पर खेद प्रकट कर रहें हैं। जिस अनथं को राजा 
ने अपने हाथो से अपने ऊपर मढ लिया उसमे रानी को दोपवती न ठह्राकर, स्त्री पर किये विश्वास को ही 
कारण मान रहे हैं। गयउ नारि विश्वास! का अथ्थं विश्वास्यताश्वच्छेदक भार्यात्व नही है, वल्कि 
नारीत्व है। इसका विशेष विवेचन सुन्दर काण्ड में 'ढोल गेंवार शूद्र पशु नारी' के प्रसग में किया गया 
है। राजा ने अभी तक कंकेयी मे भार्यात्व को पृवेवत्‌ समझकर विश्वास किया था, परन्तु भार्यात्व हटकर 
अब उसमे केवल नारीत्व रह गया। भार्यात्व के भ्रम में राजा अपरिहाय॑ प्रतिज्ञा कर बेठे। इस समय 
( दश्चरथ और केकेयी की स्थिति एक-सी है । जिस प्रकार राजा ने रानी भार्यात्व ) के पूव॑ग्रह में भ्रान्ति 
समझा उसी प्रकार केकेयी राजा के पुव॑ग्रह ( आप्तत्व ) मे भ्रान्ति समझ रही हे | इस प्रकार दोनो भ्रान्ति मे 
पड़कर वर-याचना तथा धर्म-वद्ध वरदान की प्रतिज्ञा से दु खभागी हो गये । 


आन्ति में फल फो असिद्धि 

'जतिहि अविद्या नास' का भाव है कि अपने साधन की फलसिद्धि को पृणंता के यत्न में अविद्या 

के वश्षीभूत होकर सयमी जितेन्द्रिय व्यक्ति रहस्पवेत्ता न होने से कार्यंसिद्धि के निकट पहुँचने पर भी 

सिद्धि को खो बेठता है और अपना भी विनाश कर लेता है। ऐसे यति के उदाहरण से कवि समझा रहें हैं 
' कि उपयुक्त भ्रान्तिवश राजा दशरथ भी विपत्ति के चपेट मे आ गये | 
अविद्या में भ्रान्ति फा स्थल 

अविद्या मे कहाँ-कहाँ भ्रान्तियाँ होती हैं ” इसको राजनोति-शास्त्र मे बताया गया है।" भारतीय 


१, अशक्येषु प्रवरतंसानस्यथागवेकलयं निष्फलक्लेशताविपविपत्तिरन्तत्तापदच । 


अंयोध्याकाध्डस्‌ १३३ 


शास्त्रों में निदिष्ट भरान्वीक्षिकी, श्रयी, वार्ता ओर दष्डनीति इन चारों विज्ञाओं में जय तक जिवेन्द्रिय 
ध्यक्ति परिनिष्ठिस नहीं होता तब तक अधिदा का विनाश कथमपि नहीं हो सकता । इस विषय को अरप्य 
काष्ड मे खो० ४, ५, दोहा १५ के घिवेचन में व्याश्याति किया गया है। इन चारों विद्यार्ओों को विना 
अच्छी तरह समस्ते तन्‍्त्र-विद्या में भी सफलता मिछना संदिग्प है। 

संग्रति राम को वर देने का उत्साह दो गया । 


चो० * एहि विधि राउ सर्नाह मन झांसा । देस्ति कुर्माति कुमति सन माता ॥ १॥ 


भायार्प चो०४से दो० २९ तह में कहो एहिंविधि है लिसमें राजा मनहो सन प्लींच रहे हैं। 
अर्थात्‌ वु.स्त से कछप रहे हैं ओर पछता रहे हैं। राचा को ऐसी विश्ठ दक्षा को देशकर 
कैकेयो मनस्‌ में क्रोषिता हो उठी 


भ्रान्ति का परिचय होने पर काय में अनुत्साह 
शा० ब्या० कवि कह रहे है कि राजा को जब अपनी भ्रान्सि समप्न में आयी सथ वह भीसर ही 
भीधर छिप्त होने छगे | अब उनका वर देने का उत्साह भी क्षीणहो गया क्योंकि कैकेयी का नारीत्वस्वरूप 
समझने के अनन्सर राजा के छुंदय में अब न तो प्रिमश्रवणादिप्रयुक्त आवेग है ओर न हुए ।' 


फेफेयो में क्रोध को पुनरावृत्ति 
देखि कु्मांति' से राजा के दानप्रयोजफ ओस्सुबम के असाव को देखकर केफेयी क्रोष में था 
रहो है, जिसकी 'कुमति मन माखा” से व्यक्त किया है। ऋष्विजों का कर्तव्य हो जाता है कि यज्रमास की 
इच्छा का अनुसरण करें, देसा न करने से यजमान का कर्सृत्व अससृप्राय दो जाता है, उसो प्रकार 'दु 
के चारि मा्गि मझु छेहू' से स्थातन्त्यपू्ं कततुंस्व देकर झेकेयी को यजमान बनाकर राजा उसके सामने 
ऋत्विक स्पानापप्त हो गये। अब उसकी इच्छा का अनुसरण नकरने से करेकेयी को क्रो था रहा है। 
“प्राणप्रिय/ थादि कहुकर रानी सामप्रयोग से घरपाघना कर चुकी है। तत्काल मनोरथपूर्ति होते ते 
देखकर अय दण्शभय दिखाकर अपना काये सिद्ध करना बाहती है। 
संग्रति जनु सचान बन झफ्टेठ छाना' को चरितार्थ करते हुए क्रेकेयी कटु--उक्ति से राबा पर 
प्रहार कर रही है। 
घोौ० भरतु कि राउर पूत न होहों । भानेहु मोस धेसाहि कि मोहो ॥ २ ॥ 
भावाप॑ क्ेकेयो छोप से घोछ रही है स्ि ब्या सरतल्रो तुस्हारा पुष्र मही है ? क्या सुप्तको मोल 
झरोद कर छाये हो ? उसके कहे का भाव मही है कि विधाहिता पत्ती से समप्तकर 
राज्याधिकार से वंचित करने में क्या पुत्र मरतझो को उपेका करते हैं ? 


फ्रुलराज्य 
हा» ब्या» राजनीति सिद्धान्तानुसार जब सभी वंश तनिमंछ है और राज्य संघाक्षन-क्षम, पितीत 
एवं सात्पिफ हैं. तो 'कुछराज्य' की घोषणा होनी चाहिए | इस पक्ष को ठुकराकर भरतणों फे असाप्तिष्य 
१ प्िपाड्पाणिढ़ारित्य ) 


१३४ भावाथ॑-शास्त्रीयव्यास्यासमेतम्‌ 


मे राज्याभिषेक कैसे हो सकता है ? इस पक्ष को प्रतिपादित करते कैकेयी आगे बोलती है क्या मैं “वेद्या हूँ ? 
या खरीदकर लायी हुई दासी हूँ ? जिससे मेरा पुत्र कुछ से वहिंष्कृत समझकर राज्यधिकार से वचित किया 
जा रहाहै।” 
संगति : राजा की इच्छा को ही नियामक मानने से पुर्वापर विरोध की स्थिति खडी होगी जो रानी 
कहने जा रही है 
चौ० : जो सुनि सह अस लाग तुम्हारे । काहे न बोलेहु वचनु संभारे ॥ ३ ॥ 
देहु उतर अनुकरहु कि नाही। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहों ॥ ४ ॥ 


भावार्थ : जो भरत हि टीका! को सुनकर तुम को मानो वाण लगा हे तो पहले ही सोचकर क्यो 
नहों बोले ? अर्थात्‌ यह क्यो कहा कि “दुइ के चारि मागि सु लेहु, राम सपथ सत 
मोही ४” यानी उत्तर दीजिये ( हाँ फहिये या नही कहिये ) आपत्ो रघुकुल में सत्यसघ 
प्रसिद्ध हैं । 


राजा के परस्परविरोध का प्रकाशन 


ज्ञा० व्या० : पहले तो राजा ने वर माँगने मे कैकेयी को स्वतन्त्रता प्रदान कर दी भव अपनी 
इच्छा के विपरीत होते देखकर वे देने मे हिचक रहे हैं जो परस्पर विरोधी वात है। 


सत्यसधता और कुलीनता की दोहाई रामसपथ द्वारा देकर पररुपर विरोधी वचन्तो को बोलने में 
विवेक न करना दुरात्मा के लक्षण हैं। जो राजा में सिद्ध हो रहे है। गत वर देने में “हाँ या नही” 
स्पष्ट उत्तर रानी चाहती है। 


चौ० ४ दोहा २८ मे राजा की उक्ति “रघुकुछ रीति सदा चलि आई”। प्रान जाहुँपर बचन न 
जाई, की याद दिलाते हुए केकेयी कहती है कि राजा अपने वचन को पूर्ण करें । 


संगति : इतने पर भी राजा नही वोले तो आगे का दण्ड बता रही है। 
चो० ; देन कहेहु अब जनि बरु देहु। तजहु सत्य जग अपजस लेहू ॥ ५॥ 


भावार्थ : पहले तो वर देगें कहा । अब भले मत दोजिये। सत्य को आप छोड़ते हे तो आप को 
अपयदास सिलेगा । 


शा ब्या० : यदि राजा वर देने की वात टालना चाहते हैं तो वे इह लोक मे अपयशोरूप दण्ड के 
भागी होगे क्योकि राजशास्त्र के सिद्धान्तानुसार असत्य बोलने वाले राजा के प्रति प्रजा का अविश्वास 
होता है। जिसके परिणाम मे अलक्ष्मी का प्रवेश होता है। अलक्ष्मी घर मे रहेगी तो कोप--दण्ड का तेजस्‌ 
आदि सब समाप्त हो जायगा । फलत राजत्व जीवित दशा मे ही असत्‌ प्राय हो जायगा | जैसा राजा कि 
उक्ति चो० ५-६ दो० २८ से स्पष्ट है । 


संगति * चौ० ३ भे “भागिलेहु” से राजा का देय पदार्थ वह सब है जो वालकाण्ड चौ० ३ दोहा 
२०८ मे विश्वामित्र से कि उक्ति मे 'मागहु भूमि घेनु धन कोसा-सव॑ंस देउ आज सहरोषा' से स्पष्ट है। 
केकेयी अपनी महत्ता दिखाने के लिए उन सब पदार्थों चबेना के समान तुच्छ बताकर यह प्रकट करना 
चाहती है कि सत्यसध राजा से ऐसी तुच्छ वस्तुएं मागने की अपेक्षा नही है। ' 


अयोध्याकाष्डम्‌ 9] 


चो० सप्य सरांहि फहेहु वर देता | सानेहु लेइहि साँगि चबेता ॥ ६ ॥ 
भादार्प घो०४से ६दो २८ में सत्य की प्रदासा कर को पर देसे के कहा ओर मनप्‌ में समझा 
कि घवेना छेसी कोई सस्ती पस्सु साँग छेगी 


“अलम्य घर को प्रायना 

शा० घ्या० राजा की सत्यता के गोरव के अनुरूप पही याचना क्षोमतीम मोर सफल कही जा 
सकती है जा त्वतृकृति बिना सभव नहीं है अर्थात्‌ श्रीराम को वनवास और मरतजी को राज्य--ऐसे अखम्प 
योग को थनाने में फेयछ राजा समयें हैं। बिस प्रकार मछ मगवान्‌ से वर्याचना के प्रसंग म॑ कहता है कि 
संसार के पदार्थ घन, घाम सुत आदि बया माँग? ये तो प्रस्पेक जन्म में अयाधित ही मिलते रहे हैं । 
माँगना तो घह है जो भर कोई देने में समर्थ महों न तो किसी से मिछ ही सकता है ।' 

सगति ऐसे भवसर भो जाते हैं जब सत्य को छोडना पड़ता है। फ्रेकेयी के वनों को सुनकर 
सत्य को कार्यात्वयन करने म॑ राजा को रुचि को कमी को देखकर उस रुचि के उत्पादताशे सत्यपाऊ़क 
महास्मा््रों के इतिहास गो ओर राजा का ध्यान आकपित करते हुए रानी कह रदी है । 

चौ० सिचि दघोचि यल्ि जो फछु भाषा। तनु, धनु तजेख बचन पनु रास्ता 0 ७ ७ 
भावार्ष राजा शिवि, महपि दइपोचि ओर राज़ां यक्ति ने ण्रो छुछ कहा, अपने वघनपाकत में 
घाहे उनको तन पतन का स्थाग करना पड़ा, पर अपनी प्रतिशा को उन्हेंने घमापे र्ता । 
सत्य-पालन में फो्ति 

शा० भ्या० जिनको इतिहास में अमर क्रेति की स्थापना करनी द्ोती है थे छोग किसी मो अवसर 
पर सत्य नहीं स्यागते, उदाहरण के छिए शिविं, दघीचि य्छि याद प्रसिद्ध हैं) दघ्तरथ भी उसी नामावष्ति में 
गिने जाने योग्य हैं। फेकेयो कहती है कि ऐसी स्थिति में क्या राजा उसके धच्नर्नों को पूर्ण नहीं कर सकते ? 
बह कोई ऐसा असंभव विषय उनके सामने नहीं रख रहो है जिसके निमित्त उत्तको सत्य का परित्याग 
झरना अपरिशायं हो; बयोफि उसको याचना धातहों रादिन मगिहु राह के अनुसार घप्तस॑दद्ध है 


तोन राजाओं के फोर्तेव का प्रयोजन 
सत्यपारून करने वाले ऐतिहासिक व्यक्तियों के नामकीततेन में साक्षी रूप पे तीन का ताम छेना 
अमंधास्त्र के यिधान ( त्रियाणां एकवाक्यस्वे संभत्मय” ) के अनुसार है अर्पात्‌ जिस एक जप॑ को पृथर्तपा 
तीन साक्षी निश्मण करते हों, उसको यथायंता सर्वमान्य हो जाती है। अत विभिन्त क्राहिक तीन 
महात्माओा के नाम सस्पपाछन मे प्रवृत्युपपाय झाचि उत्पन्न कराने हेतु से छिए गये हैं । 
स्मरण रखना चाहिये कि पहले हो मम्परा ने दो० १८ में “कृहिसि कथा सत सवति के” से सत्य 
मौर सो फी कथाओं का निरूपण किया है। उनमें सोत की कथा दो० १९ में कद्मू घिससा के इतिहास 
से हा चुकी है। सत्य की फया का उल्लेख फ्षेकेयी द्वारा यहाँ हो रहा है। 
संगति छियजी कह रहे हैँ कि इस समय राजा को सत्य का महस््व प्रदर्शित ररने वाले केकेयी के 
ये वचन कठोर छग रहे हैं। 
१ भवैत्यप्राषितम्‌ ध्यर्षभ्‌ धिश्स्सिष पठापुपि | । 
प्रसाद्च जपदात्मान तपता दुप्प्रसारर्म । 
सबब्फिरमपाणेई प्र्ब स्ाम्यधिवित' ॥ ( सापथध' ४ । ९। ३४ ) 


१२६ भावाथ॑-शास्त्रीयव्यास्यासमेतम्‌ 


चौ० ; अतिफटुवचन कहति केकेई । समानहुँ लोन जरे पर देई ॥ ८ ॥ 


भावार्थ - क्रैकेयी अत्यन्त कठोर वचन बोल रही है, मानो घाव पर नमक छिड़क कर उसको पीड़ा 
को बढ़ा रही हो । भर्थात्‌ फैकेयी के वरयाचनावचन को सुनकर राजा को--शोक हुआ है 
उसमें कैफेयी के वचन से राजा की सनोव्यया अधिक बढ गयी । 


राजा दशरथ का दु'ख 
शा० व्या० इस समय राजा के तीन दुःख शिवजी प्रकट कर रहें है। ( १) ककेयी के कोपयुक्त 
वचनो की कठोरता (२) प्रतिज्ञात वर न देने पर अपकीर्ति (३ ) सत्यपक्ष अपनाने पर राम-वनवास- 
जनितवियोग | उक्त त्रिविध दु खो से निकलकर किसको त्यागना या किसको अपनाना यह महती समस्या 
उन्तके सामने खडी है जिसका समाधान न पाकर राजा विचार मे डूबे पीडाक्रान्त हो रहे हैं। अन्ततः राजा 
इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि इस उलझन में फैसने वाली समस्या का समाधान रानी के हाथ मे हैं। यदि 
वरयाचना वापस ले लेती है तो बच सकते हैं अन्यथा मृत्यु तो दिखाई पड ही रही है। 


सगति * दु खी होकर राजा अपनी ऋृत्यसाध्यतात्मक दीनता प्रकट कर रहे हैँ ! 


दोहा धरमधुरंधर धीर धरि नयन् उघारे रायें। 
सिरु धुनि लोन्ह उसास असि मारेसि मोहि कुठायें ॥ ३० ॥ 


भावार्थ धर्मंधुरंघर राजा ने इस सम्य धैर्य धारण किया । अपनी आँखो को किसी तरह खोला 
( 'मूंदि दो लोचन' से पहुले कह जाये हैं कि राजा ने आँखें वच्द करली थी ) सिर पीठते 
लंबी श्वाप्त लेते हुए सोचा कि इसने मुझे बड़ी कठित परिस्थिति में डालकर तलवार 
का आघात किया हैं । 


राजा की धर्मंधुरंधरता 

शा० व्या० * शिवजी राजा दशरथ को 'धमंधुरघर धीर धरि' कह रहे है । 

प्रथम विशेषण “धरम घुरधर' का तात्पयं इस प्रकार है--राज्य सत्पप्रचुर धर्म की त्तीव पर स्थिर 
रहता है क्योंकि नीतिमर्यादा में स्थित राजा मे ही प्रजा की प्रेमपात्रता सभावित्त है। इस प्रकार धमराज्य 
के स्थेयं का उपजीव्य है। यदि राजा निव्यंसती है तो सम्पुर्ण प्रजा भी अप्रमादिनी रहती है। राजा के 
धमच्युत होने पर भ्रजा प्रमादिनी हो राष्ट्रकम॑ से च्युता हो जाती है। फलछत. अन्न आदि की उत्पत्ति 
क्षीण हो जाती है। अत नीतिमान्‌ राजा धर्म को आजीवन निभाना अपना कतंव्य समझते हैं। यहाँ धर्म 
की व्याख्या 'मानवाद्युपदिष्ट परिपालनम्‌' से हैं| सत्य को ठुकराया जाय तो राजा का राजत्व निरस्त 
हो जाता है वह निर्माल्य के समान त्याज्य भी हो जाता है। यह दोष राजा दशरथ मे नही है। किवहुना 
वह धर्म की धुरा को उठाने मे इतने अभ्यस्त हैं कि कोई भी अवस्था नीति से च्युत होने की ओर 
उनको जब आदक्रृष्ट करतो है, तब वह अपने सत्य कतंव्य से च्युत नही होते यही उनकी धरमंधुरघरता है। 
“धर्मंधुरधर” से यह भी सकेत है कि राजा केकेयी की वर्याचना को “थाती राखि न मागहु काऊ' की 
वचनबद्धता के योग से घ्मंसबद्ध समझते भी हैं । 


१. प्रजायां व्यसतस्थायां न किन्निदपि सिद्धयति ॥ ( नी० सं० )। 


१८ अपोध्याकाए्इस १३७ 


घोरघरि फा भाव 

पधरमंपालन मे पयुति ते हो एपं घचनको सत्यता भी रहे-एठदर्य रानी को समघाने झा प्रथत्त करना 
राजा को पोस्ता है। पेय के संगध म यछष्य चो० दो० ८१ की भ्यास्या में द्रष्टव्य है वह चो० ८ दो० 
ह में समषितद्ों रहो ह्रै। मपने वर्धनों से रानी मे राजा को ऐसी स्थिठि में रख दिया है बिसम हाँया 
ना कहूना नो उनको मुप्िक्त हो यया | सम्पूर्ण ओोजस्‌ समाप्त हो जाने से राजा का विपाद इतना घढ़ गया 
कि रामवनयाप्ध्यनमात्र से इछनो थस्‍्यघिक पोड़ा हो गयो कि आँखें भी नहीं छोछ पा रहे हैं) तथापि 
जिस पदार अपनी ग्रानि और दुरश में पुप्रजस्म के लिए पेय॑ रख्ता' उसो प्रकार पेय के वक्त पर इस सकट 
ही पह्टो म नो भागे पोलने का प्रयस्त कर रहे हैँ अर्पात्‌ गेकेयो को समझाने में सफलता को आणा कर 
खेद 

प्ंगति रेक्ेयों का रोप राजा की मृस्यु म॑ं कारण हो रहा है मह समझाने के लिए प्रत्यकार रोपका 
वणन झर रहे हैं । 

ची० भागे दोपि जरत रिस भारो। मनहें रोप तरवारि उधारी ॥ १॥ 
भाषा मत्पन्त क्ोप मे जरूतो के फपोषो सामने देश, माना छोघ में तछूवार निकाछो हो । 


फेफेपो फा रोप 

द्या० प्या० पतिक उत्तर न दन से प्रोकेयों आार्द्रहृदया न हाकर क्रोध मे ओर भी कठोरा दिश्ाई 
पढ़ स्हो है। थियजी फेफसी रे फ्राप फा राजा के शिए प्राथघासक समझकर “राप' कह रहे हैं। स्त्री-युस्प 
डा प्रभय्॒रस्यपी प्रांपघ भा राप! कहां जाता है। उसके प्रतोकार के लिए स्प्री-युर्य में किसी एक के 
प्रापंता करते पर उसडत घान्त द्वाना चाहिए। यदि एंसा करने पर घान्त न हुआ तो जोधित की स्पिति 
नाजुश्र हा जाता है। मयरासंयाद म बड़ा जा चुका है कि ग्कयो छा रोप राजा रू प्रति द्ेप में परिषत 
हो घुका है, इसलिए प्राप॑ंना करने पर सनो रोपमुझा नहीं हो रही है। 

संगति अब खानी फ्रापस्सो तछवार का यार करने थी तैयारो कर रही है । 


घो० मूढि कुबुद्धि घार निदुराई । धरी फूबरों सान बनाई ॥ २ ॥ 


भावा्य॑ उक्त तछपार को मुठिया कुबुद्धि है धार फठोस्ता है। कुनड़ो ने उसको सान रफ्षकर 
है यना दिया है अर्थात्‌ फकेयो की फुप्ति में निप्युरत! दोश रही है पह फुबड़ों दारा 
उभाड़ो गयी है । 
फुबरो फे फुमभ्रणा का परिणाम 
च्ञा० भ्या० पेकेफों फो फ्रोप रूपी तरूवार पर कुमत्र॒णा को धार घढ़ी है और कुमति के मूठ से 
जड़ड़ो हुई है। यदि छुमप्रणा न होती छो राजा के मनाने पर रानी का क्रोध घान्व हो जाता। 
सगति रानी का फ्राप घान्त होते न देखकर राजा को सम्देश हुआ कि पोड़ा के अनुसव में बया 
मुस्पु दी जायगी ?ै मया राम राज्य दखने को नहीं मिछेगा ? अर्थात्‌ 'योगेनान्ते तनु स्पजाम' भी हीं होगा ? 


घो०  लफ्सी महीप फराक फठोरा । सत्य कि जोवनु लेइृहि मोरा ? ॥ ३ 0 
३ 'परहु पीर होपहह घुत बा ( दी+ ४ रो १८६ दा« का० )१ 


१३८ भावाय॑-शास्त्रीयव्यास्यासमेतम्‌ 


भावार्थ : राजा ने उस भयकर रोपरूपी तलवार को देखा और समझा कि उसका बार सचमुच 
जीवन ले लेगा ? अथवा सत्य के पालन में हो जीवन जायगा क्‍या ? 
यथासम्भव मुत्यु से बचने फा उपाय 
द्वा० ब्या० : “मृत्यु वृद्धिमताओपोह्यो यावद्‌ बुद्धिधलोदय” के अनुसार राजा ने कक़ेबी का रोध 
शान्त करने के उपाय के अन्तगंत अतिधीर होकर पुन समझ